जो नाम ले जाति का, उसके मन में खोट

हाल ही में समाजवादी पार्टी ने अपना चुनावी घोषणा-पत्र जारी किया जिसमें लिखा है कि अगर उनकी सरकार दिल्ली में बनी तो ऊँची जाति वाले अमीर लोगों से अलग से कर वसूला जायेगा। केवल जाति और मझहब के गणित पर आस लगाए सत्ता पाने की आस लगाए मायावती-अखिलेश गठबंधन से यह घोषणा होना कोई अचंभा नहीं है। हालांकि संवैधानिक रूप से किसी जाति के लोगों पर जज़िया जैसा कर लगा पाना संभव नही है, किन्तु देश को जाति के नाम पर बांटने का कैसे षड्यंत्र रचा जा रहा है यह साफ दिख रहा है।

असल में मायावती और अखिलेश का चुनावी मंत्र ही जातिवाद आधारित वोटबैंक की राजनीति है। इस प्रकार अगर ये लोग कोई घोटाला भी कर जाएँ तो भी इनका वोट बैंक डगमग नहीं होता क्योंकि इस आधार पर चुनी गयी सरकार को फर्क ही नहीं पड़ता कि प्रदेश की प्रगति के लिए कुछ काम किया जाए या नही। बस लोगों को अपनी अपनी जाति या मज़हब पर वोट डालने के लिए बहला-फुसला दो, जातियों को एक दुसरे का दुश्मन बना दो या कोई डर दिखा दो और अपनी सरकार बार-बार बनाते रहो। इसपर मुझे अपनी एक पुरानी कविता याद आ गयी:

जाति में ख्याति है,
ख्याति में है वोट।
जो नाम ले जाति का,
समझो उसके मन में खोट।

यहाँ ख्याति से मतलब पहचान से है। जबतक आप खुद को जाति की पहचान से मुक्त नही करते आप उसपर ही वोट करेंगे। पर जब समझ आएगा कि समाज बदल चुका है और जाति का औचित्य खत्म हो चुका है तो आपको कोई बहका नही सकता। यूपी में आज एक जाट, ठाकुर व् यादव दुकान भी चला रहा है, बनिया नौकरी कर रहा है, दलित अफसर बन रहा है, और पंडित वेदों से कोसों दूर है। समाज में पुरानी जाति व्यवस्था बस नाम की रह गयी है, काम की नही, पर जाति के नाम पर सत्ता सुख का सपना देखने वाले कैसे जाति को विलुप्त होने दे सकते हैं? यह समाप्त हो गया तो वोटबैंक वाली राजनीति का क्या होगा?

उत्तर प्रदेश का महागठबंधन नौकरी देने की बजाय, अमीरों से लूट कर गरीबों में बांटने का सपना दे रहे हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि ऐसी समाजवादी/कम्युनिस्ट स्टाइल की घोषणाएं समाज में असंतोष व् अलगाव ला सकतीं हैं और पूरा प्रदेश अन्धकार में डूब सकता है क्योकि ऐसी घोषणाओं से व्यापारी वर्ग पलायन कर सकता है। रूस ने इस प्रकार की सोच से कब की तौबा कर ली है और अब तो चीन भी बस नाम का कम्युनिस्ट रह गया है।। समाजवादी सोच से उपजी हिंसा ने रूस, चीन, कम्बोडिया, आदि देशों में लाखों लोग मरवाये हैं। ये लोग गरीबों के मसीहा बताकर सत्ता में आते हैं और फिर सबसे पहले गरीब ही मारते हैं वो भी लाखों के संख्या में। इन लोगों को इतिहास से कुछ सीखना चाहिए और ऐसी घोषणाएं करने से पहले भविष्य में समाज पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव के बारे में सोचना चाहिए।

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