Tuesday, June 22, 2021
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गुप्त काल को स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है

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प्राचीन भारतीय इतिहास में गुप्त काल का इतिहास एक श्रेष्ठ स्थान रखता है। गुप्त सम्राटों ने उत्तर भारत को एक राजनीतिक स्थिरता प्रदान की। गुप्त साम्राज्य २०० वर्षों तक रहा। एक के बाद एक योग्य सम्राटों ने अपने साम्राज्य को दूर तक फैलाया। करीब पूरे भारतवर्ष को इन्होंने एक सूत्र में बांध दिया था। गुप्त काल में हिन्दू धर्म को उन्नति मिली तो बाकी धर्मो को भी स्थान मिला। आइए जानते हैं कि इस युग को स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है? आखिर ऐसी क्या विशेषता रही इस युग की? सबसे पहले इनकी उत्पत्ति और जो इस काल के राजा हुए, उनके बारे में जान लेते हैं।

वंश, उत्पत्ति और विभिन्न सम्राट

इस वंश की उत्पत्ति चन्द्रगुप्त प्रथम से मानी जाती है लेकिन इसका पूर्णतया विस्तार और विकास समुद्रगप्त ने किया। किसी लेखक ने इन्हे वैश्य कहा तो किसी ने छात्रिय। समुद्रगप्त का राज्याभिषेक ३२० ई में हुआ। समुद्रगुप्त के भाईयों ने विद्रोह भी किया लेकिन जल्दी ही समुद्रगुप्त ने इस विद्रोह को दबा दिया। समुद्रगप्त के बाद उसका पुत्र रामगुप्त गद्दी पर बैठा। रामगुप्त बहुत ही कम समय के लिए राजा बना। रामगुप्त के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय राजा बना और उसने समुद्रगप्त की तरह राज्य का विस्तार किया।

समुद्रगुप्त द्वितीय के बाद कुमारगुप्त सिंहासन पर बैठा और सबसे आखिरी राजा इस युग का स्कंदगुप्त था। ऐसा नहीं है कि स्कंदगुप्त के बाद राजा नहीं हुए। इसके बाद क्रमशः पुरुगुप्त, बुदुगुप्त हुए लेकिन इनमें से कोई भी राज्य को संभाल नहीं पाया। धीरे धीरे राज्य की नींव कमजोर होती हुई। बाहरी आक्रमण होने लगे, अंतर्युद्ध छिड़ गया और गुप्त काल धीरे धीरे समाप्त होता चला गया।जिस तरह समुद्रगुप्त ने राज्य को संभाला उसका विस्तार किया वैसा बाद के राजा नहीं कर पाए।

समुद्रगुप्त के शासन काल में हर छेत्र में वृद्धि हुई। चाहे वो शिक्षा हो कला का छेत्र हो या आर्थिक और सामाजिक उन्नति हो किन्तु सबसे ज्यादा हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति को बल मिला। इस काल की सबसे मुख्य विशेषता ये रही कि इस युग में संस्कृत को राजकीय भाषा का सम्मान मिला।

शासन प्रबंध

उस समय के राजाओं को धर्म का अवतार माना जाता था।धरती पर उन्हें विष्णु का रूप माना जाता था।राजा की सहायता के लिए अनेक मंत्री और अमात्य होते थे।राजा के लिए भी कुछ नियम होते थे और जी राजा उन नियमो का पालन नहीं करता था तो उसे सिंहासन से उतार दिया जाता था। केंद्र के बड़े अधिकारियों में मंत्री, महासेनापती,और दण्डनायक होते थे। राज्य की आय का मुख्य साधन लगान था। न्याय की ओर पूर्ण ध्यान दिया जाता था। दंड व्यवस्था कठोर नहीं थी। अपराधी को जुर्माना लेकर छोड़ दिया जाता था।

अगर कोई घोर अपराध करता था तब उसका दाहिना हाथ काट दिया जाता था।राजा का कर्तव्य केवल राज्य की सुराकछा,शांति स्थापित करना और भौतिक उन्नति करना ही नहीं था बल्कि नैतिक और आध्यत्मिक प्रगति का भी प्रयत्न करना था। शासन की दृष्टि से सम्पूर्ण राज्य प्रांतों में विभाजित था।जिन्हें भुक्ती अथवा भोग कहा जाता था। समुद्रगप्त के शासन काल में शासन व्यवस्था बहुत सुदृढ़ थी। समुद्रगुप्त ने पूरे हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो दिया था। सभी राज्यो और राजाओं को अपने आधीन कर लिया था।जो राज्य दूर थे। उन्हें जीतकर उनका राज्य वापिस तो कर दिया था लेकिन उनसे कर यानी टैक्स  वसूल किया जाता था।

अधीनस्थ राजाओं को अपनी सीमाओं के अंतर्गत स्वेच्छा से शासन करने का अधिकार प्राप्त था। यही कारण रहा कि जब गुप्त सम्राट दुर्बल हुए तब इन राजवंशों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। एक सफल शासन की नींव समुद्रगप्त ने अपने शासनकाल में ही रख दी थी इसीलिए गुप्त सम्राटों का शासन अत्यधिक सफल रहा। साम्राज्य की दृढ़ता शांति और नागरिकों की उन्नति इसके प्रमाण थे।

सामाजिक दशा

गुप्त सम्राट हिन्दू धर्म के समर्थक थे। इसी कारण इस काल में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता और हिन्दुओं की चतुर्वर्ण व्यवस्था पर विशेष बल दिया गया। गुप्त काल से पहले कई विदेशी आक्रमणकारी आए और यहीं भारत में बस गए। इन विदेशियों को हिन्दू समाज में स्थान दिया गया। उद्योग और व्यापार में उन्नति हुई, इसी कारण धनाढ्य वर्ग की उत्पत्ति हुई। इस काल में वर्ण व्यवस्था पर भी जोर दिया गया लेकिन बहुत ही उदारता के साथ।

कोई भी अपना धर्म बदल सकता था। शूद्र व्यापार कर सकते थे। वो सेना में भी भर्ती हो सकते थे। ब्राह्मण भी सेना में शामिल हो सकते थे। छत्रिय व्यापार करने लगे और उन्हें वेद पढ़ने का अधिकार भी दिया गया। शूद्रों को कहा गया कि अगर वो सदाचारी रहते हैं तो उन्हें यज्ञ करने का भी अधिकार है। गुप्त काल की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि, शूद्रों की स्थिति में काफी सुधार हुआ।

जब वर्ण व्यवस्था पर ज्यादा जोर नहीं दिया गया तो दास प्रथा भी कमजोर हो गई। बाहर के कई विदेशी यात्री जब भारत भ्रमण पर आए तब वो भी ये पता नहीं लगा सके कि दास प्रथा भी प्रचलित थी। दासो के साथ अनुचित व्यवहार नहीं किया जाता था। किसी पर भी कठोर नियम लागू नहीं होते थे फिर भी न्याय व्यवस्था बेहद मजबूत थी।दास अधिकतर उन्हीं लोगों को बनाया जाता था जो युद्धबंदी और कर्जदार होते थे। किसानों की हालत में भी सुधार हुआ। कृषि पर विशेष बल दिया गया।उनसे ज्यादा लगान भी नहीं वसूला जाता था।जो धनाढ्य वर्ग था, उसने गरीबों और यात्रियों के लिए अनेक धर्मशाला बनवा दी थी।

औरतों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। औरतें बड़ी आयु में विवाह करती थी। कोई धार्मिक अथवा राजनीतिक आयोजन होता था तो औरतें उनमें समान रूप से भाग लेती थी। इस काल में एक पत्नी का प्रचलन था। केवल राजा और अमीर वर्ग के लोग ही एक से ज्यादा पत्नी रख सकते थे।औरत को त्यागने का अधिकार किसी को ना था। इस युग में गनिकाओ यानी वेश्याओं को नफरत से नहीं देखा जाता था।इन्हे देवदासी भी कहा जाता था।वहां के बड़े मंदिरों में देवदासी रहने लगी थी।उनसे नृत्य और गायन कला में निपुण होने की आशा रखी जाती थी।

व्यक्तियों का चरित्र बहुत श्रेष्ठ होता था। ईमानदारी, सच्चाई, साहस, सादगी, दान, उदारता, शीक्छा, आदि ऐसे अनेक मानवीय गुण थे जिनका पालन सभी करते थे। खान पान में हर व्यक्ति सात्विक था। मांस और शराब का प्रयोग बहुत कम होता था।केवल निम्न जाति के लोग ही इनका सेवन करते थे। जन साधारण का रहन सहन बहुत सादा था।

गुप्त काल में अनेक नगरो का निर्माण हुआ। उनमें विलास की सभी सामग्री उपलब्ध होती थी।स्त्री और पुरूष दोनों अपने सौंदर्य पर ध्यान देते थे।उस समय के अनेक ग्रंथो से तत्कालीन नगर जीवन का ज्ञान मिलता है, जो उस समय के सुख साधनों और विलासिता पूर्ण जीवन का उल्लेख करते हैं।

आर्थिक दशा

गुप्त काल में साम्राज्य की स्थिति आर्थिक रूप से बहुत मजबूत थी। कृषि,,व्यापार और उद्योग में उन्नति के कारण देश धन धान्य से पूर्ण था।मंदिरों के लिए ब्राह्मणों को भूमि दान दी गई। बहुत सी झीलें और नहर भी बनवाई गई।कृषि के साथ साथ पशु पालन में भी वृद्धि हुई।इस काल में अनेक तरह के व्यवसाय थे जैसे धोबी, कुम्हार, बर्तन बनाने वाले, लोहार, बढ़ाई, हथियार बनाने वाले, शिल्पकार, जुलाहे, टोकरी बुनने वाले, दर्जी, सुनार आदि प्रमुख व्यवसाय थे।

इस काल में सूती, ऊनी और रेशमी कपड़ा बहुत बनता था। बनारस रेशमी कपड़े के लिए प्रसिद्ध था तो मथुरा सूती कपडे के लिए प्रसिद्ध था। इस काम में आंतरिक और विदेशी व्यापार उन्नति पर था। इस काम में सामंती प्रथा का प्रारंभ हुआ।आगे आने वाले समय में इस सामंती प्रथा पर अंकुश लगाना संभव ना हो सका और ये प्रथा मजबूत होती गई।

धार्मिक दशा

धार्मिक दृष्टि से गुप्त काल की मुख्य विशेषता मंदिरों का निर्माण,हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान,हिन्दुओं की उदार प्रवृत्ति और विदेशियों को हिन्दू धर्म में शामिल किया जाना और बौद्ध धर्म को जगह देना, ये विशेषता रही। आधुनिक भारत में जो हिन्दू धर्म का आधार है वो इसी काल में हुआ।गुप्त सम्राट अपने को परम भागवत मानते थे।ये लोग विष्णु और लक्ष्मी के उपासक थे। इन्होंने ब्राह्मणों को दान दिया, मंदिरों का निर्माण किया, कई अश्वमेध यज्ञ किए। महाभारत का स्वरूप प्रदान करना, मीमांसा, ब्रह्मसूत्र, योगसूत्र, न्यायसूत्र, आदि का लिखा जाना।विभिन्न पुराणों की रचना अथवा उनका संकलन भी हिन्दू धर्म के प्रचार में सहायक सिद्ध हुआ।

गुप्त काल के हिन्दू धर्म ने पुरानी और नवीन सभी धार्मिक प्रवृत्तियों को सम्मिलित करके जनसाधारण के लिए एक आकर्षक धर्म प्रदान किया। हालाकि इस युग में राम को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त नहीं हुआ लेकिन कृष्ण को सब बहुत मानते थे। बुद्ध को भी विष्णु का अवतार माना गया।दक्छिन भारत में शिव पूजा का ज्यादा महत्व रहा।

इसके अतिरिक्त बाकी देवताओं जैसे, कार्तिकेय, गणेश, सूर्य और शक्ति देवी की पूजा का भी प्रचलन बढ़ा। गंगा यमुना जैसी नदियों की मान्यता, विभिन्न व्रतो को रखना, प्रयाग और बनारस को तीर्थस्थान मानना इसी काल में शुरू हुआ। इस काल में हिन्दू धर्म ने यूनानी, शक, कुषाण आदि विदेशियों को अपने में समाहित कर लिया।हिन्दू धर्म के प्रचार की भावना से प्रेरित होकर पश्चिम में सीरिया और मेसोपोटामिया तक तथा दक्छिन में जावा, बाली, सुमात्रा, और बोर्नियो तक भारतीय संस्कृति का प्रसार किया। गुप्त काल में बौद्ध धर्म को भी एक प्रमुख स्थान मिला लेकिन बौद्ध धर्म कभी सभी भारतीयों को अपने में समाहित नहीं कर सका। अशोक की लाख कोशिशों के बावजूद भी हिन्दू धर्म विलुप्त नहीं हुआ।

ज्ञान और साहित्य

गुप्त काल में पढ़ने पर बहुत ज़ोर दिया गया। पाटलिपुत्र,वल्लभी, उज्जैन, काशी, मथुरा, नासिक, सांची, आदि ज्ञान अर्जित करने के प्रमुख स्थान थे।राजाओं और धनाढ्य वर्ग की ओर से शिक्षा संस्थाओं को भूमि प्रदान की जाती थी। भूमि के साथ धन भी दान दिया जाता था। अच्छे विद्यालयों में प्रवेश पाने का एकमात्र उपाय विद्यार्थी की योग्यता होती थी। प्रवेश पाने के पश्चात उसकी शिक्षा, रहन सहन, खाने और पीने की व्यवस्था सब कुछ विद्यालय का उत्तरदायित्व होता था। गुप्त काल में धर्म और धर्म निरपेक्ष दोनों ही प्रकार के साहित्य की प्रगति हुई।साहित्यिक प्रगति के कारण ही इस युग को पर्क्कलीन युग और ऑगास्टन युग अथवा अभिजात्य युग भी कहा जाता है।

गुप्त काल में संस्कृत राजभाषा हो गई थी। इसी कारण अधिकांश ग्रंथ संस्कृति भाषा में ही लिखे गए।धर्म निरपेक्ष साहित्य में भी अनेक ग्रंथों की रचना हुई।इस काल में अनेक विद्वान हुए। सबांधू द्वारा रचित वासवदत्ता, भट्टी का रावण वध, भारवी का किरताजूर्निय, मुद्राराक्षस तथा देविचंद्रगुप्तम,दशकुमार_चरित आदि अनेक रचनाएं इस युग में हुई। गुप्त काल के साहित्यिक आकाश में कालिदास सबसे अधिक प्रकाशमान थे।इन्होंने सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया।कालिदास सबकी सर्वसम्मति से भारत के महान कवि और नाटककार माने गए हैं।

इस प्रकार गुप्त काल में अनेक विद्वान हुए जिन्होंने अनेक भाषाओं में अपनी रचनाएं लिखी किन्तु जो श्रेष्ठ स्थान संस्कृत को प्राप्त हुआ वो अन्य किसी भाषा को प्राप्त नहीं हुआ। संस्कृत काव्य के बारे में एक अंग्रेज़ विद्वान ने लिखा कि, यदि प्रत्येक वर्ग इंच के आधार पर काव्य की बुद्धिमत्ता की तुलना की जाए तो कोई भी काव्य संस्कृत काव्य का मुकाबला नहीं कर सकता।

विज्ञान, गणित, ज्योतिष और चिकित्सा

विज्ञान, गणित और ज्योतिष के महान विद्वान इसी युग में हुए। आर्यभट्ट अपने युग का महान वैज्ञानिक और गणित का आचार्य माना गया।उसी ने बताया कि, सूर्य नहीं बल्कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। उसी ने बताया कि, सूर्य और चन्द्र को ग्रहण राहु केतु नहीं बल्कि पृथ्वी की बदलती हुई स्थिति है। उसने अंकगणित, बीजगणित और त्रिकोण में भी नई खोजे की। ये भी विश्वास किया जाता है कि, दशमलव प्रणाली का आविष्कार भी हिन्दुओं ने किया।इस बात का जिक्र आर्यभट्ट और वराहमिहिर ने अपने ग्रंथो में किया है।

आर्यभट्ट ने गणित के साथ साथ ज्योतिष विद्या को भी आगे बढ़ाया।उनकी मुख्य रचना आर्यभट्ट के नाम से विख्यात हुई।भास्कर प्रथम ने आर्यभट्ट के सिद्धांतो पर टिकाए लिखी। इस काल में चिकित्सा शास्त्र में भी वृद्धि हुई। चिकित्सा शास्त्र के साथ ही पशु चिकित्सा पर भी ज़ोर दिया गया।इस युग में चिकित्सा और रसायन शास्त्र का एक महान वैज्ञानिक नागार्जुन हुआ। उसने विभिन्न भस्मो और औषधियों की खोज की।ऐसा माना जाता है कि, महान वैद्य धनवंतरी भी इसी युग में हुए।इनके अलावा धातु विज्ञान और शिल्प ज्ञान की भी उन्नति हुई।

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