Monday, April 19, 2021
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मृत्युशैया पर आखिरी साँसें गिनता “सेकुलरिज्म”

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RAJEEV GUPTAhttp://www.carajeevgupta.blogspot.in
Chartered Accountant,Blogger,Writer and Political Analyst. Author of the Book- इस दशक के नेता : नरेंद्र मोदी.

हाल ही में ५ राज्यों के विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के अभूतपूर्व प्रदर्शन से सभी चुनावी विश्लेषक और मीडिया में बैठे “वरिष्ठ पत्रकार” स्तब्ध हैं. सभी तरह के पूर्वानुमानों को धता बताते हुए भाजपा ने ५ में से ४ राज्यों में विजय तो प्राप्त की ही है, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में प्रचंड बहुमत से ४०३ में से ३२५ सीटें जीतकर सभी को सकते में दाल दिया है. उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों से सबसे बड़ा धक्का उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष (छद्म धर्मनिरपेक्ष) ताकतों को लगा है, जो आज तक देश की जनता को जाति-पाति और धर्म-संप्रदाय के नाम पर बांटकर देखा करते थे, इन लोगों का चुनावी आकलन कभी भी “मुस्लिम-दलित” या फिर “अल्पसंख्यक-पिछड़ा वर्ग” के गठजोड़ के आगे नहीं बढ़ सका.

इस “घोर साम्प्रदायिकता और जाति-पाति की राजनीति” को गैर-भाजपाई राजनीतिक दल, मीडिया में बैठे उनके चाटुकार और कुछ स्व-घोषित बुद्धिजीवी लोग “धर्मनिरपेक्षिता” या “सेक्युलरिज्म” का नाम देते रहे. देश की जनता इन लोगों के षड्यंत्र से अनजान थी और जाति -पाति के जहर से युक्त इस “घोर साम्प्रदायिकता” को ही “सेक्युलरिज्म” समझती रही और पिछले ६०-७० सालों से इन गैर भाजपाई राजनीतिक दलों की “सेक्युलर” सरकारें इसी तरह बनती रहीं और लोगों को छलती रहीं. छद्म धर्मनिरपेक्षिता के चलते यह लोग बिहार में भी सत्ता हथियाने में कामयाब हो गए- बिहार के लोग जब तक अपनी “भयंकर गलती” को समझ पाते, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और वे लोग बिहार में “जंगल राज ” की वापसी के लिए खुद अपने आप को जिम्मेदार ठहराने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकते थे. लेकिन देश के अन्य भागों में बैठे हुए लोगों ने और खासकर उत्तर प्रदेश की जनता ने बिहार की जनता की भयंकर गलती से सबक लेते हुए उस गलती को दुबारा नहीं दोहराया.

आगे बढ़ने से पहले आइए आपको यह बताएं कि यह “छद्म धर्मनिरपेक्षिता” आखिर होती क्या है. कायदे से देखा जाए तो धर्मनिरपेक्षिता का सीधा सादा मतलब उस व्यवस्था से है जिसमे बिना किसी भेदभाव के सभी जाति और धर्म-संप्रदाय के लोगों के साथ समानता का व्यवहार किया जाए. दुर्भाग्य से देश आजाद होने के बाद से ही उस समय के राजनीतिक दलों ने अपनी राजनीतिक जड़ें मजबूत करने के लिए, चुपचाप इस “धर्मनिरपेक्षिता” का स्वरुप बिगाड़कर उसे “छद्म धर्मनिरपेक्षिता” का रूप दे दिया और उसी के सहारे लगभग ६०-७० सालों तक अपनी सरकारें चलाते रहे. देश में भारतीय जनता पार्टी एकमात्र राजनीतिक दल है जिसने शुरू से ही अपनी धर्मनिरपेक्षिता की नीति न सिर्फ बनाई हुयी है, बल्कि उस पर मुस्तैदी से अमल भी कर रहा है. पी एम् मोदी ने “सबका साथ-सबका विकास” का जो नारा दिया है, उससे भी भाजपा की इसी नीति की पुष्टि होती है.

क्योंकि देश में सिर्फ भाजपा ही एकमात्र “धर्मनिरपेक्ष” राजनीतिक पार्टी थी, इसलिए उसके बारे में ६०-७० सालों से लगातार यह दुष्प्रचार किया जाता रहा कि भाजपा तो “सांप्रदायिक” पार्टी है और जिस “छद्म धर्मनिरपेक्षिता” को बाकी के राजनीतिक दल अपनाये हुए हैं, वही असली मायनों में “धर्मनिरपेक्षिता” है. इस दुष्प्रचार में मीडिया और बुद्धिजीवी लोग सभी जोर शोर से लगे हुए थे और अभी भी लगे हुए है. वह तो भला हो सोशल मीडिया और उसके बदौलत बढ़ती हुयी जागरूकता का, जिसके चलते देश की जनता “सेक्युलरिज्म” के खूबसूरत डिब्बे में पैक की गयी इस “घोर साम्प्रदायिकता” को २०१७ के चुनावों से पहले समझने में कामयाब हुयी और उसने धर्मनिरपेक्षिता का ढोंग करने वालों को इन चुनावों में पूरी तरह नकार दिया.

उत्तर प्रदेश में मायावती, अखिलेश और राहुल गाँधी जिस तरह से “मुस्लिम-दलित” समीकरण के सहारे सत्ता हथियाने के सपने देख रहे थे, राज्य की जनता ने इन लोगों को निर्णायक ढंग से लताड़ कर भगा दिया है. जनता ने यह बता दिया है कि इस देश में सिर्फ मुस्लिम-दलित ही नहीं, अन्य वर्गों और जाति-सम्प्रदाय के लोग भी रहते हैं और उन सभी के साथ समानता का व्यवहार होना चाहिए. इस सन्दर्भ में पूर्व प्रधान मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मनमोहन सिंह के उस बयान का जिक्र करना भी जरूरी हो जाता है, जो उन्होंने ने सन २००६ में नेशनल डेवलपमेंट कौंसिल की ५२ वीं सभा को संबोधित करते हुए दिया था. वह विवादित बयान इस प्रकार है: “अल्पसंख्यकों,खासकर मुस्लिमों का, देश के संशाधनों पर पहला हक़ है.” देश की जनता खुद यह फैसला करे कि यह बयान कितना “धर्मनिरपेक्ष” है. हैरानी की बात यह है कि किसी मीडिया हाउस, अखबार, टी वी चैनल या किसी बुद्धिजीवी ने इस बयान की हल्की सी भी आलोचना नहीं की. अब आप जरा कल्पना कीजिये कि अगर यही बयान इसी मौके पर पी एम् मोदी ने कुछ इस तरह से दिया होता कि: “बहुसंख्यकों, खासकर हिंदुओं का, देश के संशाधनों पर पहला हक़ है.” तो समूचा विपक्ष, उसका चाटुकार मीडिया और अवार्ड लिए हुए बुद्धिजीवी सड़कों पर लोट लोट कर तब तक धरना प्रदर्शन करते रहते, जब तक कि मोदी जी से वे लोग इस्तीफ़ा नहीं ले लेते.

इस सारी चर्चा का निष्कर्ष यही है कि लोग पिछले ७० सालों में न सिर्फ पढ़े लिखे हैं, पहले से अधिक समझदार और जागरूक भी हुए हैं. तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों, उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया और बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर लोगों ने भरोसा करना अब बंद कर दिया है और सभी लोग खुद इस बात का विश्लेषण कर पा रहे हैं कि “सबका साथ-सबका विकास” के नारे में ही असली धर्मनिरपेक्षिता निहित है. जिस नकली धर्मनिरपेक्षिता के ढोंग के सहारे सभी गैर-भाजपाई पार्टियां पिछले ७० सालों से जनता को लूट रही थी, उन सबकी “छद्म धर्मनिरपेक्षिता” को जनता ने इन चुनावों में पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है. अगर यह कहा जाए कि “छद्म धर्मनिरपेक्षिता” २०१७ आते आते अपनी मृत्यु शैया पर आ गयी है और अंतिम साँसें गिन रही है, तो उसे अतिश्योक्ति नहीं समझना चाहिए.

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