लोकसभा चुनावों में मोदी की बम्पर जीत लगभग तय

चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो गयी है- 7 चरणों मे होने वाले चुनावों के नतीजे 23 मई 2019 को आयेंगे और जैसी की उम्मीद थी, इसी दिन कांग्रेस पार्टी का नाम इतिहास के पन्नों मे सिमटकर रह जायेगा. यह कोई ज्योतिषीय गणना या अनुमान नही है. जिस तरह की भयानक हार कांग्रेस पार्टी की होने वाली है, उसके लिये जितने जिम्मेदार मोदी जी होंगे, उतनी ही जिम्मेदारी खुद कांग्रेस पार्टी को भी लेनी पड़ेगी. कांग्रेस पार्टी द्वारा पिछले 5 सालों के दौरान जो एक गैर-जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका अदा की गयी है, उसका अंदाज़ा अगर खुद कांग्रेस पार्टी और उसके नेता नही लगा सके तो उसके लिये ना जनता जिम्मेदार होगी और ना ही ई वी एम को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

यह ठीक है कि 2014 के चुनावों मे कांग्रेस मात्र 44 सीटों पर सिमटकर रह गयी और उसे नेता विपक्ष का दर्ज़ा भी नही मिल सका. लेकिन इस बात से झल्लाई कांग्रेस पार्टी ने अपने तौर तरीकों मे सुधार करने की बजाये, सारा समय इस बात पर लगा दिया कि गलती से भी मोदी जी कोई गलती कर दें और यह उसका मुद्दा बनाकर शोर मचाना शुरु कर दे. सरकार की गलतियों पर विपक्ष का शोर मचाना जरूरी है लेकिन अगर सरकार कोई गलती नही कर रही है और आप उस हताशा मे कुछ “काल्पनिक मुद्दों” के ऊपर सरकार को घेरना शुरु कर देते हैं तो सोशल मीडिया के इस युग मे इससे अधिक आत्मघाती कदम और कोई नही हो सकता. दुर्भाग्य से कांग्रेस ने पिछले 5 सालों मे सिर्फ “काल्पनिक मुद्दों” के ऊपर सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश की है और हर बार उसे सोशल मीडिया के ऊपर ही लोगों ने जबरदस्त फटकार लगाई है जिसके चलते हर बार उसे “बैकफुट” पर आना पड़ा है.

नोट बंदी, जी एस टी, सर्जिकल स्ट्राइक-1 और सर्जिकल स्ट्राइक-2 इन सभी मुद्दों पर कांग्रेस पार्टी जनता का मिज़ाज़ समझने मे पूरी तरह से नाकाम रही और अपनी तरफ से यह “काल्पनिक नेरेटिव” बनाने मे लगी रही कि किसी भी तरह से इन ऐतिहासिक कदमों को मोदी सरकार की एक बड़ी नाकामी बनाकर जनता के सामने पेश किया जाये. इस सारी कवायद का नतीज़ा यह हुआ कि 2014 तक जिस कांग्रेस पार्टी पर सिर्फ भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप लगा करते थे, अब उस पर देशद्रोह के आरोप भी लगने शुरु हो गये.

हाल ही मे बिहार कांग्रेस के बड़े नेता और पार्टी प्रवक्ता बिनोद शर्मा का पार्टी से इस्तीफा इस बात की जीती जागती मिसाल है. इस इस्तीफे मे पूर्व कांग्रेस नेता ने साफ-साफ लिखा है कि सर्जिकल स्ट्राइक के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी का और उसके बड़े नेताओं का जो रुख है, उसके चलते जनता मे यह छवि बन गयी है कि कांग्रेस पार्टी पाकिस्तानी एजेंट है और इसके चलते मैं पार्टी से इस्तीफा दे रहा हूँ. पंजाब के मुख्यमंत्री  कैप्टन अमरिंदर सिंह पहले ही अपनी पार्टी की लाइन से हटकर चल रहे हैं. जिन कुछ राज्यों मे कांग्रेस की सरकारें हैं, उनमे 23 मई के बाद विद्रोह नही होगा, यह कहना मुश्किल है.

कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान उन 2 मुद्दों से हुआ है, जिन्हे वह अपना “ट्रंप कार्ड” मानकर चल रही थी. पहले तो कांग्रेस ने “राफेल” नाम का एक काल्पनिक मुद्दा बनकर उसके ऊपर मोदी सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश की. पहले सुप्रीम कोर्ट और बाद मे CAG ने  इस मुद्दे पर मोदी सरकार को “क्लीन चिट” दे दी. लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दे को नही छोड़ा और नतीज़ा यह हुआ कि यह मुद्दा ही एकदम हास्यास्पद बन गया. राहुल गाँधी से जनता के नुमाइंदे कोई भी सवाल पूछे और वह घुमा फिराकर यही कहें कि-“अगर मोदी ने 30000 करोड़ रुपये अनिल अंबानी की जेब मे नही डाले होते तो इस पैसे से यह काम हो सकता था.”

इस तरह के बेबुनियाद बयान तब तक तो चल जाते थे जब तक सोशल मीडिया की लोगों तक पहुंच नही थी लेकिन अब यह सब नही चलता है- यह बात समझने के लिये ना कांग्रेस पार्टी और ना ही राहुल गाँधी तैयार हैं. “राफेल” के बाद कांग्रेस के पास एक सुनहरा मौका और आया जहाँ पार्टी और इसके नेता अपनी छवि को सुधार सकते थे लेकिन कहावत है कि “विनाश काले विपरीत बुद्धि”. इस कहावत को चरितार्थ करते हुये पुलवामा हमले के बाद सरकार द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक पर कांग्रेस पार्टी ने पाकिस्तान को घेरने की बजाये अपनी ही सरकार पर सवाल खड़े करने शुरु कर दिये- जाने-अनजाने कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने ऐसे बयान दिये जिन पर पाकिस्तान मे तालियाँ बजाई गयीं. पाकिस्तान सरकार ने कांग्रेस के उन बयानों को हाथों-हाथ लिया. कांग्रेस तो मोदी-विरोध मे यह बयान दे रही थी, लेकिन वह भूल रही थी कि कांग्रेस और मोदी की इस लड़ाई मे जनता प्रत्यक्षदर्शी है जो कुछ ही समय बाद अपने मताधिकार का प्रयोग करने जा रही है.

राजनीति और खेल मे अंतिम समय पर चमत्कार भी होते हैं और बाज़ी पलट जाया करती है लेकिन फिलहाल कांग्रेस ने बिना किसी ठोस तैयारी के खुद अपनी हालत ऐसी कर ली है कि कोई चमत्कार भी पार्टी के लिये काम करता नज़र नही आ रहा है. अभी सिर्फ यही कहा जा सकता है कि मोदी सरकार 400 से अधिक सीटें जीतकर भारी बहुमत से वापसी करने जा रही है.

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