रवीश कुमार के नाम एक खुला पत्र – टीवी परदे पर पड़ा काला परदा दरअसल आपके ज़मीर पर पड़ा था

आदरणीय रवीश जी,
प्रणाम!

टीवी मेरे पास है नहीं, ट्विटर पर कभी कभी आपसे एक-तरफ़ा बातचीत हो जाती थी. एक दिन किसी ग़रीब बुढ़िया माई की HD कैमरे से ली गयी तस्वीर के साथ शेर-ओ-शायरी लिखकर आप तारीफ़ बटोर रहे थे, मैंने टोका तो आपने ब्लॉक कर दिया. एक मित्र की सिफ़ारिश पर आपने अन-ब्लॉक किया. हफ़्ते भर बाद दुनिया के सबसे पॉश माने जाने वाले फ़ोन iPhone से समाजवाद पर किये गए आपके ट्वीट को देखकर मैं हंस पड़ा, और आपने फिर से ब्लॉक कर दिया.

फिर भी आपका प्रशंसक हूँ मैं. बहुत पुराना प्रशंसक. जिस ख़ूबसूरती से आप बिना भावुक हुए तार्किक बने रहते हैं वो ग़ज़ब है. या यूं कहें कि आपकी भावनाओं पर आपकी रणनीति और आपके दिल पर आपके दिमाग़ का पूरी तरह नियंत्रण रहता है.

कल ट्विटर पर आपका एक विडियो बहुत चर्चित रहा सो मैंने भी इन्टरनेट पर उसे देखा. वही विडियो जिसमें आप अत्यधिक व्यथित थे पत्रकारिता के गिर चुके स्तर पर. जिसमें आपकी व्यथा थी कि आज के दौर में टीवी तथ्य नहीं दिखाता, ओपिनियन बनाता है, तथ्यों की जांच नहीं करता, उनको काट-छांटकर, तोड़-मरोड़ कर दिखाता है, भावनात्मक शेर-ओ-शायरी सुनाता है, ड्रामा और तमाशा दिखाता है, न्यायलय से पहले अपने निर्णय सुनाता है.

वही विडियो जिसमें अपनी पीड़ा के नाम पर आप तथ्यों को ग़ायब कर गए, एक ओपिनियन बनाया कि टीवी बीमार हो गया है, हालिया आये अप्रमाणित, विवादित विडियो क्लिपिंग्स में से अपने एजेंडा को सूट करने लायक भाग को काट-छांट कर एक ऑडियो कोलाज भी डाला था आपने. वही विडियो जिसमें स्क्रीन पर से चित्र हटाकर शानदार ड्रामेटिक इफ़ेक्ट डाले गए थे. वही विडियो जिसका समापन एक भावनात्मक कविता से किया गया इस निर्णय के साथ कि आजकल जो टीवी पर दिख रहा है वो ग़लत है. समाज में ज़हर फैल रहा है.

शानदार!! भावनाओं से भरी आपकी एक्टिंग, आपकी व्यथा, आपकी पीड़ा, आपका दर्द… यक़ीन मानिए बहुत देर तक हंसा इनको देखकर.

मैं सैडिस्ट नहीं हूँ कि किसी की पीड़ा पर हँसूं. मैं हँसा आपकी पराजय पर, आपकी फ़्रस्ट्रेशन पर. चौंकिए मत. जैसा की पहले बताया आपका बहुत पुराना फ़ैन हूँ, अब तो समझ ही जाता हूँ कि आप क्या कहना चाहते हैं. और आपका फ़ैन इसलिए हूँ कि बिना कहे कैसे कोई बात कही जाए ये आपसे बेहतर कोई नहीं जानता. नमन आपकी कला को.

आपकी व्यथा को मैं अभिनय इसलिए बोल रहा हूँ क्योंकि आपकी व्यथा देश या समाज के लिए नहीं थी. आपकी व्यक्तिगत खुन्नस थी. देश के लिए व्यथा होती तो आप की चर्चा का विषय होता कि आखिर वो कौन है जो भारत में रहकर “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा-अल्लाह, इंशा-अल्लाह” के नारे लगा रहा है.

आप अपनी ऊर्जा इस बात पर नहीं लगाते कि कन्हैया या खालिद ने ये कहा या नहीं, बल्कि उससे पहले आप इस बात के लिए बेचैन होते कि आख़िर वो है कौन जिसने ये बोला. लेकिन आपको देश के टुकड़े होने से ज़्यादा चिंता इस बात की थी कि कहीं कन्हैया को सज़ा न हो जाए. न्यायालय पर भरोसा नहीं रहा. ये भी मान लें कि वो विडियो फ़र्ज़ी था, तब भी कोई तो ऐसा है न जो किसी स्टूडियो में बैठ कर ये नारा रिकॉर्ड कर रहा है. आप इस सोच की तह तक जाने को बेचैन दिखते, कन्हैया या खालिद की आड़ में इसको ग़ायब न करते.

वैसे कमलेश तिवारी के ख़िलाफ़ लाखों लोग सड़कों पर नारे लगा रहे थे कि इसकी गर्दन काटो. तब की आपकी चुप्पी देश और समाज के लिए आप के चिंता को बयां कर देती है. हज़ारों उदहारण हैं कमलेश तिवारी जैसे. आपको कन्हैया, खालिद या कमलेश से कोई सरोकार नहीं. अगर कोई अर्नब कमलेश के खिलाफ चिल्लाया होता तब भी आप स्क्रीन काली कर के ये तमाशा करते, आप जानते हैं ये बात.

रवीश जी, आपने तथ्यों की बात नहीं की. कर भी नहीं सकते थे. इस पूरे प्रकरण में तथ्य एक ही था “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा-अल्लाह, इंशा-अल्लाह”. सीधे-सीधे इसको जस्टिफ़ाई करना आपके बस का नहीं था, सो आप छायावादी कवि बन गए. पटियाला हाउस कोर्ट में कुछ लोगों ने हाथापाई कर दी, आपको संजीवनी बूटी मिल गयी.

देशद्रोह तो मुद्दा रहा ही नहीं, मुद्दा भीड़तंत्र बन गया, कन्हैया की ग़रीबी बन गया, खालिद का धर्म बन गया. इस बार तथ्यों से नहीं, भावनाओं और शब्दों से खेला आपने. आप किसी छायावादी कवि जैसी एक्टिंग करते हुए कविता पाठ करते रहे. आपकी कविता की व्याख्या है. व्याख्या है इसलिए थोड़ा लम्बा है. आपने शब्दों का जाल भी तो बहुत लम्बा बुना है. और हाँ आपकी कविता की तरह ही मैं भी तथ्यों नहीं भावनाओं की ही बात करूंगा.

देशभक्ति, भ्रष्टाचार, भीड़तन्त्र, पत्रकारिता का गिरता स्तर, अभिव्यक्ति की आज़ादी आदि ऐसे विषय हैं जिनमे से किसी एक की भी आड़ में आप किसी को भी निशाना बना सकते हैं और ढेर कर सकते हैं. लेकिन आज आपको एक साथ ये सारे हथियार काम में लाने पड़े, शुरू के 8 मिनट देखने के बाद पता चला कि बहुत गंभीर मामला तो है ही, आपमें हर बार की तरह वाला कॉन्फ़िडेन्स नहीं था. हो भी कहाँ से, इस बार आपके निशाने पर कोई राजनेता या पार्टी नहीं बल्कि अर्नब गोस्वामी थे. अर्नब जो कि आप ही के बिरादरी के हैं.

किसी नेता की तरह उनको अपने बयान तोड़े-मरोड़े जाने का डर नहीं, अपना ख़ुद का टीवी है उनके पास. टीवी, वही हथियार जिससे आप अपने आकाओं के दुश्मनों को ढेर करते आये हैं. लेकिन इस दुश्मन के पास भी वही हथियार था, और आपके टीवी से बड़ा टीवी था उनका टीवी. इसीलिए आपने लड़ने से पहले ही हार मान ली, और अपने सारे हथियार प्रयोग कर लिए.

आपकी बौखलाहट तो इस बार काफी उभर कर बाहर आई. 40 मिनट के विडियो में कम से कम 30 बार आपने “एंकर” शब्द का प्रयोग किया. आप इतने कमज़ोर तो नहीं थे. लेकिन तारीफ़ करनी होगी आपके सुलझे हुए दिमाग़ की, इतने तनाव और हताशा के बीच भी आप बीजेपी पर हमला करना नहीं भूले.

ख़ैर, आप जैसा घाघ पत्रकार ये बात तो मानने से रहा कि आपकी ये पीड़ा अर्नब को लेकर है. चलिए आपके उस प्रोग्राम का शव-विच्छेदन करते हैं, कैसे आपने शब्दों का जाल रचा निशाना साधने के लिए.

शुरुआत में ही आप सवाल उठाते हैं कि न्यूज़ एंकर स्टूडियो में बैठ कर देशद्रोही लोगों पर चिल्ला रहे हैं, क्या आप घर पर भी ऐसे ही चिल्लाते हैं?

जी नहीं, हम सब शांतिप्रिय लोग हैं. बिलकुल सामान्य आवाज़ में बात करते हैं. शांत रहना अच्छी बात है.

लेकिन जब भी कोई घर में आग लगाने की बात करता है, घर को तोड़ने की बात करता है तो हम इससे भी ज्यादा ज़ोर से चिल्लाते हैं. हमारा दिल अभी पूरी तरह हमारे दिमाग़ के कब्ज़े में नहीं है. जब आशियाने में आग लगी दिखती है तो चीख उठता है.

हमें बड़ा सदमा लगा जब आप नहीं चिल्लाये. अर्नब चिल्लाया. हमारी आवाज़ को उसने आवाज़ दी. हम सब उसके साथ हो लिए. बस यही आपसे देखा नहीं गया. आप तिलमिला गए.

जिन लोगों को शान्ति पसंद थी वो आज अचानक आपकी शांति छोड़कर चिल्लाने वाले अर्नब के साथ कैसे हो लिए? जब लोग घर के टुकड़े-टुकड़े करने की बात कर रहे थे, तब आप हमेशा की तरह शांत रहकर अपने निशाने साध रहे थे. लेकिन हर बार की तरह इस बार लोग आपके साथ खड़े नहीं रहे, बात घर के टुकड़े होने की थी, चिल्लाना ज़रूरी था. और तब आपने क्या किया? आवाज़ उठाने की बजाय हमको एक ख़ास पार्टी, एक ख़ास नेता का समर्थक घोषित कर दिया. एक पार्टी का वेतनभोगी बना दिया.

जो लोग नफ़रत की पट्टी आँखों पर लेकर चलते हैं उनको इंसान नहीं दिखते, बस दोस्त या दुश्मन दिखते हैं. जो आपके साथ नहीं, वो आपका दुश्मन. जब हम आपके साथ नहीं दिखे तो आपने हमें उसका भक्त घोषित कर दिया जिसको आप दुश्मन मानते हैं. आप हमारी आवाज़ हैं, कम से कम हम यही समझते हैं. जब हम मुसीबत में होते हैं तो उम्मीद करते हैं कि आप हमारी आवाज़ बुलंद करें, सत्ता के गलियारों तक पहुचाएं. लेकिन आप चाहते हैं कि हमारी आवाज़ बनकर आप अपने निशाने साधते रहें. हम वो भी बर्दाश्त करते रहे. लेकिन जब हमारा घर जल रहा होता है तब तो हमारी आवाज़ बनिए.

हर कोई आपके जितना घाघ नहीं है, शब्दों से खेलना नहीं जानता. सभ्य तरीके से बोलना नहीं जानता. इसलिए तो आपके पीछे रहता है, आपको अपनी आवाज़ बनाता है. तब भी आप अपने एजेंडा से बाहर नहीं आते. और जब हम आपसे सवाल करते हैं तब आपको हममें अपना दुश्मन नज़र आने लगता है. आप हमें किसी का भक्त, किसी का चमचा घोषित कर देते हैं. इसी बौखलाहट में कोई आपको अपशब्द बोल देता है. आप उसी गाली को पकड़कर कभी मुख्यमंत्री तो कभी प्रधानमंत्री पर अपने निशाने साधते रहते हैं. मैं गालियों को जायज़ नहीं ठहरा रहा, वो ग़लत ही है. लेकिन इस गलती के जिम्मेदार सिर्फ आप और आपकी बिरादरी है. कभी सोचियेगा हमारी इस पीड़ा के बारे में.

आगे आप इसी विडियो में कहते हैं कि JNU में सिर्फ नारे लगे थे, कश्मीर में तो रोज़ देश विरोधी नारे लगते हैं, तिरंगा झंडा तक जला दिया जाता है, तब किसी की हिम्मत क्यों नहीं होती किसी को गिरफ्तार करने की, JNU में क्यों गिरफ्तार कर लिया? आपका सवाल ही आपका उत्तर है. कश्मीर में एक खास समुदाय के लोगों का हजारों की संख्या में सामूहिक नरसंहार, बलात्कार और लाखों का पलायन हुआ तब भी किसी की हिम्मत नहीं हुई किसी को गिरफ्तार करने की. न्याय तो छोड़िये, अपने ही देश में बेचारे बेघर बने घूम रहे हैं वो.

जानते हैं क्यों? क्योंकि जिस दिन कश्मीर में JNU जैसे नारे लगे थे तब कोई नहीं चिल्लाया था. और जब नारे लगाने वालों को गिरफ्तार करने की बात आई तब आपके जैसे ही किसी ने यही विलाप शुरू कर दिया जो आज आप कर रहे हैं. काश उस दिन कोई अर्नब चिल्लाया होता तो आज अपने ही देशवासी अपने ही देश में विस्थापित नहीं कहे जाते. कभी महसूस कीजियेगा उस कश्मीरी हिन्दू की पीड़ा, जब अपने ही देश की सरकार को लिखे आवेदन में स्वयं को वो “शरणार्थी” बताता है.

आगे आपकी पीड़ा है कि “छात्रों” को देशद्रोही कहा गया. देशद्रोही पैदाइशी नहीं होता कोई. हर देशद्रोही का कोई न कोई पेशा होता है. इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर या बेरोज़गार, कुछ न कुछ तो होगा ही. कन्हैया की ग़रीबी का हवाला देते हैं आप. जब किसी पर लगे आरोपों की जांच होती है तो उसमें उसकी आर्थिक या सामाजिक स्थिति को नहीं देखा जाता. सज़ा के निर्धारण के समय न्यायालय इसको ध्यान में रख सकता है.

आप स्वयं को न्यायालय से भी ऊपर मानने लगे. पटियाला हाउस कोर्ट के लोग जिस जोश के साथ इनकी पिटाई करना चाहते थे, उससे कहीं ज़्यादा बेचैनी आप दिखा रहे हैं इनको बेग़ुनाह साबित करने के लिए. थोड़ी देर पहले आप न्यायालय का हवाला देते हैं, मीडिया के फैसले सुना देने पर व्यथित होते हैं और पल भर बाद ही पूरी ऊर्जा के साथ उसको बेग़ुनाह घोषित कर देते हैं और बाकी पूरे देश को बीमार. आप जानते हैं कि कन्हैया को निर्दोष बताने से अर्नब और दोषी हो जायेगा.

आज से पहले कभी किसी मामले में आपकी इतनी तत्परता, इतनी बेचैनी नहीं देखी. आप असल मुद्दे “भारत तेरे टुकड़े होंगे” को बड़ी चालाकी से ग़ायब कर के कन्हैया और खालिद को मुद्दा बना देते हैं. यही तो आपकी ख़ासियत है. सारी दुनिया के हुड़दंगियों को आप भाजपा समर्थक बता देते हैं. थोड़ी देर बाद सारे भाजपा समर्थकों को हुड़दंगी करार देते हैं. आपकी इस घटिया चाल से तिलमिला कर कोई आपको गाली दे दे तो ढोल बजाकर ये साबित कर देते हैं की पूरी पार्टी गाली गलौज करने वालों की है.

छोड़िये, आपका वीडियो फिर देखते हैं. एक जगह आप बताते हैं कि पूरे देश मैं कैसे ज़हरीले नारे लगाये जा रहे हैं ABVP द्वारा. पहली बार आपने किसी संगठन का नाम लिया. हालांकि इस प्रकरण में और भी कई संगठनों का नाम आया है. लेकिन नाम आपने सिर्फ ABVP का लिया है.

शानदार सिनेमेटिक इफ़ेक्ट्स है. नारों की आवाज़ और साथ में स्क्रीन पर लिखे शब्द दर्शक के दिमाग़ में उतारे जा रहे हैं. स्क्रीन पर लगातार लिखा आता रहता है “ज़हर” और नारे चल रहे होते हैं. मैंने सारे नोट किये:

1. वन्दे मातरम – माँ की वंदना न किसी क़ानून के ख़िलाफ़ है न ही किसी धर्म के.
2. देश के इन गद्दारों को, जूते मारो सालों को. – संविधान तो कहता है देश के गद्दारों को फंसी दो.
3. अफ़ज़ल गुरु, देशद्रोही-देशद्रोही. – माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा है ये.
4. भारत माता की जय. – नो कमेंट्स.
5. जितने अफ़ज़ल आयेंगे, उतने मारे जायेंगे. – सेना में जाते ही इस बात की क़सम खिलाई जाती है.
6. पाकिस्तान हाय-हाय. – जिस तरह पूरे प्रकरण में उसका नाम आया है और पुरानी हरकतें रही हैं उनकी, ये जायज़ है. जायज़ न भी हो, ज़हरीला तो बिलकुल नहीं है.

नोट कीजियेगा, जब कोई कहता है “भारत तेरे टुकड़े होंगे” तब आपको नारा नहीं बल्कि उसको लगाने वाले की गरीबी और मासूमियत दिखती है, और “पकिस्तान हाय हाय” के नारे सुनते ही आपको पूरे देश में ज़हर दिखने लगता है.

बहुत बार सुना इनको. एक बूँद भी ज़हर नहीं मिला मुझे. अब मैं आपको बताता हूँ ज़हर कहाँ था. जब आप अति व्यथित होने का दिखावा करते हुए धीरे से ये बोलते हैं कि “कन्हैया के प्रति भीड़ उदार है, खालिद को ये छूट नहीं मिलती”. ये ज़हर है जो आप घोल रहे हैं; कम्यूनल ज़हर. छायावादी कवियों की तरह आप कभी सीधे नहीं बोलते.

आप बोलते हैं “हाफ़िज़ तो अफ़ज़ल को शहीद मनाता है. उन्ही के खेमे के लोग बात कर आये हाफ़िज़ सईद से पाकिस्तान जाकर, और अब वही लोग अफ़ज़ल के समर्थकों को गलिया रहे हैं.”. शानदार ढंग से आपने पटियाला हाउस पर जमा लोगों (“उन्हीं”) को भाजपा के सदस्य बना दिया. और ऐसे बनाया कि उनको भी पता न चले. ये ज़हर है आपके विडियो में. राजनीतिक ज़हर.

आगे आप Social Media की बात करते हैं. फिर से वही सपाट लहजे में बोलते हैं कि “ये लोग अपने दल की तरफ से बैटिंग करते हैं और हमें दलाल, गद्दार लिखने लगते हैं.” हर वो इंसान जो आपसे असहमत हो उसमें आपको पार्टी का कार्यकर्ता दिखने लगता है और इसीलिए उसको आपमें गद्दार और दलाल दिखने लगता है. ये ज़हर है आपके विडियो में. एक नागरिक जो आपसे संवाद करना चाहता है आप उसको किसी पार्टी से का वेतनभोगी कर्मचारी बना देते हैं.

मैं किसी राजनीतिक दल से नहीं हूँ, आप जैसे लोग पता नहीं मुझे कितनी पार्टियों और संगठनों का सदस्य बना चुके हैं. आप भी. और अब ब्लॉक भी कर चुके हैं. मैं रोया नहीं. मेरे पास शब्द हैं. आपके जितने शातिर तो नहीं, लेकिन अपनी बात बोलने भर के हैं. सोचिये अगर नहीं होते, क्या करता मैं? कुढ़ता रहता, किसी दिन इसी कुढ़न में आके आपको दलाल बोल देता और आप फिर से मुझे उसी नेता, संगठन और पार्टी से जोड़कर उनको गरियाते जिससे मेरा कोई वास्ता नहीं और आप अपना निशाना साधते रहते. मैं और ज़्यादा कुढ़ता. ये चलता रहता. यूं कहिये चलता रहता है. जो लोग आपको गाली देते हैं उनमें से 90% आपने तैयार किये हैं. आपको मदद मिलती है अपने एजेंडा के लिए.

वैसे इस विडियो में अगर किसी ने गाली दी है तो वो हैं आप. जी भर के गालियाँ दी हैं आपने पूरे देश को, अर्नब को, ज़ी न्यूज़ को और उन संगठनों पर जिनपर निशाना साधने का कोई मौक़ा आप हाथ से नहीं जाने देना चाहते.

आप सबसे पहले एक समूह बनाते हैं “हम एंकर लोग” का. और धीरे से तीन चार बार “चिल्लाकर” बता देते हैं की अर्नब भी इसमें हैं. और जी भर के कोसा है आपने. दुनिया के सारे एंकर की बुराइयां यहाँ थोप दी. और बीच-बीच में याद दिलाते रहे की मैं भी इसी समूह में हूँ. ख़ुद का बड़प्पन दिखाते रहे. आप भी जानते हैं की कितनी वाहियात और ज़लील हरक़त है ये. एंकर के समूह को बीमार और गिरा हुआ बोलकर स्वयं को आपने ईमानदार और आत्म-अन्वेषी तो साबित किया ही, अर्नब को और पूरे देश को बीमार भी घोषित कर दिया.

अब आपको बता दूं कि आप के इस तथाकथित व्यथा पर हंसी क्यों आ रही है. इसलिए क्योंकि हर बार की तरह इस बार भी आप अपने निशाने लगाने में लगे हुए थे और छिपा नहीं पाए अपना एजेंडा. अर्नब से आपकी जलन कई मौकों पर दिखी है लेकिन इस बार जब सारा देश अर्नब के पीछे हो लिया तो आप बर्दाश्त नहीं कर पाए. नीचता पर उतर आये. इससे पहले भी कई बार इस तरह के मामले आये हैं जब भीड़ ने क़ानून हाथ में लिया और आपने अपनी चालाकी से भीड़ को भीड़ न बताकर एक पार्टी के वेतनभोगी बता दिया. लेकिन तब आप मीडिया को लेकर व्यथित नहीं होते थे, अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए व्यथित नहीं हुए. इस बार थे. कारण? अर्नब की TRP.

इस बार तो आप हद से गुज़र गए. राजनीतिक पार्टी पर निशाना साधने के लिए देश-विरोध तक को जायज़ ठहराया. “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा-अल्लाह इंशा-अल्लाह” मुद्दा था. इसी को देशद्रोह बोलते हैं. आपने देशद्रोह जैसे जघन्य अपराध को गरीबी, मासूम छात्र और अल्पसंख्यक जैसे मामलों में उलझा दिया.

अपराधी को सजा देने के लिए न्यायालय हैं, लेकिन जब तक न्यायालय अपनी लम्बी प्रक्रिया से गुजरते हैं लोग मीडिया में अपनी आवाज़ खोजते हैं. आपने तो वही ग़ायब कर दिया. और ये बहुत ही शानदार चाल थी. आपको पता था कुछ कमज़ोर आत्मबल वाले लोग आपका शिकार बनेंगे. बन गए, उन्होंने पटियाला हाउस कोर्ट में हिंसक प्रदर्शन किया. बस, आपने पूरे देश की भावना का मज़ाक बनाते हुए उन मुट्ठी भर लोगों को एक संगठन से जोड़ते हुए अपना काम शुरू कर दिया. आपने पूरे देश की जनता को वही बना दिया.

देशद्रोह जैसे मुद्दे को ग़ायब कर के आप घड़ियाली आंसू लेकर भीड़तंत्र पर वेश्या-विलाप करने लगे. पूरे 40 मिनट. अर्नब जनता की आवाज़ बना. जब घर में आग लगती दिखी तो चिल्लाया. आपने बड़ी चालाकी से पटियाला हाउस के जिन मुट्ठी भर लोगों को देश का प्रतिनिधि (भाजपा से वेतन प्राप्त) बना दिया था, अब ये साबित कर दिया कि उनको अर्नब ने भड़काया.

और आख़िर में आपने एक कविता भी चेपी है. अपने देश को महबूबा और गुलदस्ता बोल रहे हैं. आपकी विचारधारा के लोग अक्सर यही बोलते हैं. “वन्दे मातरम्” या भारत माता उनको “एक्सट्रीम राष्ट्रवाद” लगता है. हम भारत को माता बोलते हैं. माता, हमारे पैदा होने से पहले ही हमें प्यार करती है. अंत तक करती है. बिना शर्त होता है. महबूबा आपके जीवन में एक ख़ास उम्र के बाद आती है, मन न मिले तो जा भी सकती है. आप भी उसको छोड़ सकते हैं. गुलदस्ते के फूल क्यारी से तोड़ कर लाये जाते हैं, मुरझा जाने पर फेंक दिए जाते हैं. आपके लिए ये महबूबा हो सकती है, गुलदस्ता हो सकता है. मेरी माँ है ये देश.

अब समझ में आया आपको वन्दे मातरम् “एक्सट्रीम राष्ट्रवाद” क्यों लगता है. यहाँ देश अपनी सहूलियत से बनायीं हुई महबूबा नहीं होती, गुलदस्ता नहीं होता, कि सूख जाने पर फेंक दें. माँ होती है, मरते दम तक स्नेह बना रहता है, इसके लिए ज़रूरत पड़े तो जान देनी पड़ सकती है.

आप एक सवाल और उठाते हैं “क्या कुछ ख़ास मामलों में अदालत से पहले फैसला भीड़ कर लेगी?”. जी नहीं. इसीलिए तो आपकी मीडिया है, जबतक मामला न्यायालय में है आप लोगों से संवाद करें, उनकी पीड़ा को सामने रखें. नहीं किया आपने, आप अपने आकाओं के शार्प शूटर बने रहे. जनता आपके जैसी शातिर नहीं होती. और हाँ कुछ मामले ऐसे होते हैं जनता ज़्यादा ही भावनात्मक होती है. मैं भी होता हूँ.

“भारत तेरे टुकड़े होंगे” ऐसा ही मुद्दा था. आपको चाहिए था कि आप आगे आयें, जनता की आवाज़ बनें, उसकी पीड़ा को सरकार तक पहुंचाएं, उसको भीड़ बनने से रोकें. सड़क पर कोई ट्रैफिक नियम तोड़े तो मैं पुलिस वाले की तरफ देखूँगा. किसी सुनसान पड़े रेलवे स्टेशन पर कोई दीवारों को गन्दा करता दिखे एक बार बोलकर आगे चल दूंगा. कोई अधिकारी दिख जायेगा तो उसको बता दूंगा.

लेकिन उसी वीरान स्टेशन पर कोई किसी महिला से ज़बरदस्ती करता दिखे तो मैं न ही किसी का इन्तज़ार करूंगा और न ही संविधान या CrPC पढूंगा. मैं पुलिस को फ़ोन करके उस व्यक्ति पर टूट पडूंगा. और तब मुझे आपका इन्तज़ार रहेगा कि आप टीवी पर आयें और बताएं कि मैंने ऐसा क्यों किया.

लेकिन तब अगर आप अपने टीवी की स्क्रीन पर अँधेरा कर के, 2-4 शायरी सुना कर ये घोषित कर दें कि वो बलात्कारी तो मासूम छात्र था जिसकी माँ बहुत ग़रीब है. और मुझ गुंडे को ABVP ने पैसे देकर भेजा था उसको मारने के लिए. और उसके बाद आप ये बताएं कि मुझ जैसे सारे लोग किसी पार्टी के गुंडे हैं जो पूरे देश में फैले हैं, मुझ जैसे जोग पूरे देश के रेलवे स्टेशनों पर गुंडागर्दी कर रहे हैं, तो निश्चित रूप से मैं उस टीवी स्क्रीन के अँधेरे को आपके ज़मीर पे पड़ा एक काला परदा समझूंगा.

रवीश जी! निर्णय आप कीजिये, मैं आपको क्या समझूं…

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