Wednesday, November 30, 2022

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Ravish Kumar

Decoding ‘godi media’

Notwithstanding these facts, if Yashwant Sinha does not understand who is ‘godi media’ and who is lying thousand times despite his faith that ‘truth has a bad habit of prevailing over falsehood ultimately’, there is none in this living world to teach the IAS-turn-politician octogenarian.

Shameless Ravish Kumar’s Prime Time on inflation

During, Modi govt's 1st term, Journalists like Ravish Kumar were at least pretending to be neutral and were making efforts to cover up their misdemeanors; were furthering their agendas discreetly. Now, they have got the audacity to showcase their biased journalism without any shame, they do it right in your face, staring in your eyes and if you blink.

गांधी के बंदर और रविश का अवतार

मोदी कभी गांधी नहीं हो सकता है, तो उसके बहकावे में ना आओ पहले तो ये जान लो की मोदी महिला विरोधी है, हर जगह अकेले ही चल देता है, मै तो अपने टाइम में ईज्जतघर भी बिना चार पाँच महिलाओं के बिना नहीं जाता था।

NDTV’s unethical practices and questionable integrity

"The Investigative Journalist" Nidhi Razdan when failed to investigate her own employment offer!

“माल है क्या?” देश में माल की कमी से जूझता ड्रगवुड, प्रधानमंत्री क्यों है खामोश

2014 से पहले मुझे बराबर मेरा माल मिलता था लेकिन जब से आपकी सरकार आई है तब से धीमे धीमे माल की कमी से मुझे जूझना पड़ रहा है। साल 2017 तो मेरे लिए इतना खराब रहा कि नशा पाने के लिए मात्र फोन से ही काम चलाना पड़ता है।

टिक टॉक और रेबीज़ कुमार का दर्द

शुरुआत मोदी सरकार कुछ नहीं बोली लेकिन जब इसका फायदा सीधे तौर पर माइनॉरिटी पीपल अर्थात पंचरवालों को मिलने लगा जिससे भाजपा और संघ परेशान थी और समय -समय पर टिक टोक को बैन करने की साजिश रचने लगे जिसमें एक साजिश #Youtube_Vs_TikTok भी थी।

आबादी: समस्या या बहाना?

जब सीमित संसाधनों वाले भारत देश को विकास की तरफ ले जाना था, तो जहां इंदिरा गांधी ने 'हम दो हमारे दो' की बात की, जिससे आबादी की बढ़ोत्तरी में कमी आए, तब उत्तर भारत के वामपंथी सोच के तथाकथित सोशलिस्ट नेता अपने-अपने वोट-बैंक के लिए 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी (संसाधन लेने में, टैक्स भरने में नहीं)' का राग अलाप रहे थे।

आरोग्य सेतू एप पर रवीश की प्राइम टाइम (व्यंग्य)

जहां देश कोरोना के संकट से जूझ रहा था, मजदूर भूख से तड़प रहे थे, दिहाड़ी मजदूर दूसरे प्रदेशों में फंसे होने के कारण आत्महत्या करने को विवश थे और प्रधानमंत्री मंत्री लोगो को अपने मोबाइल में app install करने को विवश कर रहे थे। क्या यही लोकतंत्र है..??

अदना सा पत्रकार: हें हें हें

शाम आठ बजे और कुछ टीआरपी जैसे समाजवादी कारणों से अब नौ बजे, प्राइमटाइम में अधोमुखी मेरूरज्जु से निहुरा हुआ एक अदना सा पत्रकार...

Why Ravish Kumar is more dangerous than other contemporary news anchors

Anchors like Ravish Kumar who declare themselves neutral and inert to any political influence are the most dangerous ones because they can camouflage their political narratives as news by decorating it with false but sensational information, relatable characters and conventional ‘Governments don’t care about poor’ sentiments.

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