Wednesday, December 2, 2020
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आबादी: समस्या या बहाना?

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ASHISH TRIPATHI
Right Winger, an army brat, interested in issues of society(particularly middle class), like to have realistic view (equidistant from pessimistic as well as optimistic).

पत्रकार व एंकर मैग्ससे कुमार ने अपने नए लंबे लेख में कहा कि भारत में किसी भी असफलता को ‘अधिक आबादी के अचूक मंत्र’ के नाम पर छिपा लेते हैं, सरकार कोरोनावायरस के संक्रमण को रोकने में नाकामयाब रही है। जो समझदार आदमी होगा, उसको पता है कि भारत की हर बड़ी समस्या बेरोज़गारी, गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा आदि की जड़ ही अत्यधिक आबादी है! जैसे एक परिवार में जब कमाने वाले की कमाई कम हो, मगर अधिक लोगों के खर्चों के आंकड़े ज्यादा हों, तो शीघ्र ही परिवार की आर्थिक स्थिति चिंताजनक हो जाती है, वैसे ही जब 130 करोड़ की आबादी वाले देश में टैक्स भरने वाले लोग जब मात्र 3.3 करोड़ हों (NSSO के 2019 के आंकड़े), तो संसाधन की कमी हर क्षेत्र में महसूस होगी। अब ज़रा अन्य देशों से तुलना करते हैं(आंकड़े गूगल से लिए गए हैं):

1. अमरीका भारत से क्षेत्रफल में 3 गुना बड़ा है मगर भारत की आबादी अमरीकी आबादी से 4 गुना ज्यादा है!
2. ऑस्ट्रेलिया की जितनी कुल आबादी है उससे ज़्यादा नई आबादी तो भारत में हर साल जुड़ती है, भारतीय रेलवे की NTPC परीक्षा में इतने आवेदन पत्र आए जितनी ऑस्ट्रेलिया की आबादी भी नहीं।
3. ऑस्ट्रेलिया के पड़ोसी देश न्यूज़ीलैंड की आज-कल मीडिया व सोशल मीडिया पर बहुत सराहना हो रही है कोरोनावायरस की रोकथाम को लेकर, उसकी आबादी मात्र 49 लाख है, जबकि भारत के कम से कम 10 शहर ऐसे हैं जिनकी आबादी इससे ज्यादा है!
4. विशेषज्ञों के अनुसार इस दशक के अंत तक भारत की जनसंख्या अपने से 3 गुना अधिक क्षेत्रफल और मौजूदा समय में सर्वाधिक आबादी वाले चीन से भी आगे निकल जाएगी!
5. कनाडा व रूस जैसे बड़े क्षेेेेत्रफल वाले देशों का तुलनात्मक अध्ययन तो और भी ज़्यादा चिंताजनक स्थिति दिखाएगा।

जब सीमित संसाधनों वाले भारत देश को विकास की तरफ ले जाना था, तो जहां इंदिरा गांधी ने ‘हम दो हमारे दो’ की बात की, जिससे आबादी की बढ़ोत्तरी में कमी आए, तब उत्तर भारत के वामपंथी सोच के तथाकथित सोशलिस्ट नेता अपने-अपने वोट-बैंक के लिए ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी (संसाधन लेने में, टैक्स भरने में नहीं)’ का राग अलाप रहे थे। इसके दोहरे असर हुए, एक जाति के नाम पर चुनाव जीतने में आसान था और दूसरा बढ़ती हुई गरीब आबादी को रोज़गार, शिक्षा, सड़कों, बिजली, अस्पतालों आदि की जगह केवल फ्री के राशन-पानी की बातों से अपना मानसिक गुलाम बनाया जाने लगा। बाद में उनमें से ही बहुत से गरीब लोग रोज़गार की तलाश में, मजबूरी में मजदूर बनकर हजारों किलोमीटर दूर अन्य राज्यों के महानगरों में पलायन करने लगे! उनका ‘रिवर्स पलायन’ भी कोरोना काल की एक दुखद कहानी है!

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