Thursday, April 18, 2024
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दुनिया, मतदाता और विपक्षी चश्मे से मोदी कैसे दिखते हैं!

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Abhishek Kumar
Abhishek Kumarhttps://muckrack.com/abhishekkumar
Politics -Political & Election Analyst

हाल ही में एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार ने कहा कि कर्णाटक विधान सभा चुनाव के नतीजे ने ये स्पष्ट कर दिया है कि देश में भाजपा विरोधी लहर चल रही है और लोग बदलाव चाहते है. शरद पवार कोई नौसिखए राजनेता नहीं है. वो राजनीति और राजनीतिक जमीन को समझते है. राजनीति में होने वाले बदलाव को भी समझते है.

वो अलग बात है वो उसको अपने हिसाब से बदलने की कोशिश करते है. ज्यादातर बार वो नाकाम रहते है वो एक अलग मुद्दा हैं. लेकिन उनसे कोई पूछे क्यों ऐसा कह रहे है. एक सवाल उनसे पुछा जाना चाहिए कि मई में आया कर्णाटक का नतीजा और दिसम्बर में आये गुजरात विधान सभा नतीजे, जहाँ 28 साल की एंटी इनकम्बेंसी के बावजूद भाजपा ने अपनी जीत का रिकॉर्ड बनाया. इतनी बड़ी जीत आज तक किसी पार्टी को कभी नहीं मिली. लंबे समय तक कांग्रेस सत्ता में रही उनको भी नहीं मिली. गुजरात विधानसभा की 182 सीटों में से भाजपा 156 सीटों पर जीती.

तब क्या भाजपा के पक्ष में लहर चल रही थी और पांच महीने में लहर बदलकर कांग्रेस के पक्ष में हो गयी? एक बात उनको याद दिलाने की जरुरत है कि विधानसभा और लोकसभा का चुनाव दोनों अलग–अलग होता है. और दोनों में लोग अलग तरह से वोट करते हैं. ये भारत का मतदाता अच्छे से जनता है, जिसको विधानसभा में जीतता है जरुरी नहीं उसको लोकसभा में भी वोट दे, वो फर्क करता है देश चलने की जिमेदारी किसको देनी है, और देश चलने की जिम्मेदारी किसको देनी है.

पिछले नौ साल से देश में जो माहौल है, उसमे ये साफ़ दिखाई देता है कि लोग मानते है कि देश में जितने विकल्प उपलब्ध है, उसमे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सबसे अच्छा विकल्प है. वो देश चला सकते है. नौ साल सत्ता में रहने के बाद मोदी की लोकप्रियता, अप्रूवल रेटिंग उसमे कोई कमी नहीं आ रही है. प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा सरकार की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है. इंटरनेशनल एजेंसीज जो तमाम् मानकों पर कसने के बाद ये फैसला सुनती है किसकी अप्रूवल रेटिंग कम हो रही है किसकी ज्यादा हो रही हैं. देश और दुनिया में नरेन्द्र मोदी एक मात्र नेता है जिनकी अप्रूवल रेटिंग लगातार शिखर पर हैं. ये कोई सामान्य बात नहीं है.

देश ने इन नौ सालों में दो-दो लॉकडाउन देखे. खास तौर से लॉकडाउन और कोरोना के बाद पुरे पश्चिम को ये लगता था कि भारत इससे उबर नहीं पायेगा. भारत के पास संसाधन नहीं है,इतनी बड़ी त्रासदी का सामना नहीं कर सकता. इस सब धारणाओं को मोदी ने मिथ्या साबित किया. दुनिया में कोविड का मैनेजमेंट जितना अच्छा भारत ने किया, दुनिया के सबसे शक्तिशाली और संसाधन संपन्न देश भी नहीं कर पाए.

रूस और यूक्रेन युद्ध में जिस तरह का स्टैंड लिया, साफ़ संदेश दिया कि हम किसी देश के प्रभाव में आने वाले नहीं है. हम वो करेगे जो हमारे राष्ट्र के हित में होगा. हमारे लिए प्राथमिकता हमारा देश है. भारत ने रूस के खिलाफ़ स्टैंड नहीं लिया. हम युद्ध के खिलाफ़ है. लेकिन रूस के खिलाफ़ पश्चिम के खेमे में शामिल हो जाए. ये हमने नामंजूर कर दिया.

साथ ही अपने विरोधियो से कहलवा देना भारत का स्टैंड सही था ये आसान काम नहीं था इसके लिए आपको करके दिखाना पड़ता हैं तब लोगों को यकीन होता है. नरेद्र मोदी ने ये करके दिखाया है. पश्चिम को लग गया है ये बुरी से बुरी क्राइसिस का सामना कर सकते है उनसे निकल सकते है. इनके पास देश और दुनिया के लिए विजन है. लेकिन भारत में कुछ ऐसे लोग है जो ऐसा मानने को तैयार नहीं है. अलग–अलग तरह की बातें विपक्षी नेताओं से सुनाने को मिल रही हैं.

तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्राएन की नयी थ्योरी आयी है बीजेपी को हराने का फार्मूला मिल गया है, किसी भी विपक्षी एकता की जरुरत नहीं हैं. जो पार्टी जिस राज्य में मजबूत हैं वो भाजपा को हराने के लिए वहां चुनाव लड़े. देखिये विपक्ष के अन्दर किस तरह की चालबाजियां चल रही है जो विपक्षी एकता की बात कर रहे है वो एकता के खिलाफ़ कैसे काम कर रहे है. दरअसल वो एक होना नहीं चाहते. लेकिन एक होना नहीं चाहते ऐसा कर रहे. ऐसा दिखना भी नहीं चाहते. तो दिखावे के लिए विपक्षी एकता का एक नाटक चल रहा हैं. मन हो ना हो, दिल मिले ना मिले हाथ मिलाते रहो.

अभी तो स्तिथि ये है हाथ मिलाने में भी समस्या हो रही है. अभी तक विपक्षी एकता की बैठक के लिए तारीख और वेन्यू का अंतिम फ़ैसला नहीं हुआ. अब भी नितीश कुमार की तरफ से ही घोषणा हुई है. उन्ही की पार्टी के अध्यक्ष लल्लन सिंह कह रहे है मल्लिकार्जुन खड्गे, राहुल गाँधी, ममता बनर्जी, एमके स्टालिन और अरविंद केजरीवाल भी आएगे. लेकिन उन लोगों की तरफ से कोई बयान नहीं आया है. नयी तारीख की घोषणा किए हुए नितीश कुमार को कई दिन हो चुके लेकिन किसी पार्टी के किसी नेता का बयान नहीं आया हैं. जिन पार्टियो को बुलावा हैं वो पहले से ही साथ है.कुछ नया नहीं होने जा रहा है.

केसीआर ने तौबा कर लिया हैं, विपक्षी एकता से मुझे कोई मतलब नहीं है मेरे लिए तेलंगाना महत्वपूर्ण हैं,कांग्रेस पार्टी बंगाल और उत्तर प्रदेश में चुनाव ना लड़े तो विपक्षी एकता हो सकती है, इसके लिए यादव और ममता बनर्जी का स्टैंड सबको पता है. आम आदमी पार्टी अभी कुछ तय नहीं कर पाई है, वो कह रही हैं कांग्रेस हमारा समर्थन करे, हमारा साथ दे, तब हम आगे बात करेगे. लगभग 15 दिन से अधिक हो चुके राहुल गाँधी और मल्लिकार्जुन खड्गे दोनों ने अभी तक आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को मिलने का समय नहीं दिया हैं, बातचीत करना, एकता ये सब बहुत दूर की बाते है. राहुल गाँधी कह रहे है कि भारत में जनतंत्र खत्म हो गया है.

अमेरिका से वाइट हाउस का आधिकारिक बयान आ रहा है कि भारत एक वाइब्रेंट डेमोक्रेसी हैं जिसको जानना, देखना हो तो दिल्ली आकर देख ले, तो वाइट हाउस का ये बयान किसके लिए है जाहिर है जो ये मानते हो. ये कह रहे हो कि भारत में डेमोक्रेसी नहीं है या भारत में डेमोक्रेसी को खत्म किया जा रहा है तो राहुल गाँधी भी उसमे आते हैं. राहुल इस समय अमेरिका की यात्रा पर हैं और उसी समय वाइट हाउस का बयान आया है. तो एक तरह से राहुल गाँधी को आईना दिखाने का काम किया हैं. अरे आपको तो अपने ही देश के बारे में ही नहीं मालूम है. हमको यहाँ से बैठकर दिखाई दे रहा है कि भारत में जीवंत जनतंत्र है आप कह रहे है खत्म हो रहा है और मर रहा है.

अब राहुल गाँधी का नया शिफूका आया है वो कह रहे है भारत में फ्री इलेक्शन तो हो सकता है फेयर नहीं हो सकता है. अब इसका मतलब आपको समझ आये तो समझाइए. मुझे तो ये समझ आ रहा है कि वो कह रहे है कि कर्णाटक में जीत हुई है वो फेयर इलेक्शन के कारण नहीं हुई हैं.

वो बेईमानी से हुई हैं इसका और क्या मतलब हो सकता है. हिमाचल प्रदेश और कर्णाटक में कांग्रेस की जीत इसलिए हुई क्यूंकि इन दोनों राज्यों में फेयर इलेक्शन नहीं हुआ है. दरअसल वो 2024 की हार का आधार तैयार कर रहे है कि हार के बाद क्या बोलना है क्यूंकि राहुल गाँधी की जो राजनीति है उसमे कांग्रेस की हार के लिए कांग्रेस के अलावा सारी दुनिया जिम्मेदार हैं. मोदी का तानाशाही रवैया जिम्मेदार है. उनका जनतंत्र विरोधी रवैया जिम्मेदार है. संवैधानिक संस्थाओ का कम्प्रोमाइज हो जाना जिम्मेदार है. इलेक्शन कमीशन पर भरोसा नहीं. सुप्रीमकोर्ट पर भरोसा नहीं. जितनी संविधानिक संस्था है किसी पर कांग्रेस का भरोसा नहीं है.

जो कांग्रेस को दिखाई दे रहा है. राहुल गाँधी को दिखाई दे रहा है वो दुनिया में और किसी को क्यों नहीं दिखाई दे रहा है. तो लगता है राहुल गाँधी के पास कोई विशेष चश्मा है देश को देखने का जो उन्ही को दिखाई दे रहा है. दुनिया को छोड़ दीजिये भारत के मतदाताओं को भी वो नहीं दिख रहा है जो राहुल गाँधी को दिख रहा है.

तो मामला ये हैं कि पूरा विपक्ष खासतौर से जो ये एकता का प्रयास में लगा हुआ विपक्ष है वो अपनी एक अलग दुनिया में जी रहा है. सबके अपने अपने कोने उस कोने में किसी और का प्रवेश नहीं चाहते. ये हमारा साम्राज्य है इसकी और मत देखो बाकि एकता की बात करो. हम उसके लिए तैयार हैं. इस प्रवृति वाला विपक्षी खेमा मोदी से कैसे लडेगा किस आधार पर लडेगा. उनके पास मुद्दा क्या है. मोदी हटाओ के अलावा और कोई मुद्दा नहीं है. मतदाता पूछेगा मोदी क्यों हटाओ, उसके जबाब में ये बाते है संवैधानिक संस्थाये खत्म हो गयी, जनतंत्र खत्म हो गया, देश में इमरजेंसी से बुरे हालत है.

इमरजेंसी में हालत कैसे थे, कांग्रेस पार्टी अच्छे से जानती होगी. उस समय तो देश पर जितने विपक्षी नेता थे सबको बिना मुक़दमे, बिना एफआईआर के जेल में बंद कर दिया गया था. विपक्ष का कौनसा नेता इस तरह से बंद हो गया है? यहाँ तो पूरी कानूनी प्रक्रिया के बाद कोई पकड़ा जा रहा है या जेल जा रहा है तो उस पर सवाल उठ रहा है. इस समय देश की जो राजनीतिक स्थिति है उसमे विपक्ष का इतना दिग्भ्रमित होना, इस तरह से जमीन से कट जाना ये कोई अच्छा संकेत नहीं है. लेकिन वास्तविकता है.

हम और आप इसको बदल नहीं सकते हैं. जिनको बदलना है जब तक वो इस बात का अहसास नही करेगे, जमीनी वास्तविकता कुछ और हैं. और जो वो सोच रहे है वो कुछ और हैं. जब तक उनको इसका अहसास नही होगा तब तक कोई परिस्तिथि बदलने वाली नहीं है.

बात बड़ी सीधी सी है जब तक डॉक्टर रोग का डायग्नोसिस नहीं करेगा तब तक इलाज कैसे करेगा. विपक्ष की कमजोरी क्या है, उसकी ताकत क्या है, ये ही अभी तक विपक्षी दल नहीं समझ पाए हैं. लेकिन उनकी इच्छा है कि मोदी हार जाए. इच्छा से तो चुनाव का नतीजा नहीं निकलता है. इच्छा तो जनतंत्र में मतदाता की चलती हैं. क्या मतदाता चाहता है कि मोदी हार जाए? इसका जबाब हाँ में मिलता तो नहीं दिखाई दे रहा हैं. लेकिन विपक्षी दलों को दिखाई दे रहा है. विपक्ष के सबसे अनुभवी नेता शरद पवार को दिखाई दे रहा है ,या तो उनका चश्मा कुछ गड़बड़ है या मेरा चश्मा गड़बड़ हैं, ये तो चुनावी नतीजे बताएगे.

लेख- अभिषेक कुमार (सभी विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं)

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