राजनीति का नवीनीकरण अब जातिनीति है

भारतीय राजनीति ने अब नयी करवट ली है, अब दौर है जातिनीति का| कड़वे शब्दों के बीच कितना भी उफ़न हो, वैचारिक खून दिमाग से बहते-बहते ज़बान तक आ जाये लेकिन सत्य तो यही है कि भारतीय इतिहास में राजनीति तो कभी हुई ही नहीं, आज़ादी से ठीक पहले और ठीक बाद.. जो हो-हल्ला सत्ता के गलियारों में मचता रहा, वो कभी तुष्टिकरण तो कभी धर्म के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा|

‘राजनीति’ शब्द जिस परिभाषा को संजोये हुए है उसमें साफ़ ज़िक्र है कि सत्ता और समाज में मध्यस्थता कायम करके सत्ताधारी दल एवं विपक्ष के बीच सामाजिक सरोकारों हेतु वाद-विवाद, वार्तालाप एवं क्रियाकलाप ही राजनीति है| लेकिन भारत की राजनीति में यह परिभाषा कभी भी सटीक नहीं बैठती| आज़ादी के बाद से लेकर अबतक अगर गौर किया जाय तो राजनीति सिर्फ जाति-धर्म के गलियारों से ही गुजरती रही|

चित्र में: एनडीए के राष्ट्रपति प्रत्याशी राम नाथ कोविंद के साथ प्रधानमंत्री मोदी एवं बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार

सन 1946 में राजनीति के पहले चरण में नेहरू बनाम जिन्ना का ज़िक्र ही पर्याप्त है| कटु सत्य की तरफ रुख़ करे तो यह पूरा खेल गद्दी का था, वो गद्दी थी आजाद भारत के प्रधानमंत्री के रूतबे की| उस वक़्त की जनता खुद भूख से निवाले की तरफ दौड़ लगा रही थी तो दोनों ही नेताओं ने जो मुद्दा चुना, अपनी राजनीति को संजोने और सत्ता को हथियाने के लिए, वो था धर्म| धर्म के गलीचे पर पैर फैला कर कुर्सी को छीनने के लिए खूब लड़ाई हुई, शुक्र था कि वैचारिक| लेकिन जब एक कुर्सी पर दो दावेदार की लड़ाई शुरू हुई तो ये वैचारिक लड़ाई किस तरह एक ही थाली में खाने वाले दो परिवारों को आपस में ही मरने-मारने को मजबूर कर दी, इसका गवाह तो इतिहास है ही| खून से सनी सड़के, खेत-खलिहान, बिलखते बच्चे, कंपकंपाते बूढ़े और लाचार मर्द. वो मंज़र भारतीय इतिहास का काला दशक कहा जाय तो कोई अपराध नहीं होगा|

सत्ता पर काबिज़ हुई भारतीय कांग्रेस या यूँ कहे कि नेहरू (गाँधी) परिवार नेहरू के छत्रछाया में न जाने कब अपना अस्तित्व खोता रहा, किसी को कानो-कान ख़बर तक नहीं हुई| दो दशक तक नेहरू परिवार कांग्रेस के अस्तित्व में नवीनीकरण करते हुए सत्ता पर काबिज़ रहा लेकिन इसी बीच जून, 1974 को भारतीय राजनीति में एक बदलाव का सूरज दिखा, जय प्रकाश नारायण| उनके सम्पूर्ण क्रांति के आह्वान से लगा कि अब जाति-धर्म की राजनीति में बदलाव आयेगा| अब एक नयी परिभाषा वास्तविक राजनैतिक परिभाषा के इर्द-गिर्द घूमेगी| जयप्रकाश नारायण नें कहा कि सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियाँ शामिल है- राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रान्ति होती है।

पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आहवान किया था। मैदान में उपस्थित लाखों लोगों ने जात-पात, तिलक, दहेज और भेद-भाव छोड़ने का संकल्प लिया था। उसी मैदान में हजारों-हजार ने अपने जनेऊ तोड़ दिये थे। नारा गूंजा था:

जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो।
समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो।

इस राजनैतिक परिवर्तन की आग में झुलस कर तत्कालीन इंदिरा गाँधी सरकार को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था| उम्मीद की किरण तो जगी लेकिन 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच आपातकाल ने इंदिरा गाँधी को और मज़बूत किया, वो कुछ समय के लिए सत्ता से गयी ज़रूर पर वापस 1980 के दौर में वो सत्ता पर काबिज़ हुई| 1981 में राजनीति ने फिर करवट बदलते हुए सिख बनाम अन्य का रुख इख्तियार कर लिया| यह भारतीय राजनीति का तीसरा चरण था|

चौथे चरण की राजनीति फिर से हिन्दू बनाम मुस्लिम के बीच फंस गयी| कांग्रेस से टूट कर निकले समाजवादी, जय प्रकाश की राजनीति से उपजे जनता वादी मुस्लिम तुष्टिकरण तो जनसंघ (वर्तमान भाजपा) हिन्दू तुष्टिकरण की राजनीति के साथ सत्ता के लिए जोर आजमाने लगे| 1991 से 1992 के बीच हिंदुत्व का झंडा बुलंद किये अडवाणी रथयात्रा लेकर निकले तो मुस्लिम सहानुभूति की होड़ में विपक्ष की लड़ाई समाजवादियों और जनवादियों के इर्द-गिर्द ही रही| बाबरी विध्वंस के बाद भारतीय राजनीति ने मुस्लिम बनाम हिन्दू का चोंगा पहन कर बचपन से लेकर जवानी गुजारी|

अब भारतीय राजनीति का पांचवा चरण है जातिवाद बनाम जातिवाद| इस चरण के कई सूरमा है, मायावती, मुलायम, उठावले| लेकिन अभी-अभी इस चरण के बाहुबली बनकर उभरे है नरेंद्र मोदी| आज वो भाजपा के साथ दौड़ लगा रहे है. ‘सबका साथ-सबका विकास’ की बातें करते है लेकिन इस राजनितिक दौर में वो चुपके से जातिवाद बनाम जातिवाद का नया फार्मूला लाये है| चाहे उत्तरप्रदेश चुनाव में टिकट वितरण हो या फिर दलित के घर जाकर खाने की होड़| धमा-चौकड़ी के साथ वो राहुल गाँधी को भी घसीट लाये है| जातिगत राजनीति के इस दौर में एक उप-विभाजन है ‘दलित बनाम दलित’ का|

भाजपा ने जैसे ही राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद को चुना कम से कम सौ दफा याद दिलाया कि वो ‘दलित’ को राष्ट्रपति बनाने जा रहे है| अब बेचारा विपक्ष भी क्या करे? इस राजनितिक महाभारत में वो भी ‘दलित’ रथ लेकर निकल पड़ा है| इन सभी के बीच कुछ पंक्तियाँ लिख दी है:

योग्य, कर्म न पूछो भैया…बोलो अपनी बात
महामहिम भी चुनने के लिए…पूछो केवल जात

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