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करवा चौथ: लोक परंपरा, बाज़ार और नारीवाद

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करवा चौथ: लोक परंपरा, बाज़ार और नारीवाद

तथ्य 1: आज के सारे समाचार पत्र करवा चौथ पर खरीददारी के आमंत्रण के विज्ञापनों से भरे पड़े थे। आभूषण बनाने वाली भिन्न भिन्न कम्पनियाँ और स्थानीय सर्राफ सभी एक से बढ़कर उपहार योजनाएं लेकर आए हैं। साड़ी, लहंगे, मिठाइयाँ और तो और ब्यूटी पार्लर्स के भी पर्याप्त विज्ञापन थे।

तथ्य 2: करवा चौथ को स्त्री दमन, स्त्री पराधीनता का प्रतीक, पितृसत्तात्मक मानसिकता का प्रकटीकरण बताने वाले लेख वक्तव्य, कविताएँ और सन्देश भी पर्याप्त रूप से प्रेषित हो रहे हैं।

बड़ी संख्या में नवयुग की स्त्रियाँ दुविधा में है। करवा चौथ को हाँ कहें या ना कहें। हाँ कहती हैं तो पिछड़ी मानसिकता से बंधी मानी जाएँगी और ना कहती हैं तो विज्ञापनों में पसरा ते लुभावना ग्लैमर हाथ से जाता है।

याद कीजिये वो, “दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे, और ”कभी ख़ुशी कभी गम” के ग्रैंड करवा चौथ सेलेब्रेशन या सास- बहू टी.वी. धारावाहिकों में सप्ताहों चलती करवा चौथ की तैयारी।

“करवा चौथ’, पारम्परिक दाम्पत्य उत्सव है। कुछ प्रदेशों में बहुत धूम धाम से मनाया जाता है, कुछ में मनाया ही नहीं जाता।

दिन भर निर्जल उपवास, शाम को चन्द्र दर्शन और पूजन के साथ उपवास तोड़ना, पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए प्रार्थना करना। अन्य भारतीय पर्वों की भांति स्वाभाविक तौर पर करवा चौथ में भी प्रकृति और कृषि से जुड़ाव का दर्शन था। नए चावल के आटे के व्यंजन बनते थे, करवे में उपज की प्रतीक बालियाँ लगती थीं। स्त्रियाँ प्रायः अपने विवाह के परिधान पहनती थीं। कुछ प्रान्तों में अपने से छोटी स्त्रियों को घर की बड़ी महिलाएं उपहार देती थीं।

करवा चौथ में सहज स्नेह की संवेदना थी। बालीवुड और फिर छोटे पर्दे ने भी जमकर उसका दोहन किया और साथ ही एक ऐसा पर्व बना दिया जिसमें बाज़ार को अच्छी संभावनाएं दिखीं।

बाज़ार के दखल के साथ ही करवा चौथ का अर्थ – “पति के लिए भूखा रहना” और “सजना संवारना” हो गया। स्त्री पति के लिए भूखी रहे तो पति की तरफ से उपहार तो बनता ही है। अब करवा चौथ के अगले दिन, “उन्होंने क्या दिया? की चर्चा भी बड़े जोर शोर से होती है। बाज़ार ने एक नयी परंपरा की रचना कर दी।

करवा चौथ की मूल परम्पराओं को परे धकेल कर इसे पति पत्नी के बीच लेन –देन का अवसर जैसा बनाकर बाज़ार फल –फूल रहा है। बालीवुड और अन्य मनोरंजन चैनल भावनाओं का दोहन कर रहे हैं। इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है।

दूसरी ओर उदारवादी, पितृसत्तात्मक परम्पराओं का विरोधी, वामपंथ से प्रेरित वर्ग – करवा चौथ को स्त्री के लिए उसकी हीनता के प्रदर्शन का पर्व मानकर भांति भांति से इसका उपहास कर रहा है।

आश्चर्य की बात है कि, करवा चौथ का उदहारण देकर, हिन्दू धर्म में स्त्रियों की स्थिति को हीन बताने वाले कभी बाज़ार की शक्तियों या बालीवुड से ये नहीं पूछते कि वे, पितृसत्तात्मक समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले इस पर्व का इतना प्रसार क्यों करते हैं?

परम्परा, बाज़ार और आधुनिक नारीवाद ने इस पर्व के चारों ओर एक अजीब सी जटिलता बुन दी है।

इस कारण व्रत करने वाली और न करने वाली दोनों ही स्त्रियाँ कहीं कहीं कई तरह के प्रश्नों से जूझती हैं।

“घर की परम्परा है तो निभानी पड़ेगी” से लेकर, “मैं क्यों भूखी रहूँ वो भी क्यों नहीं” जैसे तर्कों ने अब कई पुरुषों को भी करवा चौथ के दिन पत्नी के साथ व्रत करना सिखा दिया है।

भारत देश और सनातन संस्कृति उत्सवधर्मी है। अनेकानेक लोकपर्व हैं। सभी में कुछ सन्देश है। कोई प्रकृति से जोड़ता है तो कोई परिवार से। कोई अध्यात्म से जोड़ता है तो कोई लौकिक जगत से।

पर्व हमें जीवन की किसी भी प्रकार की एकरसता से बाहर लाते हैं और नयी उर्जा का संचार करते हैं।

दाम्पत्य परिवार परंपरा की धुरी है। दाम्पत्य भी एकरसता से शिथिल न हो जाये इसलिए उसमें भी उत्सव होना चाहिए। ऐसा उत्सव जो स्नेह की ऊष्मा को जगाये रखे।

किसी उत्सव को मनाना या न मनाना, नितांत निजी निर्णय है किन्तु यह निर्णय बाज़ार या विरोधियों के प्रचार या कुप्रचार पर आधारित नहीं होना चाहिए।

काव्या उच्च शिक्षित, अच्छे पद पर कार्यरत थी। काव्या की माँ एक पारंपरिक महिला थीं करवा चौथ तथा इस प्रकार के सभी पर्वों को सम्पूर्ण समर्पण के साथ मनाने वाली। उनके उलट काव्या को इनमे न ही कोई रूचि थी न ही विश्वास। काव्या का विवाह उसकी पसंद से एक अन्य प्रान्त के परिवार में हुआ जहाँ करवा चौथ की परंपरा नहीं थी। काव्या की माँ फिर भी चाहती थीं कि उनकी बेटी ये परंपरा निभाए। माँ –बेटी के बढ़ते झगडे देख कर, काव्या के पति ने उससे कहा, देखो तुम्हारी माँ ने तुम्हारी ख़ुशी के लिए सब कुछ भूलकर तुम्हारा विवाह एक अलग परंपरा वाले अलग भाषा बोलने वाले परिवार में कर दिया तो क्या तुम उनकी ख़ुशी के लिए एक पर्व नहीं मना सकती? बात काव्या को समझ में आयी। ये उत्सव नहीं महोत्सव सा हो गया। माँ प्रसन्न – बेटी परंपरा निभा रही है, पति प्रसन्न – पत्नी को उसकी सलाह भा रही है  और ससुराल के शेष सदस्य तो उसकी तपस्या से मानों अभिभूत हुए जा रहे थे।

हर एक वर्ष बीतते हुए काव्या को ऐसा लगने लगा जैसे ये वार्षिक उत्सव उनके प्रेम को और अधिक प्रगाढ़ करता है। जीवन के दैनिक व्यवहार के कारण दाम्पत्य में उपजी उदासीनता को धो डालता है। ये पति-पत्नी में किसी को ऊँचा या नीचा नहीं बनाता वरन और निकट लाता है ( किन्तु तभी जब बाज़ार के प्रभाव से मुक्त हो)।

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