Tuesday, July 23, 2024
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दक्षिण पूर्व एशिया- संबंध और संघर्ष

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दक्षिण पूर्व एशिया में संघर्ष व सम्बंध की जो स्थिति- परिस्थिति दिन-प्रतिदिन बदल रही है और विशेषकर वुहान वायरस के बाद वह तो हम देख ही रहे हैं और भारत न तो इससे अछूता रह सकता था और न ही रहा है। उन बदलती परिस्थितियों का विशलेषण व निरंतर बदलते घटनाक्रमों को तो हम देख ही रहे हैं, आवश्यकता है इन घटनाक्रमों के बीच होती उन छोटी बातों को ध्यान से देखने की तथा उनका स्वयं ही विशलेषण करने की। यह घटनाएं व बातें उभरती तो हैं एक कौंधती बिजली की तरह परन्तु पल भर में ही गायब हो जाती हैं और हमें पता भी नहीं चलता कि इसका प्रभाव कहीं पडा है या नहीं। यहां पर Geo-politics का कुछ ज्यादा ही मानवीकरण हो गया।

पहले हाम्रो मित्र नेपाल की बात करते हैं। वहाँ राजनीति व भू-राजनीति दोनों में ही परिस्थितियां बदल रही हैं। खैर.. हम विदेशी मामलों में बहु-चर्चित शब्द PEOPLE TO PEOPLE CONNECTकी बात करते हैं। नेपाल व भारत के यदि People To People Connect की बात करें तो हम सोचते हैं नेपाल व भारत के बिना बाड़-बंदी की हुई सीमाएं, व्यापार, समान रूप से चलते आ रहे सांस्कृतिक महोत्सव व रीति-रिवाज, एक दूसरे के यहाँ शादी-ब्याह (बिहार व उ.प्र. से लगे क्षेत्रों में)। हालांकि यह people to people connect का एक मजबूत पक्ष है जोकि वास्तविक भी है परन्तु एक पक्ष दूसरा भी है जिसने इस people to people connect को विस्तार दिया है और इस पर दुष्प्रभाव भी डाला है, वह है हमारा प्रिय सोशल मीडिया जिसने सीमाओं की बडी रुकावटों को समाप्त कर दिया है जो पहले बडी संख्या में लोगों को मिलने से रोकती थीं। लेकिन इससे पडने वाला दुष्प्रभाव दोनों देशों के नागरिकों के बीच टाइपिंग युद्ध के रूप में देखने को मिलता है जहाँ पर सोशल मीडिया कभी-कभी WAR ZONE में बदल जाता है। इसका कारण यह भी है सोशल मीडिया पर उपस्थित लोग politically aware होते हैं।

जब हम किसी नेपाली से मिलते हैं तो हम कहते हैं कि “तुम चाइना की तरफ झुकाव रखते हो, देख लेना चीन तुम्हारे देश में जब कब्जा करके बैठ जाएगा तब तुम्हें पता चलेगा”। लेकिन वह आपकी किसी भी बात से सहमत नहीं होगा क्योंकि आपने उसकी देश संप्रभुता पर सवाल खड़े कर दिए हैं तथा कोई भी अपने देश को इस प्रकार से नहीं देखेगा और वह यह भी नहीं चाहेगा कि कोई अन्य राष्ट्र उसके देश को कमजोर करके आँके कि वह किसी अन्य देश पर निर्भर है, चाहे वह हो भी और नेपाल है भी इसमें किसी की दो राय नहीं हो सकती। इसमें ध्यान में रखने वाली बात यह है कि हमें ऐसे टाइपिंग युद्ध में सम्मिलित नहीं होना चाहिए क्योंकि यह people to people connect पर दुष्प्रभाव डालते हैं किंतु कई बार counter-narrative व narrative सेट करने के लिए यह आवश्यक भी होता है। यदि किसी का ऐसा टाइपिंग युद्ध होता भी है तो उसे अपने चित्त को अधिक नहीं दुखाना चाहिए क्योंकि आपका प्रतिद्वंद्वी दूसरे देश का है, वह भारतीय नागरिक नहीं है और जब तो बिल्कुल भी दुखी नहीं होना चाहिए जब नेपाल में एक ऐसी populist communist govt जिसके संविधान के एजेंडा में भारत को ही विस्तारवादी बताया गया हो।

source: U.S. Library of Congress

बदलती भू-राजनीति के बीच एक और बिजली भी कौंधी थी यह आपको ध्यान होना चाहिए कि एक न्यूज आई थी कि हमारे पडोसी भूटान ने असम में पानी की आपूर्ति रोक दी है, जिसमें बाद में पता चला कि यह फेक न्यूज थी और यह आपूर्ति वुहान वायरस की वजह से प्राकृतिक रूप से सिंचाई चैनल में आई ब्लॉकेज के सही समय पर सही न कर पाने कारण रुकी थी। आमतौर पर सभी ने बाद में यही सोचा कि यह भी उस फेक न्यूज के ताल से उछली उस बूंद की तरह ही होगी जिसका हम प्रतिदिन सेवन करते लेकिन यह उससे अलग थी क्योंकि यह सोच-समझकर, आधी-अधूरी फैलाई गई थी ताकि वह मोदी को टारगेट कर यह कह सकें की देखों मोदी के शासन में सभी देशों से हमारे सम्बन्ध खराब हुए हैं तथा इस सरकार की विदेश नीति अप्रभावी है। असल में वह लोग चाहते ही यह हैं कि सभी देशों के साथ सम्बन्ध खराब हो जाएं और एक राष्ट्र के रूप में विश्व में भारत की छवि एक ऐसे देश की बन जाए जिसके किसी पडोसी देश से सम्बंध अच्छे नही हैं। ऐसी फेक न्यूज का असर यह होता है कि एक राष्ट्र के रूप में दूसरे देश की मीडिया व लोगों में भारत की छवि धूमिल होती है तथा उन्हें ऐसा महसूस होता है कि हम (भारत) उनके प्रति सोच अच्छी नहीं रखते।

Effect of Mis-reporting

इन संघर्षों व सम्बंधो के बदलते हुए हालातों में अमेरिका की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है और अब तक की घटनाओं से अबकी महत्ता को समझा जा सकता है। इस बीच कई खबरें निकल कर आई कि कैसे अमेरिका ने अपने USS NIMITZ व USS RONALD REAGAN ने दक्षिण चीन सागर में युद्धाभ्यास किया तथा बाद में उसने अपने B52 BOMBER विमानों को तैनात किया। एक और न्यूज यह निकलकर आई थी कि अमेरिका ने अपने जो ट्रूप्स रूस के विरुद्ध उसने COLD WAR के समय से ही तैनात कर रखे थे, उसकी संख्या घटाकर हिंद-प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में उनकी संख्या बढा दी है। इन सब घटनाओं से यदि पहले की चर्चा करें तो यह सर्वविदित है कि U.S. ने कई दक्षिण-पूर्वी देशों जैसे वियतनाम व फिलीपींस आदि के साथ पहले से ही संधि कर रखी है और उसके नेवल-बेस इन देशों में उपस्थित हैं। इन सभी तथ्यों से स्पष्ट होता है कि अमेरिका का प्रभाव दक्षिण-पूर्वी देशों में कितना अधिक है जबकि यह उसकी समुन्द्री सीमाएं से कितने दूर हैं।

वर्तमान में तो यह भारत, दक्षिण पूर्व एशिया व मल्लका-स्ट्रेट  के लिए सुखद स्थिति है परंतु भारत के लिए व भारत के भविष्य को देखते हुए अमेरिका का दक्षिण पूर्व एशिया में यह प्रभाव अच्छा नहीं है क्योंकि अमेरिका प्रत्येक उस शक्ति के विरुद्ध कार्य करेगा जो शक्ति उसके स्तर तक पहुँच जाएगी। आज के समय में भारत अमेरिका के लिए हर प्रकार से महत्वपूर्ण है चाहे वह डिफेंस डील व हथियारों का क्रय हो, दक्षिण एशिया व दक्षिण पूर्व एशिया में एक बडी लोकतांत्रिक व परमाणु युक्त सैन्य ताकत के लिहाज़ से हो। जिस दृष्टि से भारत दुनिया के इस हिस्से में अमेरिका के लिए महत्व रखता है उस हिसाब से तो अमेरिका का जो प्रभाव दक्षिण पूर्व में है वह भारत का होना चाहिए था।

हाल ही में भारत अपने इस प्रभाव को विस्तार देने के लगातार प्रयास कर रहा है जैसे अभी म्यांमार के साथ Russian Made Kilo-Class Diesel Electric Attack Submarine, म्यांमार के कार्गो जहाजों को तकनीकी सहायता व म्यांमार के सैन्य अधिकारियों का भारत की सैन्य अकादमी प्रशिक्षण का समझौता किया गया है लेकिन इस क्षेत्र में सैन्य कार्यवाही व युद्ध की स्थिति में किसी देश के सैन्य बेस का प्रयोग करने जैसा कोई समझौता नहीं है। हमें U.S. के दक्षिण पूर्व एशिया में प्रभाव को कब्जाने की आवश्यकता है।

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