Monday, April 15, 2024
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पालघर हत्या या द्वेष?

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खामोशियों का आलम इस कदर है जैसे साँसों का भी राजनीतिकरण हो गया हो, महाराष्ट्र में निर्दोष 70 वर्षीय साधु, साथी साधु और कार चालक की निर्मम हत्या ने पूरे लोकतंत्र को झकझोर करके रख दिया है, वकील हूँ सो नही पाया सोचा अपने लोकतंत्र और सविंधान को कलम दू, ऐसी निर्मम हत्या की वीडियो को देख इंसानियत शर्मशार हो गई।

अब आते हैं कुछ पहलू पे

1)पुलिस की मौजूदगी में निर्मम हत्या, कैसे?
तो इंडियन पुलिस एक्ट की धारा 7 और 29 के तहत अगर पुलिस अधिकारी अपनी ड्यूटी और दायित्वों की अदायगी में कोताही या असफल साबित होता है, या ईमानदारी बरतने में नाकाम होता है तो उक्त धाराओं में बरखास्तगी, जुर्माना और निलंबन का प्रावधान हैं.

2)कानून क्या कहता है
इसी तरह आपराधिक मामलों की कार्रवाईयों के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के डी.के. बसु बनाम स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल और भाई जसबिर सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब और शीला बरसे बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र के फैसले में देख सकते हैं. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से पहले और बाद की कार्रवाईयों के संदर्भ में अहम निर्देश जारी किए हैं. जो दीवारों पे या किताबों में सिर्फ एक अक्षर नही कानून है।

3) लॉक डाउन में इतनी भीड़ आई कैसे?
मुझे लगता है भीड़ आई नही, लाई गई थी क्योंकि आनंदविहार (दिल्ली) की भीड़ हो या बांद्रा मुम्बई की, हर भीड़ की एक कहानी है जिसका रचयता कोई और, तो लाचार ,बेबस और निर्दोष साधुओं की हत्या भी आई हुई भीड़ नही थी, भीड़ को किसी ने लाया था। क्योंकि इतना द्वेष, इतनी हिंसा आई हुई भीड़ नही करती, वो भीड़ करती है जिसको पहले ए ही पढ़ाया या समझाया गया हो । ये लाचारी नही हत्या थी।

4) 3 दिन बाद जब वीडियो आया तब क्यों करवाई हुई या जब मीडिया ने इसको दिखाना शुरू किया तब क्यों करवाई हुई
ये उत्तर तो बड़ा सरल है, हत्या हो जाती और चोरी का मुकदमा दर्ज करवाके निर्दोष साधुयों को ही दोषी बना दिया जाता । लेकिन लोकतंत्र भी अजीब है उसमें से कुछ लोगो के आंखों पे पानी था, जो रोक नही पाए तो आपने गुस्से को वीडियो का रूप देके हर जगह वायरल कर दिया, क्योंकि ऊपर वाला भी है जो न्याय और अन्याय का फर्क देखता है।

मेरे मानना है कि ये एक “custodial death” है, क्योंकि पुलिस वालों द्वारा भीड़ को सौपना और पुलिस स्टेशन से साधु को लेके आना अपने आप में एक तरह की हिंसा है, अतः “कॉस्टडीएल डेथ” कहने में मुझे कोई गुरेज नही।

अख़लाक़ खान, पहलू खान कोई भी हो सबके लिए देशव्यापी रोष था, हैशटैग चले थे, सारी पार्टीयों में जैसे गुस्से का तूफान आ गया था, लेकिन साधुओं की हत्या पे चुप्पी बहोत कुछ बोलती है, भइया ये लोकतंत है और हम जनता है हम “भूलते” नही।

ये ब्रह्म हत्या कहीं इस देश को या राज्य सरकार को भारी ना पर जाएं क्योंकि अगर वो चोरी करने गए थे या चोर थे तो
1) गाड़ी से क्यों जा रहे थे, कोई चोर चोरी करने गांव में कार से क्यों जाएगी।
2)साधुओं को पुलिस स्टेशन से निकाल के उनके सुपुर्द क्यों? किया गया और
3) पुलिस मूक दर्शक क्यों?बनी रही
4) 3 घंटे तक पुलिस स्टेशन में थे और तब तक कोई करवाई क्यों नही हुई

ऐसे सवाल ही मन में ‘राजनीतिकरण’ होने की आशंका लाती है। लेकिन हर अन्याय के बाद न्याय होता है और असहाय साधुओं की पुण्य आत्मा को न्याय जरूर मिलेगा। इसमें जितने लोग थे उनमें सबसे ज्यादा कहीं ना कहीं “पुलिस” वाले ज्यादा दोषी हैं।

बस इतना ही पूछना चाहता हुँ की 70 वर्षीय कल्पवृक्षगिरी साथी गिरी महाराज और कार चालक नीलेश तेलग्ने पे इतनी खामोशी कहीं कुछ लोगों की खुदकुशी की सबक ना बन जाए।

गौतम कुमार सिंहMBA/LLB.अधिवक्ता, AdvocateSupreme Court of India.9891637735.

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