गमला कट्टरवाद का!

कट्टरवाद एक ही पूर्वनिर्धारित परिप्रेक्ष्य से परख़ने और किसी भी विपरीत विचारधारा अथवा सोच के हर पहलु, चाहे वह सकारात्मक ही क्यों ना हो, को नकार देने की आदत का नाम है।

ना बदलने, ना समझने और ना सुनने की ज़िद का नाम कट्टरवाद है।

रिलिजन* से दुनिया को कोई खतरा नहीं है, कट्टरवाद से है। और ऐसा नहीं है की कट्टरवाद केवल रिलिजन में है, कट्टरवाद जीवन के हर आयाम और विचारधारा में दिख सकता है, अतिवादिता के उदाहरण हर तरफ़ मिल सकते हैं। अगर आप देखने के लिए तैयार होतो।

पूंजीवाद का कट्टरवाद, साम्यवाद का कट्टरवाद, इस्लाम का कट्टरवाद, जातीवाद का कट्टरवाद, जनतंत्र का कट्टरवाद, वाम-पक्ष का कट्टरवाद। सारी परेशानियों की जड़ कट्टरवाद ही है।

हर विचारधारा, अवधारणा एवम धारणा में अतिवादी होते हैं – किसी में कम, किसी में ज्यादा होते है। कुछ अनुग्रही समय के अनुसार बदलने और निखारने का कम विरोध करते हैं कुछ ज़्यादा।

परन्तु यदि किसी अवधारणा में ज़्यादा अतिवादिता हैं तो क्या वोह उस धारणना की विफ़लता नहीं है? कम से कम संचार की विफ़लता तो मान ही सकते है।

विज्ञान भी कट्टरवाद से अछूता नहीं है।

अरे सुन तो लीजिये।

लेखक विज्ञान की पद्धति एवम दृष्टिकोण पर प्रष्न नहीं उठा रहा हूं, और न ही उठाना चाहिए। परन्तु यह भी नहीं भूलना चाहिए की विज्ञान() प्रकृति और सृष्टि को जानने और समझने की एक खोज है।

विज्ञान के चश्में से जब प्रकृति को देखा तो न्यूटन के नियम आये(), फिर आइंस्टाइन() आये। इंसान ने और गहराई में झाँका तो क्वांटम दुनिया() मिली, ओर उसकी विचित्रता मालूम पड़ी। वस्तुगत सच्चाई नहीं है वहां, देखने वालो के बस नज़रिये हैं()।

थोड़ा सा जरूर पढ़े कम से कम क्वांटम एन्टेंगलमेंट () के बारे में, बहुत ही अधभुद है बह्रामंड।

याद रखिये न्यूटन से क्वांटम तक पहुंचने में समय लगता है।

हर संस्था की तरह विज्ञान भी इंसानों का खेल है। हर खेल की तरह इसमें भी अहंकार, राजनीति, भाई-भतीजावाद होता है। और पैसे का इस खेल में भी महत्तव है। सैन्य अनुसंधान ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है क्यूंकि उनका लक्ष्य पैसा बनाना नहीं था बल्कि सामरिक जीत का था()।

वैज्ञानिक खोज तभी कर पाता है जब उसके पास संसाधन हो। कुछ बेचारे वैज्ञानिक पुराणिक सरस्वती नदी के एक समय पर मौजूद होने के पुख़्ता प्रमाण खोज ने के लिए पैसा जमा कर पाए इसलिए उसके प्रमाण खोजने की कोशिश की गयी, और जैसा वेद पुराण में बताया था वैसा ही हुआ, सरस्वती नदी होने के पुख़्ता प्रमाण मिले()।

डीएनए प्रौद्योगिकी से पहले का और उसके आने के बाद का हमारा जो मनुष्य के इतिहास का ज्ञान है उसमे परिवर्तन आया है()। अभी हाल ही में कुछ नए डीएनए प्रणाम मिले हैं जो की भारतीय मूल के लोगो का सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया पहुंचे का दावा करते है ()।

समय लगेगा पर बदलाव आएगा क्यूंकि विज्ञान खोजता रहेगा और सत्य रास्ता ढूंढ ही लेता है। हालाकि जिंदगी में व्यस्थ इंसान तक सत्य पहुंचने में वक़्त लगता है।

प्रौद्योगिकी ने आवाज़ जरूर दी पर शोर इतना ज्यादा है की कुछ नया सुनना और समझना मुश्किल हो चला है।

आम आदमी एक मीडिया ग्रेजुएट रिपोर्टर की ख़बर से समझता है जैसे की वैज्ञानिको ने “लगभग” सब कुछ जान लिआ है ब्रम्हांड के बारे में, प्रकति के बारे में। अरे साहब गॉड पार्टिकल() भी खोज लिआ। इंसानी डीएनए को तो हमने डिकोड ही कर डाला है(), और अब तो क्रिस्पर भी आ गया है()।

यह सब निःसंदेह बड़ी सफलताएं है इंसान की, विज्ञान की, परन्तु क्रिस्पर से हमको सिर्फ़ काटने जोड़ने के औज़ार मिले हैं()। अभी हम जेनेटिक किताब() के पूर्ण अर्थ को समझने से बहुत दूर हैं।

हर रोज हम कुछ नया जान रहे हैं इस सृस्टि के बारे में ओर शोर बहुत है।

जैसे भारत के सब मूल निवासी एक ही हैं यह ना सिर्फ़ विज्ञान सिद्ध करता है बल्कि वैज्ञानिको का बड़ा हिस्सा इसको मानता भी है() पर कुछ लोग अभी भी इंडो-आर्यन माइग्रेशन सिद्धांत() पे किताबें लिखते हैं।

मिस्र का स्फिंक्स कई वैज्ञानिको के अनुसार ४५०० इसा प्रूर्व से कहीं ज्यादा पुराना है() परन्तु अभी भी यह विचार पूर्णतः स्वीकारा नहीं किया गया है वैज्ञानिक समुदाय के द्वारा()। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं की प्रमाण नहीं है बल्कि इसलिए भी की जिन लोगो ने अपना सम्पूर्ण जीवन एक विचारधारा और सिद्धांत पे लगाया हो उनको बदलाव स्वीकार करने में दिक़्क़त आ सकती है, यह स्वाभाविक है।

जानने के लिए इतना कुछ है की कोई भी एक व्यक्ति सब कुछ नहीं जान सकता, सब कुछ नहीं समझ सकता। सब इतना जटिल और आपस में जुडा हुआ है की हमारी छोड़िये वैज्ञानिक खुद नयी प्रौद्योगिकी आधारित अनुसंधान, जैसे आर्टिफिशल इंटेलिजेंस, के परिणामो से अचंभित हो जाते हैं()।

आगे बहुत कुछ और नया आएगा, कुछ और नया जानने को मिलेगा। कुछ नए धातु मिलेंगे, कुछ नए उपकरण बनेंगे।

आज कल हम ऐसे कई नए उपकरण देख रहे है जो केवल इंसान के मष्तिस्क की तरंगो से निर्दश ले सकते हैं- बिना इंसान के हिलेडुले, बिना उसके कुछ बोले काम हो जाता है()।

कुछ कहते हैं इस धरती ने ऐसे कई योगी देखे हैं जो किसी भी इंसान की एक झलक से उसकी मनोदशा समझ जाते थे, में यह नहीं कह रहा की आप उन योगीयो() की शक्ति, या कह लीजिये कहानी,में विश्वास करिये, परन्तु विज्ञान को जड़ मत मानिये, विज्ञान जिवंत विद्या है।

विज्ञान के रिलिजन के अनुग्रही खुद विज्ञान के सिद्धांतों एवम नियमो की सीमा और उनकी असीमिता को नहीं समझते()। वह भी एक संकोचित सोच से दुनिया को देखते हैं ओर कोई भी संकोचित सोच इंसान को एक भ्रम में कैद रखती है।

लेखक का विज्ञान और प्रौद्योगिकी को पूरा समर्थन है परन्तु उस भ्रम को नही जिसके अनुसार विज्ञान का कहा सब कुछ एक पत्थर की लकीर है।

डार्विन की क्रमागत उन्नति सही है() ,पर शायद जीवन धरती पे दूर कहीं अंतरिक्ष से आया हो, शायद मंगल से आया हो।

हमारा विज्ञान हमको तीन-चार आयामी दुनिया क़े नियम जरूर बताता पर विज्ञान हमको अनेको आयामों के होने की संभावना के बारे में भी बताता है()।

नियम शायद न बदलते हों परन्तु सन्दर्भ बदल सकते है।

हो सकता है बाहरी लोक के प्राणी उन आयामों के रहने वाले जीव हो और उनके लिए हम बस समतल जमीन के वासी()।

हो सकता है वोही सृस्टि के करता हो, या फिर वोभी हमारी तरह ही इस बह्रामंड, इस सृस्टि को समझने में लगे हों()।

हो सकता है नोलान() की इंटरस्टेलर() की तरह हमारे पूर्वज ही पांच आयामी दुनिया के वासी निकले। सृस्टि खुद विज्ञान की नज़र में बहुत अद्भुद और अनोखी है, सम्भावनाओं का पिटारा है।

किसी तरह जीवन ने रास्ता ढूंढ ही लिया। एक वीडियो गेम की तरह।

कई लोग सही में यही कहते हैं – यह सब साला एक सिम्युलेशन() है। उनके अनुसार विज्ञान के नियम वीडियो गेम के नियम से ज्यादा और कुछ नहीं। किसी ने पूरा गणित का पेपर() छापा है गूगल** कर लीजिये।

कुछ विज्ञानिको का मानना है की अनेको ब्रम्हांड हो रहे हैं(),पानी के बुलबुले जैसे, बन रहे हैं भुझ रहें है,और हम बस उनमे से एक में हैं। यहाँ सारे स्थिरांक, जैसे गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक, ऐसे अंक हैं की यह बह्रामंड हो पा रहा है इस रूप में()।

लेखक यह नहीं कहता की यही सत्य है, पर यह भी कुछ संभानाएं है, कुछ दृष्टिकोण हैं।

हमसे पहले बहुत कुछ देखा है इस अम्बर ने। अभिव्यक्ति बस हर बार अलग -अलग होती है ।

और जैसा पहले कहा कि विज्ञान एक ख़ोज है। इस खोज में हम कई बार गलत राह भी लेते हैं, परन्तु सुधार करते रहते हैं, बेहतर होते रहते हैं।

आज की हमारी इलेक्ट्रॉन की समझ बीसवीं सदी के सिद्धांतो से परे है। अब वह इलेक्ट्रॉन बेचारा बीसवीं सदी की तरह नाभिक का चक्कर नहीं काटता है()। आज के जागरूक इलेक्ट्रानस नाभिक के कवच जैसे कुछ बन गये हैं ()।

प्रकृति नहीं बदलती बह्रामंड की बस चश्मे बदलते रहते है।

न्यूटन ने हमको बताया की हर क्रिया के बराबर तथा उसके विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। पर कुछ ऐसा ही तो कर्मा भी कहता है()।

आइंस्टाइन ने इंसानो के लिए जो नए आयाम खोले क्या वैसी ही कुछ बातें हमारे योगी नहीं कहते थे()?

हम भी प्रकृति है, हम भी सृस्टि हैं।

क्या जो कुछ क्वांटम एन्टेंगलमेंट हमको सृस्टि के बारे में बताता है क्या वैसा ही हमने प्यार के रूप में महसूस नहीं किया है?

विज्ञान हमको यह बताता है की धरती अनंन्त बह्रामंड में तैरते हुए एक कण से ज्यादा कुछ भी नहीं है ()। विज्ञान यह भी दिखता है की प्रकर्ति विविधता से भरी है(), और विभिन्नता चाहती है(), ताकि नए रूप ले सके(), नयी लीला रचा सके()।

विज्ञान हमको कुछ और नहीं तो कम से कम खुला दिमाग रखना जरूर सिखाता है()।

स्वामी विवेकानंद() जी ने कहा है की कोई भी धर्म या विचारधारा एक छोटे गमले की तरह है जिसमे मनुष्य रुपी बीज़ एक पौधा बनता है, परन्तु मनुष्य पेड़ उस गमले से बाहर आने पर ही बनता है()।

बीसवीं सदीवाला इलेक्ट्रान बने रहना तो अपराध है, पर अपनी सोच को सिर्फ़ इकीसवीं सदी के इलेक्ट्रान तक ही सीमित करके नहीं रख सकते हैं। अलग अलग चश्मों से देखना और अनुभव करना ही होगा। गमले से बाहर निकलना ही होगा।


* रिलिजन शब्द का अनुवाद गूगल धर्म बताता है, परन्तु लेखक धर्म शब्द को रिलिजन का अनुवाद नहीं मानता। 
() लेखक उदाहरण और स्रोत की लिंक पे समय लगा सकता था लेकिन जिसको जानना है वह खुद खोजेगा ही। नहीं मिले गूगल** करके तो बतलाइएगा। 
** गूगल वही दिखाएगा जो आप देखना चाहते है या वो जो आप अभी तक देखते आये हैं। पर मिल ही जाएगा अगर आप सही सवाल पूछें तो।

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