Sunday, September 20, 2020
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कांग्रेस और राष्ट्रवाद

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2014 में लोकसभा का चुनाव बुरी तरह हारने के बाद से कांग्रेस और ख़ास तौर पर राहुलजी यह जानने की उत्कण्ठा दिखा रहे हैं कि कांग्रेस हारी तो हारी क्यों! तब से पाँच साल बीत गये, एक चुनाव और गया, कांग्रेस फिर हार गयी, पर वह यक्ष-प्रश्न अभी भी कांग्रेस और राहुलजी के समक्ष उसी तरह खड़ा है: कांग्रेस हारी क्यों? 2014 की हार पर मन्थन करने के बाद कांग्रेस के हित-चिन्तकों ने हार का कारण मोदी की निष्कलङ्क छवि को बताया था जिसके परिणामस्वरूप 2019 के चुनाव में कांग्रेस की रणनीति मोदी की छवि को येन केन प्रकारेण बिगाड़ने पर केन्द्रित रही, और नतीजा निकला- ढाक के तीन पात! 2019 की पराजय के बाद कांग्रेस के थिंक टैंक ने यह निष्कर्ष निकाला कि भाजपा के राष्ट्रवाद के मुद्दे का कांग्रेस मुकाबला नहीं कर सकी, और यही उनकी पराजय का मुख्य कारण था। इसके बाद कांग्रेस ने तय किया कि अगले चुनाव में राष्ट्रवाद का मुद्दा वह भी ज़ोर-शोर से उठाएगी: इसके लिए वह अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने के लिए वह राष्ट्रीय स्तर पर वह व्यापक अभियान चलाएगी।

यह खबर पढ़ते ही मैं चिन्ता में पड़ गया। देश की दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियाँ राष्ट्रवाद को ही अपने प्रचार-अभियान का केन्द्रबिन्दु बनाने जा रही हैं, अब राष्ट्रवाद के मुद्दे पर वोट डालने वाले वोटर के लिए कठिनाई बढ़ने जा रही है- इसी बात को लेकर मेरा तनाव बढ़ने लगा, और एक बार फिर मैंने अपने राजनीति विज्ञान के गुरूजी की शरण में जाने का निश्चय किया।

समय लेकर जब निश्चित समय पर गुरूजी के यहाँ पहुँचा तो गुरूजी पूजा-पाठ से निवृत्त होकर मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रणाम, आशीर्वाद और चाय की औपचारिकता के बाद गुरूजी ने प्रसन्नवदन होते हुए मुझे अपनी समस्या बताने के लिए कहा। “अभी तक तो मोदी और उनकी पार्टी भाजपा ही राष्ट्रवाद के मुद्दे पर वोट माँग रहे थे, अब कांग्रेस ने भी तय किया है कि वह भी अपने कार्यकर्ताओं को राष्ट्रवाद में प्रशिक्षित करेगी और अगले चुनाव में राष्ट्रवाद के मुद्दे पर ही वोट माँगेगी। ऐसे में राष्ट्रवाद के मुद्दे पर वोट देने वालों के लिए संकट खड़ा हो जाएगा: वह कैसे तय करेंगे कि किसे वोट देना है?”

गुरूजी ठठाकर हँस पड़े। “इहै तोहार समस्या हौ? हमहूँ कहीं कि सबेरे-सबेरे कवन आफत आय गइल!”

यह सुनकर मैं कुछ आश्वस्त हुआ; जिस समस्या ने मेरी रातों की नींद उड़ा रखी है, गुरूजी के लिए वह मामूली बात है। गुरूजी मेरी समस्या बस हल करने ही वाले हैं- इस उत्कण्ठा से मैं गुरूजी की ओर देखता रहा। गुरूजी कहते रहे:
“अच्छा! तो कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं को राष्ट्रवाद की ट्रेनिंग देने जा रही है? किसने किया है यह फैसला?”
मैं घबरा गया। “फैसला किसका है यह तो नहीं पता, पर अखबार इस समाचार से भरे पड़े हैं कि कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं को राष्ट्रवाद का प्रशिक्षण देने जा रही है।”

गुरूजी पूर्ववत हँसते हुए बोले, “बस, इसी से कांग्रेस का हाल समझ लीजिए। फ़ैसला किसका है यह नहीं मालूम, बस सब अँधेरे में तीर चला रहे हैं। क्या पता कोई तीर निशाने पर लग जाय।”
“पर गुरूजी, अगर कांग्रेस के कार्यकर्ता भी राष्ट्रवाद में प्रशिक्षित हो गये और कांग्रेस भी राष्ट्रवाद की बातें करने लगी, तो हम जैसों के लिए तो दिक्कत हो जाएगी।” मैंने हठपूर्वक अपनी बात पर अड़े रहते हुए कहा।
गुरूजी फुरसत में थे; मेरी स्थिति का पूरा मज़ा लेते हुए बोले, “अच्छा यह बताइए, यह प्रशिक्षण कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को देगा कौन? प्रशिक्षक वह कहाँ से लाएंगे?”
“प्रशिक्षक तो कहीं से लाये जा सकते हैं गुरूजी; कांग्रेस के पास चिंतकों की कोई कमी तो है नहीं। अमर्त्य सेन और अभिजित बनर्जी जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता हितैषी कांग्रेस के पास हैं, और राहुलजी के सलाहकारों में तो ऑक्सफ़ोर्ड और हार्वर्ड से पढ़ कर आये विशेषज्ञों की फौज है।”

 

इस उत्तर से गुरूजी और भी प्रसन्न हो गये। “बहुत अच्छे! तो ऑक्सफ़ोर्ड और हार्वर्ड वाले अब इन्हें राष्ट्रवाद सिखाएंगे!” इसके बाद स्वगत होते हुए गुरूजी ने कहा, “चिंता मत कीजिए; इनका राष्ट्रवाद मोदी के राष्ट्रवाद से अलग होगा। वोट का निर्णय करने में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी।”

गुरूजी ने मेरी समस्या तो हल कर दी थी, पर मैं भी बात को समझने पर अड़ा था। गुरूजी से ज्ञान की गूढ़ बातें निकलवाने की दृष्टि से मैंने कहा, “पर गुरूजी, राष्ट्रवाद तो राष्ट्रवाद होता है, इसका राष्ट्रवाद और उसका राष्ट्रवाद से क्या मतलब है?”

गुरूजी ने मेरी ओर इस तरह देखा जैसे एक विद्या-वाचस्पति प्राथमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को देखता है, पर मैं ऐसे दृष्टिपात का अभ्यस्त था। अन्ततः गुरूजी को मेरे स्तर पर उतरना ही पड़ा। उन्होंने अब मुझे अच्छी तरह से समझने की सदिच्छा से प्रश्न किया: “अच्छा तो इसी बात पर बताइए कि राष्ट्रवाद क्या होता है?”

 

विशेष पढ़े-लिखे न होने के कारण थ्योरी के ऐसे सवालों पर मैं बगलें झाँकने लगता था, पर आज मैंने उत्साह के साथ कहा, “राष्ट्रवाद का अर्थ है- राष्ट्र सर्वोपरि: कोई भी निर्णय राष्ट्र के हित को दृष्टिगत करते हुए लेना – यही राष्ट्रवाद है।”
राष्ट्रवाद को परिभाषित करने के मेरे इस बचकाने प्रयास पर गुरूजी मुस्करा उठे, और अगला सवाल किया, “और राष्ट्र क्या होता है?”

मैं समझ गया कि कुछ जानने का ढोंग गुरूजी के आगे नहीं चल सकता, और गुरूजी से कुछ निकलवाने के लिए मुझे उनके समक्ष समर्पण ही करना होगा, पर एक और प्रयास करते हुए मैंने कहा, “राष्ट्र मतलब देश: उसकी भौगोलिक सीमाएं, उसमें रहने वाले लोग, उसकी नदियाँ, उसके पहाड़, उसके पेड़-पौधे, उसकी प्राकृतिक सम्पदा।”
“और उसकी संस्कृति?” – गुरूजी ने सवाल दागा।
“जी, उसकी संस्कृति भी।”

गुरूजी ने चश्मा उतार कर नीचे रख दिया। यह एक शुभ संकेत थे जिसका अर्थ था कि गुरूजी अब विषय को विस्तार से समझाने जा रहे थे। गुरूजी कहने लगे, “पहले देश और राष्ट्र में अन्तर समझिए। अंग्रेजों के भारत छोड़ने के समय भारत लगभग ६०० रियासतों अथवा राज्यों में बँटा हुआ था। सबके अलग शासक थे, और अलग नियम-कानून। इस तरह यह सभी अलग देश थे। हाँ या नहीं?”
“जी गुरूजी।” मैंने सिकुड़ते हुए कहा।
“और ६०० अलग देशों में बँटे होने के बाद भी भारत अपनी सांस्कृतिक एकता के कारण एक राष्ट्र था। विदेशी जोधपुर या बीकानेर को नहीं जानते थे, भारत को जानते थे। समझ रहे हैं?”
“जी गुरूजी।” मैंने कहा।

गुरूजी कहते रहे, “१९३० के दशक में इक़बाल, जौहर और जिन्ना ने कहा कि भारत देश में दो राष्ट्रीयताएं रहती हैं, जो एकसाथ नहीं रह सकतीँ। इसे ‘टू नेशन थ्योरी’ कहा गया। गाँधीजी उन्हें समझाते रह गये किन्तु इस्लाम के कारण देश का सांस्कृतिक विभाजन हो चुका था, सिर्फ़ भौगोलिक विभाजन होना बाकी था। गाँधीजी उसे नहीं रोक सके। आज भले ही बांग्लादेश के निर्माण और पाकिस्तान के आसन्न विघटन को देखकर धर्म या मजहब के आधार पर राष्ट्र के निर्माण की अवधारणा या ‘टू नेशन थ्योरी’ को गलत साबित कर दे, पर यह निर्विवाद सत्य है कि इन अलग होने वाले देशों में से कोई भी भारत के साथ जुड़ने का इच्छुक नहीं होगा क्योंकि उनकी राष्ट्रीयता भारत से तब तक मेल नहीं खाएगी जब भारत भी उनकी तरह इस्लामी देश नहीं बन जाता।”
“जी गुरूजी।” मैंने परले सिरे के मूर्ख की तरह सिर हिलाते हुए कहा।

गुरूजी अत्यन्त कृपापूर्वक अपना आख्यान जारी रखा, “तो अब आप समझ गये कि देश और राष्ट्र अलग-अलग हैं; एक राष्ट्र में कई देश हो सकते हैं, और उसी तरह एक देश में कई राष्ट्र भी हो सकते हैं?”
“जी गुरूजी।” मैंने यन्त्रवत कहा।
“अब देखिए” गुरूजी ने आगे कहा, “दशहरे के दिन मोहन भागवत ने घोषणा की कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है, और अगले दिन शशि थरूर और असदुद्दीन ओवैसी ने उनके बयान से असहमति व्यक्त कर दी। आज मायावती ने भी इस बात के लिए भागवत की खिल्ली उड़ायी है। ओवैसी ने तो कह दिया कि भारत के वर्तमान समय में हिन्दू राष्ट्र होने का तो खैर सवाल ही नहीं उठता, भारत न कभी इतिहास में हिन्दू राष्ट्र था, न भविष्य में कभी होने जा रहा है। अब शास्त्रीयता के सवाल पर ओवैसी से कोई चाहे जितनी बहस कर ले, राष्ट्रीयता के सवाल पर वह भागवत से कभी सहमत नहीं होने वाले हैं। इसका अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत की भौगोलिक और इसके कानूनों की सीमाओं में रहते हुए भी अलग-अलग लोगों की भारत राष्ट्र की अवधारणाएं अलग-अलग हैं। मोहन भागवत भारत को हिन्दू राष्ट्र समझते हैं। उनके मतानुसार भारत उनका राष्ट्र तभी तक है जबतक इसका हिन्दू चरित्र बचा हुआ है, वहीँ थरूर, ओवैसी और मायावती के अनुसार भारत उनका राष्ट्र तभी हो सकता है जब वह अपने हिन्दू-चरित्र को त्याग दे। देख रहे हैं आप- राष्ट्र की विभिन्न परिभाषाओं में कितने विरोधाभास हैं?

“जी गुरूजी।” मैंने फिर दुहराया।

“तो चिन्ता मत कीजिए।” गुरूजी ने अपनी मुस्कराहट को और चौड़ी करते हुए कहा, “कांग्रेस का राष्ट्रवाद- वह उसकी शिक्षा चाहे जहाँ से प्राप्त करें, मोदी और भाजपा के राष्ट्रवाद से अलग होगा। आप भाजपा के राष्ट्रवाद के साथ पहले की तरह खड़े हो सकते हैं।”

मेरे मुँह के साथ मेरी आँखें भी फटी रह गयीं। गुरूजी ने पूर्णाहुति के अंदाज़ में पूछा, “और कुछ?”
गुरूजी फुरसत में कम ही मिलते थे। मैंने अवसर का लाभ उठा लेने की गरज से एक सवाल और किया, “तो गुरूजी, कांग्रेस और भाजपा के राष्ट्रवाद में मूल अन्तर क्या होंगे?”

गुरूजी मेरी मूर्खता के भोंड़े प्रदर्शन पर चकित हो गये। उन्होंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला। मुझे लगा कि अगर उस समय वहाँ मेरी जगह कोई और होता तो गुरूजी उसको दो-चार ठेठ बनारसी गालियाँ सुना चुके होते, पर धैर्य धारण करते हुए गुरूजी ने प्रेम से ही समझाया।
“मोदी के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ है भारत की युगों पुरानी वैदिक संस्कृति पर गर्व करना और उसे पुनर्जीवित करने के प्रयास करना। भारत के योग, आयुर्वेद व नीतिशास्त्र आदि अन्य प्राच्य विद्याओं के आधार पर देश का विकास करना और देश के प्राचीन गौरव को बहाल करने के लिए प्रयास करना।”
“और कांग्रेस का राष्ट्रवाद?”– मैंने पूछा।

गुरूजी ने गंभीर होते हुए उत्तर दिया। “कांग्रेस के लिए तो देश का इतिहास पण्डित नेहरू से शुरू होता है। ज्यादा से ज्यादा वह गाँधी तक पीछे जा सकते हैं। वह लोगों को यह बताएंगे कि कैसे इन दो महान नेताओं ने भारत जैसे देश का निर्माण किया, कैसे इन्दिराजी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और बांग्लादेश बनवाया। कैसे राजीवजी ने श्रीलंका में शान्ति स्थापित करने के लिए भारतीय सेना को लगाया, और कैसे मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील पर समझौता किया। इस प्रकार कांग्रेस यह सिद्ध करने का प्रयास करेगी कि वह आरम्भ से ही राष्ट्रवादी रही है, और इसलिए भविष्य में भी उसके राष्ट्रवादी होने पर भरोसा किया जा सकता है। कांग्रेसी राष्ट्रवाद का फोकस पिछले डेढ़-दो सौ सालों के इतिहास पर रहेगा जिसके लिए उसने इतनी मेहनत से अपने इतिहासकारों से इतिहास लिखवाया है। अब कितने लोग कांग्रेस के बताये इतिहास पर और कांग्रेस की राष्ट्र और राष्ट्रवाद की परिभाषाओं से सहमत या प्रभावित होंगे- यह तो समय ही बताएगा।”

थोड़ी देर रुक कर गुरुजी ने पूछा, “अब तो कोई संशय नहीं है न?”
“नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत, स्थितोsस्मि गत सन्देहः करिष्ये वचनम् तव।” गुरूजी के चरण पकड़ते हुए मैंने कहा, और उनसे विदा ली।

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