अश्वमेध यज्ञ और फैली भ्रांतियाँ

वर्तमान में सनातन धर्म और उसके रीति-रिवाजों की आलोचना करना बुद्धिजीवी होने की निशानी बन गया है। स्वघोषित बुद्धिजीवी हिंदुत्व की आलोचना कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। धर्मग्रन्थों को बिना समझे उनमें लिखी बातों का मनमाना अर्थ निकलकर दुष्प्रचार करना इन तथाकथित बुद्धिजीवियों का शौक बन गया है।

ऐसे ही एक दुष्प्रचार अश्वमेध यज्ञ के संदर्भ में भी फैलाया जा रहा है। जिसका खंडन करना नितांत आवश्यक है। अश्वमेध यज्ञ को समझने के लिए मेध शब्द को समझना पड़ेगा। क्या अर्थ है मेध का?

मेधृ धातु शब्द से बना है मेध। इसके तीन अर्थ हैं जिसे इस श्लोक से जाना जा सकता है- “मेधा मेधृ हिसनयो संगमे च” अर्थात बुद्धि, हिंसा और संगम। मेध का प्रयोग इन तीनों अर्थों में हो सकता है- बुद्धि या हिंसा या फिर संगम।

प्रश्न उठता है कि इसमें से कौन सा अर्थ लिया जाए? वर्तमान तथाकथित बुद्धिजीवी इसका अर्थ हिंसा से जोड़ कर अश्वमेध का अर्थ अश्व की हिंसा से लगाते हैं। यह अधजल गगरी छलकत जाए कि स्थिति है। किसी भी धर्मग्रन्थ का संपूर्ण अध्ययन आवश्यक है तभी उसका ठीक-ठीक अर्थ निकाला जा सकता है।

मेधा के तीन अर्थों में से कौन सा अर्थ यहाँ लागू होगा इसका समाधान हमें ऋग्वेद के प्रारंभ में ही प्रथम मंडल अध्याय 1 श्लोक 4 में ही बता दिया गया है- “अग्ने! यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि। स इद्देवेषु गच्छति।” जिसका अर्थ है- हे अग्नि देवता! जिस हिंसारहित यज्ञ को आप आवृत करते हैं वही यज्ञ ही देवताओं का प्राप्त होता है।

यज्ञमध्वरं = यज्ञम् + अध्वरम् । अध्वर शब्द का अर्थ इस श्लोक से जाना जा सकता है- “ध्वरति वध कर्मा, न ध्वरः इति अध्वरः।” अर्थात ध्वर वध कर्म है और जिसमें ध्वर न हो वह अध्वर है।

ऋग्वेद के पहले ही अध्याय में जब यह बता दिया गया हो कि अध्वर या अहिंसक यज्ञ ही देवताओं को प्राप्त हो सकता है तब मेध का अर्थ हिंसा में कैसे प्रयोग हो सकता है?! स्पष्ट है कि मेध शब्द का अर्थ अन्य दो अर्थों में से कौन सा लागू होगा यह जानना पड़ेगा क्योंकि हिंसा के अर्थ में यह प्रयुक्त नहीं हो सकता।

अश्व शब्द का भी केवल एक ही अर्थ नहीं है। अश्व का प्रयोग गति और शक्ति के लिए होता है। इसी प्रकार ‘यज्ञ’ शब्द दो अक्षरों ‘य’ और ‘ज्ञ’ से मिलकर होता है जिसका अर्थ है यत्न पूर्वक ज्ञान प्राप्ति। य से यत्न और ज्ञ से ज्ञान।

इन सबसे स्पष्ट है कि अश्वमेध यज्ञ का संपूर्ण अर्थ इस प्रकार निकलता है- यत्न पूर्वक ज्ञान प्राप्ति के लिए बुद्धि का संगम (सम्मेलन)

ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए समस्त बुद्धिमानों का सम्मेलन आयोजित किया जाता था ताकि उनके संगम या सम्मेलन से एक दूसरे के ज्ञान का आदान प्रदान हो और प्रचार प्रसार हो। यही अश्वमेध यज्ञ है।

परंतु दुर्भाग्य से इसे अश्व की हिंसा से जोड़ कर दुष्प्रचारित किया गया है। यह अर्थ लगाया गया है कि चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए राजा अश्वमेध यज्ञ आयोजन करते थे और अंत में अश्व का वध करते थे। यह बात कितनी अतार्किक है इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है इस घटना से – राजा राम ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। रावण के वध पश्चात संपूर्ण भारतवर्ष में प्रभु श्रीराम को अपने चक्रवर्ती सम्राट होने का प्रमाण स्वरुप किसी अश्वमेध यज्ञ की आवश्यकता नहीं थी, वे सर्वविदित और सर्वमान्य चक्रवर्ती सम्राट थे।

स्पष्ट है कि उन्होंने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन लोगों के सम्मेलन और फलस्वरूप ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए यह आयोजन किया था। हमें अपने प्राचीन धर्मग्रंथों का सम्यक विश्लेषण करना आवश्यक है तभी हम भ्रांतियों को दूर कर समाज में समानता स्थापित कर सकते हैं। दुष्प्रचार से केवल वैमनस्यता ही फैल सकती है। यदि किसी का उद्देश्य सही हो तो भी दुष्प्रचार से सही उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। सही लक्ष्य प्राप्ति के लिए सकारात्मक सोच और कार्य भी नितांत आवश्यक है। भ्रांतियों का निराकरण आवश्यक है तभी समाधान प्राप्त हो सकता है।

जय श्रीराम 🙏

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