Saturday, August 8, 2020
Home Hindi क्या हमारी विविधता ही आज हम पर लांछन है?

क्या हमारी विविधता ही आज हम पर लांछन है?

Also Read

Saurabh Bhaarat
सौरभ भारत
 

सबरीमाला केस पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पहले ही आ चुका है और सदियों से चले आ रहे विशुद्ध धार्मिक अनुष्ठानों को सेकुलर हस्तक्षेप द्वारा बलात् भंग करने का विचित्र आदेश दे दिया गया है। आदेश के जबरन अनुपालन में केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने दो वामपंथी एक्टिविस्ट महिलाओं को असभ्य तरीके से चोरी छिपे मन्दिर में प्रवेश भी करा दिया है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट जैसी उस संवैधानिक व्यवस्था ने दिया है जो घोषित रूप से ‘सेकुलर’ है जिसका अर्थ स्पष्ट रूप से विशुद्ध धार्मिक मामलों से तटस्थ रहना होता है। मामला अब केवल सबरीमाला तक नहीं रह गया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले भविष्य के सभी विवादों के लिए नजीर या मार्गदर्शक का काम करते हैं और यही इस फैसले का सबसे खतरनाक पहलू है। इसलिए इस फैसले से जुडी तमाम विडम्बनाओं को समझना और उस पर चर्चा करना समीचीन है।

विविधता और भेदभाव को एक ही समझने की भूल

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने सनातन धर्म की सबसे सुंदर बात अर्थात् उसकी विविधता को ही उसके अपराध के तौर पर लांछित कर दिया। वर्तमान मामले के ही आलोक में जेंडर जस्टिस की सतही बहस के नजरिए से ही देखें तो मन्दिरों/परम्पराओं को जेंडर के आधार पर तीन वर्गों में रख सकते हैं। पहले वे मन्दिर/परम्पराएँ जो केवल महिलाओं से सम्बन्धित हैं; जैसे अट्टूकल भगवती जैसे मन्दिर, दूसरे वे मन्दिर/परम्पराएँ जहाँ पुरुष ही प्रधान भूमिका में होते हैं और तीसरे शेष सभी मन्दिर/परम्पराएँ जो जेंडर-निरपेक्ष हैं अर्थात जहाँ स्त्री, पुरुष किसी की वर्जना नहीं। इतनी विविधता का कारण अलग-अलग मन्दिरों से जुड़े अलग-अलग इतिहास, कथाएँ, दर्शन और आध्यात्मिकता है।

सबरीमाला में भी 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं का प्रवेश निषेध भगवान अयप्पा की अपनी प्रकृति, ब्रह्मचारी स्वरूप् और मान्यताओं के कारण है न कि किसी महिला के महिला होने के फलस्वरूप होने वाले भेदभाव के कारण। यदि यह महिलाओं का निषेध होता तो सभी आयु की सभी महिलाओं का होता, न कि एक विशेष आयु वर्ग की महिलाओं का। इसमें किसी जेंडर के प्रति भेदभाव खोजना तो एक लिबरल दृष्टिदोष और सेकुलर रतौंधी ही कही जाएगी। इस कथित भेदभाव की थोथी दलील से क्या उन मन्दिरों को पुरुष-विरोधी कहा जाएगा जहाँ विभिन्न धार्मिक, दार्शनिक मान्यताओं के कारण पुरुषों का प्रवेश वर्जित है? अरे यह तो हिन्दू धर्म की अनन्य विशिष्टता है कि इसने अलग-अलग प्रकृतिजन्य लैंगिक विविधता को स्वतंत्र मान्यता दी ही, उसे सम्मानजनक ढंग से रिकॉग्नाइज किया है जोकि दुनिया के किसी भी अन्य प्रचलित मजहब में नहीं दिखता। केवल केरल ही क्यों, हमारे धर्म में तो उत्तर से लेकर दक्षिण तक ऐसी अनगिनत प्रथाएं, पूजा-पद्धतियाँ, नियम, अनुष्ठान, कर्मकांड, संस्कार इत्यादि हैं जिनमें जबरन स्त्री-पुरुष समानता की बात खोजना जघन्य मूर्खता ही कही जाएगी।

मैं स्वयं पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिस भोजपुरी क्षेत्र से आता हूँ वहाँ माँ दुर्गा की पूजा में उन्हें फल-फूल, धार-कपूर, अच्छत इत्यादि के साथ ही सिंदूर भी चढ़ाया जाता है और ये सिंदूर चढ़ाने का काम केवल महिलाएं ही करती हैं, पुरुष नहीं क्योंकि हमारी संस्कृति में एक पुरुष अपनी पत्नी के अलावा अन्य किसी स्त्री को सिंदूर अर्पित नहीं कर सकता है। इसी प्रकार नवरात्रि में 9 छोटी बच्चियों को देवी के 9 रूप मानकर हम उन्हें भोजन करवाते हैं। अब कोई सिरफिरा इसे पुरुषों के प्रति भेदभाव कहकर अदालत में याचिका लगा दे तो आप उसे जेंडर जस्टिस का योद्धा कहेंगे या हद दर्जे का लम्पट शरारती और मूर्ख? और ऐसी याचिका पर अदालती आदेश भी जारी हो जाए तो अपने देश की ऐसी “भयंकर न्यायिक विद्वता” पर अपना सिर पीटने के अलावा और क्या करेंगे आप? बताइए! सकारात्मक विविधता की भावना को नकारात्मक भेदभाव मानने का ऐसा न्यायिक निष्कर्ष निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण और हिन्दू धर्म के प्रति अपमानजनक है।

मूर्ति के अधिकार की अनदेखी

 

इस वाद में जेंडर न्याय के भ्रामक आवरण में भगवान अयप्पा के क़ानूनी अधिकारों की खुली अवहेलना हुई। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा का यह कहना भी समझ से परे था कि महिलाओं का प्रवेश निषेध कोई “एसेंसियल हिन्दू प्रैक्टिस” नही है। न जाने कहाँ से जज साहब ने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि हिंदुओं की ओर से ऐसा कोई दावा किया गया है कि महिलाओं का प्रवेश निषेध होना चाहिए। अव्वल तो यह महिला अधिकार की बात ही नहीं थी। यहाँ तो एक “विधिक व्यक्ति” के रूप में भगवान अयप्पा की अपनी मान्यताओं का सवाल था। ध्यान रहे, भारतीय कानून में मन्दिर में विराजमान मूर्तियों को भी एक “विधिक व्यक्ति” के रूप में मान्यता दी गई है। अतः संविधान द्वारा प्रदत्त वे सभी अधिकार जो “व्यक्तियों” को दिए गए हैं, वे प्राकृतिक व्यक्तियों (अर्थात् मनुष्यों) के साथ ही विधिक व्यक्तियों(जैसे कोई कम्पनी, संस्था, विराजमान मूर्ति आदि) को भी दिए गए हैं। जैसे, श्रीराम जन्मभूमि मामले में “श्रीरामलला विराजमान” भी एक विधिक व्यक्ति के रूप में केस के पक्षकार हैं। वर्तमान मामले में भी भगवान अयप्पा के नैष्टिक ब्रह्मचर्य गुण को संविधान के अनुच्छेद 25 के धार्मिक अधिकारों तहत संरक्षण मिलना चाहिए था जो नहीं दिया गया। इसके साथ ही संविधान के तहत एक व्यक्ति(चाहे प्राकृतिक हो या विधिक) को मिले निजता समेत उन सारे अधिकारों की भी अनदेखी हुई जिन्हें विस्तृत व्याख्या के माध्यम सुप्रीम कोर्ट ने ही तमाम निर्णयों में अनुच्छेद 21 के अनुषांगिक माना है।

हिन्दू धर्म की प्रकृति समझने में भूल

इस मामले में याचिकाकर्ताओं का यह कहना कि महिलाओं का प्रवेश निषेध हिन्दू धर्म की कोई “एसेंसियल हिन्दू प्रैक्टिस” नहीं है, भी भ्रामक और उलझाऊ है। एसेंसियल हिन्दू प्रैक्टिस जैसी बातों को अपने फैसले में शामिल कर सुप्रीम कोर्ट ने भी कहीं न कहीं यह बात मान ली कि इस्लाम और ईसाइयत की तरह हिन्दू धर्म भी कुछ निश्चित नियमों को मानने वाला कोई “लकीर का फकीर टाइप का मजहब” है जिसमें अलाँ-अलाँ चीजें सवाब हैं और फलाँ-फलाँ चीजें कुफ़्र! “एसेंसियल हिन्दू प्रैक्टिस” से आपका मतलब क्या है मीलॉर्ड? क्या आप कश्मीर के अमरनाथ धाम से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक और पश्चिम में द्वारका से लेकर सुदूर पूरब में कामरूप तथा भारत की वर्तमान राजनीतिक सीमाओं से भी आगे पशुपतिनाथ और कैलाश मानसरोवर तक विस्तृत ऐसी अचम्भित कर देने वाली अद्भुत विविधता से भरे सनातन हिन्दू धर्म की कोई दो-चार तुच्चे नियमों में बन्धी “एसेंसियल हिन्दू प्रैक्टिस” निर्धारित कर सकते हैं जिनके पालन से सभी हिन्दू मन्दिरों में विराजमान सभी देवी-देवताओं की पूजा के तरीके समाहित हो जाएं?

 

सबसे पहले तो यही समझने की जरूरत है कि हिन्दू परम्पराएँ कोई मुल्ला की दौड़ नहीं है जो मस्जिद तक ही सीमित हो। हिन्दू मन्दिरों के पीछे के इतिहास और दार्शनिकता को समेटने में तो किसी को एक जन्म भी कम पड़ जाएगा। इस निर्णय में जस्टिस चंद्रचूड़ का यह निष्कर्ष भी भ्रामक और दुर्भाग्यपूर्ण था कि किसी महिला को धर्म में ईश्वर की कमतर रचना(lesser child) नहीं माना जाना चाहिए। देखा जाए तो निष्कर्ष से ज्यादा यह एक इल्जाम था जो हिंदू धर्म के माथे पर चस्पा किया गया। इस परंपरा में कहीं भी महिलाओं को लेकर ईश्वर की कमतर रचना समझने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था क्योंकि उसी केरल में ऐसे मंदिर भी हैं जहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित है तो क्या उन मंदिरों में पुरुषों को ईश्वर की कमतर रचना माना जाएगा? जाहिर है नहीं! हिंदू धर्म में मंदिर कोई पिकनिक स्पॉट नहीं हैं, यह देवता का घर होते हैं और देवता के घर में उस देवता से जुड़े नियम और कर्मकांड ही संपादित किए जाते हैं। जैसे श्रीकृष्ण जी के श्रृंगार का एक ढंग है, तो भगवान शंकर की पूजा पाठ का ढंग अलग है। माँ दुर्गा को गुड़हल के पुष्प अर्पित किए जाते हैं, जबकि माँ लक्ष्मी को कमल के फूल। दुर्गाजी को कमल के फूल न चढ़ाना हमारी पूजा-पाठ की विविधता है, न कि कमल के फूल के साथ भेदभाव। अतः यह मामला व्यक्तियों के नहीं बल्कि उस देव प्रतिमा के दृष्टिकोण से संबंधित था।

सबरीमाला में भी एक निश्चित उम्र की महिलाओं का प्रवेश निषेध उस स्थान पर स्थित भगवान अय्यप्पा के धारण किए गए स्वरूप और स्वभाव पर आधारित है। केरल में ही अय्यप्पा के अन्य सैकड़ों मंदिर भी हैं जहां भगवान अय्यप्पा किसी अन्य रूप अथवा अन्य स्वभाव में विद्यमान हैं और वहां महिलाओं का कोई निषेध नहीं है। अतः यह मंदिर की अपनी परंपरा और विविधता का मामला था  जिसे जेंडर जस्टिस का भ्रमपूर्ण विमर्श बना दिया गया। जहां तक हिंदू धर्म में महिलाओं के कमतर होने का प्रश्न है तो यह बहुत ही हास्यास्पद आक्षेप है। हिंदू धर्म तो संसार का एकमात्र प्रचलित धर्म है जिसमें ईश्वर के स्त्री रूप की भी पूजा होती है। हमारी मान्यता में ब्रह्मा जी सृजनकर्ता हैं परन्तु सृजन का कार्य बुद्धि के बिना नहीं हो सकता इसलिए बुद्धि और ज्ञान की देवी के रूप में माँ सरस्वती ब्रह्मा जी को पूर्णता प्रदान करती हैं। धन/संसाधन अर्थात लक्ष्मी के बिना पालन या संरक्षण नहीं हो सकता इसलिए माँ लक्ष्मी पालनकर्ता विष्णु जी को पूर्ण बनाती हैं। इसी प्रकार नवसृजन के लिए आवश्यक संहार का कार्य शक्ति के बिना नहीं हो सकता अतः शक्तिरूप में माँ दुर्गा संहारकर्ता भगवान शंकर से जुड़ती हैं। सनातन धर्म के अतिरिक्त दुनिया के और किसी मजहब में ईश्वर के स्त्री रूप को मान्यता नहीं दी गई है।

हिन्दू धर्म के अलावा अन्य किसी पूजा-पद्धति में भगवान के नारी रूप की पूजा आज की तारीख में प्रचलित नहीं है। हैरानी है कि आज उसी हिन्दू धर्म पर महिला-विरोधी होने का लांछन लगाया जा रहा है। जबकि  हिंदुओं के अतिरिक्त अन्य सभी मजहबों के आराध्य पुरुषरूप में ही समझे, पूजे और सम्बोधित किए जाते हैं। बल्कि अन्य मजहबों में तो ऐसे भी मजहब हैं जहाँ घोषित रूप से सभी धर्मस्थलों में महिलाओं का प्रवेश का निषेध होता है। इस्लाम में तो एक पुरुष की गवाही के बराबर एक महिला की गवाही तक नहीं मानी जाती। ईसाई मजहब में आज तक कोई महिला पोप नहीं बन सकी। दुनिया भर के मिशनरी चर्च में महिलाओं के यौन शोषण की बात तो यहां रहने ही देते हैं।

हिन्दू धर्म की मान्यताओं में जबरन और अवैध सेकुलर दखलंदाजी

सबरीमाला के बहाने जिस तरह से सेकुलर स्टेट द्वारा विशुद्धतः पूजा-पाठ के मामले में दखलन्दाजी की गई है, इसने भविष्य के सभी सदृश्य विवादों के लिए अदालती दखलन्दाजी के रास्ते खोल दिए हैं। मेरे जैसे एक साधारण हिन्दू के मन में स्वाभाविक आशंका बन गई कि कहीं भविष्य में अदालतें ही यह न तय करने लगें कि मुझे नवरात्रि का व्रत कैसे रखना है, व्रत में बिना नमक रहना है या सेंधा नमक खाना अनुमन्य है, तिलक और त्रिपुण्ड में कितना चन्दन और कितना भस्म प्रयोग करना है। हम नवरात्रि में छोटी बच्चियों को खाना भी खिलाते हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई सिरफिरा कल को याचिका प्रस्तुत कर इसे वयस्क महिलाओं के प्रति भेदभाव घोषित करवा दे। मन्दिरों में आरती कब और कितनी बार होनी है, आरती में लता मंगेशकर का ऑडियो चलाने पर कहीं अनुराधा पौडवाल के प्रशंसक नाराज होकर पौडवाल के भी गाने चलवाने के लिए याचिका तो नहीं प्रस्तुत कर देंगे न?

भविष्य की घातक आशंकाएं

अदालती फैसले में सबरीमाला मन्दिर को एक ‘पब्लिक प्लेस’ के रूप में व्यवहार करने और उसके विशुद्ध पूजा-पाठ के नियमों पर संवैधानिक प्रावधानों के अविवेकपूर्ण आरोपण से भविष्य को लेकर भी अशुभ आशंकाएं उत्पन्न हो गई हैं। उदाहरण के लिए, आज आपने समानता के अधिकार के आधार पर सभी प्रकार की महिलाओं को प्रवेश के लिए अधिकृत कर दिया है। कल को ऐसा तो नहीं होगा न कि उसी संविधान का सहारा लेकर मुस्लिम और ईसाई समूह भी मन्दिर में मनमानी करने उतर जाएं? क्योंकि संविधान तो जेंडर के साथ ही पन्थ के आधार पर भी भेदभाव का निषेध करता है। मन्दिर की धार्मिक और कर्मकांडीय प्रक्रियाएं भी यदि धर्मग्रन्थों के आधार पर न चलकर संविधान द्वारा चलाई जाएंगी तो फिर तो आपके संविधान में स्थित अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या के अनुसार मनपसंद भोजन का अधिकार भी एक मूल अधिकार होने के कारण कोई नास्तिक या कम्युनिस्ट या वेटिकन का गुर्गा या जेहादी मुल्ला अपने मुँह में गो-मांस चबाते हुए मन्दिर में प्रवेश का अधिकार जताए तो उसे आपका संविधान कैसे रोकेगा? क्योंकि संविधान तो न तो किसी को मजहब के आधार पर प्रवेश से रोकेगा और न ही किसी की फूड हैबिट अर्थात खाने की रुचि के आधार पर!

आपके संविधान द्वारा प्रदत्त दुस्साहस के साथ एक मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट तो हाथ मे सैनिटरी पैड लेकर सबरीमाला में घुसने का घृणित प्रयत्न भी कर चुकी है! आप ये सब देख पा रहे हैं मीलॉर्ड? मनपसन्द कपड़े पहनना भी मूल अधिकार है, यानी अब उन मन्दिरों में जहाँ एक निश्चित ड्रेसकोड अनिवार्य है, उन परम्पराओं को भी मनपसन्द कपड़े पहनकर मन्दिर में प्रवेश के संवैधानिक अधिकार द्वारा कुचला जा सकता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस फैसले की नजीर के बहाने भविष्य में सभी हिन्दू मन्दिरों को अपनी मनमर्जी का अखाड़ा बनाकर सभी परम्पराओं, अनुष्ठानों, संस्कारों और अंततः पूरे हिन्दू धर्म का क्रूर मजाक बनाकर रख दिया जाएगा! इस सेकुलर संवैधानिक व्यवस्था में अदालतों का रुख और राज्य का हिन्दू-विरोधी चरित्र देखकर यह आशंका निर्मूल तो नहीं लगती।

किसको फायदा?

हिन्दू आस्था पर इतनी बड़ी चोट तो कर दी गई लेकिन क्या कभी इस पर भी विचार हुआ कि सबरीमाला की परंपरा के विरुद्ध कथित न्याय माँगने अदालत पहुँचे लोगों या उनके राजनीतिक और मीडियाई चीयरलीडरों का इसमें क्या हित है? “इंडियन यंग लायर्स एसोसिएशन” नामक जिस याचिकाबाज गुट ने इस मामले में याचिका दायर की थी उसके अध्यक्ष का नाम “नौशाद अहमद खान” है। नाम से ही आप समझ गए होंगे कि इनकी सबरीमाला या भगवान अयप्पा में क्या और कितनी आस्था होगी। मन्दिर में जबरन प्रवेश को लेकर जिस केरल सरकार ने अपने गुंडे कार्यकर्ताओं की मानव श्रृंखला बनाई वह स्वयं कम्युनिस्टों से भरी हुई है जो घोषित रूप से नास्तिक हैं।

इस गुंडागर्दी को केरल की सड़कों पर जिन्होंने समर्थन दिया उनमें केरल के सीरियन चर्च की भेजी ईसाई महिलाएं और कट्टर मुस्लिम संगठनों द्वारा भेजी गई बुर्काधारी मुस्लिम महिलाएं अव्वल थीं। यानी एक मंदिर की परंपरा को भंग करने लिए याचिका लगाई मुसलमान ने, आंदोलन के नाम पर गुंडागर्दी की नास्तिक कम्युनिस्टों ने, उसे समर्थन दिया ईसाइयों और मुसलमानों ने और वो मन्दिर है हिंदुओं का! और इन सब को सर्वोच्च अदालत से लेकर पूरी भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का निर्बाध सहयोग भी मिला। सेकुलरिज्म के नाम पर ऐसी गलीज, वाहियात हरकत और इससे बड़ी विडंबना दुनिया के किसी और देश में देखने को नहीं मिलेगी।

यह भी ध्यान देना होगा कि केरल में ही सबसे ज्यादा isis के आतंकवादियों की भर्ती हुई है। यहाँ जिहादी संगठनों को अपनी आबादी तेजी से बढ़ानी है। दूसरी ओर वेटिकन के इशारे पर चलने वाले  ईसाई मिशनरी गिरोहों को भी धर्मांतरण का कुचक्र रचाकर अपनी संख्या में वृद्धि करनी है। दोनों के ही लिए हिंदू आस्था ही सबसे बड़ी बाधक है। ऐसे में सबरीमाला के रूप में यदि एक बाधा धराशाई होती है तो दोनों का हित सधता है। ध्यान रहे, जनता के किसी भी वर्ग पर नई आस्था के आरोपण के लिए पुरानी आस्था को भंग करना आवश्यक है। यदि सबरीमाला में आस्था सफलतापूर्वक तोड़ दी जाती है तो मिशनरी संगठनों और जिहादी गिरोहों दोनों के लिए एक ऐसा खाली खेत तैयार हो जाएगा जिसमें वे अपनी मनचाही फसल बो सकते हैं और फिर उसे या तो केरल के इस्लामीकरण के लिए या फिर केेरल को पूर्णतः क्रूसीफायड करने के लिए आत्माओं की लहलहाती फसल काट सकते हैं। इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से किसका फायदा होता दिख रहा है, यह समझना कठिन नहीं है।

मीडिया का पक्षपात

इस पूरे मामले में मीडिया का भी खुला पक्षपात दिखाई दिया। सबरीमाला की परंपरा के समर्थन में केरल की श्रद्धालु महिलाओं ने 795 किलोमीटर की मानव श्रृंखला बनाई परंतु किसी भी मुख्यधारा की मीडिया में इसे व्यापक कवरेज नहीं मिला। दूसरी ओर सीपीएम, ईसाई मिशनरियों और जिहादी मुल्लों द्वारा सबरीमाला परंपरा के विरोध में की गई गुंडागर्दी को “जनता के स्वतंत्रता आंदोलन” के रूप में अंग्रेजी और उत्तर भारतीय हिंदी मीडिया ने चित्रित किया। मीडिया ने शुरू से ही सबरीमाला की परंपरा के गलत प्रस्तुतीकरण द्वारा केरल और शेष भारत की जनता को इस पूरे मामले में भ्रमित करने का प्रयास किया और जाने अनजाने कम्युनिस्टों, ईसाई मिशनरियों और मुस्लिम संगठनों के हितसाधन का कार्य किया। इस पूरे मामले में हिंदू परंपरा के समर्थन में जो भी आवाज उठी वह सोशल मीडिया में ही उठी।

हम क्या करें

इस पूरे विवाद में एक आहत हिंदू मन में यह स्वाभाविक प्रश्न है कि भेदभावपूर्ण सेकुलर संवैधानिक व्यवस्था, मार्क्सवाद, मिशनरी ईसाइयत और जिहादी इस्लाम, अर्थात इन चारों की चांडाल चौकड़ी की साझा गिरोहबंदी की ओर से हिंदू परंपराओं पर होते निरंतर हमले का हम बचाव कैसे करें या प्रतिकार कैसे करें? मेरी सीमित समझ के हिसाब से हमें अपने लोगों को जागरूक करना होगा। हिंदुओं के भीतर ही अभी बहुत से ऐसे लोग हैं जो सबरीमाला जैसी परंपराओं को उनके सही रूप में नहीं समझते हैं और मीडिया के दुष्प्रचार के शिकार होते हैं। हमें अपने धर्मग्रंथों को पढ़ना, समझना, समझाना और प्रचारित करना पड़ेगा। हमें संवैधानिक सेकुलरिज्म की विडंबना और मार्क्सवाद, ईसाइयत और जिहादी इस्लाम की जुगलबंदी से उत्पन्न हर षड्यंत्र को गहरे भाव में समझना पड़ेगा।

साथ ही किसी पार्टी अथवा सरकार पर आंख मूंदकर विश्वास करने के बजाय हिंदू हित के एजेंडे को अपने दबाव के माध्यम से सरकारों द्वारा लागू करवाना होगा। मैं सभी से अपनी परंपराओं के अध्ययन और अपने धर्म के विरुद्ध हो रहे षड्यंत्रों के प्रति सजग होने का निवेदन करता हूँ। कुछ विद्वान सजग हिंदुओं द्वारा प्रस्तावित Charter Of Hindu Demands अर्थात “हिंदू मांगों के घोषणा पत्र” को लागू करवाने के लिए हम सब को तन, मन, धन से आगे आना चाहिए। हिन्दू चार्टर को स्वयं समझने और दूसरों को समझाने का प्रयास करना होगा तथा अपने जनप्रतिनिधियों से चर्चा, बहस, वाद, प्रतिवाद, संवाद के माध्यम से ईमेल, व्हाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर इत्यादि सभी मंचों पर उठाकर आगे बढ़ाने की लड़ाई लड़नी होगी।

भारत-विरोधी शक्तियाँ वो रेबीज के कीटाणु हैं जिनका आधा एंटीडोट हमारी सजगता है और बाकी आधा हमारा सक्रिय प्रयास। हमें तैयारी करनी होगी, सशक्त बनना होगा क्योंकि राष्ट्रघाती ताकतों से युद्ध तो निश्चित है।

(हिन्दू माँगों के घोषणा पत्र को यहाँ से डाउनलोड करें – https://hinducharter.org/hi/होम-2/)

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

Saurabh Bhaarat
सौरभ भारत

Latest News

The history of India – a story of distortion by marxists

By interpreting history only on the basis of economic monopoly can not eradicate the wrongdoings which were done based on religion.

Democracy has stung Communism big time in Galwan

China has spoiled relations with entire neighbourhood and well beyond its capacity to manage. The fool cards like BRI, blank cheque diplomacy and the debt-traps can buy few leaders of poor countries for short-term, but turn people of these nations into long-term enemies as well.

Religious secularism

With the hypocritical standards which are followed in this country, a person is looked down upon to celebrate an historical moment in his religion.

मोदी को न राम से बड़ा बताया है और न ही जय श्रीराम का उदघोष साम्प्रदायिक है

हिन्दू धर्म में तुलसीदास और सूरदास जैसे कई कवियों ने भगवान कृष्ण और राम के लिये वात्सल्य भाव का प्रयोग किया है। आज भी वैष्णव सम्प्रदाय में भगवान की वात्सल्य भाव से पूजा की जाती है तथा उन्हें परिवार के एक बालक की तरह ही देखा जाता है।

What the Ram Temple means to a Hindu

The difference between Hindu diversity and Christian or Muslim diversity - while the latter began as one and split with differences of opinion, we began as many and came together under one blanket, while retaining individual identities – the ultimate balancing act

A change that doesn’t augur well on this Independence Day

The character of the nation is carried by its citizens. If aberration is the norm, then how do we create soldiers of character defending borders? How do we create institutions and polity without the foundation of good character?

Recently Popular

Curious case of Swastika

Swastika (स्वस्तिक) literally means ‘let there be good’ (su "good" and asti "let it be"), or simply ‘good it is’ implying total surrender to paramatma and acceptance of the fruits of karma.

Democracy has stung Communism big time in Galwan

China has spoiled relations with entire neighbourhood and well beyond its capacity to manage. The fool cards like BRI, blank cheque diplomacy and the debt-traps can buy few leaders of poor countries for short-term, but turn people of these nations into long-term enemies as well.

Jainism’s Rama

In Jainism re-telling of Ramayana, Rama (also known as Padma), a gentle hero, is not the one who kills Ravana. Instead, his younger brother Lakshmana kills Ravana, the king of Rakshasas, who are otherwise a civilized and vegetarian people.

Striking similarities between the death of Parveen Babi and Sushant Singh Rajput: A mere co-incidence or well planned murders?

Together Rhea and Bhatt’s media statements subtly and cleverly project Sushant as some kind of a nut job like Parveen Babi, another Bhatt conjuring.

National Education Policy 2020 envisions to revive the ancient Indian wisdom, philosophy, human ethics and value system

The NEP 2020 is indeed has the potential to make India – Atmanirbhar if implemented properly. It envisions to make India a knowledge driven society and become Vishwa Guru in the field of education.
Advertisements