धर्म की राजनीति

सत्य ही धर्म है। परंतु सत्य क्या है? सत्य वह है जो क्रमानुसार सृष्टि, जीवन, मानवजाति, समाज, परिवार फिर व्यक्ति के लिए कल्याणकारी हो। मानव ने धर्म (सीमित अर्थों में विचारधारा) सत्य की व्याख्या के लिए गढ़े हैं। इसमें यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि सामाजिक, राजनैतिक तथा भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार व्याखाएँ भिन्न हो सकती हैं परंतु कोई भी व्याख्या उपरोक्त क्रम को अस्वीकार नहीं कर सकती।

मनुष्य का सबसे बड़ा लक्ष्य स्वयं के अहम् को संतुष्ट करना है। अहम् को संतुष्ट के लिए स्वयं को श्रेष्ठतम साबित करना एक महत्वपूर्ण शर्त है। इसलिए वह अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा में शामिल हो जाता है। समस्या तब विकट हो जाती है जब प्रतिस्पर्धा अस्वस्थ हो जाती है अर्थात् जब वह एक दूसरे के अधिकारों का हरण करने लगता है।

विश्व में चली आ रही धार्मिक अतिवादिता का मूल कारण यह है कि हम सत्य को ही धर्म मान चुके हैं और धर्म को श्रेष्ठतम। अपने अपने व्याख्याओं को श्रेष्ठ साबित करने के लिए हम सत्य को भूल चुके हैं। वास्तव लड़ाई धर्म को बचाने के लिए नहीं अपितु अपने अहम् को संतुष्ट करने के लिए है। इस प्रकार के अत्यंत व्यक्तिगत आकांक्षा की पूर्ति के मार्ग को सुगम बनाने के लिए हम ईश्वर के नाम का दुरुपयोग करते हैं और इसे सामूहिक रूप देने के लिए लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ते हैं। अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने के लिए हमारे पास दो रास्ते हैं, एक सकारात्मक तथा दूसरा नकारात्मक। सकारात्मक तरीके से हम लोगो की सेवा करके, मदद करके और अपने धर्म की सबसे अच्छी बातों को प्रचारित करके अधिक से अधिक लोगों को प्रभावित करते हैं कि वो हमारे धर्म के बारे मे अच्छा सोचे व समझें। नकारात्मक तरीके से हम लोगों को अपने धर्म को छोड़कर हमारे धर्म को अपनाने के लिए लालच देकर, बलपूर्वक अथवा अन्य तरीके से प्रेरित करते हैं। कभी कभी दोनों तरीके एक दूसरे में ऐसे घुले- मिले होते हैं कि अन्तर सुस्पष्ट नही हो पाता।

जब कभी कोई अन्य हमारे धार्मिक विचारों पर प्रश्न खड़ा करने लगता है तो हमारी असहिष्णुता हम पर हावी हो जाती है और हमें अपने धर्म की श्रेष्ठता पर खतरा महसूस होने लगता है। अपनी श्रेष्ठता को स्थायी रुप से पुनर्स्थापित करने के लिए दो तरीके अपनाए जाते रहे हैं। एक अप्रत्यक्ष तरीका जिसमें राजनीति, सामाजिक तथा बौद्धिक प्रभावों का उपयोग करके अपने धार्मिक विचारों को संरक्षण प्रदान करना जैसे किसी देश को मुस्लिम, क्रिश्चन, बौद्ध या हिन्दू देश घोषित करना या धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिक्षा व्यवस्था अपनाना। दूसरा प्रत्यक्ष तरीका जिसमें विरोधी विचारों को छल या बल से समाप्त करने का प्रयास किया जाता है जैसे कि आजकल धर्म के नाम पर हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है। किन्तु इतिहास साक्षी है कि ये दोनों तरीके या कोई अन्य भी वैकल्पिक विचारों को देर तक दबा कर नहीं रख सकते। विचार बहती नदी की की तरह होते हैं, कोई कितनी भी कोशिश कर ले नदी अपना रास्ता ढूंढ ही लेती है।

अब प्रश्न यह उठता है कि इन सब समस्याओं का समाधान क्या है? यह एक बहुआयामी समस्या है क्योंकि धर्म लगभग जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करता है। इसलिए इसके समाधान के लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम करने की आवश्यकता है । एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण पहलू है धर्म का वैचारिक पहलू जिस पर बात करने से अधिकतर लोग बचते हैं या यूँ कहे कि लोगो को उस पर बात करने रोका जाता है। क्योंकि धर्म का सबसे कमजोर पक्ष भी यही है जो तार्किकता के सिद्धांतों के विपरीत है। इसलिए धर्म को विश्वास का विषय मान लिया गया है। पर समय की आवश्यकता है कि धर्म के इस अवैज्ञानिकता पर विचार किया जाए।

एक परिकल्पना जो सभी धर्मों में समान रूप से विद्यमान है वह है ईश्वर की परिकल्पना । ईश्वर है या नहीं यह तो कोई नहीं जानता इसलिए इस परिकल्पना को एक सिरे से नकारा भी नहीं जा सकता। पर असली समस्या इस परिकल्पना के बाद आती है जब इन्सान द्वारा बनाए गये धार्मिक नियमों को ईश्वर के द्वारा बनाया हुआ मान लिया जाता है। हमें इस बात को समझना चाहिए कि किसी भी धार्मिक पुस्तक में जो बातें लिखी हुई वह इन्सानों ने ही लिखी है ईश्वर ने नहीं। और उन बातों की आलोचना करना ईश्वर की आलोचना करना नहीं है। इन पुस्तकों की बातों को लिखने वाला कितना भी महान क्यों न हो परन्तु ये सारी बातें एक विशेष समय, समूह, परिस्थिति के हिसाब से लिखी गई थीं जिनमें से कुछ का आज के समय कोई उपयोग नहीं है। इनमें से कई बातें आज के समाज को नुकसान पहुंचा रही हैं। इसलिए इन सभी से छुटकारा पाना अत्यंत आवश्यक है। हमें इन्सान और तथाकथित भगवान के बीच के अन्तर को समझना होगा। इन्सान की कही बातों को भगवान की कही बातें मानना मूर्खतापूर्ण है। हमें अपने धर्मग्रंथों को फिर से निष्पक्षतापूर्ण पढ़ना होगा और उनका पुनर्लेखन भी करना होगा। हम हजारों साल पहले किसी व्यक्ति द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर अगले हजार साल तक नहीं चल सकते। इसके बचाव के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि नियमों की व्याख्या गलत की जाती है। इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी बात की यदि गलत व्याख्या की गई है तो उसकी सही व्याख्या क्या है यह स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि वास्तव में कुछ गलत बातें लिखी गईं हैं अथवा वर्तमान में अप्रासंगिक हो गई हैं तो उनका त्याग करना होगा। हम इस बात को नज़रअंदाज नहीं कर सकते कि इन्सानों ने धर्म को बनाया है धर्म ने इंसान को नहीं। इसलिए धर्म इंसान से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। जहाँ तक धर्म की आलोचना का प्रश्न है तो हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि बुद्ध ,नानक, जीजस, महावीर, मुहम्मद, शंकराचार्य इत्यादि सभी पहले से व्याप्त धर्मों की आलोचना करके नया मार्ग दिखलाया। इस कारण हम भी धर्म की आलोचना करने के पूर्ण अधिकारी हैं।

लेकिन आलोचना तथ्यात्मक तथा निष्पक्ष होनी चाहिए अन्यथा आलोचना महत्वहीन हो जाती है। यदि इससे किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचती है तो उन्हें ठेस पहुँचनी भी चाहिए क्योंकि बिना किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाए परिवर्तन संभव नहीं। और इस संसार में परिवर्तन ही स्थायी है अन्य कुछ नहीं।
जब तक हम धर्म की तथ्यात्मक आलोचना करने से बचते रहेंगे तब तक हम अतिवाद से मुक्त नहीं हो पायेंगे। हमें इस अतिवाद की जड़ अर्थात् इसके वैचारिक पक्ष पर प्रहार करना ही अन्यथा हमारी आगे आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी। अन्त में इतना ही कहना चाहूँगा कि ईश्वर है या नहीं यह हमें नहीं पता, उसे दर्द होता है या नहीं हमें नहीं पता परन्तु इन्सान तो हम ही हैं। इसलिए किसी अज्ञात ईश्वर के लिए इंसानों की बलि देना कहाँ तक जायज है? आप स्वयं सोचिए।

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