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बिहार का अतिदुर्भाग्य भाग-२

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बिहार का अतिदुर्भाग्य भाग-२

मित्रो स्वागत है आपका इस दूसरे अंक में। प्रथम अंक में हमने विवेचना की बिहार राज्य में सत्ता का सुख भोग रहे कुछ सत्ताविरो के मानसिक स्थिति और जनता के प्रति उनकी सोच और अवधारणा की। इस अंक में हम माननीय शिक्षा मंत्री के विषवमन का शिकार बने रामचरितमानस के दूसरे चौपाई के बारे में सूक्ष्म अवलोकन करेंगे। आइये देखते हैं:-

माननीय शिक्षा मंत्री जी पेशे से प्रोफ़ेसर भी हैं अपने अज्ञान रूपी ज्ञान का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए, एक अन्य दोहे के बारे में विष वमन करते हैं, उसे नारियो के विरोध में बताकर, वो कुछ इस प्रकार है:-“प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥ ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥” यंहा गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि ये अच्छा किया प्रभु ने कि मुझे अच्छा ज्ञान दिया क्योंकि मर्यादा भी तो प्रभु के हि द्वारा उत्पन्न कि गई है। ढोल गवार, शूद्र पशु और नारी ये सभी ताड़ने अर्थात जानने या परखने योग्य हैं अर्थात इनको जाने बिना इनसे सहकार्य नहीं किया जा सकता।

अब इसी ” ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥” वाले हिस्से को माननीय शिक्षा मंत्री जी जैसे विषधारीयो के द्वारा नारी, पशु और शूद्र के विरुद्ध बताकर समाज में घृणा फैलाई जाती है। इस चौपाई के इस हिस्से का अर्थ समझने के लिए हमें सर्वप्रथम इसमें प्रयोग किये गए शब्दों के अर्थ को समझना होगा, जो इस प्रकार हैं “ढोल अर्थात ढोलक, गवार अर्थात अज्ञानी या अनपढ़, शूद्र अर्थात वंचित वर्ग, पशु का अर्थ जानवर, नारी का अर्थ स्त्री, सकल मतलब पूरा या सम्पूर्ण, “ताड़ना” (जो सबसे अधिक बहुअर्थी शब्द है) का अवधि भाषा में अर्थ है देखना, पहचनाना या परख करना और अधिकारी का मतलब हक़दार”। इस प्रकार इस  चौपाई के इस हिस्से का अर्थ यह हुआ कि “ढोलक, अनपढ़, वंचित, जानवर और नारी, यह पांच पूरी तरह से जानने या परखने के विषय है।” इसे विस्तारपुर्वक इस प्रकार समझ सकते हैं:

१ :- ढोलक को अगर सही तरिके से नहीं “ताड़ा” अर्थात सही ढंग से थाप नहीं दी तो उसे संगीत के सुर और ताल से जोड़ा नहीं जा सकता अत: उससे संगीत के मधुर स्वर उतपन्न करने के लिए उसे जानना अत्यंत आवश्यक है। अतः ढोलक पूरी तरह से जानने या अध्ययन का विषय है। ढोलक या ढोल की प्रकृति को समझकर उस पर थाप देने से कर्णप्रिय संगीत का सृजन होता है। इसको इस प्रकार भी समझा जा सकता है “फल फूलन्ह सब डार ओढ़ाई। झुंड बंधि कै पंचम गाई।बाजहिं ढोल, दुंदुभी भेरी। मादक तूर, झांझ चहुं फेरी। नवल बसंत – नवल सब वारी, सेंदुर बुम्का, होर धमारी। अब यंहा पर “बाजहिं ढोल” शब्द का उपयोग किया गया है, बसंत ऋतू के स्वागत हेतु तो इसका अर्थ स्पष्ट है कि ढोल से स्वरबद्ध लहरी निकला रही संगीत की जब उसे बजाया जा रहा है और बजाने के लिए उस पर थाप देना अर्थात “ताड़” कर थाप देने से है।

२ :-इसी प्रकार अनपढ़ व्यक्ति आपकी किसी बात का गलत अर्थ निकाल सकता है या आप उसकी किसी बात को ना समझकर अनायास उसका उपहास उड़ा सकते हैं अतः उसके बारे में अच्छी तरह से जान लेना चाहिए। यंहा पर गवार अर्थात अनपढ़ व्यक्ति को ताड़ने से सीधा तात्पर्य है की हमें उस व्यक्ति के भावनाओ और उसकी प्रकृति को समझकर उसके साथ उचित व्यवहार करना चाहिए जिससे उसको किसी भी प्रकार ठेस पहुंचाए हम स्वय के द्वारा उसके लसखी को या उसके द्वारा स्वय के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। हमारे शास्त्रों ने गवाँर अर्थात मुर्ख या अनपढ़ व्यक्ति के पांच लक्षण बताये हैं जी इस प्रकार हैं “मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं तथा। क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः।। अर्थात– एक मुर्ख के पांच लक्षण होते है घमण्ड, दुष्ट वार्तालाप, क्रोध, जिद्दी तर्क और अन्य लोगों के लिए सम्मान में कमी।

३:-इसी प्रकार  वंचित व्यक्ति अर्थात शूद्र को भी जानकर ही आप किसी कार्य में उनका सहयोग ले सकते हैं अन्यथा कार्य में  असफलता का डर बना रहता है और यदि हम शूद्र व्यक्ति की योग्यता के बारे में जानकर उनका सहयोग प्राप्त करना चाहे किसी लक्ष्य कि प्राप्ति हेतु तो किसी भी असफलता के बगैर हम उस लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। वेद, मनुस्मृति, श्रीमद भगवत गीता, इत्यादि सभी पवित्र ग्रंथो में वर्णांत्मक व्यवस्था ही है, जातिगत व्यवस्था कहीं भी नहीं है। महाभारत के वन पर्व में इसका उल्लेख किया गया है जिसका सूक्ष्म विश्लेषण निम्न प्रकार से है “अशीलच्श्रापि पुरुषो भूत्त्वा भवति शीलवान्। प्रणिहिसारतच्श्राऽपि भवते धार्मिक: पुमान्।। (वनपर्व२०६-३३)  अर्थात पुरुष दुच्श्ररित्र होकर भी सुचरित्र हो सकता है और प्राणियो की हिंसा में रत रहने पर भी मनुष्य धार्मिक हो सकता है।

पापचेत् पुरुष: कृत्त्वा कल्याणमभिपधते। मुच्यते सर्वपापेभ्यो ,आहाभ्रेणेव चन्द्रमा:।। यथादित्य: समुधन् वै तम: पूर्व व्यपोहति। एवं कल्याणमातीष्ठन् सर्वपापै: प्रमुच्यते।। (वनपर्व२०६-५५-५६) शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठत:। वेश्यतत्व लभते ब्रह्मन क्षत्रियत्त्व तथैव च।। अर्थात, शूद्रयोनी में भी उत्पन्न हुआ पुरुष यदि अपने में अच्छे गुणों को संग्रह करे, तो हे ब्रह्मन! वह वैश्य हो जाता है, और क्षत्रिय यदि सदाचार से जीवन यापन करे तो उसमे ब्राह्मण की योग्यता भी उत्पन्न हो जाती है।

४:-हम सब जानते हैं कि चार पैर वाले जीव (चौपाये) के पास सोचने एवं समझने की क्षमता मनुष्य जितनी नहीं होती इसलिए कई बार वो हमारे किसी व्यवहार, आचरण, क्रियाकलाप या गतिविधि से आहत हो जाते हैं और ना चाहते हुए भी असुरक्षा के भाव में असामान्य कार्य कर बैठते हैं अतः पशु को भी भली-भांति जान लेना चाहिए, उनसे किसी भी प्रकार का कार्य लेने से पूर्व। समान्य तौर पर पशु अकारण किसी पर आक्रमण नहीं करते, परन्तु कुछ पशु स्वभाव से ही हिंसक होते हैं। अत: पशुओं के व्यवहार और प्रकृति को समझे बिना उनसे किसी भी प्रकार का सम्पर्क नहीं करना चाहिए। हमारे शास्त्र पशुवत चरित्र का वर्णन करते हुए कहते हैं कि “येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।ते मृत्युलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥“अर्थात– जिन मनुष्यों के पास विद्या, तप, दान की भावना, ज्ञान,   शील (सत्स्वभाव), मानवीय गुण, धर्म में संलग्नता का अभाव हो वे इस मरणशील संसार में धरती पर बोझ बने हुए मनुष्य रूप में विचरण करने वाले पशु हैं। एक अन्य श्लोक में कहते हैं कि “साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः ।तृणं न खादन्नपि जीवमानस्तद्भागधेयं परमं पशूनाम्॥” अर्थात– जो मनुष्य साहित्य, संगीत, कला, से वंचित होता है वह बिना पूंछ तथा बिना सींगों वाले साक्षात् पशु के समान है। वह बिना घास खाए जीवित रहता है यह पशुओं के लिए निःसंदेह सौभाग्य की बात है।

५ :- अब हम आ जाते हैं “नारी” पर :-यदि आप स्त्रियों को नहीं समझते तो उनके साथ जीवन निर्वहन मुश्किल हो जाता है यहां स्त्री का तात्पर्य माता, बहन, पत्नी, मित्र या किसी भी ऐसी स्त्री से है जिनसे आप जीवनपर्यन्त जुड़े रहते हैं, ऐसे में आपसी सूझबूझ अत्यधिक आवश्यक होती है। रामचरित मानस में देवी मंथरा, माता कैकेयी, सुपर्णखा, माता  मंदोदरी, माता शबरी तथा  माता तारा इत्यादि विभिन्न नारियो के चरित्र का चित्रण प्राप्त होता है और स्वय गोस्वामी जी की अपनी पत्नी (देवी रत्नावली) जिन्होंने प्रभु राम के प्रेम में डूब जाने वाले वो अमोघ शब्द रूपी बाण छोड़े, जिन्होंने तुलसीदास को गोस्वामी तुलसीदास के रूप में विश्व विख्यात कर दिया ,जो निम्न प्रकार है:-“अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति! नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत ” अर्थात ”मेरे इस हाड – मांस के शरीर के प्रति जितनी तुम्हारी आसक्ति है, उसकी आधी भी अगर प्रभु से होती तो तुम्हारा जीवन संवर गया होता।” सुनकर तुलसी सन्न रह गये, उनके हृदय में यह बात गहरे तक उतर गयी और उनके ज्ञान चक्षु खुल गये|  उनको अपनी अज्ञानता का एहसास हो गया। वे एक क्षण भी गवाये  बिना वहां से चल दिये और उनका ह्रदय परिवर्तन हो गया|  इन्ही शब्दों की शक्ति ने तुलसीराम को महान गोस्वामी तुलसीदास बना दिया| नारी की महिमा का वर्णन करते हमारे शास्त्र कहते हैं “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः। यत्र तास्तु न पूज्यंते तत्र सर्वाफलक्रियाः।। अर्थात– जहाँ पर हर नारी की पूजा होती है वहां पर देवता भी निवास करते हैं और जहाँ पर नारी की पूजा नहीं होती, वहां पर सभी काम करना व्यर्थ है। भूमे:गरीयसी माता,स्वर्गात उच्चतर:पिता। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गात अपि गरीयसी।। अर्थात  – भूमि से श्रेष्ठ माता है, स्वर्ग से ऊंचे पिता हैं। माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं।

वैसे कई विद्वानो ने अपने लेखो में स्पष्ट किया है कि, गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित उक्त पंक्ति कुछ इस प्रकार है:-

ढोल गंवार सूद्र पसु रारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥” अर्थात जंहा पर गोस्वामी जी ने “रॉरी” शब्द का उपयोग किया है, उसे मानसिक रूप से बीमार लोगों ने “नारी” शब्द से बदल दिया। अब यंहा “रॉरी” शब्द का अर्थ है “झगड़ा करने वाला व्यक्ति” अर्थात ऐसा व्यक्ति जो हर बात में झगड़ा करने का तत्व ढूढने का प्रयास करता है, तो ऐसे व्यक्ति को ताड़ने की अत्यंत अवश्यक्ता होती है। इसीलिए ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव को स्पष्ट करते हुए हमारे शास्त्रों ने कहा है कि “दुर्जन:स्वस्वभावेन परकार्ये विनश्यति। नोदर तृप्तिमायाती मूषक:वस्त्रभक्षक:।।” अर्थात– दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव ही दूसरे के कार्य बिगाड़ने का होता है। वस्त्रों को काटने वाला चूहा कभी भी पेट भरने के लिए कपड़े नहीं काटता।

माननीय शिक्षा मंत्री जी के लिए तो केवल ईतना ही कह सकते हैं: न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:। काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति। अर्थात– लोगों की निंदा किये बिना दुष्ट व्यक्तियों को आनंद नहीं आता। जैसे कौवा सब रसों का भोग करता है। परंतु गंदगी के बिना उसकी तृप्ति नहीं होती।

और नितीश जी याद रखिये “दुर्जन:परिहर्तव्यो विद्यालंकृतो सन। मणिना भूषितो सर्प:किमसौ न भयंकर:।। अर्थात– दुष्ट व्यक्ति यदि विद्या से सुशोभित भी तो अर्थात् वह विद्यावान भी हो तो भी उसका परित्याग कर देगा। चाहिए जैसे मणि से सुशोभित सर्प क्या भयंकर नहीं होता? तो मित्रों इस प्रकार हम सबने देखा कि किस प्रकार बिहार को एक बार पुन: हिन्दुओ को आपस में लडाने की पूरी योजना बना ली गई है और समाज में जहरीले बयान देकर बस अग्नि प्रज्वलित करने का प्रयास किया जा रहा है, क्योंकि इनको लगता है कि हिन्दुओ के खून से हि इनको सत्ता का सुख मिल सकता है।

लेखन और संकलन: नागेंद्र प्रताप सिंह (अधिवक्ता)

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