Wednesday, January 26, 2022
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विपक्षीयो कि धूर्तता भरी चीखों के मध्य चुनाव सुधार विधेयक २०२१ ध्वनि मतो से पारित

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An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

मित्रों आपदा में अवसर किस प्रकार ढूंढा जाए ये मोदी सरकार से अच्छी प्रकार कोई नहीं जानता, तभी तो संसद के शीतकालीन सत्र में सम्पूर्ण विपक्ष जंहा १२ हुडदंगी सांसदो के निलम्बन पर घड़ीयाली आंसू बहा रहा था वहीं मोदी सरकार ने पहले ४० वर्षों से लटक रहे बाँध सुरक्षा विधेयक को पारित कराया वही दूसरी बार में निर्वाचन सुधार विधेयक २०२१ पारित कराके संसद के शीतकालीन सत्र का भरपूर लाभ उठा लिया।

जी हाँ दोस्तों, आइये देखते हैं कि ये विधेयक किस प्रकार सुधारात्मक प्रक्रिया को अपनाता है:-

चुनाव आयोग कि पहल:- मित्रों वर्ष २०२० ई में तत्कालीन क़ानून मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद ने यह जानकारी प्रदान कि थी कि चुनाव आयोग ने आधार डेटाबेस के साथ वोटर लिस्ट को जोड़ने का प्रस्ताव दिया है, ताकि “एक ही व्यक्ति के कई नामांकन के खतरे को रोका जा सके। उन्होंने बताया था कि इसके लिए चुनावी कानूनों में संसोधन करने की आवश्यकता होगी।

विदित हो कि अगस्त २०१९ में चुनाव आयोग ने एक प्रस्ताव भेजा था जिसमें जनप्रतिनिधित्व कानून १९५० और आधार अधिनियम में संशोधन के लिए प्रस्ताव लाने की मांग की गई थी। आयोग का कहना था कि इससे वोटर लिस्ट में होने वाली गड़बड़ियों से बचा जा सकेगा। कहा जाता है कि पोल पैनल ने दावा किया था कि उसके द्वारा संचालित पायलट परियोजनाओं के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।

मित्रों वर्तमान केंद्रीय सरकार पूरे देश में एक ही मतदाता सूची का उपयोग करने पर राज्य सरकारों के बीच सहमति बनाने और इसी अनुरूप विधायी बदलाव करने पर विचार कर रही है और् इस प्रक्रिया के सन्दर्भ में दो विकल्पों में से किसी एक को अपनाया जा सकता है। पहला, भारतीय संविधान के अनुच्छेद २४३ (के) और २४३ (जेडए) में संशोधन करके देश के सभी चुनावों के लिए एक समान मतदाता सूची को अनिवार्य किया जा सकता है। यह नियम राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची तैयार करने और स्थानीय निकायों के चुनावों का संचालन करने का अधिकार देता है। दूसरा, निर्वाचन आयोग या भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों को अपने कानूनों में संशोधन करने और नगरपालिका तथा पंचायत चुनावों के लिए राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची को अपनाने के लिए राजी किया जा सकता है।

मित्रों चुनाव आयोग ने “आधार इकोसिस्टम” के साथ वोटर लिस्ट को जोड़ने का प्रस्ताव दिया है, ताकि “एक ही व्यक्ति के कई नामांकन के खतरे को रोका जा सके.”

मित्रों आधार नंबर को वोटर आईडी से जोड़ने के लिए चुनाव आयोग ने नेशनल इलेक्टोरल लॉ प्यूरीफिकेशन एंड ऑथेंटिकेशन प्रोग्राम भी शुरू किया था। आयोग ने कहा कि लिंक करने से एक व्यक्ति के नाम पर कई नामांकन खत्म हो जाएंगे। उस समय, इस प्रोग्राम को रोक दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि वेल्फेयर योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आधार का उपयोग वैकल्पिक रहेगा। इसके बाद चुनाव आयोग अपने प्रस्ताव में संशोधन करने के लिए विवश हो गया और कहा कि लिंकिंग वैकल्पिक होगी।

लोकसभा में सरकार द्वारा २० दिसंबर २०२१ को चुनाव सुधार बिल (Election Reform Bill) पेश किया गया। विपक्षी सदस्यों के शोर शराबे और लडकपन के बीच ये बिल लोकसभा में पास कर दिया। राज्यसभा (Rajya Sabha) ने २१ दिसंबर २०२१ को विपक्षी सदस्यों के विरोध, बचपने और हंगामे के बीच ‘निर्वाचन विधि (संशोधन) विधेयक, २०२१’ को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी।

आइये देखते हैं इस विधेयक कि कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को:-

१:- इसका सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है आधार को वोटर आइडी से जोड़ देना।केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने बिल पास होने के बाद कहा कि आधार कार्ड को वोटर लिस्ट के साथ जोड़ना अनिवार्य नहीं है। ये स्वैच्छिक है। ये वैकल्पिक है। इससे एड्रेस पता करने में मदद होगी, फर्ज़ी वोटिंग को रोकने में मदद होगी। मित्रों यदि आधार को वोटर आइडी से जोड़ दिया जाएगा तो (I):-फर्जी वोटिंग रुक जाएगी, (ji) वोटर आईडी की डुप्लीकेसी खत्म हो जाएगी;(iii)इलेक्शन डेटाबेस मजबूत हो जाएगा; (iv)एक व्यक्ति को अलग-अलग स्थानों पर पंजीकरण के झंझट से मुक्ति मिल जाएगी;(v) इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग की दिशा में हम आगे बढ़ जाएँगे; (vi) प्रवासी मतदाताओं को कही से भी वोट करने का मौका प्राप्त हो जाएगा; (vii) आर्मी कि दृष्टि से जेंडर equality कि ओर यह एक बड़ा कदम होगा ( चुनाव कानून को सर्विस वोटर्स के लिए जेंडर न्यूट्रल बनाना है। फिलहाल, एक सेना के जवान की पत्नी एक सर्विस वोटर के रूप में रजिस्टर होने की हकदार है, लेकिन एक महिला सेना अधिकारी का पति नहीं है); (viii) चुनाव में होने वाली धांधलियों से बचा जा सकेगा।

आम-आदमी के मन में इस सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पूरे देश के लिए एक ही मतदाता सूची बनाए जाने की आवश्यकता क्यों है? तो हमें यह समझना होगा कि इसके माध्यम से ही मोदी सरकार की ‘एक देश-एक चुनाव’ की अवधारणा को मूर्त रूप दिया जा सकेगा, जिसकी घोषणा बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में की थी। इसके अलावा एक मतदाता सूची होने से अलग-अलग मतदाता सूची के बनाने में आने वाले खर्च और श्रम दोनों की बचत होगी। इसके साथ ही एक ही मतदाता सूची बनाने के पीछे यह तर्क भी दिया जाता है कि दो अलग-अलग संस्थाओं द्वारा तैयार की जाने वाली अलग-अलग मतदाता सूचियों के निर्माण में काफी अधिक दोहराव होता है, जिससे मानवीय प्रयास और व्यय भी दोगुने हो जाते हैं।

अब आम आदमी यह भी प्रश्न करता है कि जब ये सुधार विधेयक इतना लाभदायक है तो फिर विपक्ष इसे निजता का खतरा क्यूँ बता रहा है, तो मित्रों विपक्ष जो केवल मुसलिम तुष्टिकरण कि राजनीती करता चला आ रहा है वो इस विधेयक के क़ानून बन जाने के पश्चात अवैध बंग्लादेशीयों, रोहंगियाओ को वोट बैंक के रूप में कैसे इस्तेमाल कर पायेगा, पाश्चिम बंगाल में जिस प्रकार धन्धलियुक्त् चुनाव हुए, वैसा चुनाव तो हो हि नहीं पायेगा, फिर विपक्ष सत्ता में वापस कैसे आएगा, इसलिए चोरों को तो इमानदारी का विरोध करना हि है, तो वो कर रहे हैं।

आइये देखते हैं इस विधेयक का दूसरा सबसे बड़ा बदलाव क्या हैं?:- मित्रो इस विधेयक में एक दूसरा जो बड़ा संसोधन सुझाया गया है, वो ये है कि नए वोटर को खुद को मतदाता के तौर पर रजिस्टर कराने के लिए साल में चार मौके दिए जाएँगे। जैसा कि आप जानते हैं वर्तमान समय में,१ जनवरी या उससे पहले १८ वर्ष पूरा होने पर ही व्यक्ति खुद को मतदाता के तौर पर पंजीकृत करा सकता है। इसके बाद १८ वर्ष की आयु पूरी होने पर, उसे स्वय को मतदाता के तौर पर पंजीकृत कराने के लिए अगले वर्ष कि इंतजार प्रतीक्षा करना पड़ता है दूसरे शब्दों में कहें तो अब तक की व्यवस्था में १८ वर्ष पार होने के बाद भी काफी लोग मतदान करने से वंचित रह जाते हैं क्योंकि एक जनवरी को पंजीकरण संबंधी एक ही ‘कट आफ’ तारीख होती है और इसमें ही नए मतदाताओं का पंजीकरण होता है।अत: नए विधेयक में, हर साल १ जनवरी, १ अप्रैल, १ जुलाई और १ अक्टूबर को क्वालिफाइंग डेट्स के तौर पर रखा गया है।
इस विधेयक के माध्यम से जनप्रतिनिधित्व अधिनियम १९५० और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम १९५१ में संशोधन किए जाने की बात कही गयी है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अब पंजीकरण के संबंध में चार तारीखें होंगी जो एक जनवरी, एक अप्रैल, एक जुलाई और एक अक्टूबर होगी।

मित्रो जैसा कि आप जानते हैं कि संविधान का अनुच्छेद ३२४ (१) चुनाव आयोग को संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए निर्वाचक नामावली की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार देता है।गौरतलब हो, इस समय देश में कई मतदाता सूचियां मौजूद हैं। देश के कई राज्यों में पंचायत और नगरपालिका चुनावों के लिए जिस मतदाता सूची का प्रयोग किया जाता है वह संसद और विधानसभा चुनावों के लिए उपयोग की जाने वाली सूची से भिन्न होती है। इस प्रकार के अंतर का मुख्य कारण यह है कि हमारे देश में चुनावों की देखरेख और उसके संचालन की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को दी गई है। कुछ राज्य अपने राज्य निर्वाचन आयोग को स्थानीय चुनाव के लिए राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार की गई मतदाता सूची का उपयोग करने की स्वतंत्रता देते हैं। जबकि कुछ राज्यों में निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची को केवल आधार के तौर पर प्रयोग किया जाता है। इस समय उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, असम, मध्य प्रदेश, केरल, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर शेष राज्य और केंद्रशासित प्रदेश स्थानीय निकाय के चुनावों के लिए राष्ट्रीय चुनाव आयोग की मतदाता सूची का प्रयोग करते हैं। लिहाजा संविधान में संशोधन करना आसान होगा।

विपक्ष का विरोध:- मित्रों इस सुधारात्मक प्रक्रिया का विरोध विपक्ष कर रहा है, कोई इसकी टाइमिंग को लेकर विरोध कर रहा है, क्योंकि पाँच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। कोई इसे निजता का हनन बता रहा है। कोई इस पर चर्चा करना चाहता है, कोई कुछ कर विरोध करता है कोई कुछ कहकर पर वास्तविकता यही है कि सबको अपने अवैध वोट बैंक कि पड़ी है। क्योंकि यदि ये सुधार् हो गए तो फर्जी मतदान रुक जाएगा, चुनाव में धांधली बंद हो जाएगी, फर्जी मतदाता (अवैध घुसपैठिये) किसी काम के नहीं रहेंगे, उनके फर्जी वोटिंग कार्ड धरे के धरे रह जाएँगे और विपक्ष कि उम्मीदें मिट्टी में मिल जाएँगी। बस इतनी सी बात है।

जनता जनार्दन सब समझती है इसलिए विपक्षियों कि बेचैनी का आनंद ले रही है।

जय हिंद, भारत माता कि जय। वंदेमातरम।
Nagendra Pratap Singh (Advocate)
[email protected]

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