Sunday, April 14, 2024
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हिंदूओं के वीर संगठनों की धार कुंद कैसे हुई?

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भारत में धर्मांतरण का आसान लक्ष्य है हिंदू समाज। इसका कारण है हिंदु धर्मावलंबियों का अपनी समृद्ध संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान आधारित परंपराओं के प्रति उनके भीतर घुसे तथाकथित सेकुलरिज्म के वायरस के कारण घोर उदासीनता। मगर आज इस कारण पर चर्चा करने के बजाय धर्मान्तरण के बढ़ते मामलों पर बात करते हैं। और बात करते हैं कि क्यों राजनैतिक नेतृत्व इन अराष्ट्रीय गतिविधियों के प्रति घोर उदासीन बना हुआ है। उसकी क्या सियासी मजबूरियां हैं। क्या वह जानबूझकर इन घटनाओं को अनदेखा कर रहा है? क्या हिंदू समाज को कमजोर करने में ही उसे अपनी सियासत नजर आ रही है?

उत्तरप्रदेश में हाल ही में पुलिस ने अवैध धर्मान्तरण के मामले में एक बड़े गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए दो लोगों को गिरफ्तार किया है। उत्तरप्रदेश एटीएस ने कड़ी कार्रवाई करते हुए आरोपी मोहम्मद उमर गौतम और मुफ्ती काजी जहांगीर कासमी को पकड़ लिया है। दुर्भाग्य से इनमें एक संकर प्रजाति का मुस्लिम है। यानी वह हिंदू से धर्मान्तरित होकर मुसलमान हुआ है। उमर गौतम पूर्व में हिंदू था। उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने आरोपियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) लगा दिया गया है। इन पर जो कार्रवाई होनी है, जरूर होगी।

लेकिन इस घटना के एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर बात करना जरूरी है। केंद्रीय महिला और बाल कल्याण मंत्रालय में सांकेतिक भाषा विशेषज्ञ इरफान ख्वाजा खान की धर्मान्तरण में संलिप्तता इंटेलीजेंस की क्षमताओं पर सवाल खड़ा करती है। सरकार के महत्वपूर्ण विभाग में बैठा व्यक्ति न जाने कितने वर्षों से सरकारी दस्तावेजों की मदद से गूंगे और बहरे नाबालिग बच्चों का डाटा धर्मान्तरण में लगे जेहादी प्रवृत्ति के लोगों को उपलब्ध करवाता रहा और इंटेलीजेंस सोता रहा। सवाल यह भी है कि क्या वाकई इंटेलीजेंस को उसकी हरकतों के बारे में खबर नहीं थी या किसी दबाव में उसने इमरान पर कोई कार्रवाई करने की जरूरत नहीं समझी। कितने आश्चर्य की बात है कि उसी व्यक्ति को सांकेतिक भाषा के लिए प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा करवाया जाता है। हैरानी की बात है कि प्रधानमंत्री उस व्यक्ति की पीठ थपथपाते हैं। क्या यह सच है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को इमरान की हरकतों को बारे में कोई खबर नहीं थी?

गाजियाबाद के डासना देवी शिव शक्ति धाम के महंत और अखिल भारतीय संत परिषद के राष्ट्रीय संयोजक स्वामी यति नरसिंहानंद सरस्वती के इन आरोपों में – कि इरफान जफर सरेशवाला का खास आदमी है, तो यह समीकरण बहुत खतरनाक हैं। और हिंदू समाज के खिलाफ सोची समझी साजिश है। यति के आरोप हैं कि तब्लीगी जमात का प्रमुख मोहम्मद साद भी जफर की मेहरबानी के कारण ही अब तक पुलिस की गिरफ्त से दूर है। दिल्ली दंगों में भी उसकी भूमिका के बारे में कुछ तथ्य निकले हैं। क्या यह संभव है कि पुलिस के हाथ इतने छोटे पड़ जाए कि वह मोहम्मद साद सरीखे व्यक्ति को नहीं पकड़ पाए। जमातियों के कोरोना फैलाने और इमारत खाली नहीं करने पर उन्हें समझाने के लिए यदि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैसे व्यक्ति को मैदान में उतरना पड़ता है तो साद की शख्सियत कोई छोटी-मोटी नहीं मानी जा सकती। लेकिन ऐसा लगता है कि मौलाना साद जैसे व्यक्ति अपने उच्च लिंक के कारण निश्चिंत हैं। माना जाता है कि जफर सरेशवाला के लिंक बहुत ऊंचे दर्जे के हैं। इसलिए यति के इन आरोपों में निश्चिय ही दम है कि अब धर्मान्तरण करने वाले गिरोह का रहस्य कभी नहीं खुल पाएगा। जिस तरह तब्लीगी जमात का प्रमुख मोहम्मद साद आंखों के सामने होते हुए भी आज तक पकड़ से बाहर है। इन तमाम घटनाक्रम को देखकर यति के आरोपों में विश्वास नहीं करने का कोई कारण नजर नहीं आता है। 

इनसे भी महत्वपूर्ण और नोटिस करने वाला तथ्य यह है कि हिंदू समाज के वीर संगठन कैसे कमजोर कर दिए गये। एक समय था जब हिंदु समाज में वीरोचित तरीके से प्रतिकार करने के लिए विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और हिंदू वाहिनी जैसे संगठन हिंदू समाज पर हो रहे अत्याचारों का तेजी से प्रतिकार करते थे और अहिंदु समुदाय के दुराग्रही लोग उनसे डरते थे। यही वजह थी कि गोधरा मामले के बाद गुजरात में हिंदुओं के खिलाफ कोई बड़ी साजिश नहीं हुई। लेकिन जैसे-जैसे हिंदु समाज के वीर संगठनों की ताकत को जान-बूझकर कम किया गया, हिंदू समाज अहिंदू समुदाय के अत्याचारों का शिकार होता गया। पश्चिम बंगाल इसका सबसे ताजा उदाहरण है। सनातन समाज के लोगों पर टीएमसी के गुंडों की खुली गुंडागर्दी का प्रतिकार करने वाला आज वहां कोई नहीं है। यह सच है कि सियासी लोगों से कभी भी हिंदू समाज का झंडा बुलंद नहीं होता। समाज का झंडा उसके मजबूत और आक्रामक संगठनों की वजह से ऊंचा होता है। आज हिंदू समाज अपने वीर संगठनों की कमी का अभाव अनुभव कर रहा है। क्या यह सच नहीं है कि प्रवीण भाई तोगड़िया और विनय कटियार जैसे बुलंद हौसले वाले संगठनकर्ताओं को जानबूझकर कमजोर किया गया? उनकी मौजूदगी भर से हिंदू समाज की मुट्ठियां तनने लगती थी।

लेकिन हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि उन संगठनों को किन लोगों ने किन लोगों के कहने पर कमजोर करने का प्रयास किया। अगर यति नरसिंहानन्द सरस्वती के आरोपों पर विश्वास किया जाए तो इसमें मुस्लिम कारोबारी जफर सरेशवाला की सबसे प्रमुख भूमिका रही है। विभिन्न चैनलों और यूट्यूब पर उनके पुराने बयानों को सुन लीजिए। वह खुलकर विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और संघ की आलोचना करते रहे हैं। वह यह भी स्वीकार करते हैं कि उन्हीं के कहने पर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की ताकत को कमजोर किया गया। उन्हीं के कहने पर प्रवीण भाई तोगड़िया को कमजोर किया गया। लेकिन समझने की बात यह है कि इससे ये संगठन मात्र कमजोर नहीं हुए हैं, बल्कि पूरा हिंदू समाज कमजोर हुआ है। और इसका नतीजा पूरा हिंदू समाज पश्चिमी बंगाल से लेकर राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल में भुगत रहा है। हम अनुमान लगा सकते हैं कि महाराष्ट्र के पालघर में हिंदु संतों की हत्या पर मौन रहने वाले समाज को इतना कमजोर क्यों और कैसे कर दिया गया? 

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