Friday, April 19, 2024
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हिंदुओं की पुराने अनुपात में वापसी ही कश्मीर घाटी की चिंता का समाधान है

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Kumar Narad
Kumar Narad
Writer/Blogger/Poet/ History Lover

केंद्र सरकार भले ही कश्मीर घाटी में आतंकवाद, अलगाववाद और राजनैतिक परिवारवाद से निपटने के लिए धारा 370 और 35 ए को हटाकर खुश है, लेकिन कश्मीर घाटी की आग को शांत करने का आखरी और एकमात्र उपाय है कश्मीर घाटी को उसके मूल जनसंख्यात्मक ढांचे में लाना। कश्मीर को शांत वादियों में बदलना है तो उसे अस्सी के दशक में मौजूद रहे जनसंख्या के मूल ढांचे में लाना ही पड़ेगा। इसके अलावा बाकी सारे उपाय फौरी तौर पर तो सफल हो सकते हैं, लेकिन वह लंबे समय तक कारगार नहीं हो पाएंगे। और इसकी असल वजह है वहां के तथाकथित अल्पसंख्यक (जम्मू कश्मीर में बहुसंख्यक) समुदाय के भीतर सुप्त और जाग्रत अवस्था में रहने वाली अलगाववाद की भावना। सियासत इसे भले ही पोलिटिकली करैक्ट होने के चक्कर में स्वीकार नहीं करे, लेकिन कबूतर के आंखें बंद कर लेने से बिल्ली उस पर झपट्टा नहीं मारेगी, ऐसा सोचकर लंबे समय तक चुप नहीं रहना घाटी की चिंताओं को बढ़ाना ही है।

हाल का ताजा उदाहरण सबके सामने हैं। पिछले चार दशक से श्रीनगर में रह रहे ज्वैलरी व्यवसायी सतपाल निश्चल की पाक समर्थित आतंकी गुट टीआरएफ ने हत्या कर दी। सतपाल निश्चल को हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा बनाए डोमिसाइल कानून के तहत कश्मीर का डोमिसाइल सर्टिफिकेट दिया गया था। यह बात आतंकवादियों को रास नहीं आई और उन्होंने 31 दिसंबर को सतपाल निश्चल को सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी। अब ढूंढते रहे टीआरएफ को। यह एक घटना मात्र नहीं है। यह कश्मीर के अमन चैन की हत्या की कोशिश है। केंद्र सरकार की सकारात्मक पहल की हत्या की कोशिश है। यह केंद्र को संदेश देने की कोशिश है कि डोमिसाइल का प्रयोग इतना आसान नहीं है। तो फिर? इस नीति को तेजी से, अग्रेसिव ढंग से और प्रभावी ढंग से लागू करने की आवश्यकता है।

1989 में कश्मीरी हिंदुओं के घाटी छोड़ने के बाद घाटी का जनसंख्यात्मक ढांचा पूरी तरह एकतरफा हो गया था। जिसका नुकसान पिछले 30 सालों में पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है और यह इस बात का गवाह इतिहास है कि जहां-जहां हिंदू अल्पसंख्यक हुआ है और मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक हुआ है वह हिस्सा अलगाववाद की आग में झुलसने लगता है। झुलसते झुलसते धीरे धीरे टूटकर अलग हो जाता है। अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

कश्मीर घाटी में पिछले तीन दशकों से चल रहा अलगाववाद और आतंकवाद देश के लिए नासूर बन चुका था। हालांकि पिछले कुछ सालों से उस पर अंकुश जरूर लगा है, लेकिन उस पर नियंत्रण पा लिया, यह कहना जल्दबाजी होगा। सत्य तो यही है कि यहां से अलगाववाद कम से कम वर्तमान परिस्थितियों में तो कभी खत्म नहीं होगा।

बड़ा सवाल है कि क्या टीआरएफ जैसे छोटे-मोटे आतंकी गुटों से डरकर हम अपने कदम पीछे खींच ले? फिर उपाय क्या है? इसका सीधा और सरल उपाय है घाटी का जनसंख्यात्मक ढांचा पूरी तरह बदल दिया जाए और इसे 1990 से पहले की स्थिति में बहाल किया जाए। लेकिन यह कैसे संभव है? इसका तरीका आसान है। इसके लिए भारत के सेवानिवृत्त फौजी और देश की मार्शल कौम को आगे आना होगा।

केंद्र सरकार को एक नियम बना कर सेवानिवृत्त फौजियों को घाटी में बड़ी संख्या में बड़ी मात्रा में भूमि आवंटित कर उन्हें वहां स्थाई रूप से बसाने की पहल करनी चाहिए और उन्हें जम्मू कश्मीर के विभिन्न रक्षा, सुरक्षा जैसे अनेक संस्थानों से जोड़कर उनकी कुशलता का लाभ लेना चाहिए। इसके साथ साथ देश भर में अपनी बहादुरी के लिए जानी जाने वाली मार्शल कौम को भी वहां बहाने और उन्हें व्यापार करने की छूट देनी चाहिए। इन लोगों के बीच में ही कश्मीर घाटी को छोड़कर गए कश्मीरी हिंदुओं को वापस सुरक्षित ढंग से बसाना चाहिए।

90 के दशक में आतंकवाद के माहौल के कारण रातों रात निकल कर आए कश्मीरी हिंदुओं की जमीनों पर से स्थानीय लोगों के अवैध कब्जों को पूरी तरह मुक्त करके उन पर कश्मीरी हिंदुओं को बसाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। कश्मीरी हिंदुओं के आवासों, भूखंडों और उनके बाग बगीचों को स्थानीय समुदाय के लोगों ने या कब्जा लिया है या उस पर नया निर्माण कर लिया है। तत्कालीन अब्दुल्ला सरकार ने कश्मीरी हिंदुओं को घरों और उनकी जमीनों पर स्थानीय लोगों को कब्जा करने की भरपूर छूट दी थी। वर्तमान में बहुत कम संख्या में हिंदुओं के घर शेष रहे हैं। उन घरों को पुननिर्माण के लिए सरकार को सहायता देनी चाहिए। ऐसे सेवानिवृत्त फौजी, जो कश्मीर में रहकर अपना बिजनेस करना चाहते हैं, उनके लिए स्थानीय सरकार को आवासीय कॉलोनियों का निर्माण करना चाहिए। इसके अलावा कश्मीर में खेती और कारोबार के लिए देश की दूसरी मार्शल कौम के लोगों को बड़े पैमाने पर बसाकर घाटी में एक सकारात्मक माहौल बनाना चाहिए।

हम घाटी में कितना ही हीलिंग टच कर लें, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जब तक कश्मीर घाटी का जनसंख्यात्मक ढांचा अपने मूल स्वरूप में नहीं आएगा कश्मीर घाटी में अमन और चैन एक दूर की कौड़ी ही रहने वाली है।

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