Thursday, July 2, 2020
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भारत मे समुदायों के बीच क्यों बढ़ रहा है तनाव?

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यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर तो हर कोई जानना चाहता है और हर किसी ने अपने मन में इसके लिए कोई न कोई उत्तर बना रखा है जिसे वह सही मानता है। पहले मैं बात करूंगा समस्याओं की और फिर कुछ सुझावों की।

किन्ही भी समुदायों के बीच तनाव बढ़ने के कई कारण होते हैं पर ये तनाव एक प्रकिया का हिस्सा है। भारत एक ऐसा देश हैं जहां अभी न तो प्रजातंत्र परिपक्व हुआ है और न ही लोगों को प्रजातंत्र का वास्तविक अर्थ पता है। सरकार को चुनना मात्र ही प्रजातंत्र नही हैं। संविधान में दिए गए हर मौलिक कर्तव्य को निभाते हुए और अपने मौलिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए यदि व्यक्ति काम करे तो ऐसी स्थितियों से बचा जा सकता है। आज के समय में भाईचारे की भावना को बढ़ाना सबसे बड़ा कर्तव्य हैं।

यदि इतिहास की तरफ नज़र डालें तो सफलता तभी मिल पाई है जब सभी लोग साथ मे आए।लेकिन क्या इस बात को बोलने मात्र से भाईचारा बढ़ जाएगा, भाईचारा हमेशा दोनो तरफ से बढ़ता है। सभी समुदायों को एक दूसरे के प्रति विश्वास पैदा करने की आवश्यकता है और वो तभी होगा जब दोनों और से कुछ ऐसे ‘gestures’ दिखाया जाए जिससे ये साबित हो पाए कि हम एक-दूसरे का सम्मान करते हैं और सही को सही और गलत को गलत बोलने का माद्दा भी रखते हैं।

धर्म में बढ़ती कट्टरता इन सबके बीच मे बाधा का काम कर रही है। धर्म के वास्तविक अर्थ को लोगों को समझने की जरूरत है।

धर्म का अर्थ केवल हिन्दू,मुस्लिम नही है। संस्कृत में कहा गया है “धारयति इति धर्म:” जिसका अर्थ है ‘धर्म वह है जिसे धारण किया जा सके’। सच बोलना एक धर्म है, बड़ों का आदर एक धर्म है, भाईचारे का विकास करना एक धर्म है अथार्त हर वह चीज जो समाज और मानवता का भला कर सके वह ही धर्म है।

दूसरी बात ये है कि लोगों में ये भावना घर कर चुकी है कि जब उनके बारे में कुछ बोला जाता है तब मीडिया/सरकारी तंत्र सुबह से शाम तक छाती पीटता है पर जब हमारे बारे में कुछ बोला जाता है तो वही तंत्र शांत रहता है। इसमें वैसे लोगों की इतनी गलती भी नही है। “जिस प्रकार का मीडिया हमारे देश मे है और सुबह से शाम तक जो चर्चाएँ वहां होती है यदि उसकी तुलना कूड़े से की जाए तो कूड़ा भी उसके आगे गुलदस्ता लगने लगेगा।” समस्या ये है कि मीडिया हमे ये बताने लगा है कि हमे सोचना कैसे हैं। वह वो नही दिखा रहा कि सच क्या है और खबर क्या है वह ये बताने लगा है कि ये गलत हुआ है और ये सही हुआ है जिसका ज़िम्मा दर्शक के पास स्वयं होना चाहिए। मीडिया का काम केवल हमे सच्ची खबर दिखाना होना चाहिए न कि हम उस खबर को कैसे ग्रहण करें और उसके बाद क्या सोचे ये बताना। और आप यह सोचने की गलती भी न करें कि कुछ चैनल खराब है तो कुछ सही है मैं दोनो को एक सिक्के के दो पहलू के रूप में ही देखता हूँ। एक धड़ा केवल सरकार की तारीफों के पुल बांधता रहता है तो वही दूसरा केवल विरोध करने के साथ-साथ अपना propaganda आगे बढाते रहता है, ऐसे में दूसरे धड़े को ये बोलने का कोई अधिकार नही रह जाता कि मीडिया तो खराब हो गया और वह निष्पक्ष बात नही करता क्योंकि वह स्वयं ही निष्पक्ष नही है।

 

अब बात करते हैं एक और विवादास्पद बिंदू की जो है “Islamophobia’। मैं यहाँ केवल अपने विचार रखूंगा सही गलत तय करना आपकी ज़िम्मेदारी है।

मैं इसे ऐसे देखता हूं कि यदि कोई व्यक्ति मुझसे डरता है या मेरे प्रति उसमे किसी हीन भावना का विकास हो रहा है तो इसके दो कारण हो सकते है। 1.या तो मेरे द्वारा ऐसा कुछ किआ, बोला या दिखाया जाता है जिससे उसकी भावनाएँ आहत होती हैं 2.उसके कहीं न कहीं कुछ ऐसे अनुभव रहे है जिससे उसकी मेरे प्रति एक विशेष धारणा बन गयी है।

तो इसका उपचार कैसे किया जा सकता है? क्या इसका उपचार ये है कि मैं सुबह शाम बस ये बोलूं की वह तो इस्लामोफोबिया का शिकार है या फिर मैं अपनी तरफ से कुछ ऐसी पहल करूँ जो उस व्यक्ति को भी उसकी सोच बदलने पर मजबूर कर दे?मैं सही को सही और गलत को गलत बोल सकूँ और गलत होने पर शांत न रह जाऊं क्योंकि गलत होने पर शांत बैठ जाना कही न कहीं सहमति को दर्शाता है। और गलत के खिलाफ आवाज उठाना ही वह चीज हैं जो कि सबसे कम देखने को मिलती है।

 

इसी वजह से मुझे ‘गंगा-जमुनी’ तहज़ीब जैसे शब्दों को बोलने से परहेज है क्योंकि यह कहीं न कहीं यह दिखाता है कि हम दो ‘अलग’ लोग है जो साथ मे रहने की कोशिश कर रहे हैं और ये भेदभाव ही कई समस्याओं की जड़ है। एक और जो समस्या है वो है सोशल मीडिया का गलत उपयोग।

जहां सोशल मीडिया का अविष्कार ही इस सिद्धांत पर हुआ था कि ये लोगों को आपस मे जोड़ेगा वहीं भारत मे इसका उपयोग सबसे ज्यादा लोगों को तोड़ने में किया जाता है। दिल्ली दंगों में हम देख ही चुके है कितने ही फेक एकाउंट्स बनाकर भड़काऊं बातें बोली गई और तरह-तरह के वीडियोस को भी फैलाया गया। हमारे देश में बढ़ते दंगों और mob-lynching इत्त्यादि में सोशल मीडिया का एक विशेष योगदान रहा है।क्योंकि इसमें प्रामाणिकता को बताने वाला कोई नही हैं और इसमें गलत खबर इतनी तेजी से आग की तरह फैलती है कि जबतक कोई उसे खारिज़ कर सके उससे पहले ही वह काफी हानि कर चुकी होती है।

अब बात कुछ सुझावों की :-

  • सबसे पहले एक ऐसी नीति लाने की आवश्यकता है जिससे आपको अपने सोशल मीडिया पर सही identity को जोड़ना पड़े(आधार,पैन कार्ड या किसी और माध्यम से)। मुझे पता है कि इसमें कुछ Privicy issues हो सकते है पर इस चुनौती को सरकार को हल करना है। और साथ ही साथ सोशल मीडिया चलाने के लिए एक निश्चित आयु सीमा को तय किया जाए, क्योंकि ‘सोशल मीडिया पर आज हर प्रकार का मैटेरियल है जो हर आयु वर्ग के लिए उचित नही है’।हाल ही की ‘Bois Locker Room’ की जो घटना हुई है वह इसका जीत जागता सबूत है कि कैसे आज 13-14 साल के बालकों का मस्तिष्क इसके गलत उपयोग से कितना दूषित हो रहा है तो ऐसे में यह जरूरी है कि इसके उपयोग के लिए भी एक आयु सीमा को निश्चित किया जाए।। Identity को इससे जोड़े जाने से यह भी हो पायेगा की हर व्यक्ति यह समझ सकेगा कि उसके द्वारा जो कुछ लिखा जाएगा वह उसका ज़िम्मेदार भी है, आप ऐसे ही कुछ भी भड़काऊ या ऊल-जलूल नही लिख सकते।जिससे दंगे और mob-lynching जैसी घटनाओं में भी कमी आएगी।
  • दूसरा हमे एक निष्पक्ष मीडिया की आवश्यकता है।

मैं यहाँ independent media houses (Quint,Wire आदि) की बात नही कर रहा हूँ क्योंकि वे तो एक अलग की अजेंडा के साथ रिपोर्टिंग करते हैं, हमारी भावी पीढ़ी को इसके लिए पहल करनी पड़ेगी और हमें ये सुबह-शाम होने वाली हिंदुस्तान-पाकिस्तान और हिन्दू-मुस्लिम वाली चर्चाओं से दूरी बनानी पड़ेगी।

  • हमें धार्मिक-कट्टरता की रोकथाम के लिए आगे आना पड़ेगा और इसमें हर व्यक्ति को अपने समाज में हो रही गलत बातों के खिलाफ आवाज़ उठानी पड़ेगी।यदि तबलीग जमात के लोगों द्वारा गलत किया जाए तो उनके खिलाफ मुसलमानों को आगे आना पड़ेगा वहीं गो-मूत्र से कोरोना ठीक हो जाएगा ऐसी अफवाहों के खिलाफ हिन्दुओं को भी आगे आना पड़ेगा।

धार्मिक कट्टरता और आपसी सौहार्द को बढाने के लिए जबतक दोनों तरफ से पहल नही की जाएगी जबतक ऐसे ही अनगिनत दंगों का और कट्टरता का शिकार ये देश होता रहेगा और देश के दुश्मन इसमे अवसर देखकर केवल फायदा ही उठाएंगे।

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