Saturday, April 13, 2024
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साम्यवाद – लोकतंत्र और राष्ट्रीय अखंडता के लिए खतरा

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साम्यवाद का मानना है कि जिस व्यक्ति/समुह के पास उत्पादन का अवसर होता है वह व्यक्ति/समुह दूसरे व्यक्ति या समूह (अर्थात मजदूर या ऐसा जो किसी भी उत्पादन का स्वामी नहीं है) को अपने अधीन कर उसकी जीवन रचना का निर्धारक बन जाता है तथा शोषण कि शुरवात करता है। शोषण के फल स्वरूप वह समूह जिसे उत्पादन का अवसर मिला है वह उसे अधिकार मान कर उत्पादन पर एकाधिकार प्राप्त कर लेता है, जिस कारण पूंजी उसी के पाले में आ जाती है। सत्ता और सरकरे भी उनके अधीन हो जाती है और वह एक समुह सर्व शक्तिमान बन जाता है। अपने वैभव से अर्जित भोग विलास से वह प्रकृति पर विजय की लालसा लिए शोषण के दाता बन जाते है तथा दूसरा वर्ग सर्वहारा बन जाता है।

ऐसी परिस्थिति को रोकने के लिए साम्यवादीओं ने उत्पादन तथा अर्जित पूंजी पर मजदूर तथा उत्पादक के समान अधिकार की बात कही। समानता के अधिकार पर साम्यवादी गूठों ने सर्वहारा वर्ग तथा पूंजीवादी वर्ग के बीच एक संघर्ष की शुरवात की। इस संघर्ष में सम्यवादियों को कई यूरोपीय भु-भागो में सफलता मिली। परन्तु जब उत्पादान के क्षेत्र में समानता का अधिकार देने का प्रयास हुआ तो विषय उठा कि यदि उत्पादन का स्वामी कोई एक वर्ग विशेष हुआ तो परिस्थिति पूंजीवाद को ही जन्म देगी इससे उभरने के लिए उत्पादन के क्षेत्रों में संपत्ति का स्वामित्व समाज को देने का भाव भी जगा और इस भाव को साक्षात रूप देने हेतु तथा जमीनी स्तर पर इसकी पालन करने हेतु आर्थिक उत्पादन तथा सामाजिक रचना के अधिकार चुनी गई सरकार को देना निश्चित हुआ।

परिस्थिति को नियंत्रण में रखने हेतु तथा पूंजीवाद की संभावनाओं का नाश करने हेतु सरकारों को सद्रुड करना आवश्यक था। वहीं कोई दूसरा पक्ष अपने आर्थिक, सामाजिक विचारो से राष्ट्रीय में कोई नया राजनेतिक आंदोलन न खड़ा करे इस बात का बोध भी सरकार को रखना था। इन सभी संभावनाओं को साधने हेतु राष्ट्र की समस्त इकाइयों पर सरकार का पहरा तथा दबाव आवश्यक होगया फल स्वरूप सरकारों को अनंत अधिकारियों से विभूषित कर राष्ट्र की समस्त शक्ति का केंद्र बना दिया गया।

मानव की प्राकृतिक प्रवृत्ति अनंत का विचार करने की है तथा उस तक पहुंचने का मार्ग बनाने की है। ऐसी परिस्थिति में उसे कई बंधनों से मुक्त हो कर स्वतंत्र प्रयास करने की आवश्यकता होती ही है। यह रीति आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक सभी विषयों में उपयोगी है। परन्तु साम्यवाद में स्वतंत्र प्रयास को संदेह की दृष्टि से ही देखा जाएगा क्योंकी साम्यवादियों का जन्म ही संघर्ष से हुआ है, जिसमें उन्होंने सदा से स्वतंत्र आर्थिक उत्पादकों तथा धार्मिक चिंतकों को अपना क्षत्रु माना है। तथाकथित अप्राकृतिक समानता का अधिकार देने हेतु मानव से उसकी प्राकृतिक स्वतंत्रता ही छीन ली गई। जहा की रीत नीत प्राकृतिक स्वतंत्रता का हनन करे वहा न्याय पालिका को भी स्वतंत्र नहीं रखा जा सकता क्योंकी स्वतंत्र न्याय व्यवस्था में तर्क की संभावना होती है और प्राकृतिक न्याय दर्शन ही मानवीय तर्क का जनक होते है। ऐसी परिस्थिति को साधने हेतु न्याय प्रणाली को भी सरकारी तंत्र के अधीन रखना पड़ा।

साम्यवाद में प्रतिएक मानव को संदेह की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति के कारण राजकीय तंत्र (सरकारी अफसर, प्रशाशन, सेना) सकती से काम करे यह भी जरूरी हो गया जिस कारण इन्हें भी सरकारी जोर के अंतर गत कार्य करवाना जरूरी था।

संघर्ष ही जनक होने के कारण साम्यवाद में असंतोष होना निश्चित था, परन्तु असंतोष पूर्ण राष्ट्र की अखंडता को आहत न करे तथा प्रजा का सरकार के विरूद्ध मोर्चा न खड़ा हो इस कारणवर्ष संचार के सभी माध्यमों (पत्रकार, स्वतंत्र लेखक, सोशल मीडिया, इंटरनेट) को सरकार की गिरफ्त में रखा गया।

इस प्रकार लोकतंत्र के समस्त स्तंभों को सरकार के अधीन कर दिया गया। परन्तु ऐसा करते समय यह भुला दिया गया कि सरकार का नियंत्रण करने वाला भी एक मानव ही होगा। सरकारों को अनंत शक्तियों से शोभित करने पर शोभा नियंत्रक की ही बढ़ेगी। एक राष्ट्र की समस्त शक्तियों को एक व्यक्ति को प्रदान करने पर संपूर्ण राष्ट्र का भविष्य एक व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता पर केन्द्रित हो जाता है। जब कोई व्यक्ति अनंत शक्ति से विभूषित हो तो वह अमर्यादित हो जाता है। मर्यादा की अनुपस्थिति में नेतिक्ता का रहना मुश्किल हो जाता है। जब सत्ता पर विराजमान व्यक्ति अनेतिक हो तो ऐसी परिस्थिति में लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। समानता के आधार पर पोषित साम्यवाद ने संघर्ष के मार्ग पर चलते हुए लोकतंत्र की ही हत्या कर दी। राष्ट्र की समस्त शक्ति की धुरी पूंजीवादीयों से हट कर सत्ता में विराजित व्यक्तियों के पास आगई। इसका जीवंत उदाहरण आज का चीन तथा रूस हो गया है। वहा सत्ता से अर्जित शक्ति एक ही पाले में वास करती है तथा लोकतंत्र नाम मात्र रह गया है।

अब प्रश्न यह है कि इस परिस्थिति से बचने का उपाय क्या है?

भारतीय सनातन धर्म में योग और ध्यान को विशेष महत्व है। इसी कारण यहां की संस्कृति में सदा से प्रकृति का दर्शन कर उससे संपर्क साधने की रीत है। यहां मानव ने सदा से देखा है कि किस प्रकार प्रकृति के कई अंश समान परिस्थिति में नहीं है। दो भु-भागो का वातावरण अलग है। जो वृक्ष जंगलों में उगता हो उसकी कल्पना रेगिस्तान में नहीं हो सकती जो रुद्राक्ष हिमालय की कंदराओं में उगे वह चाहे जितना भी पवित्र हो वह अन्य विपरीत प्रकृति में नहीं पल सकता। प्रकृति का प्रतीएक अंश की अपनी विशेषता है, अपना रूप है, अपनी अलग प्रकृति है तथा भु-भाग बदलने के साथ ही अपना अलग मूल्य है। अतः समानता के आधार पर प्रकृति के किसी भी अंश को दूसरे स्थान पर पोषित करना उसकी अपनी विशेषता तथा प्रारूप के साथ अन्याय है। उसी प्रकार समानता के नाम पर सभी भु-भागो की प्रकृति भी एक सी नहीं की जा सकती। परन्तु असमान होने के उपरांत भी उनमें एक एकात्मता है। प्रकृति का प्रतिएक अंश दूसरे से एकात्म भाव से जुड़ कर एक दूसरे को पूर्ण करता है। रात्रि दिन को, एक ऋतु दूसरी ऋतु को।

मानव तथा वृक्षों के लिए प्राण वायु अलग है, परन्तु मानव वृक्षों के तथा वृक्ष मानवों के जरूरत कि वायु के कारक बन एक दूसरे को पूर्ण करते है। उसी प्रकार अनंत काल से चली आ रही मानव सभ्यता में भी अपनी प्रकृति के फल स्वरूप कई वंशो ने अपने पुरुषार्थ से अपने जीवन योग्य भौतिक वैभव अर्जित किए है। राजाओं ने राज्य अर्जित किया, किसानों ने धन, गुरु ने ज्ञान तो श्रमिको ने कला। अब इन गुणों को असमान बताकर उनसे छीन लेना एक व्यक्ति के पुरुषार्थ तथा स्वतंत्रता कि अवहेलना है। यह सभी समान नहीं है, इनके प्राकृतिक गुण अलग है फल स्वरूप अर्जित वैभव का प्रारूप भी अलग होगा, तथा इनहे आपस में तोला भी नहीं जा सकता कारण की इनका अपना अलग आयाम है परंतु राष्ट्र उन्नति में समान योगदान है। इन सभी वैभव में किसी एक को महत्व का मान कर अन्य पूर्ण मानव सभ्यता को शोषित मानना तथा समानता के नियम की दुहाई देकर उनकी असीमित संभावनाओं को क्षीर्ण कर उन्हें एक वैभव के अर्जन पर विवश करना मानव की प्रकृति तथा स्वतंत्रता के साथ अन्याय है। समानता की अंधनिती समाज के दो गुठों में संघर्ष को ही जन्म देती है जो राष्ट्र की उन्नति के सभी मार्गो में रोढा बनता है।

इसी दुर्भाग्य से बचने हेतु भारतीय दार्शनिकों ने प्रकृति से साक्षात्कार कर मानव में परस्पर एकत्मता के आधार पर संस्कृति बनाकर सभ्यता को पोषित कर राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य रखा। संस्कृति के इस एकात्म भाव ने राष्ट्र के प्रतीएक घटक को राष्ट्र यज्ञ में अपने गुणों की आहुति दे कर परस्पर प्रीति से एक दूसरे की पूर्णता को अर्जित करने के लिए कारक बनाया।

अधिकार का विचार छोड़ कर्तव्य को परम मान कर भारतीय संस्कृति में व्यक्ति और समाज को परस्पर एकात्म भाव से प्रीति के सूत्र में पिरोया। एकात्म भाव के जागरण से व्यक्ति ने समाज से अर्जित वैभव का सुख पुनः समाज को अर्पित करने में माना, अपनी मुक्ति का मार्ग बनाया। इसी का एक उदाहरण आज आप के समक्ष रखना इस लेख का उद्देश्य है….

राजस्थान में जब किसान हल जोतते हैं, तो स्यावड़ माता का स्मरण कर निम्न पद बोलते हैं…..

स्यावड़ माता सतकरी,
दाणा-फाका भोत करी,
बैण-सुभासनी रै भाग रो देई,
चिड़ी-कमेड़ी रै राग रो देई,
राही-भाई रो देई,
ध्यांणी अर जंवाई रो देई,
घर आयो साधु भूखो न जा,
बामण दादो धाप र खा,
सुन्ना डांगर खा धापै,
चोर चकोर लेज्या अापै,
कारूआ रै भेले ने देई,
राजाजी रै सेले ने देई,
सुणीजै माता सूरी,
छत्तीस कौमां पूरी,
फेर तेरी बखारी में ऊबरै,
तो मेरे टाबरा नै ई देई,
स्यावाड़ माता, सत की दाता।

अर्थात:
हे सत् करनेवाली स्यावड़ माता! पर्याप्त खाद्य अन्न उत्पन्न करना। ससुराल गई बहन-बुवा के भाग्य का देना, पक्षियों की आवश्यकता को पूरा करना। राहगीर भाई-बंधुओं के लिए देना। अपने जमाइयों के लिए देना। घर में आया कोई साधु भूखा न रहे, श्रेष्ठ ब्राह्मण पेट भरकर खाए। आवारा पशु भी पूरा खा सकें। चोर-चकोर भी अपनी जरूरत पूरी कर सकें। कारू अर्थात् खेती न करनेवाले कुम्हार, नाई, खाती आदि इनके लिए भी देना, शासन अच्छा चले, उनके लिए भी देना। हे सब की माता! सुनो, छत्तीस कौंमों की जरूरत पूरी करो। उसके बाद तुम्हारे भंडार में कुछ बचे तो मेरे बच्चों के लिए भी देना। हे स्यावड़ माता! तुमहीं सबको सत् देनेवाली हो।

यह पद इस बात का गवाह है कि किस प्रकार हमारी संस्कृति में एक सामान्य कृषक भी स्वय से पहले समाज का चिंतन करता है। विश्व कल्याण कि कामना करता है। पूंजी नहीं अपितु सुख उसका जीवनलक्ष्य वह सुख जो भौतिक वस्तुओं से परे है।

यह भावना मात्र कृषक में नहीं अपितु सम्पूर्ण भारवर्ष में व्याप्त है। शिक्षा जिसकी धारा भारतीय संस्कृति में समाज से व्यक्ति की दिशा में बताई गई है, उसमें भी बताया जाता है…..

विद्यां ददाति विनय विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रताम् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ।।
अर्थात:
विद्या यानि ज्ञान हमें विनम्रता प्रदान करता है, विनम्रता से योग्यता आती है और योग्यता से हमें धन की प्राप्ति होती है जिससे हम धर्म के कार्य कर सकते हैं और हमें सुख मिलता है।

हमारी संस्कृति में ज्ञानी और सक्षम पुरुष की विशेषता बताते समय कहा गया है….

विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्, ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।।
अर्थात:
दुर्जनो और सत्पुरुष  का व्यवहार विपरीत होता है। दूर्जनो की विद्या विवादार्थ, धन गवार्थ और शक्ति परपीड़न के लिए होती है, वहीं सत्पुरुष की विद्या ज्ञानार्थ, धन दानार्थ और शक्ति अन्य के रक्षण के लिए होती है।

ऐसी विद्या से पोषित सभ्यता में एकात्म भाव स्वयं ही जाग्रत हो जाता है तथा संघर्ष की आवश्यकता ही खत्म हो जाती है और साम्यवाद के कारण पैदा होने वाली समस्या समाप्त हो जाती है जिस कारण शक्ति के केंद्रीय कारण की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है और ऐसी परिस्थिति में लोकतंत्र पोषित होता है। ऐसा लोकतंत्र राष्ट्र उन्नति तथा विश्व शांति का द्योतक बनता है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः
अर्थात:
सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

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