Wednesday, November 30, 2022
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अम्बेडकरवादियों का सच

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स्वतंत्रता आंदोलन के सभी नेताओं में बाबासाहेब भीमराव आंबेदकर का व्यक्तित्व वर्तमान राजनितिक परिदृष्य में सबसे ज्यादा महत्वपुर्ण है। भारत के इतिहास में सैकड़ों विचारक और दार्शनिक भरे पड़े हैं सभी महापुरुषों ने तमाम तरह के दर्शन और विचार पेश किए लेकिन बाबासाहब के अलावे सबों ने किसी एक विचारधारा को अंतिम सत्य मान कर उसके पक्ष में तर्क दिए और उसी को सर्वोत्तम साबित करने का प्रयास किया। मगर डॉ. भीमराव आंबेदकर एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होने समाज में, सियासत में, धर्म में, और आर्थिक नीति को लेकर प्रचलित हर तरह के विचारधारा और मान्यता का गहराई से अध्य्यन करते हुए स्वंच्छंद रूप से बिना पुर्वाग्रह के उन सब पर अपना विचार प्रकट किया। उनके विचारों का अध्य्यन करने से पता चलता है कि उन्होने कभी भी किसी विचारधारा को सर्वोत्तम नहीं माना और ना ही किसी की अंध आलोचना की।

दलितों और अछूतों के उत्थान के लिए बाबासाहेब के संघर्ष और प्रयास के वजह से देश भर के अतिपिछड़ी जातियों के लोग आज भी उनको अपना उद्धारक मानते है। और इसी वजह से वर्तमान में सारे राजनीतिक दल और नेता खुद को सबसे बड़ा आंबेदकरवादी साबित कर दलितों का वोट पाने का प्रयास करते हैं। लेकिन जब डॉ. आंबेदकर के विचारों पर चलने की बात आती है तो सभी दल उनके विचारों से कोसों दूर नजर आते है। भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी दलों को तो पहले हीं आंबेकर विरोधी और मनुवादी कहा जाता रहा है लेकिन अभी के सारे वामपंथी दल और देश में दलितों का सबसे बड़ा चेहरा बसपा प्रमुख मायावती जैसे लोग जो की हर मंच से आंबेदकर के नाम का माला जपती रहती हैं, इन लोगों ने बाबासाहेब के सिद्धांतों को कितना अंगीकार किया है? बाबासाहेब व्यक्तिपूजा को बड़े सख्ती से निषेध मानते थे। मायावती ने पार्टी और सरकार में रहते हुए जिस तरह से व्यक्ति पूजा के परंपरा को मजबूत किया वह बाबासाहेब के सिद्धांतों के बिलकुल विपरीत था। ऐसे में ये लोग कैसे खुद को आंबेदकरवादी कह सकते हैं?

आज देश के तमाम वामपंथी दल हर जगह आंबेदकर भक्ति का प्रदर्शन करते रहते है। उनकी भक्ति देख कर उनकी निष्ठा पर संशय पैदा होता है क्योंकि आमतौर पर वामपंथी बड़े जहीन अध्य्यन के माने जाते हैं। ऐसे में इन लोगों ने साम्यवाद संबंधी डॉ. आंबेदकर के विचारों को नहीं पढा होगा इसकी बहुत कम हीं गुंजाइश है। बाबासाहेब के राजनीतिक चिंतन में साम्यवाद के आलोचना की प्रचूरता है। साम्यवाद के प्रति बाबासाहेब दृष्टिकोण को उनके इस बयान से समझा जा सकता है- ”मेरा कम्युनिस्टों से संबंध रखना बिलकुल भी संभव नहीं हैं, मैं कम्युनिस्टों का कट्टर दुश्मन हुं।“ उन्होने कम्युनिस्टों द्वारा चलाए जा रहे मजदूर आंदोलन के बारे में कहा कि मजदूरों को कम्युनिस्टों के सही सिद्धांत नहीं मालूम हैं और उन्हे ये सिद्धांत पता चल जाएंगे तो कभी भी वो साम्यवाद का समर्थन नहीं करेंगे। अपने भाषणों और लेखों के माध्यम से बाबासाहेब ने अपने अनुयाइयों को कम्युनिस्टों से हमेशा दूर रहने के लिए अगाह करते रहे। देश के स्वतंत्र होने और संविधान बन जाने के बाद बाबासाहेब आजाद भारत के भविष्य को लेकर सशंकित थे, भारत में साम्यवाद का बढता प्रभाव इसके मुख्य कारणों में से एक था। इन सब के अलावा साम्यवाद के आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक अवधारणा से ना सिर्फ उनकी असहमति थी, बल्कि वो इसके कट्टर आलेचक भी थे। इन सब के बावजूद भारत के वामपंथी आंबेदकर-आंबेदकर की रट लगाते है तो यह उनके पाखंड को हीं प्रदर्शित करता है।

लोगों के दिमाग में कथित बुद्धिजीवयों के द्वारा यह स्थापित कर दिया गया है कि वो धर्म को एकदम गैरजरूरी मानते थे। यह सरासर झूठ है, बाबासाहेब का मार्क्सवादियों से असहमति का एक प्रमुख विषय ‘धर्म’ भी था। मार्क्सवाद जहां धर्म को एकदम अनावश्यक मानता है वही डॉ. आंबेदकर ने मानव जीवन के लिए धर्म को नितांत अनिवार्य तत्व बताया है। उनका स्पष्ट मानना था कि मार्क्सवाद हमारे पेट भरने में सहायक हो सकता है लेकिन जीवन को एक मनुष्य के रूप सुसंस्कारित करने के लिए धर्म बहुत ही जरूरी है। साथ ही यह भी खूब प्रचारित किया गया कि बाबासाहेब कट्टर हिंदू-विरोधी थे। बाबासाहेब हिंदू धर्म की की कड़ी आलोचना की ये बात सच है मगर उनकी आलोचना वर्णाश्रम व्यववस्था को लेकर थी और अधिकांश रूप से उसी पर केंद्रित रहा। उन्होने हिंदू-धर्म के प्राचीन ग्रंथों का गहन अध्य्यन किया था। उसमें उनको जो बुराई नजर आयी उसका उन्होने खुलकर आलोचना तो किया हीं लेकिन जो बाते उनको अच्छी लगी तो उसका उन्होने ना सिर्फ तारीफ किया बल्कि अपने सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन उससे प्रेरणा लेने से कभी नही हिचके। उनके लेख और भाषणों में कई ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं, जब उन्होने रामायण, महाभारत और अन्य पौराणिक कथाओं के पात्रों और प्रसंगों से खुद और अपने अनुयायियों को प्रेरित किया। हिंदू धर्म के बारे में अपना विचार व्यक्त करते हुए 3 अप्रैल 1927 के बहिष्कृत भारत में वो लिखते है कि- “हिंदू-धर्म का सिद्धांत ईसाई और महमदी धर्म के सिद्धांत की तूलना में कई गुणा समता के विचार का पोषक है।

सभी मानव ईश्वर की संतान है इतने पर हीं ना रुकते हुए, सभी मनुष्य ईश्वर के ही रूप हैं, इस तरह की सिद्धांत की स्थापना हिंदू-धर्म बड़े हीं हिम्मत के साथ करता है। जहां सभी ईश्वर के ही रूप हो वहां ऊंचनीच का भेदभाव करना असंभव है यही हिंदू धर्म का मूल सिद्धांत है। इस बात को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता कि समानता का सम्राज्य स्थापित करने में हिंदू-धर्म से बढकर कोई आधार मिलना मुश्किल है।“ बाबासाहेब के इन विचारों से हिंदू-विरोधी या धर्म-विरोधी की उनकी जो छवि गढ़ी गई वो धाराशाही हो जाता है। वर्तमान समय में जितने भी स्वघोषित आंबेदकरवादी हैं, उन्होने या तो डॉ. आंबेदकर को पढ़ा नहीं अथवा पढ़ने के बाद भी अपनी सियासत को सूट करने वाली सामग्री चयनित करके सिर्फ उसका प्रचार करते रहे।

मैंने शुरू में ही कहा कि बाबासाहेब के विचारों का किसी भी तरह से सिमांकन नहीं किया जा सकता। नेता होते हुए भी उनके दर्शन कभी भी उनके राजनीति से प्रभावित नहीं हुए। क्योंकि वो एक सच्चे यथार्थवादी थे, अपने गहन शोध और अध्य्यन से जो कुछ अन्वेषित किया उसको सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने से कभी नहीं हिचके। बाबासाहेब का यही यथार्थवाद वर्तमान समय में किसी भी राजनीतिक दल के खांचे फिट नहीं बैठता। आंबेदकरवाद का पुर्ण अनुकरण किसी दल या नेता के बस की बात नहीं हैं। आंबेदकरवाद के पुर्ण अनुकरण का मतलब है पॉलिटिकली-इंकरेक्ट होना जो किसी को मंजूर नहीं।

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