एक हिंदू की हिंदूइज़म में घर वापसी

#CAA और #CAB के मंथन से दो महत्वपूर्ण पदार्थ निकल चुके हैं। सनातन परंपरा में पुनः स्थापित होने वाला विश्वास और दूसरे वो जमात जो औरतों को आगे खड़े कर उनकी ओट में राजनीति कर रही है। आज आम भारतीय उद्वेलित है, कुछ इसलिए कि उनको उचित मार्गदर्शन नहीं दिया जा रहा है और बाकी इसलिए कि सब कुछ साफ साफ वर्णित होने के बावजूद भी हंगामे पर क्यों उतारू हैं कुछ लोग। देश की विघटनकारी शक्तियां इस बार पूरे जोर से और राजनीतिक सहयोग के साथ उतरी हैं। पर वर्ग विशेष को भड़काती इन शक्तियों से एक नए वर्ग का उदय हो रहा है। वो दूर हुआ, भूला, भ्रमित उदारवादी हिंदू वापस सनातन परंपरा में वापस आ रहा है। कुछ विचार प्रस्तुत हैं।

मेरा जन्म ऐसे गाँव में हुआ जहाँ न बिजली थी न सड़क। गाँव का जीवन एक किलोमीटर के दायरे में सीमित था, हफ्ते में एक दिन लगभग ढाई किलोमीटर दूर बाजार जाना हो जाता। एक हमारे कुल देवता का छोटा सा मंदिर था, साल में कुछ अवसर पर पांच किलोमीटर दूर गणनाथ जी के मंदिर में आयोजित कार्यक्रमों में जाते थे यह सारी दूरी पैदल ही तय होती। भूत और बाघ से बहुत डर लगता था, हर अनजानी आवाज भूत की लगती और बाघ तो अक्सर दिखता था घरों में पलने वाले कुत्तों को उठा ले जाता।

शाम को घर के सब पुरूष व बच्चे साथ बैठते और लालटेन की रौशनी में जोर जोर से “ओम जय जगदीश हरे” की आरती गाते बाद में दादाजी “शांताकारम भुजगशयनं” का मंत्र बोलते थे। तब तक महिलाएं रात का खाना तैयार कर लेती और लगभग सात बजे तक खाना खाकर आठ बजे तक सो जाते थे।

पौराणिक कहानियां सुनकर भविष्य में कुछ कर गुजरने के विचार और कामना करते।

कुछ साल बाद गाँव से निकले और सरसावा कस्बे में पहुंचे। सात वर्ष की मेरी उम्र होगी, एक शाम को पिताजी का हाथ पकड़े किसी धूल भरी गली से गुजर रहा था, अचानक कान में अजान की आवाज पड़ी, तब लाउडस्पीकर नहीं होते थे। नजर घुमाई तो नीली लुंगी, मटमैला सफेद कुर्ता और सिर पर गोल टोपी पहने एक आदमी अपने कानों में अंगुली डाले दिखा। मैंने पिताजी से पूछा तो उन्होंने कहा कि यह मुसलमानों का पूजा करने का तरीका है। अगला प्रश्न था मुसलमान कौन होते हैं? उत्तर आया मुसलमान चांद की पूजा करते हैं। यह तो नई बात पता चली, अब तो घर आए हर आदमी से मैं पूछता कि आप मुसलमान हो क्या? हमारा दूधवाला मुसलमान निकला, नाम मेहंदी।

मैं: आप किसकी पूजा करते हो?
मेहंदी: हम अल्ला की पूजा करते हैं।

मैंने कहा आपको पता है कि आदमी चांद पर जा चुका है? यह सुन कर उसको बहुत आश्चर्य हुआ और बहुत ही भोलेपन से मेहंदी ने कहा “फिर तो वो अल्ला से भी मिले होंगे”।

यह था करीब चालीस साल पहले का “धार्मिक भोलापन”।

उस समय गाँव कस्बे के लोग लगभग एक समान वेशभूषा ही रखते थे, मुसलमानों में भी धार्मिक पहचान जैसे दाढ़ी, गोल टोपी इत्यादि पर ज्यादा जोर नहीं था। हम महाशिवरात्रि पर शिवालयों जाते तो किसी बृहस्पतिवार पीर बाबा की मजार पर मत्था टेकते, कभी गुगाल पीर की मस्जिद में मेला देखने जाते थे तो साथ ही स्थित गुरुद्वारे के लंगर में सेवा भी कर आते।

स्कूल में किसी ने बाइबल फाउंडेशन का पर्चा दिया, उसमें संलग्न फाॅर्म में नाम व स्कूल का पता लिख कर पोस्ट कर दिया कोई टिकट भी नहीं लगाना था। कुछ दिनों में बड़े बड़े लिफाफे आने लगे, सहपाठियों के कुतूहल के बीच मैंने बड़ी शान से पहला लिफ़ाफ़ा खोला उसमें बाइबल थी, साथ में प्रश्न पत्र और वापसी लिफ़ाफ़ा। बाइबल पढ़ कर प्रश्नों का उत्तर भेजना था, ऐसे करते हुए एक साल बाद बाइबल का डिप्लोमा मिल गया। इस प्रकार एक साल इसाई धर्म का अध्ययन हो गया।

1990 तक आते आते हम बड़ी कक्षा में आ चुके थे। उस वर्ष सहारनपुर में जबरदस्त हिंदू-मुस्लिम दंगा हुआ, कस्बे में सुंदर सा मजबूत सफेद-काला सांड था, हम बचपन से उसे देखते आ रहे थे, हमें बताया गया था कि यह भगवान शिव को समर्पित कर दिया गया है, कस्बे के लोग उसे खाना घास देते रहते थे। एक दिन स्कूल जाते देखा तो बीच सड़क पर शिव मंदिर के नजदीक सांड मृत पड़ा था। किसी की भी साजिश रही हो पर दंगे हमारी तरफ नहीं फैले।

राम मंदिर आंदोलन आरंभ हो चुका था साथ ही मंडल कमीशन का पिटारा भी खुला। एक दिन कस्बे के छोटे से मैदान में चूने से कुछ लोग रेखा बना रहे थे, कारण पूछा तो किसी ने कहा मुलायम सिंह यादव का भाषण है, मेरे मन में आया कि बड़ा अजीब सा नाम है, पता नहीं कौन है, और मैं आगे बढ़ चला।

समाज हिलोरें ले रहा था, लालू-मुलायम-काशीराम राजनीतिक ठेकेदार बनकर अपने वोट बैंक कायम करने लगे। लोग अब यादव, जाटव, दलित बन रहे थे, टीवी पर इमाम बुखारी अक्सर आने लगे और मुसलमानों को पार्टी विशेष को वोट देने के फतवे जारी करते। “भोलेपन” का दौर खत्म हो रहा था।

इस सामाजिक-राजनीतिक हलचल का मुझ पर प्रभाव पड़ने ही लगा था परंतु नियति को और ही मंजूर था। कुछ महीनों बाद राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में चयन हो गया और उठते उन्माद पर फौज का रंग चढ़ गया, मैं पुनः “धार्मिक भोलेपन” की स्थिति में आ गया।

धर्म से दूरी बढ़ने लगी, अब सनातन परंपरा रूढ़िवादी लगने लगी। कुमाऊँ में परंपरा है कि घर से कहीं दूर जाते समय माथे पर लाल टीका लगाया जाता है। छुट्टी पूरी होने पर वापस जाते हुए इजा (मां) थाली में कुमकुम घोल कर लाती तो चिढ़ सी मच जाती थी, कहता कि छोटा सा टीका लगाना जो दिखे नहीं। आज कई हिंदू अपनी ही धार्मिक मान्यताओं को भला बुरा कहते घूम रहे हैं, वो सब शायद जीवन की इसी परिस्थिति से गुजर रहे हैं।

बंबई में 26/11 हुआ, कांग्रेस सरकार थी। भारत के इतिहास में बहुत बड़ी घटना होने के बावजूद तत्कालीन सरकार उदासीन रही और बड़े ही रहस्यमय ढंग से कांग्रेस के नेताओं ने हिंदू आतंकवाद की कहानियाँ गढ़नी शुरू कर दी। मीडिया भी षडयंत्र में सहयोग करते हुए इन कहानियों को प्रमुखता से प्रसार करता रहा। हिंदुओं को आत्मग्लानी से भरने की भरपूर कोशिश होने लगी, कांग्रेसी नेताओं से मिले तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग ने भारतीय परंपराओं को नीचा दिखाने का कुत्सित एजेंडा चला दिया। राम काल्पनिक हैं, राम सेतु तोड़ने जैसी बातें होने लगी। तब से यह षड्यंत्र लगातार ही चल रहा है, हाल ही में #Ashamed to be Hindu# जैसे बैनर उठाए कुछ हस्तियां भी इसमें शामिल हैं। इस पूरे ecosystem को न देश से ना मान्यताओं से कोई सरोकार है, बस सत्ता प्राप्ति ही एकमात्र उद्देश्य है।

बचपन से हम संस्कृत के मंत्रों में भारतवर्ष का उल्लेख सुनते आ रहे हैं। हिंदुओं के लिए भारतवर्ष अंग्रेजों द्वारा खींची हुई रेखाओं से परिभाषित नहीं होता है। सनातन धर्म एक व्यापक परंपरा है जिसकी सोच देश की सीमाओं तक सीमित नहीं की जा सकती है। शायद यही कारण है कि भारतवर्ष में हर विचार को जगह मिल पाई। पारसी धर्म खत्म ही हो जाता अगर उनके धर्मगुरू को भारत में शरण न मिली होती। हैदराबाद में स्थित ईरानी बाबा मौला अली की दरगाह सनातन धर्म की विराट भावना का प्रतीक है, ऐसे अनेक उदाहरण हिंदुस्तान के हर कोने में मिल जाते हैं। बौद्ध, जैन, सिख धर्मं भारत में ही स्थापित हो सके।

किताबिया धर्मों में जहां उन्माद या जेहाद का भाव है वहीं सनातन धर्म में मातृभूमि के प्रति समर्पण व प्रेम समाहित है, शायद यही कारण रहा होगा कि सनातन संस्कृति एक विशिष्ट भूभाग तक सीमित रही, दूसरी ओर किताबिये मातृभूमि से दूर जाकर अभी भी अपना प्रसार करते हैं।

हिंदुस्तान शायद इकलौता देश होगा जहां धार्मिकता पर राजनीति हावी रहती है।समाज का वर्गीकरण एक प्रकार की ठेकेदारी हो गई है, धर्मगुरूओं की बजाय नेतागण विभिन्न वर्गों के मसीहा बनने की जुगत बिठाते रहते हैं। गरीबों का, पिछड़ों का, मुसलमानों का मसीहा बनने की होड़ लगी हुई है। नेताओं की इस अंध दौड़ से वो सब एक मंच पर आ रहे हैं जो अब तक जिंदगी की दौड़ में ही रमे थे और धर्म जाति से बेफिक्र रहे।

2014 में मोदी सरकार आई। इन्होंने मोदी को कच्ची मिट्टी समझा था, परोक्ष रूप से सरकार चलाने वालों की चलनी बंद हो गई। ज्यों ज्यों तिलमिलाहट बढ़ी इन प्रजातियों ने देश विरोधी रूख अपना लिया, उनकी कुत्सित मानसिकता ने यह मान लिया कि हिंदुओं ने मोदी को वोट देकर उनको सत्ता से बेदखल कर दिया। यह खीझ इतनी बढ़ रही है कि इन्होंने मोदी सरकार को चिढ़ाने के लिए सनातन संस्कृति का ही अपमान आरंभ कर दिया। पर इसका प्रभाव उल्टा पड़ गया, 2019 में मोदी सरकार का बहुमत और बढ़ गया।

2020 आते आते यह खीझ और गुस्सा बिमारी का रूप ले चुकी है। विशेषकर मोदी 2.0 के पहले छः महीने में जो ताबड़तोड़ समाज सुधारक कानून बने हैं इनकी सोच से भी परे हैं। देशवासियों की आंखें भी खुल रही हैं, पर नेता भटक गया है। CAA/NRC कानून पर जो घटिया राजनीति चल रही है, मुसलमानों को बरगलाया जा रहा है।

दंगा-फसाद व तोड़ फोड़ से एक मुहिम आरंभ हुई, बदनामी हुई तो हाथों में तिरंगा पकड़ लिया, मुद्दे के आभाव में जब कुछ हासिल नहीं हुआ तो महिलाओं को आगे खड़ा कर दिया है।

मोदी सरकार पर निशाना लगाने के लिए सनातन संस्कृति के प्रतीक स्वास्तिक व अन्य चिन्हों पर चोट करने की कोशिशों में एजेंडा सनातन परंपराओं पर प्रहार का बन गया है। इसको विफल करना मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ। अपनी संस्कृति पर मुझे गर्व है।

वसुधैव कुटुंबकम में मेरा पूरा विश्वास है पर घर में नियम कायम रखना मेरी जिम्मेदारी भी है और इसके लिए reconcilitary या pacify approach नहीं होगी।

I’m now an unapologetic Hindu again.

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