Tuesday, April 7, 2020
Home Hindi सामाजिक भेदभाव: कारण और निवारण

सामाजिक भेदभाव: कारण और निवारण

Also Read

anantpurohit
Self from a small village Khatkhati of Chhattisgarh. I have completed my Graduation in Mechanical Engineering from GEC, Bilaspur. Now, I am working as a General Manager in a Power Plant. I have much interested in spirituality and religious activity. Reading and writing are my hobbies apart from playing chess. From past 2 years I am doing research on "Science in Hindu Scriptures".

आज वर्तमान भारत की अनेक समस्याओं मे से एक समस्या है सामाजिक भेदभाव। विगत कई वर्षों से सामाजिक भेदभाव और इसके निराकरण के लिए अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं या समाजसेवियों ने प्रयास किया। कुछ आंशिक सफलता के अलावा किसी को भी सामाजिक भेदभाव समाप्त करने में उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली और यह आज भी समाज में व्याप्त है।

सामाजिक समानता की दिशा में सर्वाधिक उल्लेखनीय कार्य और महत्वपूर्ण कदम उठाया बाबा साहेब अंबेडकर ने। बाबा साहेब ने भारतीय संविधान के माध्यम से सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया। बाबा साहेब ने भेदभाव को मिटाने के लिए दो महत्वपूर्ण पहलुओं को ध्यान में रखा: सामाजिक असामानता और आर्थिक असमानता। सामाजिक असमानता को मिटाने के लिए संविधान में अस्पृश्यता उन्मूलन कानून की व्यवस्था की गई और आर्थिक असमानता को समाप्त करने हेतु अस्थाई आरक्षण की व्यवस्था।

भारत में व्याप्त सामाजिक असामानता केवल एक वर्ग विशेष के साथ जिसे कि दलित कहा जाता है के साथ ही व्यापक रूप से प्रभावी है परंतु आर्थिक असमानता को केवल दलितों में ही व्याप्त नहीं माना जा सकता। बाबा साहेब सहित अन्य सभी समाजसेवियों ने इस असमानता की खाई को पाटने के लिए अपने अपने तरीके से प्रयास किया और उन सभी के प्रयासों में वर्ण व्यवस्था का विरोध समान रूप से मौजूद था।

- article continues after ad - - article resumes -

आज भी जितने समाजसेवी हैं या तथाकथित दलित हितैषी राजनीतिक दल हैं सभी एक सुर से वर्ण व्यवस्था का विरोध करते हैं। उनकी सोच यह है कि वर्ण व्यवस्था ही सामाजिक असामानता का जनक है।

क्या वास्तव में वर्ण व्यवस्था ही सामाजिक असामानता की जड़ है? यदि ऐसा है तो वर्ण व्यवस्था को जड़ से मिटा देना चाहिए। पर यहाँ एक दूसरे पहलू पर भी सोचना अतिआवश्यक है। एक रुग्ण व्यक्ति को ठीक करने के लिए चिकित्सक भी एक ही औषधि बार बार नहीं देता यदि औषधि के परिणाम संतोषजनक न हों तो। पर भारतीय समाज के चिकित्सक रुपी समाजसेवी इस रुग्ण समाज को ठीक करने के लिए एंटी-वर्ण व्यवस्था की ही खुराक दिए जा रहे हैं भले ही इस दवा का कोई लाभ होता न दिख रहा हो।

अपने इंजीनियरिंग के दस वर्षों से अधिक कार्यकाल में मैंने अनुभव किया कि समस्या जहाँ से उत्पन्न हुई उसका समाधान वहीं छुपा मिलता है। अपनी कार्यक्षेत्र में किसी भी समस्या का निराकरण मैंने इन चरणों का पालन करते हुए पाया है:
1. समस्या के लक्षण जानना
2. वास्तविक समस्या को पहचानना
3. संभावित निदान की सूची तैयार करना
4. सूचीबद्ध निदानों में से एक-एक कर आजमाना

अधिकांशतः समस्या और समस्या के लक्षण में व्यक्ति भ्रमित हो जाता है और कई बार लक्षणों को समस्या मान बैठता है। यदि आपने लक्षण को समस्या मान बैठे तो यकीनन आप समस्या के भँवरजाल में उलझ गए। अब समस्या का निदान संभव नहीं है। लक्षण को समस्या समझने पर आप केवल मरम्मत कर सकते हैं, समस्या जस का तस रहेगा और अपना लक्षण पुनः प्रकट करेगा। ऐसी अवांछनीय स्थिति से बचने के लिए असली समस्या को पहचान कर ठीक करना आवश्यक है। साधारण से उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं – यदि मोटर का शाफ्ट टूट रहा है तो शाफ्ट टूटना समस्या नहीं है, यह लक्षण है। यदि शाफ्ट टूटने को समस्या मान लिया गया तो इसको या तो बदल दिया जाएगा या मरम्मत कर लगा दिया जाएगा। निश्चित रुप से यह शाफ्ट दोबारा टूटेगा। असली समस्या है संरेखण (Alignment अलाइनमेंट)। अलाइनमेंट जब तक ठीक नहीं किया जाएगा तब तक शाफ्ट टूटता रहेगा। और आसान शब्दों में समझने का प्रयास करते हैं- सिर दर्द समस्या नहीं है, यह लक्षण है। केवल सिर दर्द की औषधि आपको क्षणिक राहत दे सकता है पर स्थाई समाधान नहीं। सिर दर्द का लक्षण किस समस्या से आया यह जानना अति महत्वपूर्ण है तभी स्थाई समाधान मिलेगा।

स्वतंत्रता के बाद और पहले से भी अनेक समाजसेवियों ने अस्पृश्यता को खत्म करने के लिए आंदोलन किया। आंदोलन का मुख्य निशाना वर्ण व्यवस्था रहा। पर आज भी यदि इह समस्या की पुनरावृत्ति हो रही है तो कहीं हम लक्षण को समस्या मानने की भूल तो नहीं कर रहे हैं!

मेरा मानना छुआ-छूत लक्षण है और समस्या कहीं और छुपा हुआ है।

एकबारगी मैं अपने से पूर्व हुए विचारकों की बात को सही मान लेता हूँ कि वर्ण व्यवस्था ही छुआ-छूत की जड़ है तब शूद्र वर्ण में सभी के साथ छुआ-छूत होता। परंतु ऐसा नहीं है। स्पष्ट है कि वर्ण व्यवस्था का छुआ-छूत से कोई लेना देना नहीं है। जब तक लक्षण को समस्या मान समाधान खोजा जाएगा तब तक समस्या का हल मिलेगा नहीं।

तब फिर इसका समाधान क्या है? छुआ-छूत किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। तब कैसे होगा समाधान? समाधान वहीं मिलेगा जहाँ से इसकी उत्पत्ति माना जा रहा है। हमें अपने ग्रंथों को गहराई से पढ़ना पड़ेगा और समझना पड़ेगा कि वास्तविक वर्ण व्यवस्था क्या है? वर्ण को जाति शब्द का पर्यायवाची समझना बहुत बड़ी गलती है। वर्ण व्यवस्था के बारे में मैंने अपने लेख ‘वर्ण व्यवस्था और इसके संबंध में फैली भ्रांतियाँ’ में विस्तार से इसे बताया है।

इसके अलावा इस श्लोक से समझने का प्रयास करते हैं:

जन्मना जायते शूद्रः, संस्कारात् भवेत् द्विजः |
वेद-पाठात् भवेत् विप्रः, ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः |

जन्म से सभी शूद्र होते हैं, संस्कारित होकर द्विज बनते हैं, वेद पाठ कर विप्र बनते हैं और ब्रह्म को जानकर ब्राह्मण बनते हैं।

यह श्लोक स्पष्ट कर देता है कि कोई भी जन्म से ब्राह्मण नहीं है। ब्राह्मण होना एक गुण है जिसे पुरुषार्थ से अर्जित करना पड़ता है। जिन ग्रंथों में इतनी सुन्दर बात कही गई हो वह किसी के साथ भेदभाव कर ही नहीं सकता। जाहिर है कि इन्हें समझने में कहीं न कहीं चूक हो रही है। समझने में हुई चूक को इस श्लोक से समझते हैं:

पृथिव्यां यानी तीर्थानि तानी तीर्थानि सागरे ।
सागरे सर्वतीर्थानि पादे विप्रस्य दक्षिणे ।।

इसका जो अर्थ लिखा जाता है- पृथ्वी में जितने भी तीर्थ हैं सब सागर में भी हैं। और सागर के सभी तीर्थ ब्राह्मण के दक्षिण पैर में हैं। यह अर्थ सिरे से गलत है, सरासर गलत।

इसका सही अर्थ ऐसा है- पृथ्वी में जितने भी तीर्थ हैं सब सागर में भी हैं और सागर के सभी तीर्थ विप्र के दक्षिण में कदम रखने में हैं अर्थात विप्र की सरलता में हैं। अर्थात जब आप सरल हो जाते हैं तब सारे तीर्थ मिल जाते हैं।

दक्षिण शब्द के दो अर्थ हैं दक्षिण दिशा और दूसरा अर्थ है सरलता। इस बात की पुष्टि संस्कृत शब्दकोश से किया जा सकता है। इसका दूसरा प्रमाण यह है कि दक्षिण शब्द का सप्तमी एक वचन रुप ‘दक्षिणे’ का प्रयोग किया गया है – पादे विप्रस्य दक्षिणे। दक्षिणे का अर्थ है दक्षिण में अर्थात सरलता में। यदि इसका अर्थ वास्तव में दाएँ पैर में होता तो कर्मधारय समास का प्रयोग कर ‘दक्षिणपादे’ शब्द का प्रयोग होता न कि ‘दक्षिणे पादे’। इसके अलावा पूर्ववर्ती श्लोक में हमने देखा विप्र और ब्राह्मण दो अलग अलग अवस्था है, विप्र का अर्थ ब्राह्मण कदापि नहीं है। संस्कारित होकर द्विज बनते हैं और वेद पढ़कर विप्र बनते हैं, ब्रह्म को जानकर ब्राह्मण बनते हैं।

अब जब दोनों श्लोकों को हम एक साथ विश्लेषण करते हैं तो इसका वास्तविक अर्थ कुछ इस तरह स्पष्ट होता है – वेद पढ़कर जो ज्ञानी है वह विप्र है परंतु ज्ञानी होकर वह सरल न होकर अहंकारी हो जाता है तो वह ब्राह्मण नहीं हो सकता। ज्ञानी जब अपने कदम सरलता की ओर उठाता है तब वह ब्रह्म को जान सकता है और ब्राह्मण बनता है। यही इसका वास्तविक और सही अर्थ है।

इन सबसे स्पष्ट है कि वर्ण व्यवस्था कभी भी जन्म आधारित नहीं था यह गुणों पर आधारित कर्म विभाजन पर आधारित था। और जब यह व्यवस्था अपने वास्तविक अर्थों के साथ लागू होगा तब न केवल छुआ-छूत की समस्या का समाधान होगा वरन बेरोजगारी जैसी समस्या का भी समाधान मिलेगा। वर्ण व्यवस्था कैसे बेरोजगारी की समस्या का समाधान कर सकता है इसकी चर्चा मैं अपने अगले पोस्ट में करूँगा। फिलहाल मैं अपनी लेखनी को विराम देता हूँ।

- Support OpIndia -
Support OpIndia by making a monetary contribution
anantpurohit
Self from a small village Khatkhati of Chhattisgarh. I have completed my Graduation in Mechanical Engineering from GEC, Bilaspur. Now, I am working as a General Manager in a Power Plant. I have much interested in spirituality and religious activity. Reading and writing are my hobbies apart from playing chess. From past 2 years I am doing research on "Science in Hindu Scriptures".

Latest News

Ducking the COVID-19

Voluntary compliance, which is a practical philosophy, would decide whether India would duck the COVID-19 trends.

Exemplary leadership during a phase of crisis: Dr. Himanta Biswa Sarma

At a time when people are losing their hopes and are weakening in this battle; Dr. Sarma brings the fighting zeal back into the people, thereby taking everyone together in this fight.

Short story|From secularism to Hinduism and humanity

Religious radicals are cancer cells of our society. If we don't call them out, they will continue to breed and will eventually kill us

A ludicrous attempt of defending the undefendable

Does the imbecile leftist intelligentsia know that it is just trying to Defend the Undefendable?

India’s left liberals, the perennial Muslim-appeasers, are once again up in arms against Arnab Goswami

His tough stand regarding the Tablighi Jamaat meet at Nizamuddin Markaz has therefore faced the ire of left-liberals and Islamists masqueraded as journalists alike.

Let us invoke the Dunkirk spirit and the god principle

Modi depresses liberals yet another time for 5th April event. And people with slap them with its grand success!

Recently Popular

Tabliqi Jamaat had all the information to cancel the Markaz: They didn’t

Lets have a look at events that happened prior to it, to get some perspective as to why the criticism of the Tabliqi Jamaat is completely justified and further action is necessary for their actions which are absolutely unforgivable.

An irresponsible state under the responsible state

Country's minority group must understand that majority group can not be only responsible for maintaining the communal harmony in a society.

India’s left liberals, the perennial Muslim-appeasers, are once again up in arms against Arnab Goswami

His tough stand regarding the Tablighi Jamaat meet at Nizamuddin Markaz has therefore faced the ire of left-liberals and Islamists masqueraded as journalists alike.

कोरोना की भयावहता और भारतीय कानून

भारत सरकार की जैविक प्रबंधन आपदा के 2008 रिपोर्ट में कहा गया की 1897 की महामारी कानून सक्षम नहीं है एवं इसे बदलने की जरुरत है. यह कानून केंद्र को जैविक आपातकाल के दौरान ज्यादा शक्ति प्रदान नही करता.

How Siddharth Varadarajan, editor of The Wire, defended heinous killers and slandered victims of the Godhra carnage

Siddharth Varadarajan implied in August 2004 that the post-Godhra riots would have happened even without Godhra!