Tuesday, May 26, 2020
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मोदी जी से ईर्ष्या की पत्र राजनीति

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Sandeep Uniyal
स्व-उद्यमी "एक भारत, एक परिवार" "एक भारत, सर्वश्रेष्ठ भारत"

मई 2014 को भारत के इतिहास में एक अध्याय जुड़ा। भारतीय जनता पार्टी की विजय ने राजनीति के समीकरण बदल दिए। एक चाय बेचने वाले ने अपने परिश्रम व लग्न से वर्षों से विभाजनकारी नीतियों के पर्याय बन चुके अपने विरोधी राजनीतिक दलों को हरा दिया। दो सांसदों से पूर्ण बहुमत की यात्रा को पूर्ण किया व इसे और आगे बढ़ाया। नरेंद्र मोदी जी ने साबित किया कि यदि इरादे अटल हो तो आप ऊंचाइयों को छू सकते हैं और भारतवासियों के लिए मोदी जी की विजय गौरव का विषय है।

एक गरीब परिवार में जन्मा व्यक्ति अपने परिश्रम व लग्न से राष्ट्र प्रमुख बन गया। ये प्रेरणादायक है व हर परिश्रम करने वाले नागरिक के लिए हर्ष का विषय है। किन्तु मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते ही अचानक एक बहुत ही भारी शब्द “असहिष्णुता” प्रचलित हुआ। अचानक से पूरे राष्ट्र में होने वाली घटनाओं को धर्म, जाति और न जाने कितने ही विभाजनकारी दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। एक ऐसा बुद्धिजीवी वर्ग जिनकी बुद्धि ऐसे उच्च शिखर तक पहुँच गयी कि अचानक पुरस्कार लौटाने की प्रथा प्रारम्भ हो गयी। मुख्य धारा का मीडिया चीखने चिल्लाने लगा। अचानक से इस देश के हिंदुओं को कठघरे में खड़ा करने की होड़ लग गयी। जांच के नतीजों की परवाह किये बिना बस किसी भी प्रकार से हिंदुओं को असहिष्णु घोषित किया जाए। इसके प्रयास किये जाने लगे। क्या कभी इन तथाकथित बुद्धिजीवियों ने सोचा है कि आम नागरिक पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है? आम नागरिक जो अपने सपनों को सच करने के लिए संघर्ष में जुटा रहता है। अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए दिन रात परिश्रम करता है। अचानक एक सुबह उसका सामना इतने बड़े भारी शब्द “असहिष्णुता” से हो जाता है।

जिसका सही से उच्चारण करना भी उसके लिए संघर्ष है और इस बार “लिंचिंग” शब्द से परिचय करवाया गया। राष्ट्र के कुछ प्रतिष्ठित व अर्बन नक्सल नागरिक राजनीतिक सम्बन्धों के चलते राष्ट्र को बौद्धिक विभाजन की ओर ले जाने का नीच कार्य कर रहे हैं। क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि राष्ट्र की अखंडता बनी रहे। हर घटना को विभाजन के तराजू में न तौले। स्वार्थ में अंधे ये नागरिक केवल एक वर्ग के लिए ही घड़याली आँसू बहाते है और उस वर्ग के विकास में इनका योगदान नगण्य है।

 

अभी हाल ही में 49 प्रतिष्ठित नागरिकों ने मोदी जी को पत्र लिखा। किन्तु ये पत्र तब क्यों नहीं लिखा गया जब बंगाल व केरल में राजनीति के लिए निर्मम हत्याएं हो रही थी। जब अपने ही राष्ट्र में हिन्दू शरणार्थी बन गए। जब गैर बीजेपी शासित राज्यों में लिंचिंग की घटनाएं होती है व जब किसी घटना में हिन्दू पीड़ित होते हैं। आख़िर घटनाओं पर तुष्टिकरण क्यों? क्यों स्वार्थ के तराजू पर तौला जाता है? या स्वार्थ ने इन्हें गिद्ध बना दिया जो घटनाओं की ताक में रहते हैं और स्वार्थ में नोचते हैं।

एक कारण ये भी नज़र आता है कि इन्हें एक सामान्य परिवार के नागरिक का राष्ट्र प्रमुख बनना पच नहीं रहा। एक गरीब परिवार का बेटा पूरे विश्व में ख्याति प्राप्त कर रहा है व विश्व नेता बनने की ओर अग्रसर है। जब भी मोदी जी सफलता के नए आयाम छूते हैं तो इनकी छाती पर सांप लोटने लगते हैं। उस छटपटाहट में ये अपना मानसिक नियन्त्रण खोते जा रहे हैं।सरकार को घेरने के लिए मुद्दे न मिल पाने के कारण नए नए शब्द ख़ोज रहे है व आम नागरिकों को भ्रमित करने का असफ़ल प्रयास कर रहे हैं। नागरिकों को जागरूक होना होगा।

ये तथाकथित बुद्धिजीवी ऐसी घटनाओं की प्रतीक्षा में रहते हैं जिससे ये राष्ट्र की छवि धूमिल कर सके। ये एक एजेंडे के तहत कार्य करते हैं। नागरिकों को अपने दायित्व को समझना होगा व आवेश में कानून का उल्लंघन करने से बचना होगा। मैं राष्ट्र के प्रतिष्ठित राष्ट्रवादी नागरिकों से अपेक्षा करूंगा कि इस पुण्य भारतभूमि के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करें व राष्ट्र में भय का वातावरण न बनने दे। आगे आकर नागरिकों में आपसी सामंजस्य व अखण्डता को सुदृढ़ करने का प्रयास करें। जिससे भ्रम की स्थिति फ़ैलाने वाले बौद्धिक आतंकवादियों को कड़ा उत्तर मिले।

 

आज 61 प्रतिष्ठित नागरिकों ने अपने दायित्व को निभाया व सार्वजनिक रूप से पत्र लिख नागरिकों को तथ्यों से अवगत कराया। ये अति सराहनीय कार्य है व सभी को राष्ट्र की छवि धूमिल करने के प्रयासों को विफ़ल करने में यथाशक्ति योगदान देना चाहिए।

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