Monday, April 6, 2020
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जाति है कि जाती नही

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AKASH
दर्शनशास्त्र स्नातक, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी परास्नातक, दिल्ली विश्वविद्यालय PhD, लखनऊ विश्वविद्यालय

हाल ही में फिल्म आर्टिकल 15 पर स्वरा भास्कर का एक लेख हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ, जिसमें वह कहती हैं,

जाति से अनभिज्ञ होना आधुनिक भारत में अपने आप में एक ऐसी सहूलियत है, जिसका लाभ सवर्ण ही ले सकते हैं।

फिल्म आर्टिकल 15 की बात करते-करते महोदया जाति व्यवस्था की उस सच्चाई को खोलने का प्रयास करने लग जाती हैं, जो उन्होंने कभी जी ही नहीं है। उन्होंने दिल्ली में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की और आज मुंबई में काम कर रही हैं। जो व्यक्ति दिल्ली-मुंबई से कभी बाहर गया ही नहीं, उसे क्या पता होगा कि गाँव के खेतों में धान कैसे लगते हैं या गाँव के किसी पुराने खंडहर में छुपते-छुपाते लोग ताश कैसे खेलते हैं। मुझे नहीं लगता कि उन्हें अपनी ज्ञान की पोटली दूसरे लोगों के सामने यह कहकर खोलनी चाहिए कि समाज ऐसा ही है।

जाति व्यवस्था से बाहर ही नहीं निकलना चाहते 

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बदायूं बलात्कार और हत्याकांड ऐसा केस था, जिसने निर्भया कांड के बाद एक बार फिर सबको दहला दिया था। उसके साथ सहानभूति रखने वाले सिर्फ एक जाति, पंथ से नहीं थे बल्कि वे लोग भी थे, जिन्हें उच्च बौद्धिक समाज, मार्क्स के कथनों में शोषणकर्ता कहता है अर्थात ब्राह्मण।

इस फिल्म के बहाने लोगों को अपनी भड़ास निकालने का मौका मिला गया। मेरे जैसे ब्राह्मण इसलिए भड़ास निकाल रहे हैं, क्योंकि मेरा मानना है कि हमारी गलत छवि पेश की जा रही है और शोषित वर्ग इसलिए नाराज़ है, क्योंकि इस फिल्म में एक नायक के तौर पर किसी ब्राह्मण को दिखाया गया है।

उनकी दलील है कि एक बार फिर उन्हें ब्राह्मण के रहमो-करम पर इंसाफ के लिए अपनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। दरअसल, समाज की समस्या ही यहीं से शुरू होती है कि हम अपनी जाति व्यवस्था में इतना रम चुके हैं कि उससे बाहर ही निकलना नहीं चाहते।

मेरी अपनी कोई बहन नहीं है लेकिन दिल्ली में एक बहन बनी जिसने मुझे राखी बांधी, वह बहन मुस्लिम थी। बीएचयू जिसे ऐसा मान लिया जाता है कि वह सिर्फ हिन्दुओं के पढ़ने की जगह है, वहां कोलकाता से आया हुआ एक मुस्लिम दोस्त मेरे साथ एक थाली में खाना खाता था। चाहे चर्च हो या गुरूद्वारा मुझे किसी भी धर्म को सम्मान देने में कभी हिचकिचाहट नहीं हुई। 

शोषण के बदले शोषण कहां तक उचित?

ऐसा नहीं है कि जाति व्यवस्था का दंश सिर्फ कुछ तबकों को झेलना पड़ता है।

मुझे याद है बीएचयू में एक टीचर ने क्लास के सभी ब्राह्मण लड़कों को इंटरनल में कम नंबर दिए थे। एक और प्रोफेसर थे, जिन्होंने मुझे फेसबुक पर ब्लॉक कर दिया, क्योंकि मैं उनके ब्राह्मण विरोधी शब्दों का विरोध कर देता था।

आज समाज के पढ़े-लिखे प्रोफेसर इस दंश को बढ़ावा दे रहे हैं, क्योंकि उनके पुरखे शायद उच्च वर्ग द्वारा शोषित हुए थे। उस शोषण का बदला आज उच्च वर्ग के लोगोंं से लेना कहां तक उचित है? इस तरह तो समाज में कभी समरसता आ ही नहीं सकती है, क्योंकि जिस तरह उनके मन में एक शोषित होने का दर्द है, वह अब उच्च वर्ग वाले के भी मन में है। हमें अपने पूर्वजों और कवियों को सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ना चाहिए कि उन्होंने इस पर लिखा है, उनको ग्रहण भी करना चाहिए। किसी ने कहा भी है,

बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेई

घृणा का भाव कभी समरस नहीं होने देगा

मैं यह नहीं कह रहा कि उच्च वर्ग ने कोई अत्याचार नहीं किया लेकिन जब तक हम उन पुरानी चीज़ों को ढ़ोएंगे, तब तक हमारे मन में घृणा का भाव रहेगा और ये घृणा का भाव हमें कभी समरस नहीं होने देगा।

वैसे बदायूं के केस में आरोपित और विक्टिम दोनों एक जाति के थे ना कि ब्राहमण। यह सिर्फ इसलिए बता रहा हूं कि कई लोग आर्टिकल 15 के ट्रेलर को देखने के बाद बदायूं केस के आरोपियों को ब्राह्मण समझ कर गलियां दे रहे हैं। मेरी नज़र में जाति की राजनीति करने वाले सभी नेता ब्राह्मणवाद विचारधारा से ग्रसित हैं, क्योंकि वह समाज में एकीकृत भाव का निर्माण होने ही नहीं देना चाहते। बाकि समझ अपनी-अपनी। गालियां बेशक देना लेकिन तर्क के साथ।

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AKASH
दर्शनशास्त्र स्नातक, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी परास्नातक, दिल्ली विश्वविद्यालय PhD, लखनऊ विश्वविद्यालय

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