चुनाव: जाति और धर्म का

उत्तर प्रदेश, बिहार या भारत देश के कई अन्य राज्य जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, मत मांगने को गलत नहीं मानते हैं।प्रत्याशी की जाति क्या है इसे देखकर टिकट का बटवारा भी किया जाता है। अगर किसी प्रत्यासी ने विकास के नाम पर, अपने कार्य के नाम पर वोट मांगने की जुर्रत दिखाई तो हो सकता है उसे मुँह की खानी पड़े। नितिन गडकरी जैसे नेता विरले ही पाए जाते हैं। वैसे कई पत्रकार भी अपनी पत्रकारिता की रोटी जाति और धर्म के तवे पर ही सेकते हैं, “कौन जात हो जी?” ये प्रश्न एक पुराने पत्रकार का तकियाकलाम है।

देश में ऐसी कई राजनितिक पार्टियां हैं जो केवल जाति विशेष या धर्म विशेष पर ही अपना ध्यान केंद्रित करती है और केवल उनको साध के ही आगे बढ़ना चाहती हैं। बसपा जैसी पार्टी का क्षेत्रीय पार्टी तक सीमित रह जाना इसका एक जीता जागता उदाहरण है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगना कहाँ तक जायज है, ये तो वोट मांगने वाली पार्टी या वोट करने वाले वोटर ही बता सकते हैं। ऐसा भी नहीं है की ये रोग केवल क्षत्रिय पार्टियों तक ही सीमित है बल्कि यह देश की दो प्रमुख पार्टियों में भी फ़ैल चूका है। वर्तमान की भाजपा सरकार अगर अपने कार्यों के दम पर वोट मांगने की हिम्मत भी करती है तो वापस से चुनाव के मुद्दों को घसीट के जाति, धर्म और मजहब के पाले में ले आया जाता है क्यूंकि विपक्ष अपनी उपलब्धियों को गिनाने में विफल है और लोगों के जहन से पुरानी सरकार द्वारा दिए हुए भ्रष्टाचार के जख्म अभी ताजे ही हैं।

जिस तरीके के प्रचार का माध्यम है, उससे लगता है की पार्टियां युवाओं को रिझाने में ज्यादा लगी हुई है। तेज तेज बोल वाले गाने जिसे अंग्रेजी में रैप कहा जाता है ज्यादा प्रचलन में है। सत्ताधारी पार्टी जहाँ एक ओर मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है वही दूसरी ओर विपक्ष राहुल गाँधी को विगत कितने सालों से युवा नेता के तौर पर स्थापित करने में विफल रही है। हालाँकि युवाओं को रिझाने में राहुल गाँधी से ज्यादा उम्रदराज नरेंद्र मोदी, अधिक सफल रहे हैं। उन्होंने इस बात को चरितार्थ किया है की उम्र से कोई युवा या प्रौढ़ नहीं होता अपने सोच विचार से होता है। वैसे राहुल गाँधी को युवा कहना न तो उम्र के लिहाज से ठीक है और न ही उनके कृत्यों से, देश शायद ही कभी यह भूले की देश की सबसे पुरानी पार्टी के मुखिया ने संसद भवन में बैठकर अपने आँखों को किस तरह मटकाया था। इस तरह की हरकत किसी भी समझदार सुलझे हुए व्यक्ति को शोभा नहीं देती और यह दर्शाता है की उनको अभी वक़्त लगेगा एक जिम्मेदार नेता बनने में।

गाँधी परिवार में पैदा होने के कारन ही उन्हें कांग्रेस पार्टी की जिम्मेदारी मिली है, नहीं तो शायद ही यह भी मुमकिन हो पाता।वैसे जिम्मेदारियां ली जाती हैं थोपी नहीं जाती और अगर आपके ऊपर किसी जिम्मेदारी को थोप दिया जाये तो आपकी दृढ़इच्छाशक्ति, आपका आत्मबल ही केवल आपको सफलता तक ले जा सकता है वरना असफल होने की समभावना ज्यादा है।

आज का युवा शिक्षा, नौकरी, सुरक्षा, भ्रष्टाचार, देश की प्रगति, देश के सम्मान के लिए अपना मत देना चाहता है न की जाती और धर्म के नाम पर, लेकिन फिर भी कई राजनितिक पार्टियां बार-बार वर्षों पुराना राग गा कर उसी धुन पर लोकतंत्र का नृत्य करवाना चाहती हैं। २०१४ के चुनाव में इन्ही सब मुद्दों पर युवाओं ने अपना मत दिया था,और भाजपा सरकार का आंकलन भी इन्ही मुद्दों को प्रत्यक्ष रख कर करना चाहिए। विपक्ष यह जनता है की इन मुद्दों पर सरकार ने संतोषजनक कार्य किया है इसलिए चुनाव में नए मुद्दे लाने की कोसिस की जा रही है। चाहे वह राफेल का मुद्दा हो या लोभ लालच के नाम पर गरीब लोगों को ‘न्याय’ जैसा लेमनचूस दे कर मत इकठ्ठा करने की रणनीति हो। ये सारे मुद्दे ऐसे हैं जो देश के मूल मुद्दों से भटके नजर आते हैं।

देश के हर मतदाता को यह सोचना चाइये की देश के लिए क्या जरुरी है और चुनाव के मुद्दे क्या होने चाहिए और अगर कोई भी राजनितिक पार्टी जाति, धर्म या मजहब के नाम पर मत मांगे तो उसे सिरे से ख़ारिज कर देना चाहिए, हो सकता है की चुनाव से इन मुद्दों को बहार निकाल फेकना संभव न हो लेकिन एक पहल तो जरुरी है।

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