अगर चीन सहयोग करता और मसूद अज़हर पर आतंकवादी होने की वैश्विक मोहर लग ही जाती तो क्या हासिल होता?

मसूद अज़हर के मुद्दे पर चीन के वीटो के चलते वैश्विक बिरादरी को निराशा हासिल हुई है और उसे “अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी” घोषित कराने की कोशिशें लगातार चौथी बार असफल हुई हैं। परन्तु मेरा मानना है कि भारत के हवाले से इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता था। इससे पहले कि इस नए घटनाक्रम का विश्लेषण हो, एक बार ये देखना ज़रूरी है कि अगर चीन सहयोग करता और मसूद अज़हर पर आतंकवादी होने की वैश्विक मोहर लग ही जाती तो क्या हासिल होता।

ध्यान दें कि 2008 में हाफ़िज़ सईद को संयुक्त राष्ट्र ने “वैश्विक आतंकवादी” घोषित कर दिया, इंटरपोल ने भी “रेड कार्नर नोटिस” जारी कर दिया, 2009 में अमरीका ने एक करोड़ डॉलर का इनाम घोषित कर दिया। क्या हुआ? हाफ़िज़ आज भी न सिर्फ खुलेआम पाकिस्तान में घूम रहा है बल्कि जिहादियों की दुनिया में आज वो ओसामा बिन लादेन के बाद सबसे बड़ा नाम हो गया। अपनी महफ़िल में बैठता होगा तो फिल्म शोले के गब्बर सिंह की तरह शान से पूछता होगा, “क्यों रे, कितना इनाम रखे है अमरीका हमरे ऊपर?”

“वैश्विक आतंकवादी” हाफ़िज़ सईद पिछले चुनावों तकरीबन तीन सौ सीटों पर अपनी पार्टी “अल्लाह-हू-अकबर तहरीक” के नाम से चुनाव भी लड़ा। और अब तो उसने लाहौर में पत्रकारिता सिखाने के लिए कॉलेज भी खोल दिया जहाँ पहली बात ये पढ़ाई जा रही है कि पत्रकारिता जेहाद का एक जरिया है। क्या बिगाड़ लिया यूनाइटेड नेशन्स लेकर अमरीका ने उसका। आखिर उसे एक पूरे मुल्क की पनाह हासिल है। लाहौर हाई कोर्ट ने उसके खिलाफ सभी आरोपों को ख़ारिज कर दिया।

उसके खिलाफ किसी भी कार्यवाही की बात होते ही पाकिस्तानी अवाम के एक बड़े हिस्से में नाराज़गी की एक लहर दौड़ जाती है। इसका कारण ये है कि हाफ़िज़ मदरसे भी चला रहा है जहाँ गरीब बच्चों को रख कर मुफ्त में खाना, कपडा और शिक्षा दी जाती है। अब ये बात दीगर है कि ये शिक्षा जिहाद की है, मरने-मारने की है, दुनिया में आग लगाने की है। परन्तु गरीबी और भुखमरी से जूझ रही पाकिस्तानी अवाम के इस हिस्से को फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनके बच्चों को क्या सिखाया जा रहा है।

और इन्हीं मदरसों से तैयार होती है एक कभी न ख़त्म होने वाली जिहादियों की कतार जो हाफ़िज़ के इशारे पर सर पे क़फ़न बाँध कर कश्मीर में कूद पड़ते हैं। जैसा कि पूर्व तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ ने अपने एक हालिया इंटरव्यू में कहा कि जिहादी फौज में भर्ती होने के लिए एक लम्बी प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) है। आप जितने मारेंगे, उससे ज़्यादा उनकी जगह लेने के लिए तैयार हैं।

अतः कल अगर अमरीका-ब्रिटेन- फ्रांस द्वारा प्रायोजित प्रस्ताव सफल हो जाता और मसूद अज़हर “वैश्विक आतंकवादी” करार हो ही जाता तो क्या बिगड़ जाता उसका। हाफ़िज़ सईद की तरह वो भी इस ठप्पे को गर्व से धारण करता और जेहादियों की नज़र में उसकी इज़्ज़त और बढ़ जाती। अमरीका को शैतान समझने वाले जिहादियों की दुनिया में इस तरह के ठप्पे मैडल की तरह पहने जाते हैं और इन आतंकवादियों की पकड़ को और मजबूत करते हैं। इन्हें ग्लैमर प्रदान करते हैं। ओसामा की मृत्यु के बाद दुनिया भर में न जाने कितने मुसलमानों ने अपने बच्चों का नाम “ओसामा” रख दिया।

तो जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि भारत के हवाले से ये एक सकारात्मक घटनाक्रम है। दुनिया न सिर्फ आज चीन-पकिस्तान गठजोड़ को नापाक मानने के लिए विवश है, बल्कि सबकी राय भारत के हक़ में है। और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर वैश्विक सहानुभूति का क्या असर होता है वो हमने अभी देखा जब भारत के हवाई हमले के बाद एक भी मुल्क ने उसकी निंदा नहीं की। यहाँ तक की इस्लामिक मुल्कों से लेकर चीन तक निष्पक्ष बने रहे।

पिछले सौ सालों में शायद यह पहला अवसर था कि किसी देश के दुसरे देश पर हवाई हमले को इतना अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हुआ हो। सीरिया में देखें, रूस के हर हमले पर पश्चिमी देशों की सख्त प्रतिक्रिया आती है, तो अमरीका और फ्रांस के हमलों पर रूस की धमकी। सऊदी अरब जब भी यमन पर बमबारी करता है तो अमरीका जैसा उसका मित्र राष्ट्र भी हमले की निंदा करता है। इजराइल की फिलिस्तीन पर कोई भी बमबारी संयुक्त राष्ट्र में निंदा प्रस्ताव से नहीं बच पाती। परन्तु हाल के बालाकोट हवाई हमलों पर तकरीबन सारे देशों की राय थी कि भारत को अपनी रक्षा हेतु ऐसे कदम उठाने का हक़ है। विडंबना ये कि पकिस्तान के हक़ में अगर कोई खड़ा था तो सिर्फ भारत की विपक्षी पार्टियां।

कल चीन के वीटो के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के एक सदस्य द्वारा “अन्य विकल्प” अपनाने की घोषणा एकअभूतपूर्व घटना है। शायद ही कभी संयुक्त राष्ट्र से ऐसा धमकी भरा बयान जारी हुआ हो। इस बयान के बाद पाकिस्तानी मीडिया में खलबली है और इसे “ओसामा बिन लादेन विकल्प” के रूप में लिया जा रहा है। जब पाकिस्तान ने अपने मुल्क में ओसामा की मौजूदगी से सिरे से इंकार कर दिया तो अमरीका ने पाकिस्तान में घुस कर उसे ठिकाने लगा दिया। आज वैश्विक बिरादरी ने भारत के हाथ पूरी तरह न सिर्फ खोल दिए बल्कि उसकी किसी भी कार्यवाही के लिए अपना पूर्ण समर्थन घोषित कर दिया।

उल्लेखनीय है की भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु शक्ति से लैस हैं, और इन दोनों के बीच किसी भी तरह का तनाव पूरी दुनिया को बेचैन कर देता है। सब मिल कर भारत को संयम की सलाह देने लगते हैं। ऐसे हालात में दुनिया का स्वयं “अन्य विकल्पों” पर विचार करना, भारत के पक्ष में एक अप्रत्याशित घटनाक्रम है।

फिर से विडंबना देखिये कि पाकिस्तानी मीडिया से लेकर बुद्दिजीवी तक के पसीने छूट रहे हैं, और भारत के पक्ष में लामबंद होती दुनिया के लिए वो अपने मुल्क की फौज तक को ज़िम्मेदार पा रहे हैं। परन्तु यहाँ इस देश की सबसे पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष इसे भारत की हार बता रहे हैं और अपने प्रधानमंत्री को डरपोक ठहरा रहे हैं।

अनुपम मिश्र

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