Saturday, July 4, 2020
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : एक परिचय

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना सितम्बर 1925 में सिद्धहस्त डॉक्टर श्री बलिराम हेगडेवार जी ने की. इनको सम्मान के साथ डॉक्टरजी कहकर बुलाया जाता था।

कांग्रेस और उसकी चमचा ब्रिगेड (वामपंथी, पाकप्रेमी, JNU धारी बुद्धिजीवी, फर्जी धर्मनिरपेक्ष, हिन्दू विरोधी) का कहना है कि संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया। सत्य यह है कि संघ ने गाँधी के तुष्टिकरण और नमक आंदोलन से स्वयं को दूर रखा, स्वतंत्रता आंदोलन से नहीं। हेगडेवार जी ने सभी स्वयंसेवकों को स्वतंत्र रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया किन्तु जिस कांग्रेस ने कभी नेताजी बोस और भगत सिंह को स्वतंत्रता सेनानी नहीं माना वह कांग्रेस भला कैसे किसी संघ कार्यकर्ता को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्वीकार करती !!

१९३४ में संघ की शाखा के एक कार्यक्रम में गांधीजी ने संघ की प्रशंसा करते हुआ कहा था कि संघ का अनुशासन अतुलनीय है और इससे सबको शिक्षा लेनी चाहिए। गाँधी ने यह भी कहा कि संघ के भीतर छुआछूत, ऊंचनीच, भेदभाव के कोई भी चिन्ह उनको देखने को नहीं मिलते। एक और कांग्रेस का बनाया संविधान है जिसने जातिवाद की जड़ों को राष्ट्र में और गहरा किया तथा स्वतंत्रता के ७० वर्षों बाद भी नए नए जाति समूह स्वयं को दलित घोषित करने की होड़ लगाए दिखते हैं, दूसरी और संघ का समतावाद है जिधर व्यक्ति पहले है और जाति बाद में। संघ में काम करने वाला व्यक्ति किसी भी जाति और वर्ग से आता हो, वह स्वयं को दलित और नीचा नहीं मानता।

सरदार पटेल जिन्होंने गाँधी कि हत्या के समय संघ पर अपना संदेह जताया था, उन्होंने स्वयं ही भूल सुधार करते हुए संघ पर से १९४९ में प्रतिबन्ध हटा लिया था।

गाँधी कि हत्या के बाद बौखलाए हुए नेहरू ने भी संघ पर संदेह जताया था किन्तु कालांतर में उन्होंने भी संघ को पहचाना और उसकी प्रशंसा की। नेहरू ने १९६२ के भारत चीन युद्ध के समय संघ सेवकों के द्वारा सीमा पर किये गए कार्यों की खुले ह्रदय से प्रशंसा की। संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा उत्तर पूर्वी भारत में सेना और आम जनता के हितार्थ किये गए कार्यों को सम्मानित करने के लिए १९६३ की गणतंत्र दिवस परेड में उन्हें आमंत्रित भी किया गया।

एक और जहां कांग्रेस और उसकी चमचा ब्रिगेड (वामपंथी, पाकप्रेमी, JNU धारी बुद्धिजीवी, फर्जी धर्मनिरपेक्ष, हिन्दू विरोधी) ने बार बार श्री नाथूराम गोडसे की आड़ में संघ को घेरने का प्रयास किया वहीं स्वयं नाथूराम गोडसे स्वयं संघ के विचारों से सहमति नहीं रखते थे। उन्होंने एक बार कहा था कि संघ हिन्दू युवाओं की ऊर्जा नष्ट कर रहा है।

 

देश की स्वतंत्रता के समय जब देश हिन्दू मुस्लिम दंगों की आग में झुलस रहा था और गाँधी नेहरू मिलकर मुस्लिम तुष्टिकरण के नित नए प्रयोग कर रहे थे, ऐसे में संघ इकलौता संगठन था जो हिन्दुओं के लिए कार्य कर रहा था। संघ ने अकेले ही पकिस्तान से आ रहे हिन्दुओं सिक्खों के लिए हजारों शिविर लगाए और उनकी देखभाल की व्यवस्था की।

१९८४ में इंदिरा गाँधी नाम का पेड़ गिर जाने पर जब कांग्रेस के कार्यकर्ता धरती हिला रहे थे और सिखों को गली गली में जिन्दा जलाया जा रहा था, तब संघ इकलौता संगठन था जो सिक्खों को सुरक्षा देने के लिए सामने आया था। संघ के जाने माने आलोचक खुशवंत सिंह ने स्वयं भी संघ के इस योगदान को स्वीकार करते हुए यह माना था कि १९८४ जनसंहार के समय संघ ने सिक्खों की बहुत सहायता की थी।

स्वतंत्रता के बाद से संघ पर कांग्रेस के द्वारा तीन बार प्रतिबन्ध लगाया जा चुका है और तीनों ही बार कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी है और संघ को प्रतिबन्ध मुक्त करना पड़ा है। १९४८ में पहली बार संघ को गाँधी वध के उपरांत प्रतिबंधित किया गया किन्तु बाद में संघ की कोई भूमिका नहीं पाए जाने पर प्रतिबन्ध उठाना पड़ा। दूसरी बार इमरजेंसी (राहुल गाँधी के शब्दों में लोकतंत्र की हत्या) के समय अन्य सभी संस्थानों की तरह संघ पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया था जो इमरजेंसी के बाद उठा लिया गया।

 

तीसरी बार १९९२ में संघ पर तब प्रतिबन्ध लगा दिया गया जब अतिउत्साहित कारसेवकों ने मंदिर तोड़ कर बनाई गई बाबरी मस्जिद का विवादित खंडहर गिरा दिया और मुस्लिम तुष्टिकरण की चाशनी में डूबी कांग्रेस ने ना सिर्फ संघ और अन्य सभी हिंदूवादी संगठनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया बल्कि संविधान की खुलेआम हत्या करते हुए सभी भाजपा सरकारों को भी गिरा दिया गया। इधर ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ढांचा विध्वंस के बाद हुए सभी हिन्दू मुस्लिम दंगों में किसी भी मुस्लिम संगठन पर कार्यवाही नहीं कि गई (संभवतः इसलिए नहीं कि गई होगी कि फिर कांग्रेस को स्वयं पर भी कार्यवाही करनी पड़ जाती)।

कांग्रेस और उसकी चमचा ब्रिगेड (वामपंथी, पाकप्रेमी, JNU धारी बुद्धिजीवी, फर्जी धर्मनिरपेक्ष, हिन्दू विरोधी) के द्वारा बार बार यह आरोप लगाया जाता है कि संघ मुस्लिम विरोधी है किन्तु बार बार मांगने पर भी कभी कोई तथ्य सामने नहीं रखे जाते। इनके मुंह पर थप्पड़ मारता हुआ और इनके तर्कहीन आरोपों को चिढ़ाता हुआ संघ का राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा पूरी तरह से मुस्लिमों के द्वारा संचालित होता है। यह ऐसे मुसलमानों का समूह है जो देश को इस्लाम से ऊपर मानता है, वन्दे मातरम को सांप्रदायिक नहीं मानता और एक राष्ट्र एक विधान में विश्वास करता है।

संघ के द्वारा अनेक बार भिन्न भिन्न मुस्लिम ईसाई संगठनों को संघ की शाखाओं में आमंत्रित किया गया किन्तु ऐसे संगठन जो भारत का हिस्सा नहीं बनना चाहते बल्कि भारत को अपना हिस्सा बनाना चाहते हैं, वे कभी संघ का आमंत्रण स्वीकारने का साहस नहीं जुटा सके। किन्तु इतने प्रतिरोध के बाद भी काफी मुस्लमान और ईसाई संघ की सदस्यता ग्रहण कर चुके हैं। मूल रूप से संघ हिन्दुओं का संगठन ना होकर हिन्दू, सिक्ख, जैन, बौद्ध, मुस्लमान सभी का मिला जुला संगठन है।

संघ को महिला विरोधी तथा पितृसत्तात्मक कहने वाले छद्म महिलावादियों को एक बार दुर्गावाहिनी के दर्शन करने चाहिए जिधर सभी जाति धर्म की बालिकाएं आत्म रक्षा का प्रशिक्षण लेती दिखती हैं। संघ की यह महिला शाखा पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित होती है और इधर महिला सशक्तिकरण का अर्थ पुरुषों को गाली देना या किसी फिल्म में हस्तमैथुन के दृश्य फिल्माना नहीं होता अपितु महिला पुरुष में आत्मसम्मान का समान भाव और महिला का सर्वांगीण विकास होता है।

संघ को बार बार अनेकता में एकता की सीख देने वाले खोखले धर्मनिरपेक्ष संभवतः जानना चाहेंगे कि संघ के द्वारा नियमित रूप से ऐसे लोगों को संघ के कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाता रहा है जिनकी संघ कि विचारधारा से सहमति नहीं रही है, जैसे कि हाल ही में भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को बुलाया गया था। इसके विपरीत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बड़ी बड़ी बातें करने वाले कांग्रेस और उसकी चमचा ब्रिगेड (वामपंथी, पाकप्रेमी, JNU धारी बुद्धिजीवी, फर्जी धर्मनिरपेक्ष, हिन्दू विरोधी) न केवल अपने सभी मंचों से संघ का खुला बहिष्कार करते हैं बल्कि सभी विचारधाराओं को (१०० करोड़ हिन्दुओं को १५ मिनट में काट डालने वाली विचारधार को जोड़कर) सम्मान देने की उनकी नीति संघ का नाम सुनते ही ध्वस्त हो जाती है।

वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक श्री मोहन भागवत हैं जिनकी नियुक्ति २००९ में की गई थी। भागवत जी के समय में संघ ने कुछ आंतरिक परिवर्तन भी देखे जैसे कि हाफ पेंट को ट्रॉउज़र से बदल दिया गया, अन्य दलों के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को संघ में आने का आह्वान किया गया तथा सभी पदों के लिए उच्चतम आयु सीमा ७५ वर्ष कर दी गई।

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