क्या रमजान का महीना शांति की गारन्टी है?

कुछ ही दिन पहले कश्मीर में मुख्यमन्त्री महबूबा मुफ़्ती समेत सभी इस्लामी पार्टियों और अलगाववादियों ने रमजान को देखते हुए आतंकियों के खिलाफ चल रहे सुरक्षा बलों के अभियान को बंद कर एकतरफा सीजफायर की मांग की थी। इसमें किसी को हैरानी नहीं हुई। लेकिन आश्चर्य की बात तब हुई जब केंद्र सरकार ने महबूबा मुफ़्ती की यह मांग स्वीकार कर ली। इसकी पुष्टि खुद गृह मंत्रालय ने की।

यह एक विचित्र स्थिति है। कहाँ तो आतंक को किसी मजहब से न जोड़ने की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं और अब एक विशेष इस्लामी महीने में ही एकतरफा सीजफायर की आत्मघाती घोषणाएं की जा रही हैं। सवाल ये है कि अगर ये घोषणा वाकई कश्मीर और देश के हित में है तो इसे पूरे वर्ष क्यों नहीं लागू कर दिया जाता? और अगर वर्ष के बाकी महीनों में सीजफायर की जरूरत नहीं समझी गयी तो अब आतंकियों या उनके पाकिस्तानी आकाओं ने कौन से शांति समझौते पर अपने दस्तखत दे दिए हैं जो हमने इतनी बड़ी खुशफहमी पाल ली? अरे ये तो वो लोग हैं जो पूरी दुनिया के सामने हुए आपके ताशकन्द और शिमला समझौतों की भी चिंदी चिंदी उड़ा देते हैं तो बिना किसी समझौते के वे आपकी इस अजीबोगरीब पहल को इज्जत बख्शेंगे इसकी गारन्टी कौन लेगा?

अव्वल तो यह बात ही बेमानी और तथ्यहीन है कि रमजान में आतंकी कोई शांति या अमन की खुमारी में जीते हैं। असल स्थिति बिलकुल उलटी है। देश-दुनिया का अनुभव तो ये कहता है कि रमजान के महीने में वे और ज्यादा घातक और जुनूनी होते हैं। ऐसे में सीजफायर की तो बात ही छोड़िए, रमजान में तो सरकार और भारतीय सुरक्षाबलों को अतिरिक्त सतर्कता दिखाते हुए आतंकियों पर और ज्यादा निर्मम होने की आवश्यकता है। शांतिप्रिय लोगों के लिए यह पाक महीना हो सकता है लेकिन आतंकियों की प्रेरणा, विचारधारा और हाल के वर्षों में हुई आतंकी घटनाओं के आलोक में देखें तो रमजान का महीना हमारे लिए अतिरिक्त सावधानी और सतर्कता की मांग करता है।

आतंकियों के नजरिए से जिहादी इस्लाम में रमजान के महीने में कहीं से भी ‘काफिरों’ की हत्या वर्जित नहीं है। खुद पैगम्बर मोहम्मद ने जब 624 ई. में गैर-मुस्लिमों के खिलाफ बद्र की जंग के रूप में जिहाद छेड़ा तो रमजान का ही पाक महीना चल रहा था। फिर इसी रमजान में मोहम्मद की अगुवाई में जिहादियों ने मक्का पर हमला कर ‘काफिरों’ को मुसलमान बनाया और यह तो इस्लाम का बुनियादी सिद्धान्त है कि पैगम्बर ने अपने जीवन में जो कुछ भी कहा या जो कुछ भी किया वह सभी मुसलमानों के लिए सुन्नत होती है, नजीर होती, अनुकरणीय होती है। ध्यान रहे, मैं यहाँ किसी मजहब के सही या गलत नजरिए की व्याख्या नहीं कर रहा। लेकिन आतंकी समूह उस मजहब को किस रूप में जानते, समझते हैं या उससे किस भाव में प्रेरणा लेते हैं, यह जानना हमारे लिए जरूरी है।

बहरहाल, रमजान में पैगम्बर का जिहाद तो फिर भी मध्ययुगीन इतिहास की घटना है लेकिन आधुनिक इतिहास में भी जिहाद की प्रेरणा की नजीर मौजूद है। भारत के आधुनिक इतिहास में इसका सबसे बड़ा उदाहरण है 1946 में अलग पाकिस्तान देश की माँग को लेकर मुस्लिम लीग का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ को अंजाम दिया जाना। 16 अगस्त, 1946 को जब मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग ने कलकत्ता समेत पूरे बंगाल की सड़कों को हिन्दुओं के खून से लाल कर दिया तब भी यही रमजान का ‘पाक महीना’ चल रहा था। मुस्लिम लीग ने तो हिन्दुओं के खिलाफ इस ‘डायरेक्ट एक्शन’ को बाकायदा पैगम्बर मोहम्मद के 624 ई. वाले रमजान के जिहाद से प्रेरित भी बताया था। विकिपीडिया भी इसकी तस्दीक करता है।

हाल के वर्षों में भी रमजान के महीने में ही पूरी दुनिया में आतंकी हमले अंजाम दिए गए। पिछले वर्ष ही पेरिस, ऑरलैंडो, लेबनान, सीरिया, इस्तांबुल, जॉर्डन, ढाका, यमन, बगदाद, अफगानिस्तान समेत कश्मीर में भी आतंकी हमले बदस्तूर जारी रहे। इनमें सम्मिलित रूप से सैकड़ों की संख्या में निर्दोष लोग मारे गए। कश्मीर से ही आने वाले भारतीय सेना के बहादुर ऑफिसर उमर फैयाज की हत्या भी आतंकियों ने पिछले वर्ष रमजान के महीने में ही की थी।

आश्चर्य नहीं कि पूरी दुनिया में रमजान के महीने में बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं की हत्या करते हुए इस्लामी जिहादी भी जिन्ना की मुस्लिम लीग की तरह कहाँ से ‘प्रेरणा’ लेते हैं। आतंकियों की दृष्टि में रमजान में ‘काफिरों’ को लूटने, मतान्तरित करने और मार डालने में कुछ भी ‘गैर-इस्लामी’ नहीं है। उनके लिए तो यह सब पूरी तरह इस्लामसम्मत है। इसलिए इस रमजान के महीने में भारतीय सुरक्षा बलों को कश्मीर में अधिक सावधान होने की आवश्यकता है। आतंकवाद पर सीजफायर तो दुनिया को तब तक नहीं करना होगा जब तक इस शैतानी कल्ट का एक भी आतंकी जीवित है।

अब सरकार के बचाव में प्रवक्ता लोग टीवी चैनलों पर सफाई दे रहे हैं कि हमने सुरक्षा बलों को Retaliation यानी जवाब देने से मना नहीं किया। परन्तु देखा जाए तो यह सफाई अपने आप में इस बात की स्वीकारोक्ति है कि हमारे सुरक्षा बल जो अब तक अग्रसर होकर जिहादियों को मार रहे थे, वे अब मात्र प्रत्युत्तर दे सकेंगे। अर्थात् पहले जवानों के ऊपर हमला होगा तब जवान केवल उस हमले को रोकने के लिए जवाब दे सकेंगे। यदि सुरक्षा बलों के पास आतंकियों के ठिकानों का कोई इंटेलिजेंस पुट है तो वे खुद से कार्यवाही नहीं करेंगे। अपनी पहल पर खोजी अभियान और स्थानीय मुठभेड़ भी बन्द ही रहेगी। इस दौरान आतंकी हमारे जवानों पर हमलावर नहीं होंगे इसका कोई आश्वासन नहीं मिला है। इस बात की भी गारन्टी नहीं है कि इस सीजफायर का लाभ उठाकर आतंकी पहले से अधिक सुगठित और मजबूत नहीं हो जाएंगे।

मेरा निवेदन है कि सरकार को देश की जनता की भावनाओं तथा सुरक्षा बलों के मनोबल का भी ध्यान रखना चाहिए। सुरक्षा की चिंता तो अपनी जगह है ही क्योंकि ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट है कि रमजान का महीना कोई शांति की गारन्टी नहीं है।

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