Monday, April 22, 2024
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2019 का चुनावी गणित

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Chetan Prinja
Chetan Prinja
#SHIVBHAKT A PROUD HINDU & SABSE BADKAR SACHA HINDUSTANI

बहुत सारे विद्वान और चुनावी पंडित अपने अपने अनुमान लगा रहे हैं क़ि 2019 के चुनाव में क्या होगा। हालाँ कि अभी काफी समय है चुनाव में और परिस्थितियाँ बदल भी सकती हैं। लेकिन आज के हिसाब से हर कोई हिसाब किताब लगा रहा है और अपना चुनावी विश्लेषण कर रहा है। इस लिए हम भी अपनी थोड़ी बहुत समझ के अनुसार ये पता लगाने का प्रयास करते हैं क़ि अगले लोकसभा चुनाव में क्या हो सकता है।

राजनीति में कुछ भी हो सकता है। इसकी ताज़ा मिसाल सपा और बसपा जैसे दो कट्टर दुश्मनों का साथ आना है। ये दिखलाता है क़ि राजनीति अनिश्चितताओं का खेल है। इस में जो आज दुश्मन है कल वो दोस्त बन सकते है और जो आज दोस्त है वो कल कट्टर शत्रु बन सकते है। हालाँकि सपा बसपा यह सफाई दे सकती हैं क़ि बीजेपी ने भी जम्मू कश्मीर में पीडीपी से गढ़बंधन से सरकार बनाई है। और वैसे भी राजनीति में आज कल सिर्फ जीत मायने रखती है।आखिर में सब लड़ाई कुर्सी और सत्ता पाने के लिए ही है। इस हिसाब से देखे तो कल को एक तरफ मोदी तो दूसरी तरफ सारा विपक्ष चुनाव में नज़र आ सकता है।

ममता बैनर्जी अपनी पूरी ताकत लगा रहीं हैं कल को दुबारा मोदी प्रधान मंत्री न बने। इस के लिए वे तीसरे मोर्चे के गठन के लिए पूरे हाथ पैर मार रहीं हैं। सभी दलों के साथ बात कर रही हैं। वही यूपी में सपा बसपा का गठजोड़ भी लगभग तह है बात सिर्फ सीट के बटवारें पर अटकी है। हालाँकि कई बार सीट के बटवारें को लेकर कई गठजोड़ टूट जाते हैं। लेकिन इस जगह मोदी के प्रति नफरत और मोदी को हराने की चाहत में शायद यह लोग कम सीट पर भी चुनाव लड़ने पर भी राज़ी हो जाएं। बाकि के राजग के दल भी कोई बहाना ढून्ढ कर अलग राह पकडने को उतावले नज़र आ रहे है।

वहीं कांग्रेस जो की सबसे पुरानी पार्टी है वो भी काफी आक्रामक तेवर में नज़र आ रही है। हालाँकि कांग्रेस राहुल गाँधी को प्रधान मंत्री बनाना चाहती है। यह बात दूसरे दल कितना मानेंगे यह आने वाली तीन विधानसभा चुनाव के नतीजे तह करेंगे, क़ि वो कितनी मोल भाव की स्थिति में है। और अपनी मांगे मनवा भी सकती है या नहीं। दूसरे दलों की मजबूरी यह है कि उनका संग़ठन सिर्फ उनके राज्य में ही है और अगर किसी का संग़ठन पूरे देश में हैं भी तो वो बीजेपी और कांग्रेस के संग़ठन जितना मजबूत नहीं है। इस लिए उन्हें इन में से किसी एक दल की जरूरत पड़ेगी। जाहिर है कि वो कांग्रेस को ही चुनेंगे। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी की क़ाबलियत और अमित शाह की चाणक्य नीति। और बीजेपी और आरएसएस का संघठित संगठन और जोश से भरे वर्कर जो हर वक़्त चुनाव के लिए तैयार रहते हैं।

हालाँकि बीजेपी एक तरह से कमाल की चुनावी मशीन बन चुकी है जोकि हर चुनाव जीतना  चाहती है। किन्तु इस बार बीजेपी के खिलाफ एंटी incumbancy हो गई। और उनके पास भ्रष्टचार जैसा कोई बड़ा चुनावी नारा भी नहीं है जैसा क़ि 2014 के वक़्त था। लेकिन वो इसकी पूर्ति राम मंदिर के नारे के साथ कर सकती है। कांग्रेस यह उम्मीद लगा कर बैठी है क़ि अगले चुनाव में हिंदी भाषी क्षेत्र से बीजेपी वो पुरानी जीत नहीं दोहरा पाएगी। और वो दोसौ के आंकड़े पर अटक जाएगी ऐसी स्थिति में दूसरे दल अपनी मोदी प्रति नफरत के चलते मोदी के साथ नहीं जाएंगे।

बल्कि ऐसी स्थिति में राजनाथ सिंह PM के लिए दूसरे दलों की पहली पसंद होंगे। हालाँकि इस में भी एक स्थिति यह है कि बीजेपी ने उत्तर भारत में जो उनकी इस बार कम सीट आएंगी उसकी पूर्ति के लिए नार्थ ईस्ट और दक्षिण के राज्य में चुनाव जीत कर करने की योजना बनाई है। इस लिए अभी यह कहना की मोदी 2019 का चुनाव हार जायेंगे यह सिर्फ बेवकूफी हो गयी। क्योंकि सियासत के नए चाणक्य ने हर जोड़ तोड़ लगा रखा है। अब बॉल जनता की कोर्ट में है कि वो गठबंधन की खिचड़ी चाहती है या बहुमत वाली मजबूत सरकार। क्योंकि गठबंधन की सरकार की कई मजबूरियाँ होती है उन्हें सब को खुश रखना होता है।

बाकि पब्लिक है सब जानती है। देश की जनता है समझदार है अपने फैसले ले सकती है।देखना रोमांचक होगा क़ि 2019 में जनता किसे जीता कर मुकदर का सिकंदर बनाती है।

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