Monday, October 26, 2020
Home Hindi उ.प्र. का योगी आरोहण: मात्र एक घटना से परे, इसके बहुआयामी प्रभाव

उ.प्र. का योगी आरोहण: मात्र एक घटना से परे, इसके बहुआयामी प्रभाव

Also Read

Akhilesh Shukla
More Bharatiya than normal Indian 🙂 A Non Resident Indian, whose soul wanders around Bharat Varsh!! A Project Management & Project Controls professional; interests in History, Society & Geo Political events. I'm generally "right' of the right-of-the-centre 🙂

अगर आप किसी घटना, या व्यक्ति, का प्रभाव देखना चाहते हैं, तो उसके विरोध को देखें। विरोध की गंभीरता, विरोधियों की संख्या, और विरोधत्व काल (कितना लंबे समय तक विरोध चला) से अंदाज लगाया जा सकता है कि घटना, या व्यक्ति, का महत्त्व क्या है। वैसे तो इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से, किंतु समयाचीन उदाहरण है आज के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का।

सन 2002 से लगातार एक इंसान का इस कदर विरोध हुआ कि जो इंसान सामान्य तौर पर एक मुख्यमंत्री पद से रिटायर हो जाता आज भारत का प्रधानमंत्री है। आख़िर मोदी भाजपा के कई मुख्यमंत्रियों में से एक थे। मुख्यमंत्री बनने तक शायद बहुत से लोग जानते भी नही होंगे। सब कुछ शायद सामान्य जैसा ही रहता।

लेकिन इतिहास गवाह है कि हुआ क्या- मीडिया, विशेषकर अंग्रेजी मीडिया, के एक वर्ग ने निहित-ईर्ष्या और निहित-स्वार्थ वश मोदी-विरोध का एक आंदोलन चला दिया, अति कर दी। ये गलत था। परिणाम सबके सामने है, आज मोदी भारत के प्रधान मंत्री हैं। मेरा आशय ये नहीं है  कि  मोदी जी जहाँ हैं वहां अपनी योग्यता से नहीं हैं, वह जरूर योग्य हैं, लेकिन वही अकेले योग्य हैं, ऐसा भी तो नहीं है ना। मोदी के उत्थान में कहीं न कहीं मीडिया के वर्ग विशेष द्वारा जो अनर्गल, अप्रत्याशित और अनैतिक आक्रमण किया गया उसका भी योगदान काम नही है।

आज, जबसे योगी मुख्यमंत्री बने हैं, वही अंग्रेजी मीडिया, उसी तथाकथित छद्म-सेकुलर गिरोह ने योगी-विरोध में दिन रात एक कर रखा है।सोशल मीडिया हो या दूसरे मीडिया माध्यम सब के सब योगी-विरोध से भरे पड़े हैं। बात विरोध तक होती तो ठीक है, कुछ स्वनामधन्य पत्रकार तो योगी-घृणा में इस स्तर तक गिर गए हैं कि झूठमूठ पर उतर आए हैं। खैर, ये (कलुषित पत्रकारिता) न तो आश्चर्य जनक है और न ही अप्रत्याषित। मोदी विरोध मैं, जैसा मैंने ऊपर उद्धृत किया, ऐसा पहले भी हो चुका है। आश्चर्य ये भी नहीं है कि ये सब उसी पारिस्थितिकी तंत्र (इको-सिस्टम) के द्वारा हो रहा है। आश्चर्य ये जरूर है कि इस बार तीव्रता अधिक है, बौखलाहट अधिक है, संताप और प्रलाप अधिक है। इसी अतिरेकी योगी विरोध के कुछ बिंदु-

  • क्या योगी का चयन विधि-परक नहीं है? आखिर, जैसी कि विधि है, चुने हुये विधायको ने ही उन्हें अपना (मंत्री परिषद् के नेतृत्व का) नेता चुना है।
  • क्या ये सच नहीं है कि योगी लगातार पांच बार सांसद चुने गए हैं? चुनने वाले आमजन, जनता ही तो थी, स्वाभाविक है कि लोग उन्हें पसंद करते हैं, आखिर गणतंत्र में ‘गण’ की इच्छा का इतना अनादर क्यों?
  • क्या योगी सिर्फ इसलिए “उपयुक्त” नहीं हैं की वह विशेष प्रकार के कपडे पहनते हैं? आखिर दिल्ली (लुटयन गिरोह) को भगवा रंग से इतनी चिढ क्यों है?
  • क्या इसलिए कि वह आभिजात्य नहीं है, अंग्रेजी नहीं बोलते? किसी कुल विशेष से नहीं आते? अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में नहीं पढ़े हैं? या “पार्टी सर्कल” से सम्बंधित नहीं है?
  • छद्म-सेकुलर तंत्र  को शायद ये अखरे लेकिन भारतीय परम्परा में योगियों, ऋषियों, मुनियों का स्थान बहुत आदर और सम्मान का रहा है  जनमानस में आज भी सन्यासियों, गेरुआ वस्त्रधारियों, का अंतर्निहित सम्मान बरक़रार है। हमें नही भूलना चाहिए कि महान योगिराज जनक भी राजा थे हमारा तो इतिहास भरा पड़ा है जहाँ राज्य-संचलन धर्म (राज धर्म) का ही एक अंग होता था। भारतीय संविधान और भारतीय जनमानस अगर किसी योगी को पद विशेष के अयोग्य नही मानता तो इस छद्म-सेकुलर तंत्र को पेट में  मरोड़ क्यों हो रही है? बल्कि ये तो अच्छा है कि आजकल की लुटखसोट और स्वार्थ की राजनीति में सन्यासी (दिल्ली में) और योगी (लखनऊ में) के रूप में नि:स्वार्थ, अति ईमानदार और कर्मठ जनसेवक हमे मिले हैं। छद्म-सेकुलर तंत्र का अति-प्रलाप कहीं इसलिए तो नहीं है कि ये ‘जनसेवक’ उनकी लूटखसोट का ज़रिया ही बंद कर देंगे।

मुझे तो इस अतिरेकी  योगी विरोध के तीन प्रमुख कारण लगते हैं-

  1. मोदी विरोध के काल में, इस छद्म-सेकुलर तंत्र को लगता था कि वह आसानी से मोदी को नेस्तनाबूद कर देंगे। वह सही थे, आखिर उन्होंने कितनोको जमींदोज़ किया भी था। जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक जीवन को नजदीक से देखा है, जानते होंगे कि ७० के दशक के अटल आज के योगी या कल के मोदी से भिन्न न थे (भाषा शैली भले उदात्त हो)। इन्ही अटल को १९९९  आते आते नेहरूवादी अटल में बदल दिया था इस तंत्र ने। इस छद्म-सेकुलर तंत्र की असीमित शक्ति तो है किन्तु मोदी ने जिसप्रकार इस तंत्र को इसका स्थान दिखाया, जाहिर है, अगले मोदी (आज के योगी )  के विरोध में ये तंत्र पहले से अधिक प्रयास करेगा।
  2. बात अब सिर्फ विरोध से अधिक  छद्म-सेकुलर तंत्र के ‘अस्तित्व’ की है।  मोदी ने जिस प्रकार इस तंत्र की जड़ों पर चोट शुरू की है, अगला मोदी स्वाभाविक रूप से इनका अस्तित्व ही समाप्त कर देगा। ये अतिरेकी  योगी विरोध महज  स्वाभाविक विरोध नहीं है बल्कि ये लंबी लड़ाई, इस छद्म-सेकुलर तंत्र  के अस्तित्व की लड़ाई है। योगीजी ये भूल न कर बैठे कि उ.प्र. का विकास  करके वे इस तंत्र को खुश कर देंगे। उ.प्र. में अगर सोने की सड़कें भी बनवा दी जाएं, तो भी योगी का भगवा रंग इस तंत्र को अखरेगा, चुभेगा, और विरोध भी होगा। विरोध के नए और अप्रत्याशित  तरीके देखने के लिए तैयार रहें – योगी निपटने को, बाकि हम सब दर्शक दीर्घा से इतिहास को देखने को।
  3. उपरोक्त कारण तो बाह्य कारण  हैं, मूल कारण तो उस विचार धारा से विरोध है जिसे मोदी या योगी प्रतिनिधित्व देते हैं। एक अकेला योगी इस वैचारिक संघर्ष के लिए न तो अपरिहार्य है और न ही अप्रासंगिक। युग-युगांतर के इस लंबे संघर्ष में योगी न तो प्रथम हैं और न ही अंतिम। आचार्य शंकर से लेकर स्वामी विवेकानंद तक अनवरत, विचारधाराओं के इस संघर्ष में, सनातन  संस्कृति  का कोई न कोई योगी राक्षसी प्रवृति से संघर्ष करता हुआ मिल ही जायेगा।

अब देखना यह है कि इस एक घटना (छद्म-सेकुलर तंत्र के लिए दुर्घटना) के कितने बहु आयामी प्रभाव पड़ते हैं। ये तो भविष्य का इतिहास बताएगा कि वास्तविक प्रभाव क्या  होते हैं, किन्तु मुख्यतः तीन प्रभाव, सामाजिक,राजनीतिक और अंतराष्ट्रीय संभावित हैं।

सामाजिक

कुछ 15-16 वर्ष पूर्व भारतीय समाज में, तत्कालीन राजनेताओं द्वारा, मंडल और मंदिर की खाई डाली गयी थी। ये विवाद का विषय हो सकता है कि पहल किसने की-मंदिर ने या मंडल ने, आज ये सब अप्रासंगिक है, किन्तु सत्य यह है कि इस विभाजन ने समाज का बहुत नुकसान किया। सामाजिक समरसता, जोकि स्वाभाविक लक्ष्य होना चाहिए था, के स्थान पर इस प्रयोग से सामाजिक वैमनस्य ही बढ़ा है। योगी के उ.प्र. आरोहण  से  इस खाई  को पाटने में मदद मिलेगी। कुछ स्वाभाविक बिंदु-

  • योगी सामान्यतः जाति-निष्पृह होते हैं। भले ही छद्म-सेकुलर तंत्र योगी की जाति बताने में दिन रात एक किये हो, सामान्य भारतीय जन मानस में ऐसी धारना है और स्वाभाविक रूप से सत्य भी है कि सन्यासी जाति विहीन होते हैं।
  • योगी के अनुभव इंगित करते हैं कि वह जाति, और संप्रदाय से भी, ऊपर उठकर कार्य करते रहे है। उनके मठ, और विशेषकर नाथ संप्रदाय जिसका वह नेतृत्व करते हैं, में मूलतः सभी जातियों के लोग, पिछड़े और अति पिछड़े विशेषरूप से, सामान रूप से सम्मिलित रहते है।
  • योगी के नेतृत्व में यह स्वाभाविक और अवश्यंभावी लगता है कि समाज की जाति पाँति आधारित क़ुरीतियों को अगर पूर्णत: नही भी मिटाया जा सकता है तो कम से कम कमी ज़रूर आएगी।
  • मंडल और कमंडल का जो विभेद १५ वर्ष पूर्व वी.पी. सिंह और मंडली ने बनाया था, आज उसका विधिवत मिलन हो गया है। मंडल और कमंडल मिलकर योगिमंडल हो गया है। सामाजिक समरसता के इस महान कार्य को आने वाली पीढियां सुखद अनुभूति से याद करेंगी।
  • मेरा  दृढ़ मानना है कि योगी के शासन काल में  उ.प्र. अभूतपूर्व उन्नति करेगा। सामाजिक उन्नयन का एक प्रमुख वाहक है आर्थिक उन्नति। उ.प्र. की आर्थिक उन्नति अंततोगत्वा भारत की उन्नति में भी सहायक होगी।

राजनीतिक

१९८९ के आम चुनाव कांग्रेस के लिए विशेष और ऐतिहासिक महत्त्व वाले रहे हैं। एक- कांग्रेस ४०० सांसद से (१९८४ में) धड़ाम से १९७ सांसदों तक पहुँच गयी, दो- इसके बाद कभी भी कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बनी। २००४ और २००९ में स.प्र.ग. (यूपीए) शासन के समय भी कांग्रेस स्वयं से सामान्य बहुमत नहीं जुटा सकी। लोकसभा चुनाव जीतने के लिए उ.प्र.का महत्त्व किसी से छिपा नहीं है। योगी का यूपी की ताजपोशी कोई सामान्य घटना नहीं है बल्कि यह एक लंबे समय का राजनीतिक दांव भी है। मोदी और शाह की जोड़ी ने जिस फार्मूले से २०१४ का चुनाव जीता (यूपी: ८० में ७५ सीट), ये उसी फार्मूले की अगली कड़ी है। सामान्य तौर देखा जाये तो, मोदी-शाह फार्मूला कुछ ऐसे है:

  • जातियों को जोड़ो, हिंदुओं को एक करो, पीड़ित, प्रताड़ित और नजरअंदाज किये हुए बहुसंख्यक वर्ग को राष्ट्रवाद से जोड़ो।
  • विकास को आगे रखो, पारदर्शी और न्यायसंगत प्रशासन प्रदान करो। अगर भाजपा शासित राज्यों को देखा जाये तो यह सामान्यतः स्वाभाविक ही है, आखिर भाजपा की कुछ, गुजरात, म.प्र., प्रदेश सरकारें लगातार चुन कर आ रही हैं। स्वाभाविक है भाजपा का नेतृत्व उ.प्र. में भी ऐसा ही करना चाहेगा

प्रदेश स्तर के उपलब्ध नेताओं में योगी निश्चित रूप से इन मानको पर खरे उतरते है। उनकी अपनी एक छवि है और उनका अपना खुद का वोट बैंक भी है।

इससे ये भी साफ परिलक्षित है कि मोदी-शाह की जोड़ी कहीं से भी छमायाचनात्मक अनुचेतना (अपोलोजेटिक सिंड्रोम) का शिकार नहीं है। जाहिर है, इस प्रचण्ड बहुमत में उन्हें ऐसा करने की न तो आवश्यकता है और न ही नेता द्वय इस बात के लिए जाने जाते हैं।

इसके इतर, निवर्तमान चुनाव के परिणाम और उसके बाद योगी के मुख्यमंत्री बनने से कुछ स्वाभाविक राजनीतिक उथल पुथल अवश्यम्भावी है। राजनीतिक भविष्यवाणी कठिन होती है,  फिर भी विवेचना अवश्य इंगित करती है, कि-

  • अगर भाजपा का गैर-जाटव अनुसूचित जातियों और गैर यादव-अति पिछड़ो (जैसे सुहेलदेव-बसपा, अपना दल आदि) का गठबंधन, जैसा कि पिछले २०१४ के आम चुनाव से चल रहा है, आगे भी जारी रहता है, मायावती जी के लिए आगे के दिन मुश्किल भरे हो सकते हैं। व्यापक जनाधार में मायावती सपा के मुलायम सिंह औए अखिलेश यादव के जोड़ के आगे कहीं नहीं टिकती। बसपा के पास दो ही विकल्प दिखते हैं, एक- अकेले लड़े और अंततोगत्वा राजनीतिक शून्य में जाये , या, दो- मुलायम की सपा के साथ मिल कर भाजपा का मुकाबला करे। दूसरी स्थिति में  ये गठबंधन भाजपा को हरा तो सकता है लेकिन मुलायम सिंह बड़ी आसानी से बसपा को निगल जाएंगे। ये बात मायावती जी को बेहतर मालूम है, और मुझे नहीं लगता कि कभी भी सपा और बसपा का विलय होगा। राजनीतिक स्थितियों के अनुसार  जाये तो, सपा भी रहेगी, बसपा भी रहेगी और  निकट भविष्य में  तो सरकार भाजपा की बनती रहेगी।
  • इसी सन्दर्भ में योगी की ताजपोशी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि योगीजी 2 साल  (योगी की परीक्षा २०१९ है, २०२२ नहीं)  में उ.प्र. में आमूल चूल परिवर्तन नहीं कर पाए, भाजपा जल्दी ही नैपथ्य में भी जा सकती है। मत भूलो की सीटें भले ३२५ आयी हों वोट प्रतिशत मात्र ४०% ही है (सपा और बसपा मिलाकर ४४%), जो न तो  कोई लहर है और न ही कोई सुनामी।
  • यदि योगीजी चमत्कार कर देते हैं, मुझे तो लगता है कर देंगे, तब भाजपा एक मैराथन दौड़ के लिए अपना रास्ता साफ़ कर लेगी।  उ.प्र. विजय का अर्थ भारत वर्ष पर भाजपा का लंबे, बहुत लंबे, समय तक शासन  हो जाए। आनंद की बात ये होगी जब छद्म-सेकुलर तंत्र के खिलाडी एक एक करके केशरिया धारा में जुड़ेंगे- ये जुड़ेंगे क्योंकि इनका (छद्म-सेकुलर तंत्र) लगाव किसी विचारधारा में नहीं बल्कि ‘सत्ता’ धारा में है।
  • भले ही देश में अन्यत्र कांग्रेस का नामोनिशान बचा रहे, लेकिन यदि उ.प्र. में कांग्रेस का अस्तित्व समाप्त हुआ तो ये मान लें कि केंद्र में कांग्रेसनीत सरकार दूर की कौड़ी होगी। कांग्रेस के पास अब दो ही उपाय हैं, या तो राहुल की ताजपोशी करें और महात्मा गांधी की कांग्रेस मुक्त इच्छा पूर्ण करें या फिर किसी और को कमान दें, और वेंटिलेटर पर कुछ समय पार्टी को और चलायें। मोदी-शाह-योगी की तिकड़ी से अगर किसी को सबसे अधिक राजनीतिक नुक़सान हुआ है और होने वाला है तो वह है कांग्रेस पार्टी और नेहरु-गांधी परिवार। १९६९ के बाद की पारिवारिक-व्यक्ति विशेष निहित कांग्रेस के ज्ञात-अज्ञात अत्याचारों का अंत तो होना ही था, नियति ने योगियों और सन्यासियों को इसके लिए चुना, कौतूहल का विषय हो सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय 

देश, समाज, परिवेश से परे बड़े सामाजिक परिवर्तन सामान्यतः सार्वभौमिक होते हैं, मानव जीवन के विकास क्रम में कमोबेश यही प्रक्रिया देखी जा सकती है। एक उदाहरण देखें- २०वीं सदी के मध्य के ३० वर्षों में औपनिवेशिक चक्र से बाहर आने की एक ऐसी लहर चली कि दर्जनो, संभवत: सौ से ऊपर, देश आज़ाद हो गए। ऐसी ही लहर कभी साम्यवाद और कभी बाज़ारवाद की भी चली थी।

आजकल भी एक ऐसी ही लहर चल रही है, अति राष्ट्रवाद की। वैश्वीकरण के इस युग में और मूलतः उसके आदर्शों के इतर, विभिन्न देश, समाज अपने स्थानीय हितों के प्रति सजग हो रहे हैं, संगठित हो रहे हैं। अमेरिका में ट्रम्प को चुना जाना कोई एकल घटना नही है, ब्रिटेन का यूरोप से बाहर आना, फ़्रान्स और जर्मनी में दक्षिण पंथी पार्टियों की बढ़त (लगभग पूरा यूरोप दक्षिण पंथी विचारधारा में बहता दिख रहा है), फ़िलिपींस, तुर्की, रूस, भारत आदि देशों में नए दक्षिण पंथी शासक वर्ग का चुना जाना इसी परिवर्तन की कहानी बयान कर रहा है।

उ.प्र. जहाँ विश्व की ३% जनसंख्या निवास करती है, जहाँ की आबादी ब्रिटेन फ़्रान्स और जर्मनी की सम्मिलित जनसंख्या से भी अधिक है, अगर इसी वैश्विक रुझान को प्रदर्शित कर रहा है, राष्ट्रवाद की ओर झुक रहा है, तो इसमें आश्चर्य कैसा? आख़िर जो कारक अमेरिका में ट्रम्प को लाते हैं, फ़्रान्स में लीपेन को बढ़त दिलाते हैं, वही सार्वभौमिक कारक पहले मोदी को और अब योगी को नेत्रत्व पटल पर लाते हैं।

उ. प्र. के निवर्तमान चुनाव परिणामों का एक और अंतर्राष्ट्रीय  प्रभाव भी पड़ा है। शायद कम ही होता होगा कि भारत के किसी प्रदेश के चुनाव जीतने पर विदेशी शासनाध्यक्षों से भारत के प्रधानमंत्री को बधाइयाँ मिलें। लेकिन ऐसा हुआ। कारण साफ़ है। इन चुनावों ने मोदी के हाथ बहुत मज़बूत कर दिए हैं। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मोदी की छवि पहले से ही एक ताकतवर शासन-प्रमुख की रही है। २०१८ तक राज्यसभा में भाजपा को पूर्ण बहुमत, वर्तमान अपार जन समर्थन और मज़बूत प्रशासक की छवि के चलते मोदी की अंतराष्ट्रीय जगत में और अधिक शक्तिशाली छवि बनी है। इसके दूरगामी परिणाम भी देखने को मिलेंगे। केवल प्रादेशिक राजधानियों में ही चुप्पी नही छाई है, बेज़िंग से लेकर इस्लामाबाद तक उ.प्र. के चुनाव और योगी के आने का गुणा-भाग लग रहा है। कुछ तो ख़ास है कि एक मुख्यमंत्री को वीज़ा देने में आनाकानी करने वाले आज मोदी के बड़े चेले, भगवाधारी योगी, के मुख्यमंत्री बनने से न केवल ख़ामोश बैठे हैं बल्कि नए सम्बन्धों की पींगे बढ़ा रहे हैं।

संक्षेप में, योगी का रंगमंच पर आना न तो एक सामान्य घटना है, और न ही इसके परिणाम सामान्य होने वाले हैं। आने वाला समय रोचक तो होगा ही, इसके दूरगामी विशेष परिणाम भी अवश्यम्भावी हैं। २२ करोड़ जनसमुदाय का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत भूभाग भी प्रभावित होने वाला है। आप चाहे तो इस राजधर्म के यज्ञ में आहुति दें, धर्म और विकास के संगम के भागी बनें, प्रयाण को सफल बनाएं, या फिर तटस्थ होकर इतिहास बदलते देखें। लेकिन राष्ट्र कवि दिनकर की पंक्तियाँ याद रखें-

‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र।
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।।’

 

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

Akhilesh Shukla
More Bharatiya than normal Indian 🙂 A Non Resident Indian, whose soul wanders around Bharat Varsh!! A Project Management & Project Controls professional; interests in History, Society & Geo Political events. I'm generally "right' of the right-of-the-centre 🙂
- Advertisement -

Latest News

Joe Biden is not Trump, Joe Biden might be worse than Trump

A man who belongs to the elitist coterie that will use American taxpayers’ money to fuel terrorism in other countries and a woman who can disown her ethnic identity — and they are expected to bring in inclusivity to American society?

Looking back at ‘anti-CAA agitation’ after ten months

If Muslims in India in particular and South East Asia in general continue to practice “heads I win, tails you lose”, soul of India will be determined by right wing Indian Hindus in coming days!

Constitutional threat to secularism in India

If we look the legality of secular and socialist words in terms of constitution and constitution related cases we find that in two scenarios- 42th amendment in which secular and socialist words in preamble can legally be challenged.

Republic Vs Lutyens Media: Why Arnab is winning

Arnab is winning, because all those ganged up against him have little or no credibility.

Kamala Harris as Maa Durga opens up questions about her true identity

Hindu Americans are still not clear on what religion Kamala Harris or Meena Harris follow. Little do they know that neither Kamala Harris nor Meena Harris follow the Hindu faith, Kamala Harris considers herself a Baptist Christian.

Congress: Staring at bleak future

It has been more than six years since congress is kicked out of the power, but there is absolutely no change in Congress’s attitude. It continues to support anti-India elements. Look what Congress is doing

Recently Popular

Destroying the Ravana within

Its important to destroy demon that is there inside us.

The free temple Movement and scams

There is a big argument on social media that why should the government have temples in their control, Swαmy went to court against several state govt. to free temples will explain to you all why does Swαmy wants to free temples & why Modi thinks differently.

Save Hindus, save Bengali

Since 1979 the Hindus living in Meghalaya are consider a third class citizen, being the domicile and being minority religious community of the same state they have to go through a lot of unjust and equality, they cant buy land, can't get government administration jobs even can't live peacefully.

Congress goons who attacked Arnab Goswami and Samyabrata Ray revealed their association with Congress party: Hypocrisy of left liberal ecosystem on freedom of press...

If a women is wife of Arnab Goswami or is a acid attack victim who supports right wing of India; their life doesn't matter to them.

Kamala Harris as Maa Durga opens up questions about her true identity

Hindu Americans are still not clear on what religion Kamala Harris or Meena Harris follow. Little do they know that neither Kamala Harris nor Meena Harris follow the Hindu faith, Kamala Harris considers herself a Baptist Christian.