राजनीति में आने के लिए “शार्ट कट” की तलाश करती गुरमेहर कौर

देशद्रोहियों और आतंकवादियों का समर्थन करने वाले कुछ राजनीतिक दलों के हाथ में “खिलौना” बन चुकी गुरमेहर कौर आजकल विवादों में हैं. गुरमेहर कौर आम आदमी पार्टी की सक्रिय कार्यकर्त्ता होने के साथ साथ केजरीवाल जी की ही तरह “अति महत्वाकांक्षी” भी हैं और इसीलिए उन्होंने मात्र २० वर्ष की आयु में अपनी पढाई लिखाई पर ध्यान देने की बजाये खुद को उस विवाद में जानबूझकर डाल दिया, जिससे उनका कोई लेना देना तक नहीं था.

विवाद शुरू हुआ था रामजस कॉलेज से. रामजस कॉलेज में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था और कार्यक्रम के आयोजकों ने उस कार्यक्रम में बोलने के लिए जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के उन विवादित छात्रों को आमंत्रित कर लिया था, जिनके ऊपर एक साल पहले “जे एन यू परिसर” में ही देश विरोधी नारे लगाने और नारे लगाने वालों का समर्थन करने का आरोप है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने कार्यक्रम में इन तथाकथित देश विरोधी छात्रों की शिरकत का विरोध किया. अब देखा जाए तो यह मामला रामजस कॉलेज के छात्रों और जे इन यू के छात्रों के बीच का है. गुरमेहर कौर जो लेडी श्री राम कॉलेज की छात्रा है, उसका इस सारे मामले से कोई लेना देना नहीं था. लेकिन अगर किसी को राजनीति में जाने के लिए “शार्ट कट” की तलाश हो और वह भी रातों रात कन्हैया, हार्दिक पटेल और केजरीवाल की तरह नेतागिरी करने का सपना देख रहा हो, तो उसे तो बस किसी भी मामले में कूदने का मौका भर चाहिए. बाकी का काम तो वे राजनीतिक दल और उनके समर्थक अपने आप ही कर देते हैं, जिनका देशद्रोहियों और आतंकवादियों के ऊपर वरद-हस्त है. ऐसे सभी राजनीतिक दल पहले से ही मोदी, भाजपा और आर एस एस को अपना दुश्मन समझते हैं और इनके खिलाफ बयानबाज़ी और साज़िश करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं.

इन्ही राजनीतिक दलों की लिखी हुयी स्क्रिप्ट पर काम करते हुए पहले तो गुरमेहर कौर ने इस सारे मामले को अभिव्यक्ति की आज़ादी से जोड़ते हुए जे एन यू के छात्रों का समर्थन कर दिया और अपने शहीद पिता की मौत के लिए पकिस्तान को “क्लीन चिट” देते हुए इस बात की घोषणा कर डाली कि-” मेरे पिता कि मृत्यु के लिए पाकिस्तान नहीं, युद्ध जिम्मेदार है.” गुरमेहर कौर की पाकिस्तान को दी गयी यह “क्लीन चिट” पाकिस्तान को भी बढ़िया लगी और हमारे अपने ही देश में मौजूद उन पाकिस्तान प्रेमियों और राजनीतिक दलों को भी बहुत बढ़िया लगी, जो खाते तो हिंदुस्तान का हैं, लेकिन गाते पाकिस्तान का हैं. पाकिस्तान के अखबार “डॉन” ने तो गुरमेहर की इस बात की तारीफ करते हुए उस पर एक लेख भी लिख मारा. पूरी दुनिया में अपनी आतंकवादी वारदातों के लिए हाशिये पर आये हुए पाकिस्तान के लिए तो गुरमेहर एक “मसीहा” से कम नहीं है. लेकिन पाकिस्तान की बेजा हरकतों की वजह से देश में कितने सैनिक और नागरिकों की जाने चली जाती हैं, उनका ख्याल न तो गुरमेहर जैसे “अति-महत्वाकांक्षी” लोगों को है और न उन नेताओं को जो इन्हें भड़का भड़का कर अपनी देश विरोधी राजनीति चमकाते रहते हैं.

देखा जाए तो यह सारा मामला दो राजनीतिक विचारधाराओं के बीच की लड़ाई से ज्यादा कुछ नहीं था. एक तरफ वे राजनीतिक दल थे जो गुरमेहर कौर के पिता क़ी शहादत को भुनाकर उसका अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे थे, दूसरी तरफ भाजपा क़ी स्टूडेंट्स विंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के छात्र थे, जो इस मामले में उन लोगों का विरोध कर रहे थे जिनके ऊपर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है.

इस सारे विवाद में गुरमेहर कौर जो कुछ भी हासिल करना चाहती थी, उसे हासिल करने के बाद वह, फिलहाल स्टेज छोड़कर नेपथ्य में चली गयी है, यह भी पहले से लिखी हुयी स्क्रिप्ट का हिस्सा ही है. नेपथ्य में जाने से पहले गुरमेहर कौर ने यह सुनिश्चित कर लिया है कि जिन राजनीतिक दलों के लिए वह काम कर रही हैं, वे और उनके समर्थक मिलकर उनको देश में इतना “मशहूर” तो कर ही दें, कि आने वाले समय में उन्हें हार्दिक पटेल, कन्हैया और केजरीवाल से कम करके ना आँका जाए और जब कभी सत्ता में भागीदारी का मौका आये तो उन्हें उसी तरह मौका मिले जैसे कभी केजरीवाल,कन्हैया और हार्दिक पटेल तो मिला था.

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