Friday, September 18, 2020
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काल्पनिक पत्रकार राना चौधरी की कश्मीर में बाढ़ पर रिपोर्ट

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Puranee Basteehttps://puraneebastee.blogspot.in/
पाँच हिंदी किताबों के जबरिया लेखक। कभी व्यंग्य लिखते थे अब व्यंग्य बन गए हैं।
 

राना चौधरी नाम की एक काल्पनिक पत्रकार हैं| चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से तेज है और राना चौधरी का दिमाग चाचा चौधरी से भी तेज है। राना चौधरी के दिमाग के तेज होने के पीछे अफगानिस्तान के बादाम का बहुत बड़ा हाथ है। अब अफगानिस्तान में बादाम पैदा होता है या नहीं इस बात का ज्ञान मुझे नही है लेकिन भारत का बादाम केसरिया रंग का होता है इसलिए वो भारत के बादाम नहीं खाती, पाकिस्तान में तो गेहूँ की रोटी भी नदारद है तो बादाम पैदा करना तो दूर की बात है इसलिए बादाम तो अफगानिस्तान से ही आता होगा। पूत के पाँव पालने में दिख जाते हैं चौधराईन के पैदा होते ही उनके पिताजी समझ गए थे की बड़ी होकर राना अफवहों के बाजार(मेरी अधूरी किताब) का प्रमोशन करेगी अर्थात पत्रकारिता में आकर अफवाह और सत्य को झालमुड़ी बनाकर बेचेंगी।

राना चौधरी का बचपन गुजरात की गलियो में दंग्गा करते हुए लोगो के बीच बीता। राना की माने तो आज तक जब कोई दंगा हुआ है उसमे इंसान नहीं मरते बल्की हिंदू-मुसलमान मरते है। इनकी नजर से किसी के घर चोरी हुई तो वो आम चोरी नहीं है, वो कम्युनल चोरी है जो जरूर किसी हिंदू ने मुसलमान से बदला लेने के लिए की होगी। राना अय्यूब चौधरी इस बात की हमेशा से पक्षधर रही है कि तिरंगे में जो केसरिया रंग ऊपर है वो मुसलमानो को इस देश में दबाने की साजिश है और सर्वधर्म संभव को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार को हरे रंग को ऊपर करके अपनी सच्चाई और निष्ठा का साबुत देना चाहिए।

कश्मीर में आनेवाली बाढ़ पर राना चौधरी ने खास रिपोर्ट पेश की जिसमे वो ये बताना भूल गयी कि बाढ़ आने पर हमारे देश के जो सिपाही अपनी जान जोखिम में डालकर कश्मीर के लोगो को बचते है उन्हें वही कश्मीर वाले पत्थरों से मरते है, वो जिन पत्थरों से हमारे सैनिकों को मारते है यदि वो पत्थर अपने घर की नींव में डालते तो उनका घर मजबूत बनता और बाढ़ में जमीन के अंदर नही धसता और उन्हें बचाने के लिए हमारे सिपाही अपनी जान न कुर्बान करते। ऐसे कई तथ्य होंगे जिन्हे राना अय्यूब चौधरी के दिमाग ने कुछ इस तरह प्रोसेस किया उसमे सिर्फ हिंदू मुसलमान ही दिखते है।

बरसात कैसे होती है – मैं कोई विज्ञान का पाठ नहीं पढ़ानेवाला परंतु मोटे तौर पर सूर्य की किरणों से झील, नदी और समुंदर के पानी का वाष्पीकरण होता है, जिससे बादल बनते है। समय के साथ धीरे-धीरे बादल ठंडे और बोझिल होते जाते है और हवा के वायुदाब से बरसात होती है। हवा के वायुदाब के बढ़ने और घटने से बाढ़ और सूखे की परिस्थितिया उत्पन्न होती है।

राना चौधरी की नजर से कश्मीर में बाढ़ की रिपोर्ट।

सन १९४७ में भारत के आजद होने के बाद कश्मीर के हिन्दू राजा ने कश्मीर को जालिम हिंदूवादी विचारधारा के लोगो को सौंप दिया। ये जालिम हिन्दू पुरे विश्व में आतंक फैलाते है और मुसलमनो का नाम ख़राब करते है। कश्मीर भारत का गुलाम है और वहा के लोग भारत की गुलामी से आजदी चाहते है और इसलिए कश्मीरी पंडितो को उनके घर से खदेड़ दिया गया। जिस दिन कश्मीर से सभी कश्मीरी पंडितो को खदेड़ा गया उस दिन कश्मीर के लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत हुई और इस घटना को इतिहास की सुनहरे अक्षरो में लिखा जायेगा। (आप सोच रहे है की बाढ़ का जिक्र कहा है – अरे भाई अभी दिल की भड़ास निकाली जा रही है और सेक्युलर माहोल बनाया जा रहा है बाढ़ के किस्से पर भी मोहतरमा थोड़े समय में आएँगी)

 

कट्टर हिन्दू हमेशा से कश्मीर की आवाम के खिलाफ थे। इसलिए कम्युनल लोगो ने मिलकर कश्मीर में बाढ़ लाने की योजना बनाई। कश्मीर में बाढ़ लाने की योजना को अमलीय जामा पहनाने के लिए कई कट्टर दलो से बड़े-बड़े पुजारी चुने गए। वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार हवा के वायु दाब में छेड़ छाड़ करके बादलो को कश्मीर घाटी में जरुरत से अधिक बरसने के लिए मजबूर किया गया। इस घटना को अंजाम देने के लिए दक्षिण भारत से लेकर मध्य भारत तक और उत्तर भारत में विशेष रूप से यज्ञ का आयोजन किया गया। यज्ञ में लगा पैसा कश्मीर की जनता को पत्थर खरीदने के लिए दिया जा सकता था परंतु कट्टर हिंदू दलों ने यज्ञ में शुद्ध देशी घी का इस्तेमाल करके वायुमंडल में जरुरत से अधिक मात्र में धुँआ भर दिया। इस यज्ञ से वायुमंडल का तापमान बिगड़ गया और कश्मीर में बाढ़ आ गयी। जिस बाढ़ में कई बेगुनाह मुसलमान कश्मीरी मारे गए। insaan

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