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2024 के चुनाओं की चुनौतियां

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2024 के चुनाओं की चुनौतियां

2014 के चुनाव में आज का विपक्ष सत्ता में था और रक्षात्मक भूमिका में था। उसके पहले के वर्षों में लगातार घोटालों के पर्दाफाश हो रहे थे, देश की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो रही थी, आतंकवाद के नियमित प्रहार हो रहे थे और महंगाई समाज के बड़े तबके का दम घोंट रही थी। ऐसी स्थिति में मोदी, गुजरात मॉडल के ध्वज के साथ एक धूमकेतु की तरह राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर चमके और छा गए।

2019 तक विपक्ष को यह समझ आ चुका था कि मोदी की ईमानदार छवि ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए रणनीति के तहत यह तय किया गया कि इस छवि पर हमला किया जाय। इस रणनीति का आधार वही पुराना तर्क था कि राजनीति तथ्यों पर नहीं बनाए गए माहौल पर चलती है। इसी रणनीति के तहत 2004 के आम चुनाव में, अटलजी के सफल कार्यकाल के बावजूद गोधरा काण्ड में 59 हिंदुओं को जिंदा जलाने के बाद हुए दंगो के सन्दर्भ में भाजपा पर भ्रामक और मिथ्या आरोप लगा कर, जीत हासिल की गई थी।

इसलिए 2019 के आम चुनाव के पहले राफेल का झूठ गढ़ा गया। भारतीय राजनीति के स्तर को अभूतपूर्व निचले स्तर पर ले जाते हुए चौकीदार चोर है का नारा लगाया गया। अधेड़ युवा, मंच से इस उम्मीद से चीखता रहा कि किसी को सौ बार चोर बोला जाए तो लोग उसे वास्तव में चोर मानने लगते है। इतिहास में इस रणनीति के आधार पर अटल जी और रिचर्ड निक्सन जैसे लोगो को बलि चढ़ा दिया गया था, इसलिए शायद इसे एक अचूक रणनीति माना गया होगा। परन्तु सोशल मीडिया ने ये सारे समीकरण गलत साबित कर दिए। झूठ सतत झूठ साबित होता रहा। लोग झांसे में नहीं आए और मोदी एक बार पुनः, और अधिक मजबूत बहुमत के साथ, सत्ता में आ गए।

अब 2024 की बिसात बिछ रही है। दस वर्ष बाद भी मोदी जी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। अंतर्राष्ट्रीय छवि और अधिक निखरी ही है। देश आज सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अहम स्थान रखने लगा है। COVID के बावजूद निरंतर विकास चल रहा है। बॉलीवुड के बावलों से लेकर न्याय व्यवस्था के मठाधीशों तक, भ्रामक भाषणों से लेकर सफेद झूठ तक और टुकड़े टुकड़े के आवाहन से लेकर धार्मिक संस्थाओं के संचालन तक सब कुछ आजमाया जा चुका है और सब कुछ बुरी तरह असफल रहा है।

दूसरी और राष्ट्रीय चेतना, सनातन के प्रति आदर, इतिहास के प्रति गर्व और संस्कृति के प्रति लगाव हर दिन बढ़ता जा रहा हैं। यही वे तत्व जिनसे कोई राष्ट्र शक्तिशाली और समृद्ध बनता है। इन्ही तत्वों को एक सोची समझी रणनीति के तहत विदेशी धन और देशी राय बहादुरों के माध्यम से हमसे दूर रखा गया था।

देश के नागरिकों में राष्ट्रवाद, इतिहास और संस्कृति के प्रति बढ़ता गर्व, पूरे विश्व में बढ़ता भारत का वर्चस्व, हमारी समृद्धि में होता चहुंमुखी विकास, देश के रूप में बढ़ती हमारी आर्थिक एवं सामरिक शक्ति। देश और विदेश की भारत विरोधी शक्तियों के सीनों पर सांप लौट रहे हैं। और इस सब परिवर्तन का केंद्र सिर्फ एक व्यक्ति है – नरेंद्र मोदी!

इसलिए किसी भी कीमत पर नरेंद्र मोदी से 2024 में छुटकारा पाना है। वो स्वयं कोई मौका दे नहीं रहे। देश में संभव सारे दांव चले जा चुके हैं और असफल रहे हैं। इसलिए अब विदेशों से आक्रमण हो रहे हैं।

BBC का वृत्त चित्र और अडानी पर हमला तो सिर्फ शंखनाद है। आने वाले लगभग पंद्रह माह क्षुद्र, देशविरोधी और खतरनाक राजनीति से भरे होने की प्रबल संभावना है। विपक्ष और देश विरोधी तत्व के बीच विभाजन रेखा धूमिल तो हो ही चुकी है, गायब भी हो सकती है। मोदी का पांच वर्ष और रहना भारत विरोधी शक्तियों, उनकी देशी कठपुतलियों और उन कठपुतलियों के पिछलग्गुओं के लिए असहनीय तो है ही, अस्तित्व पर संकट भी है। इनमे से कईं उम्र के उस दौर में हैं कि अब उन्हें दूसरा मौका नहीं मिलेगा। इसलिए येन केन प्रकारेण उन्हे मोदी को हटाना है। वे इसके लिए किसी भी हद तक गिर सकते है।

ऐसी परिस्थिति में एक आम राष्ट्रवादी नागरिक को जागरूक रहना जरूरी है। यह आवश्यक है कि हम स्वयं भ्रमित न हो और अपने प्रभाव क्षेत्र के लोगों को भी भ्रमित न होने दे।

ऐसा समझा जा सकता है कि आने वाले पंद्रह महीने हम सब एक युद्ध की स्थिति में हैं। वैचारिक युद्ध… जो कि हमारे राष्ट्र की नियति तय करेगा। इस युद्ध में अगर हम गिलहरी योगदान भी दे सके तो वह हमारे जीवन का स्वर्णिम कार्य होगा।

श्रीरंग पेंढारकर
04/02/2023

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