Sunday, November 27, 2022
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरोधी, भ्रटाचारी, तानाशाह और आतंकी ही क्यों होते हैं? भाग-२

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Nagendra Pratap Singh
Nagendra Pratap Singhhttp://kanoonforall.com
An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

स्वतन्त्रा के पश्चात कांग्रेस करीब ४९ वर्षो तक सत्ता का सुख भोगती रही और इस दौरान उसने:-

सात प्रधानमंत्री दिए जिसमें स्व लाल बहादुर शास्त्री जी ही जनता के प्रधानमंत्री साबित हुए, अन्य निम्न प्रकार हैं:-

१:-जवाहरलाल नेहरू (१९४७ -६४), २:-लाल बहादुर शास्त्री (१९६४-६६), ३:- इंदिरा गांधी (१९६६ -७७ ,१९८० -८४) ४:- राजीव गांधी (१९८४ -८९) ५:-पी.वी. नरसिम्हा राव (१९९१ -९६) और ६:- मनमोहन सिंह (२००४ -२०१४) थे।

सात राष्ट्रपति दिए:- १:-डॉ राजेन्द्र प्रसाद (१९५०-६२), २:- फखरुद्दीन अली अहमद (१९७४ -७७) ३:-ज़ैल सिंह (१९८२-८७), ४:-रामास्वामी वेंकटरमण (१९८७-९२), ५:- डा शंकर दयाल शर्मा (१९९२-९७), ६:- के आर नारायणन (१९९७ -२००२) और प्रतिभा देवीसिंह पाटिल (२००७ -२०१२)

पाँच उपराष्ट्रपति दिए:- १:-बासप्पा दनप्पा जत्ती (१९७४-७९), २:-रामास्वामी वेंकटरमण (१९८४ -८७), ३:- डा शंकर दयाल शर्मा (१९८७-९२), ४:-के आर नारायणन (१९९२-९७) और ५:-हामिद अंसारी (२००७-२०१७)।

छह लोकसभा अध्यक्ष दिए:-१:-गणेश वासुदेव मावलंकर (१९५२-१९५६), २:-अनन्त शयनम् अयंगार (१९५६-१९६२), ३:-सरदार हुकम सिंह (१९६२-१९६७), ४:-नीलम संजीव रेड्डी (१९६७-१९६९), ५:-जी. एस. ढिल्‍लों (१९६९-१९७५) और ६:-बलि राम भगत (१९७६-१९७७).

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि कांग्रेस ने किस प्रकार सत्ता पर अपना वर्चस्व स्थापित कर रखा था और मनमानी करते हुए राज कर रही थी। कांग्रेस के राज के हर मोड़ पर हिन्दू समाज एक अपमानित जीवन जीने के लिए बाध्य था।

अपने सत्ता और शक्ति के माध में चूर कांग्रेस ने आपातकाल की घोषणा करके भारतवर्ष के लोकतंत्र का गला घोंट दिया और यही केवल नहीं हुआ अपितु स्नाविधान की आत्मा उसकी उद्देशिका (PREAMBLE) को भी अपने तुष्टिकरण की नीति का शिकार बना डाला जो संविधान के ४२वें संसोधन के नाम से कुख्यात है।

दिनांक  २५ जून १९७५ को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं, राजनीतिक शिष्टाचार तथा सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर मात्र अपना राजनीतिक अस्तित्व और सत्ता बचाने के लिए देश में आपातकाल थोप दिया। उस समय भ्रष्टाचार, समाजिक कुव्यवस्था और अधिनायकवादी और परिवारवादी नीतियों के विरुद्ध एक योद्धा मैदान में उतर चुके थे, जिन्हे आज हम “लोकनायक जयप्रकाश नारायण” के नाम से जानते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का  सामूहिक शक्ति ने इस  आंदोलन को  एक शक्तिशाली, संगठित देशव्यापी आंदोलन में बदल दिया।

मित्रो इस वक्त भी विपक्ष टुकड़ो में विभक्त था, किसी भी राजनितिक पार्टी के पास इतनी जनशक्ति या संगठन शक्ति नहीं थी कि वो कांग्रेस के इस अधिनायकवादी असमाजिक और अनैतिक निति के समक्ष स्वय को खड़ा कर सके परन्तु आरएसएस की बात ही कुछ और थी, इस समय देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही एकमात्र ऐसी संगठित शक्ति थी, जो इंदिरा गांधी की तानाशाही के साथ टक्कर लेकर उसे सदैव के लिए मिटा सकती थी।

इस तथ्य से कांग्रेस भलीभांति परिचित थी और संभावित प्रतिकार को ध्यान में रखते हुए इन्दिरा गांधी ने संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया।कांग्रेस द्वारा  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अन्य छोटी-मोटी कुल  २१ संस्थाओं को प्रतिबन्धित किया गया। किन्तु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अलावा किसी ने भी इस घोर अनैतिकता के विरुद्ध आवाज नहीं उठाया, जिसने कांग्रेस को और भी दुष्प्रेरित किया और इंदिरा गांधी ने सभी प्रांतों के पुलिस अधिकारियों को संघ के कार्यकर्ताओं की धरपकड़ तेज करने के आदेश दे दिये। संघ के भूमिगत नेतृत्व ने उस चुनौती को स्वीकार करके समस्त भारतीयों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का बीड़ा उठाया और एक राष्ट्रव्यापी अहिंसक आंदोलन के प्रयास में जुट गए। थोड़े ही दिनों में देशभर की सभी शाखाओं के तार भूमिगत केन्द्रीय नेतृत्व के साथ जुड़ गए।

संघ ने नाम और प्रसिद्धि से दूर रहते हुए राष्ट्रहित में काम करने की अपनी कार्यपद्धति को बनाए रखते हुए यह आन्दोलन लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा घोषित ‘लोक संघर्ष समिति’ तथा ‘युवा छात्र संघर्ष समिति’ के नाम से ही चलाया।संघ के भूमिगत नेतृत्व ने गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों, निष्पक्ष बुद्धिजीवियों एवं विभिन्न विचार के लोगों को भी एक मंच पर एकत्र कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भूमिगत नेतृत्व (संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक) एवं संघ के विभिन्न अनुषांगिक संगठनों जनसंघ, विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद एवं मजदूर संघ इत्यादि लगभग ३० संगठनों ने भी इस आंदोलन को सफल बनाने हेतु अपनी ताकत झोंक दी और अंतत: संघ के अथक अनवरत और स्वार्थरहित अहिंसात्मक प्रयासों का ही प्रभाव था कि भारत में नए सूर्य का उदय हुआ कांग्रेस के घमंड को चकनाचूर करके विपक्षियों ने मिलकर सरकार बनाई।

मित्रो जनसंघ के नाम से प्रसिद्ध “भारतीय जनसंघ की स्थापना” स्व श्री  डॉ॰ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कांग्रेस के पार्टी के तुष्टिकरण वाली  राजनीति के प्रत्युत्तर में और राष्ट्रवाद के समर्थन में वर्ष १९५१ में की थी। वर्ष १९७५ में प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया। जनसंघ ने इसके विरूद्ध व्यापक विरोध आरम्भ कर दिया जिससे देशभर में इसके हज़ारों कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया।वर्ष १९७७ में आपातकाल ख़त्म हुआ और इसके बाद आम चुनाव हुये, इस चुनाव में “जनसंघ” का भारतीय लोक दल, कांग्रेस (ओ) और समाजवादी पार्टी के साथ विलय करके “जनता पार्टी” का निर्माण किया गया जिसका प्रमुख उद्देश्य चुनावों में कांग्रेस को हराकर एक स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना करना था। जनता पार्टी के विघटन के बाद दिनांक ६ अप्रैल १९८० को भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की गयी, जिसके प्रथम अध्यक्ष स्व श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी थे।

मित्रो जैसा की प्रथम भाग में हमने इस तथ्य का समावेश कर लिया था कि “जंहा कांग्रेस सत्ता और शक्ति के मिश्रित लड़ाई में संगठनात्मक रूप से कमजोर होती गयी, वंही आरएसएस सनातन धर्म से जुड़े हर क्षेत्र को स्पर्श करते हुए अपनी सेवा के बल पर संगठनात्मक रूप से दिन दूनी रात चौगुनी विस्तार करती गयी। सहकार भारती, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, सेवा भारती, राष्ट्र सेविका समिति, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू स्वयंसेवक संघ, स्वदेशी जागरण मंच,सरस्वती शिशु मंदिर, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, बजरंग दल, लघु उद्योग भारती,भारतीय विचार केन्द्र, विश्व संवाद केन्द्र। राष्ट्रीय सिख संगत, हिन्दू जागरण मंच और विवेकानन्द केन्द्र नामक इत्यादि संगठनों ने समाज के बच्चो, युवाओ, प्रौढ़ों और वरिष्ठों इत्यादि के साथ साथ, छात्रों, दलितों, वनवासियों, मजदूरों और किसानो में अपनी गहरी पैठ बना ली, जिसके कारण आरएसएस समाज के हर वर्ग तक पहुंच कर उसका सम्मान अर्जित कर सका।” और इसका सुपरिणाम ये रहा कि वर्ष १९८० में स्थापित भारतीय जनता पार्टी ने १२५ वर्ष पुराणी पार्टी को उखाड़  फेंका और प्रथम बार केंद्र में सरकार बनने में वर्ष २००० में सफल हुई।

इसके पश्चात मित्रो वर्ष २००४ से लेकर २०१४ तक कांग्रेस ने लगातार दो बार केंद्र में सरकार बनायी और ना केवल देश के खजाने को जम कर लुटाया अपितु इनके राज में आतंकवादियों ने देश के लगभग प्रत्येक महत्वपूर्ण  शहर को बम विस्फोट से दहला दिया। महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई तो आतंकवादियों की सैरगाह हो चुकी थी, कई बार मुंबई की छाती को आतंकियों की गोली ने लहूलुहान कर दिया।

मित्रो देश या विदेश में जब जब भी विपत्ति आयी ये कांग्रेसी दूर से बैठकर तमाशा देखने के अलावा कुछ नहीं करते थे, अपितु निर्लज्जता से उस विपत्ति के समय भी आर्थिक लाभ प्राप्त करने से गुरेज नहीं करते थे, वंही आरएसएस के स्वय सेवक हर विपत्ति में चाहे वो भोपाल गैस त्रासदी हो, कच्छ और भुज में आया भूकंप हो या बिहार, उड़ीसा, केरल और पश्चिम बंगाल में हुआ जल प्रलय हो या फिर नेपाल को दहलाने वाला भूकंप हो या आतंकवादियों द्वारा बम विस्फोट में मारे गए लोगो की सेवा करनी हो या फिर किसी क्षेत्र या पुरे देश में फैली महामारी हो, हर वक्त तैयार मिले और उन्होंने निस्वार्थ भाव से सबकी सेवा की| सेवा का कार्य करते समय उन्होंने कभी भेदभाव करने की सोच को पनपने ही नहीं दिया और इस प्रकार आरएसएस के सेवक सबके नायक बनते गए और आरएसएस की ख्याति बढ़ती गयी।

मित्रो आपको बताते चले की संघ में संगठनात्मक रूप से सबसे ऊपर सरसंघचालक का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है। प्रत्येक सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। वर्तमान में संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत हैं। संघ के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के माध्यम से ही होता है,स्तुत: शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है। संघ की रचनात्मक व्यवस्था इस प्रकार है:-१:-केंद्र, २:-क्षेत्र, ३:-प्रान्त, ४:-विभाग, ५:-जिला, ६:-तालुका/तहसील/महकमा, ७:- नगर, ८:-खण्ड, ९:-मण्डल, १०:-ग्राम, ११:-शाखा।

शाखा:-शाखा किसी मैदान या खुली जगह पर एक घंटे की लगती है। शाखा में व्यायाम, खेल, सूर्य नमस्कार, समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है। सामान्यतः शाखा प्रतिदिन एक घंटे की ही लगती है।

मित्रो वर्ष १८३५ में ब्रिटेन की संसद हॉउस ऑफ़ कॉमन्स में अपने भाषण के दौरान “टी बी मैकाले” ने कुछ अकाट्य तथ्य रखते हुए बताया था कि “भारत में इस वक्त ७ लाख गांव हैं और किसी भी गांव में गुरुकुल ना हो ऐसा मैंने नहीं देखा”। इसके साथ ही भारत में  साक्षरता दर के विषय में पूछने पर मैकाले ने बताया कि इस वक्त भारत में साक्षरता की दर लगभग शत प्रतिशत है। मित्रो इस तथ्य को आप अपने अपने माध्यम से जाँच कर सकते हैं | तो संघ भी अपनी शाखाओ के माध्यम से  देश के कोने कोने से अपने आपको जोड़ता चला जा रहा है और इसी प्रक्रिया ने वर्ष २०१४ से संघ को सम्पूर्ण  विश्व के सबसे बड़े स्वय सेवको के  संगठन के रूप में प्रतिष्ठापित कर दिया है।

मित्रो वर्ष १९८० में स्थापित की गयी भारतीय जनता पार्टी आज विश्व की सबसे बड़ी राजैनितक पार्टी के रूप में स्थापित हो चुकी है और यही नहीं आज हमारे देश के केंद्र में और इसके साथ साथ कुछ  राज्यों जिसमे केरल, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और राजस्थान सम्मिलित हैं, को छोड़ दे तो देश के प्रत्येक राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है  और वंही १२५ से १४० वर्ष पुराणी पार्टी का दम्भ भरने वाली कांग्रेस आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

मित्रो आरएसएस के जन्म से लेकर आजतक किसी भी विपक्ष के नेता में इतना सामर्थ्य नहीं हुआ कि वो आरएसएस को किसी असमाजिक कार्य के लिए उत्तरदायी ठहरा सके और उसे साबित कर सके। गाँधी वध से लेकर वर्तमान में दो वर्ष पूर्व दिल्ली में हुए दंगो तक अनेक बार विपक्षियों ने कोशिश की आरएसएस को बदनाम करने की परन्तु हर बार आरएसएस एक हिरे की भांति निखरता और अपने प्रकाश से सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करता हुआ समाज में प्रतिष्ठित रहा। जो विपक्षी PFI जैसे खूंखार असमाजिक संगठन से  निस्वार्थ सेवा भाव वाले पवित्र चरित्र और आचरण वाले राष्ट्रभक्तो के संगठन आरएसएस  की तुलना करत रहे हैं वो निसंदेह असमाजिकता के काले चादर में अनैतिकता और कायरता से युक्त अपने चरित्र को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ भी नहीं।

आज कांग्रेस से लगभग ४० वर्ष बाद जन्म लेने वाले संगठन ने कांग्रेस को अस्तित्वविहीन कर छटपटाने के लिए छोड़ दिया है इस उम्मीद के साथ की एक दिन उसका चाल, चरित्र और सोच हमारे सनातन धर्म के अनुसार होगी, उसके विरुद्ध नहीं।

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि।

Nagendra Pratap Singh [email protected]

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