Wednesday, June 26, 2024
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अवमानना की हद

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Abhishek Kumar
Abhishek Kumar
Politics -Political & Election Analyst

देश के अटर्नी जनरल वेणुगोपाल ने नूपुर शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणियों का विरोध करने को अवमानना मानने से इनकार कर दिया। उन्होनें इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ले पूर्व जज एसएन ढींगरा सहित तीन लोगों के खिलाफ अवमानना का मामला चलाने की इजाजत भी नहीं दी। देखा जाए तो अटर्नी जनरल का यह फैसला उचित है। ऐसा इसलिए भी कि जायज आलोचना का हक सबको है। आलोचना किसी की भी हो और उचित दायरे में की जाए तो इसमें क्या हर्ज? फिर अगर ऐसे हर मामले में लोग अवमानना की याचिका लिए तैयार खडे रहेंगे तो अदालतों में ऐसे मामलों का अंबार लग जाएगा।

दरअसल, पिछले एक पखवाडे नूपुर शर्मा मामले में शीर्ष अदालत के जजों की टिप्पणियों को लेकर बखेडा खडा हो गया है। गौरतलब है कि नूपुर शर्मा ने एक टीवी चैनेल के कार्यक्रम में मुस्लिम नेता तसलीम रहमानी की हिंदू धर्म के आराध्य महादेव पर ओछी और घटिया टिप्पणी की थी जिसका जबाब देते हुए उन्होनें इस्लाम के पैंगबर मोहम्मद को लेकर एक टिप्पणी कर दी थी। इसके बाद देशभर में इसका विरोध होने लगा। इस दौरान उदयपुर में एक दर्जी की सरेआम हत्या कर दी गई। पता चला कि उसने नूपुर शर्मा का समर्थन किया था, इसलिए उसकी हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद जो नया विवाद पैदा हुआ, वह कहीं ज्यादा गंभीर है। विवादित टिप्पणी से नाराज लोगों ने नूपुर शर्मा के खिलाफ कई शहरों में मामले दर्ज करवाए।

इन सभी मामलों को एक जगह करने को लेकर नूपुर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन इस मामले की सुनवाई करने वाली दो जजों की पीठ ने पूरी घटना पर जिस तरह की नाराजगी जताई, उनकी जम कर आलोचना हुई।  मामले की सुनवाई करने वाले न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने नूपुर शर्मा की याचिका खारिज करते हुए  कहा था कि ‘आपकी टिप्पणी ने सारे देश को आग में झोंक दिया। आज देश में जो हो रहा है, उसके लिए यह महिला जिम्मेदार हैं।’  इतना ही नहीं , जजों मे नूपुर शर्मा को टीवी पर जाकर देश से माफी मांगने को भी कहा था।हालांकि जजों ने नाराजगी भरी ये टिप्प्णियां मौखिक रूप की थी और अदालत की कार्यवाही में दर्ज नहीं की गई पर इसके बाद सोशल मिडिया से लेकर हर स्तर पर इन टिप्पणियों का जोरदार विरोध हुआ।

दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज एसएन ढींगरा ने सुप्रीम कोर्ट की इन तल्ख टिप्पणियों को गैरजिम्मेदाराना और गैरकानूनी करार दिया था। उनका तर्क था कि बिना किसी जांच, गवाह और नूपुर शर्मा का पक्ष सुने यह कैसे मान लिया गया कि उदयपुर की घटना के लिए वही अकेली जिम्मेदार है।इस लिहाज से उन्होनें इस तरह की टिप्पणियों को अवैध और अनुचित करार दिया था। उनका कहना था कि इस तरह की टिप्पणियां निचली अदालतों को प्रभावित करने वाली हैं।

जाहिर है,उन्होनें जो कहा, उसके पीछे ठोस आधार रहा होगा। ढींगरा खुद हाई कोर्ट के जज रहे हैं, मामलों और ऐसी टिप्पणियों की व्याख्या वे भली प्रकार समझते हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के मुद्दे पर सौ से ज्यादा पूर्व नौकरशाहों, जजों और सैन्य अधिकारियों ने भी पत्र लिख कर विरोध जताया था। ऐसे में अगर ढींगरा सहित तीन लोगों के खिलाफ अवमानना का मामला चलाने की इजाजत दे दी जाती तो फिर खुला पत्र लिखने वाले पूर्व नौकरशाहों, जजों और सैन्य अधिकारी भी इस अवमानना के दायरे में आने चाहिए। ऐसे में किस-किस के खिलाफ अवमानना का मुकदमा चलेगा? फैसले की आलोचना अलग बात होती है और अपनी बात रखना अलग। सवाल है कि क्या अपनी बात रखना भी अवमानना हैं?

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