Sunday, December 4, 2022
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अल्पसंख्यक आयोग: देश के बहुसंख्यक समाज के साथ एक छलावा

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Nagendra Pratap Singh
Nagendra Pratap Singhhttp://kanoonforall.com
An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

मित्रों आप में से कितने लोगों ने अल्पसंख्यक आयोग अस्तित्व को भारतीय संविधान के तत्वाधान में समझने का प्रयास किया है। हम बहुसंख्यक समाज को बार बार धर्मनिरपेक्षता कि घुटी पिला पिला कर ये समझाने का प्रयास किया जाता रहा है कि हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और यंहा पर सभी धर्म बराबर है।

जबकि वर्ष १९४७ में भारत का बटवारा हि धर्म के आधार पर किया गया था और मुसलिम मजहब के लोगों ने अपने लिए पाकिस्तान ले लिया था। याद रखिये मुस्लिमो ने हि अलग देश कि माँग की थी, किसी ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी या सिक्ख धर्म के लोगों ने नहीं किया था।

परन्तु हम बहुसंख्यक समाज के साथ वर्ष १९४७ में धोखा किया गया, क्योंकि हम सनातन धर्मीयो को तो केवल एक देश मिला पर इन मुसलिम मजहब के लोगों ने ना केवल पाकिस्तान ले लिया बल्कि भारी मात्रा में ये हिंदुस्तान में ही रह गए और इस प्रकार बड़ी धूर्तता से उस समय के कुछ धोखेबाज अंग्रेजो के गुलामो के कारण ये पूरी तरह  जम गए।

इन मुसलिम मजहब के लोगों ने अंग्रेजो की बनाई पार्टी के अंग्रेजो के चाटुकार नेताओं के मुसलिम तुष्टिकरण कि निति का भरपूर लाभ उठाकर हम बहुसंख्यक समाज के लोगों को हिंदुस्तान में भी दोयम दर्जे का बना दिया और देश के सभी संसाधनों पर धीरे धीरे कब्जा जमा लिया।

वर्ष १९७५ के पश्चात तो इनकी चाँदी ही हो गई,जब स्व श्रीमती इंदिरा गाँधी का युग आरम्भ हुआ और उन्होंने बहुसंख्यक समाज के विरोधी  कम्युनिस्टो की सहायता से केंद्र में सरकार बना ली और शिक्षा का क्षेत्र् इन बेईमान और मक्कार कम्युनिस्ट लोगों के हाथ में आ गया और इन्होने धीरे धीरे भारतीय संस्कृति और सभ्यता को मुगलो की सभ्यता और संस्कृति में बद्ल दिया और हमारे इतिहास को विकृत कर दिया।

और इसी क्रम में एक सबसे बड़ा धोखा बहुसंख्यक समाज और बौद्ध, जैन, सिक्ख और पारसी जैसे अल्पसंख्यक समाज के लोगों के साथ हुआ और वो था अल्पसंख्यक आयोग का गठन:- (Minorities Commission- MC) अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की परिकल्पना भारत के गृह मंत्रालय के संकल्प दिनांक १२.०१.१९७८  के तहत की गई थी जिसमें विशेषरूप से उल्लेख किया गया था कि संविधान तथा कानून में संरक्षण प्रदान किए जाने के बावजूद अल्पसंख्यक असमानता एवं भेदभाव को महसूस करते हैं। यह केवल और केवल मुसलिम तुष्टिकरण निति का एक आयाम और वोट बैंक की राजीनीति का एक खेल था, जिसमें फायदा केवल और केवल मुसलिम समुदाय को दिया जा रहा था, जिनके बाप दादाओ ने मजहब के नाम पर अपना मुल्क पाकिस्तान पहले हि ले लिया था।

खैर वर्ष १९८४ में, अल्पसंख्यक आयोग को गृह मंत्रालय से अलग कर दिया गया और इसे नव-निर्मित कल्याण मंत्रालय (Ministry of Welfare) के अधीन रखा गया, जिसने वर्ष १९८८ में भाषाई अल्पसंख्यकों को आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया।

वर्ष १९९२ में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, १९९२ के अधिनियमन के साथ ही अल्पसंख्यक आयोग एक सांविधिक/वैधानिक (Statutory) निकाय बन गया और इसका नाम बदलकर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) कर दिया गया।

वर्ष १९९३ में, पहले वैधानिक राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया और पाँच धार्मिक समुदायों- मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी को अल्पसंख्यक समुदायों के रूप में अधिसूचित किया गया। परन्तु जब तक अंग्रेजो की बनाई गई कांग्रेस का शासन रहा ईस आयोग के लिए केवल और केवल मुसलिम समाज ही अल्पसंख्यक के रूप में दिखाई देता रहा।

जैन धर्म मानने वालों को वर्ष २०१४ में अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में अधिसूचित किया गया, जब आदरणीय श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी के नेतृत्व में प्रथम बार हम हिन्दुस्तानियो के सरकार बनी और अंग्रेजो की बनाई कांग्रेस अपने कमज़ोर अस्तित्व के साथ विपक्ष में बैठी।

अब प्रश्न ये उठता है कि, वर्ष १९७५ में आपातकाल लगाकर विपक्ष के सभी नेताओं को जेल में बंदकर संविधान के ४२ वे संसोधन के अनुसार संविधान की आत्मा को बदलकर उसके उद्देशिका में सोशल और सेक्युलर शब्द जोड़े गए तो फिर उस संसोधन का ही तिरस्कार करके अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना क्यों की गई।

याद रखिये राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के प्रथम अध्यक्ष न्यायमूर्ति मोहम्मद सरदार अली खान (१९९३-१९६) थे।

यदि हमारे संविधान के अनुसार:-

१:-हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष देश है;

२:-अनुच्छेद १४के अनुसार ” देश का प्रत्येक नागरिक क़ानून के समक्ष बराबर है”!

३:-संविधान के अनुच्छेद १५ और १६ जंहा एक ओर “धर्म, जाति, समुदाय, लिंग, वर्ण, भाषा या जन्म स्थान के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव का निषेध करते हैं वही दूसरी ओर राज्य के अधीन किसी भी कार्यालय में रोज़गार या नियुक्ति से संबंधित मामलों में नागरिकों को ‘अवसर की समानता’ का अधिकार है, जिसमे धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव निषेध करते हैं”।

४:- संविधान के अनुच्छेद २५ (१), २६ और २८:- लोगों को अंत:करण की स्वतंत्रता और स्वतंत्र रूप से धर्म का प्रचार, अभ्यास और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करते है।

विदित हो कि उपर्युक्त अनुच्छेदों में प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या वर्ग को धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों हेतु धार्मिक संस्थानों को स्थापित करने का अधिकार तथा अपने स्वयं के धार्मिक मामलों का प्रबंधन, संपत्ति का अधिग्रहण और उनके प्रशासन का अधिकार शामिल है। इसके साथ ही इन अनुच्छेदों के अनुसार “राज्य द्वारा पोषित संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक कार्यों में हिस्सा लेने या अनुदान सहायता प्राप्त करने की स्वतंत्रता होगी”।

५:- संविधान का अनुच्छेद २९:- उपबंध करता है कि भारत के राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार होगा।

 और यही नहीं संविधान का अनुच्छेद ३० तो इन तथाकथित अल्पसंख्यक समुदाय को “धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा, संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार देता है और विशेष रूप से 

अनुच्छेद 30 के तहत संरक्षण केवल अल्पसंख्यकों (धार्मिक या भाषायी) तक ही सीमित है और बहुसंख्यक वर्ग  तक विस्तारित नहीं किया जा सकता।

जब तथाकथित मुसलिम अल्पसंख्यक समुदाय के लिए जब संविधान ने स्वयम इतनी सुविधाएं दे रखी थी फलने फूलने और अपने समाज का विकास करने के लिए तो फिर अल्पसंख्यक आयोग क्यों बनाया गया?

१:-क्या ये बहुसंख्यक समाज के साथ किया जाने वाला सफ़ेद धोखा नहीं है?

२:-क्या हम बहुसंख्यक समाज के लोगों के हितों, अधिकारों और हको पर डाला गया डाका नहीं है?

३:-क्या बहुसंख्यक समाज के करदाताओं के कठिन परिश्रम से कमाई गए पैसों की लूट नहीं है?

आपको जान कर आश्चर्य होगा कि जब देश को तथाकथित स्वतन्त्रता प्राप्त हुई, उस समय पूरे देश में ५०० से ज्यादा छोटी बड़ी रियासते थी और दो चार रियासतो को छोड़ दे सब पर हुकूमत इन्हीं मुसलिम समुदाय के लोगों की थी, फिर जो कौम इतनी अमीर थी और जिन्होंने मक्कार अंग्रेजों के आने के पूर्व देश को जमकर लुटा और खजाना भरा वो हि लोग वर्ष १९७८ आते आते इतने गरीब कैसे हो गए की उनके विकास के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़े।

आज देश में सबसे ज्यादा अल्पसंख्यक यहूदी, पारसी, जैन और सिक्ख हैं पर ये आत्मसम्मान, स्वाभिमान और ईमानदारी से जीवन जीने वाली बड़ी हि बुद्धिमान और खूबसूरत लोग हैं। १:-आज धन के मामले में जैन समुदाय से ज्यादा धनी कोई नहीं।

२:-आज बुद्धिमता में पारसी और यहुदी समुदाय से आगे कोई नहीं।

३:-आज सेवा कार्य, देश भक्ति और अन्य सामाजिक कार्य क्षेत्र् में सिक्ख समुदाय से बढ़कर कोई नहीं।

४:-आज ज्ञान और धर्म के क्षेत्र में बौद्ध समुदाय से बढ़कर कोई नहीं।

५:- ईसाई समुदाय ने भी कभी अलग देश कि माँग नहीं उठाई।

परन्तु जो बहुसंख्यक होने के बावजूद भी अल्पसंख्यक होने का रोना रोते हैं, वो भला किस काबिल हैं, यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए।जिनके तुष्टिकरण के कारण हमारे देश के दो टुकड़े हो गए, आखिर वो इस अल्पसंख्यक आयोग के अस्तित्व की मलाई क्यों खा रहे है?

आइये देखते हैं कि आखिर ये अल्पसंख्यक आयोग कार्य क्या करता है?

१:- आयोग संघ और राज्यों के तहत अल्पसंख्यकों के विकास की प्रगति का मूल्यांकन करता है;

२:-संविधान और संघ तथा राज्य के कानूनों में अल्पसंख्यकों को प्रदान किये गए सुरक्षा उपायों की निगरानी करता है;

३:-अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की सुरक्षा के लिये नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु आवश्यक सिफारिशें करता है;

४:-अल्पसंख्यकों को उनके अधिकारों और रक्षा ऊपायों से वंचित करने से संबंधित विनिर्दिष्ट शिकायतों की जाँच पड़ताल करता है;

५:-अल्पसंख्यकों के विरुद्ध किसी भी प्रकार के विभेद के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याओं का अध्ययन करता/करवाता और इन समस्याओं को दूर करने के लिये सिफारिश करता है;

६:-अल्पसंख्यकों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विकास से संबंधित विषयों का अध्ययन अनुसंधान और विश्लेषण करता है;

७:-केंद्र अथवा राज्य सरकारों को किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित उपायों को अपनाने का सुझाव देता है;

८:-केंद्र और राज्य सरकारों को अल्पसंख्यकों से संबंधित किसी विषय पर विशिष्टतया कठिनाइयों पर नियतकालिक अथवा विशिष्ट रिपोर्ट प्रदान करता है;

९:-कोई अन्य विषय जो केंद्र सरकार द्वारा उसे निर्दिष्ट किया जाए, करता है।

१०:-यह सुनिश्चित करता है कि प्रधानमंत्री का १५ सूत्री कार्यक्रम लागू है और अल्पसंख्यक समुदायों के लिये यह कार्यक्रम वास्तव में काम कर रहा है।

अब मित्रों प्रश्न ये है कि पैदा होने से लेकर अब तक,

१:-क्या अल्पसंख्यक आयोग तथाकथित अल्पसंख्यक मुसलिम समुदाय के समाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक विकास में एक तिनके के बराबर भी योगदान कर पाया है।

२:- हर वर्ष करोड़ो रुपए खर्च करने के पश्चात भी क्या अल्पसंख्यक आयोग :-

क:-मुसलिम युवकों के शैक्षणिक स्तर में वृद्धि कर पाया है;

ख:-मुसलिम युवकों कि सोच और समझ में से कट्टरपन्थ को निकालकर समाज के मुख्यधारा से जोड़ पाया है;

ग:-केरल से लगभग ५० से ज्यादा मुसलिम युवकों ने ISIS को ज्वाइन कर लिया, क्या अल्पसंख्यक आयोग उन्हें रोक पाया;

घ:-CAA का विरोध मुसलिम विश्वविद्यालय के स्नातक और परास्नातक की उपाधियां अर्जित करने वाले छात्र और छात्राओ द्वारा किया गया, क्या अल्पसंख्यक आयोग उन्हें समझा पाया;

च:- CAA के विरोध में हुए दिल्ली में तथाकथित अल्पसंख्यक मुसलिम समुदाय के भटके लोगों के द्वारा पूरे जोश और खरोश से दंगे करने, लूटपाट करने और हत्या करने से अल्पसंख्यक आयोग रोक पाया;

छ:-रामनवमी और हनुमान जयंती के दिन देश के ८ राज्यों में बहुसंख्यक समाज के धार्मिक यात्रा को तथाकथित अल्पसंख्यक समाज के भटके युवाओं द्वारा की गई, अराजकता, लूटपाट और हमले से अल्पसंख्यक आयोग बचा पाया;

मित्रों ये तो कुछ घटनाये हैं, आप इतिहास उठाकर देख ले वर्ष १९९० में कश्मीर में हिन्दुओ व सिक्खों के साथ किये गए भयानक जिहादी /आतंकवादी घटनाओ को अंजाम देने वाले शांतिदूतों और वर्तमान में राजस्थान के जोधपुर में ईद की नमाज के बाद पत्थरबाजी करने वाले शांतिदूतों की सोच और समझ में ज़रा भी अंतर नहीं आया है, वे आज भी उसी सोच के साथ जी रहे हैं, कुछ नहीं बदला है।

फिर ये अल्पसंख्यक आयोग कौन सा दायित्व सही ढंग से निभा रहा है, ईश्वर जाने, पर हाँ, बहुसंख्यकों को किस प्रकार उनके, हको, हितो और अधिकारों से वंचित रखना है, ये अवश्य सतत और अनवरत किया जा रहा है।

ये अल्पसंख्यक आयोग ना केवल बहुसंख्यक समाज के साथ धोखा है, अपितु जैन, बौद्ध, सिक्ख, ईसाई और पारसी समुदायों के साथ किया जाने वाला एक छलावा है।

यदि हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष देश है तो अल्पसंख्यक आयोग सबसे बड़ा है।

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