Monday, November 28, 2022
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पराक्रम दिवस, कुछ ऐतिहासिक तथ्य और नेताजी से प्रेरणा पाता आत्मनिर्भर भारत

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Shailendra Kumar Singh
Shailendra Kumar Singh
Social Entrepreneur and Activist, Bagaha, West Champaran, Bihar

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का 125वां जन्मदिवस 23 जनवरी को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में पूरे देश में धूमधाम से मनाया गया। समूचे देश ने इस अदम्य वीर स्वतंत्रता सेनानी को गर्व और भावुकता के साथ याद किया। नेताजी का जन्मदिन आज तक इतनी चर्चा में नहीं रहा। आमतौर पर यह कुछेक जगहों पर यह दिन सरकारी कार्यालयों में अवकाश की तरह बीत जाता रहा या इसकी चर्चा कम होती रही।

श्याम बेनेगल ने नेताजी पर एक बायोपिक बनाई है जिसका शीर्षक ही है ‘नेताजी सुभाष चन्द्र बोस: द फॉरगॉटन हीरो’। ऐसा नहीं है कि देश ने या देश की जनता ने उन्हें भुला दिया या उतना याद नहीं रखा, नेताजी आज भी हर भारतवासी के दिलों में जिंदा हैं और इसका प्रमाण इस ‘पराक्रम दिवस’ पर दिखाई भी दिया। दरअसल होता यूँ रहा कि नेताजी को भुला देने और स्वतंत्रता की लड़ाई के कुछ अवास्तविक नेताओं की राष्ट्रीय छवि बनाने की शर्मनाक राजनीतिक कोशिशें आज़ादी के बाद लगातार होती रहीं। कहना न होगा कि 70 सालों तक मुख्य रूप से जो राजनीतिक पार्टी इस देश पर शासन करती रही उसका इसमें हाथ रहा। पर कांग्रेस पार्टी ने ऐसा क्यों किया? इसके पीछे कुछ ऐतिहासिक कारण रहे हैं। सन् 1938 में जब नेताजी गाँधीजी के समर्थन से कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये तब उन्होंने अध्यक्ष होने के नाते संगठन को एक नयी दिशा देने की कोशिश की। अब तक कांग्रेस की नीति ‘डोमिनियन स्टेटस’ पाने की थी जिसके तहत भारतीय अपनी सरकार तो चलाते लेकिन यह सरकार ब्रिटिश राजवंश के अंतर्गत काम करती। नेताजी हमेशा से ही इसका विरोध करते आये थे और उन्होंने ‘पूर्ण स्वराज’ की अपनी मांग को बार-बार दुहराया।

उनका स्पष्ट कहना था कि स्वराज मांगने की वस्तु नहीं है बल्कि लड़कर लेने की वस्तु है। इसलिए वे विश्युद्ध में फंसे अंग्रेजों की मुश्किलों का लाभ उठाकर उनके खिलाफ लड़ाई तेज करना चाहते थे। गांधी इसके लिए तैयार नहीं थे, उन्हें यह ‘अनैतिक’ मालूम पड़ता था। हास्यास्पद है कि अपने शोषक से लड़कर आज़ादी प्राप्त करना कैसे किसी को अनैतिक लग सकता है। इसलिए अगले साल 1939 में वे नहीं चाहते थे कि नेताजी दुबारा कांग्रेस के अध्यक्ष बनें। जैसा कि विदित है पहली बार कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुए और नेताजी अपने प्रतिद्वंदी और गाँधी समर्थित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को हराकर दुबारा कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। लेकिन गाँधीजी को यह मंजूर नहीं था और परिणामतः नेताजी को इस्तीफ़ा देना पड़ा और उन्होंने अपनी स्वतंत्र पार्टी भी बनाई। गाँधीजी की यह अनैतिक ज़िद देश को कितनी महंगी पड़ी इस बारे में स्वयं नेताजी के परपोते चन्द्र कुमार बोस ने हाल में दिए अपने बयान में बताया है। उन्होंने कहा कि अगर नेताजी को कांग्रेस छोड़कर जाना न पड़ता तो इस देश का विभाजन न होता। डोमिनियन स्टेटस पाने की इस राजनीति ने ही तत्कालीन नेताओं में पद की लालसा को बढ़ाया जिसकी वजह से जिन्ना जैसे नेताओं ने अलग देश की मांग की।  इस सबके बावजूद यह जानकर हैरानी होती है कि गाँधीजी को राष्ट्रपिता पहली बार नेताजी ने ही कहा था और एक तरह से यह पदवी उन्होंने ही गाँधीजी को दी थी।

बावजूद इसके नेताजी का हौसला कम नहीं हुआ। वे ‘वन मैन आर्मी’ का जीता जागता उदाहरण थे। नज़रबंदी से निकल भागना और अफगानिस्तान, रूस, जर्मनी होते हुए जापान पहुँचना तथा आज़ाद हिन्द फौज का गठन करना देश के किसी कांग्रेस नेता के बस की बात न थी। विदेशी ज़मीन पर आज़ाद हिन्द फौज के गठन ने देश के अंदर ऐसा संदेश दिया कि घर घर से लोग इस फौज में शामिल होने की इच्छा रखने लगे। लोगों ने अपनी जमापूंजी, महिलाओं ने अपने गहने नेताजी को आज़ादी की लड़ाई के लिए भेजे। देश की जनता भी सत्ता हस्तांतरण की जगह वास्तविक आज़ादी चाहती थी जो उन्हें किसी कांग्रेस पार्टी से नहीं बल्कि आज़ाद हिन्द फौज से मिलने वाली थी जिसने अंडमान निकोबार अंग्रेजों से जीत लिया था और नागालैंड होते हुए भारत की मुख्यभूमि में दाखिल हो रही थी।

आज़ाद हिन्द फौज का गठन सिर्फ एक सेना का गठन नहीं था बल्कि एक संदेश था जो ब्रिटिश सेना में काम करने वाले भारतीय सिपाहियों को भेजा गया था कि, लड़ाई में मरना है तो अपने देश के लिए लड़ते हुए मरो। और यह संदेश भारतीय सिपाहियों तक बड़े प्रभावपूर्ण तरीके से पहुँचा भी। 1946 में हुआ नौसेना विद्रोह इसका एक बड़ा उदाहरण है जब रॉयल इंडियन नेवी (तत्कालीन ब्रिटिश भारतीय नौसेना) के तकरीबन 20 हज़ार नौसेनिकों ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह कर दिया। उन्होंने न सिर्फ आजाद हिन्द फौज के राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग की बल्कि ‘भारत छोड़ो’ के नारे भी लगाये। विडंबना है कि इस आन्दोलन को उस समय कांग्रेस का समर्थन भी नहीं मिला। क्योंकि कांग्रेसी और मुस्लिम लीग के नेता सत्ता की बंदरबांट में लगे हुए थे। क्लिमंड एटली जो भारत की आज़ादी के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे, वे कई वर्षों बाद 1956 में भारत आये और उन दिनों पश्चिम बंगाल के गवर्नर जस्टिस पीबी चक्रवर्ती के अतिथि थे। जस्टिस चक्रवर्ती ने उनसे पूछा कि अंग्रेजों ने भारत क्यों छोड़ा जबकि 1944 तक भारत छोडो आन्दोलन कमजोर पड़ चुका था। एटली ने साफ़ साफ़ जवाब दिया बोस की आज़ाद हिन्द फौज की वजह से, जिस कारण ब्रिटिश भारतीय सेनाओं में विद्रोह शुरू हो गये थे। अंग्रेजों को यह अंदेशा हो गया था कि अगर ये विद्रोह तेज हो गये और उन्होंने भारत नहीं छोड़ा तो उनका सफाया होते देर नहीं लगेगी। ऐसी थी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की योजना और उनका तेज।

यह अपने आप में विडंबनापूर्ण है कि देश को अपने वास्तविक स्वतंत्रकर्ता को उसका सही अवदान स्वीकारने में इतना वक़्त लगा। लेकिन ज़ाहिर है यह काम कांग्रेस की सरकारों में कतई नहीं हो सकता था जिसने नेताजी की मृत्यु(?) तक को एक रहस्य बनाकर रख दिया। वाजपेयी सरकार ने 1999 में पहली बार नेताजी की मृत्यु से पर्दा उठाने के लिए मुखर्जी आयोग का गठन किया था, इस आयोग ने 2006 में अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें कहा गया कि नेताजी की मृत्यु बतायी गयी विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी। लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस रिपोर्ट को ही खारिज़ कर दिया। दरअसल, आज़ाद हिन्द फौज का गठन एक वैश्विक राजनीति का हिस्सा भी थी जिसे नेताजी बखूबी समझते थे, द्वितीय विश्वयुद्ध में धुरी राष्ट्रों से अंग्रेजों के खिलाफ़ भारत के पक्ष में समर्थन लेना इसका उदाहरण है। नेताजी की मृत्यु या लापता होने में यह वैश्विक राजनीति काम कर रही थी, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। मुखर्जी आयोग ने तो टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर में रखी गयी नेताजी की अस्थियों को भी अवास्तविक बताया। लेकिन क्या आज़ादी के 60 साल बाद 2006 में भी देश में चल रही कांग्रेस की सरकार विदेशी शक्तियों से प्रभावित हो रही थी ? एक संप्रभु राष्ट्र होने का क्या फायदा जब आपको अपने ही देश के आतंरिक फैसले दूसरे देशों के दबाव में लेने पड़ें। लेकिन यह कांग्रेस पार्टी का इतिहास है जो अब खुद इतिहास बनने की ओर अग्रसर है।

इसीलिए इस प्रथम ‘पराक्रम दिवस’ पर प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ बेहद जरूरी बातें कही हैं जिनपर गौर करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज दुनिया एलएसी (LAC) से एलओसी (LOC) तक भारत का पराक्रम देख रही है जहाँ भारत की संप्रभुता को चुनौती देने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया जा रहा है। देश को इस पराक्रम की प्रेरणा नेताजी से मिल रही है जिन्होंने अपने समय की सबसे शक्तिशाली सत्ता से कहा कि मैं तुमसे अपनी आज़ादी मांगूंगा नहीं बल्कि छीन लूँगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि आज ‘आत्मनिर्भर भारत’ की ओर अग्रसर हो रहा देश बार बार नेताजी से प्रेरणा पाता है। उन्होंने कहा कि आज हम स्त्रियों के सशक्तिकरण की बात करते हैं नेताजी ने उस समय ही आज़ाद हिन्द फौज में ‘रानी झाँसी रेजिमेंट’ बनाकर देश की बेटियों को भी सेना में शामिल होकर देश के लिए बलिदान देने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि आज़ाद हिन्द फौज़ जाति-धर्म से ऊपर उठकर देश के मर मिटने वालों की फौज थी।

इस तरह प्रधानमंत्री ने नेताजी से प्रेरणा लेते हुए देश के भीतर जाति-धर्म-लिंग आदि स्तरों पर होने वाले भेद-विभेद से ऊपर उठकर देश की सुरक्षा के लिए और देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नागरिकों से अपील की। नेताजी को इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है कि उनके जन्मदिवस के सवा सौवें साल पर पूरा देश उनके पराक्रम से प्रेरणा पाए और देश को नेताजी के सपनों का देश बनाने की ओर कदम बढ़ाये।

जय हिन्द।

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