Saturday, February 27, 2021
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प्राण व दैहिक स्वतंत्रता अनुच्छेद 21

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वसुधैव कुटूंबकम!

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।

सर्वेशां स्वस्तिर्भवतु। सर्वेशां शान्तिर्भवतु।
सर्वेशां पुर्णंभवतु। सर्वेशां मङ्गलंभवतु।

आप सोच रहे होंगे कि मैं ये संस्कृत के श्लोक क्यों लिख रहा हूँ, पर जरा ध्यान से इन श्लोको को अपने मस्तिष्क मे केंद्रित कर सूछ्म विवेचना किजीये और विचारिये कि आखिर ईनके द्वारा किस विषय की ओर आपका ध्यान आकृष्ट कराया जा रहा है…

जी हाँ, हमारे सनातन धर्म की यही तो मौलिक सुंदरता है कि वो संपूर्ण चराचर जगत के एक परिवार के रूप मे प्रतिष्ठित करता है, वो सभी के लिये खुशी, निरोगी, अभावरहीत व शांतिपूर्ण जीवन की कामना करता है।

हमारे सनातन धर्म की मूल भावना “जीयो और जीने दो” तथा “सभी जीवो को अपना जीवन अपनी ईच्छा से जीने का अधिकार है” में निहित है।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने भी अपने संपूर्ण जीवन काल मे प्रत्येक जीव के प्राण व दैहिक स्वतंत्रता को अमुल्य व सर्वोपरि मानकर प्रतिष्ठित किया फिर चाहे सुग्रीव को किष्किंधा का नरेश बनाकर उनकी पत्नि से उन्हे मिलाना रहा हो, माता सिता को रावण के कैद से मुक्त कराना रहा हो या फिर विभिषण को लंका का जीता हुवा राज्य प्रदान कर शांती व स्वतंत्रता का स्थापना करना हो।

भगवान श्रीकृष्ण नें कुरुक्षेत्र की रणभूमि मे अर्जुन को महान उपदेश देते हुये कर्म व धर्म के प्रभाव से संपूर्ण संसार को परिचित कराया और एक सामाजिक परिवेश में प्रत्येक जीव के प्राण व दैहिक स्वतंत्रता के महत्व को स्थापित किया।

महर्षि वाल्मिकी, महर्षि वेद व्यास, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि जैमिनी, महर्षि पतंजलि, महर्षि कणाद, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर स्वामी, आचार्य चाणक्य, गुरू नानक देव, स्वामी रामाकृष्ण परमहंस, स्व स्वामी दयानंद सरस्वती, स्व सरदार वल्लभ भाई पटेल, सर्वोच्च बलिदानी भगत सिंह, अमर बलिदानी चंद्रशेखर आजाद स्व स्वामी विवेकानंद, स्व लाल बहादुर शास्त्री, स्व डॉ अब्दुल कलाम व प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ईत्यादी सभी के “सबका साथ सबका विकास व सबका विश्वास” की मूल भावना को अनुच्छेद 21 ही प्रतिष्ठापित करता है।

यही कारण है कि सनातन धर्म की सार्वभौमिक ईसी मूल भावना को अनुच्छेद 21 के माध्यम से हमारे महान संविधान नेें हमारे देश के नागरिको को प्राण व दैहिक स्वतंत्रता का मूलभूत अधिकार दिया है।

अनुच्छेद 21 के द्वारा प्रदान किये गये “प्राण व दैहिक स्वतंत्रता (Life and Public Liberty) अधिकारो में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार , मानव गरिमा के साथ जीवन यापन का अधिकार, शिछा का अधिकार, जीविकोपार्जन के साधन का अधिकार, मानव सम्मान (Reputation) का अधिकार, लिंगभेद से बचाव की अधिकार, रोटी, कपड़ा व मकान प्राप्त करने का अधिकार, अन्य जीवों को जीने का अधिकार प्रकृति व वनों को संरछण का अधिकार तथा हवा व जल का प्रदुषण से बचाव का अधिकार ईत्यादी भी सम्मिलित है।

अनुच्छेद 21 स्थापित करता है “No person shall be deprived of his life or personal liberty except according to the procedure established by law” अर्थात “विधि द्वारा प्रतिस्थापित कार्यवाही के बीना किसी व्यक्ति को उसके प्राण व दैहिक स्वतंत्रता से बाधित नही किया जा सकता”।

ये अनुच्छेद 21 अपने अंदर अनुच्छेद 14 व अनुच्छेद 15को समाहित किये हुये है अनुच्छेद 14 जहाँ स्थापित करता है। “भारत के सभी नागरिक विधी को समछ बराबर है वहीं अनुच्छेद 15 राज्य को अपने किसी भी नागरिक से ” जाती, लिंग, वर्ण, जन्म स्थान, भाषा या भेषभूषा के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है”।

ईलाहाबाद(अब प्रयागराज) उच्च न्यायालय ने रामजी सिंह @ मुजिब भाई v/s उ. प्र. राज्य (Civil Misc.Writ Petition No. 38985/2004 AIR 2009) मे निर्णय देते हुये कहा कि अनुच्छेद 21मे उद्धृत “Person” शब्द ना केवल जीवित व्यक्ति को अपितु कुछ परिधि तक मृत व्यक्ति का भी प्रतिनिधित्व करता है। यहि कारण है कि जब आतंकवादी या अपराधी मारे जाते हैं तो भारतीय सेना व पुलिस उनके मृत शरीर का अंतिम क्रिया कर्म उनके धर्म/ मजहब के अनुसार कर देते हैं।

मेनका गाँधी V/S यूनियन आफ ईण्डिया (1978 AIR 5971978 SCR (2) 71 केस में अपने सुविख्यात निर्णय को पारित करते हुये सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधिश श्री पी एन भगवती जी ने कहा था कि राज्य किसी एसी विधिक प्रक्रिया को प्रतिस्थापित नही कर सकता जो Arbitrary, unfair व unreasonable हो। अनुच्छेद 21 एसा करने से राज्य को स्पष्ट रूप से रोकता है!Justice Bhagawati ने Just, Fair व Reasonable जैसे तिन कारक बतलाये जिन्हें किसी विधिक प्रक्रिया को स्वरूप के गठन समय ध्यान मे रखना चाहिये ताकी किसी भी प्रकार के अन्याय की संभावना ही ना हो।

फ्रांसीस कोर्ली मूलीन V/S (प्रशासक) केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली और अन्य (1981 AIR 746) मे आदरणीय न्यायालय ने स्पष्ट किया की “प्राण का अधिकार (Right to Life) में निम्न अधिकारो का समावेश होता है :-
मानव गरिमा के साथ जीवन यापन करने का अधिकार
पर्याप्त पोषण, वस्त्र व छत्रछाया प्राप्त करने का अधिकार
पढ़ने, लिखने व स्वंय को अभिव्यक्त करने का अधिकार
एक स्थान से दुसरे स्थान पर भ्रमण का अधिकार ईत्यादी

ओमप्रकाश चौटाला v/s कवर भान (2014) 5 SCC 417 मे सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि, “सम्मान (Reputation) किसी व्यक्ति के जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग होता है, यदि सम्मान पर चोट पहुँचती है तो वो व्यक्ति स्वंय को अधमरा महसूस करता है”!अत: यह स्पष्ट है कि अनुच्छेद 21 व्यक्ति के सम्मान को भी संरछण प्रदान करती है।

ईसी प्रकार मैक्स आफ बांबे V/S M/s. ZY AIR 1977 Bom 406 मे न्यायालय द्वारा यह निर्धारित किया गया कि एक व्यक्ति को केवल ईसलिए नौकरी के लिये चिक्त्सकिय आधार अयोग्य घोषित नही किया जा सकता कि वो एड्स पाजीटीव है।

विशाखा V/S राज्य सरकार ( राजस्थान) (1977) 6 SCC 241 में सर्वोच्च न्यायालय ने “Gender Equality” के बारे स्पष्ट करते हुये निर्धारित किया कि ” Right to Life” under Article 21 along with other fundamental rights are guaranteed to us by constitution amptitude to cover gender equality including the right against sexual harassment”.

चमेली सिंह v/s राज्य सरकार (उ.प्र.) 1995 SUPP (6) SCR 827 मे पहली बार न्यायालय के द्वारा “Right to shelter” को स्थापित किया गया! न्यायालय ने स्पष्टतया कहा कि ” किसी भी व्यक्ति को Shelter प्राप्त करने के अधिकार से अवश्य ही वंचित नही किया जा सकता”!

एम सी मेहता v/s यूनियन आफ इंडिया 1987 AIR 1086 मे न्यायालय ने ये निर्धारित किया की अनुच्छेद 21 के अंतर्गत कई प्रकार के अधिकारो का समावेश है और वे केवल मानव जीवन तक सिमित नहीं है वरन जंगली जीवों, जंगल, तालाब, प्राचीन धरोहरो, पारिस्थितिक तंत्र, अप्रदुषित जल, वायु व भूमी के अधिकारो तक विस्तृत हैं।

मोहिनी जैन v/s राज्य सरकार (कर्नाटक) 1992 AIR 1858 में न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि 14वर्ष की आयु तक हर नागरिक को “Free Education” प्राप्त करने का अधिकार है।

24अगस्त सन 2017 को ” Right to Privacy” को भी अनुच्छेद 21 की परिधि में सम्मिलित कर लिया गया अब ईसे भी मौलिक अधिकार के रूप मे वैधता प्राप्त हो चुकी है।

अर्नव मनोरंजन गोस्वामी v/s राज्य सरकार(महाराष्ट्र) 2020 वर्तमान समय मे महाराष्ट्र सरकार व रिपब्लिक टी वी के मुखिया श्री अर्नव मनोरंजन गोस्वामी के मध्य छिड़ा युद्ध जब से ( श्री अर्नव गोस्वामी को, सन 2018 मे एक आर्किटेक्ट स्व श्री अन्वय नाईक व उनकी माता जी के आत्महत्या के सिलसिले मे बंद हो चुके केस को पुन: जिंदा कर 2020 मे गिरफ्तार किया गया!) मुंबई उच्च न्यायलय से होता हुवा सर्वोच्च न्यायालय में पहुँचा तब से “Personal Liberty” की चर्चा एक बार पुन: जोरो पर है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश श्री डी वाई चंद्रचूड़ व श्रीमती ईंदीरा बनर्जी के डिवीजन बेंच ने श्री अर्नव मनोरंजन गोस्वामी जी के अवैध गिरफ्तारी पर मुंबई उच्च न्यायालय के द्वारा दिये गये निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुये कहा कि:-

“It would be travesty of Justice if personal liberty of a person is curtailed like this”.

उन्होंने राज्य सरकार को सचेत करते हुये कहा कि:-
“If state government target individuals they must realise then that there is apex Court to protect the liberty of citizens”.

एक कदम आगे बढ़ते हुये डिवीजन बेंच ने कहा कि “We are seeing case after case where High Courts are not granting bail and failing to protect personal liberty of people”.

“Courts must be alive to the need to safeguard the public interest in ensuring that the due enforcement of criminal law is not obstructed. The fair investigation of crime is an aid to it. Equally it is the duty of courts across the spectrum – the district judiciary, the High Courts and the Supreme Court – to ensure that the criminal law does not become a weapon for the selective harassment of citizens.”

Pertinently, the Court also noted,

“Doors of courts cannot be closed in such cases and courts should remain open for all cases of deprivation of personal liberty and such deprivation cannot be even for one day.”

डिवीजन बेंच ने “Jail is Rule and Bail is an exception” के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुये व्यक्ति के प्राण व दैहिक स्वतंत्रता को सर्वोपरी बताया और अर्नव मनोरंजन गोस्वामी को अतंरीम अनुतोष (Interim Relief) देते हुये जमानत पर तुरंत छोड़ देने का निर्देश दिया!

यहि नही डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि “If we don’t interfere in this case today, we will walk on a path of destruction. If left to me, I won’t watch the channel and you may differ in ideology, but constitutional courts will have to protect such freedoms…”

तो इस प्रकार हम देखते है कि आज के परिवेश मे जबकि आर्थीक, धार्मीक, सामाजिक, वैचारिक व राजनितिक वैमनस्यता अपने चरम की ओर अग्रसर है तब प्रत्येक न्यायालय का यह कर्तव्य बन जाता है कि वो प्रत्येक नागरिक के प्राण व दैहिक स्वतंत्रता की रछा करे।

नागेंद्र प्रताप सिंह (अधिवक्ता)
aryan_innag@yahoo.co.in
9172054828

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