Wednesday, December 2, 2020
Home Hindi बिहार चुनाव फैसला किसके पक्ष में?

बिहार चुनाव फैसला किसके पक्ष में?

Also Read

डॉ नीलम महेंद्रhttp://drneelammahendra.blogspot.in/
Writer. Taking a small step to bring positiveness in moral and social values.

बिहार देश का पहला ऐसा राज्य बनने जा रहा है जहाँ कोरोना महामारी के बीच चुनाव होने जा रहे हैं और भारत शायद विश्व का ऐसा पहला देश। आम आदमी कोरोना से लड़ेगा और राजनैतिक दल चुनाव। खास बात यह है कि चुनाव के दौरान सभी राजनैतिक दल एक दूसरे के खिलाफ लड़ेंगे लेकिन चुनाव के बाद अपनी अपनी सुविधानुसार एक भी हो सकते हैं। यानी चुनाव प्रचार के दौरान एकदूसरे पर छींटाकशी और आरोप प्रत्यारोप लगाने वाले नेता चुनावी नतीजों के बाद एक दूसरे की तारीफों के पुल भी बांध सकते हैं। मजे की बात यह है कि यह सब लोकतंत्र बचाने के नाम पर किया जाता है। हाल ही में हमने ऐसा महाराष्ट्र में देखा और उससे पहले बिहार के पिछले विधानसभा सत्र में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। 

दरअसल बीते कुछ सालों में  राजनीति की परिभाषा और चुनावों की प्रक्रिया दोनों में जबरदस्त बदलाव आया है। जहाँ राजनीति का लक्ष्य सरकार में पद प्राप्ति तक सीमित हो गया है वहीं चुनावी मैदान सोशल मीडिया के मंच पर सिमट गया है। राजनीति से राष्ट्र सेवा का भाव ओझल हो गया है तो चुनावी मैदान से आम आदमी। धरातल पर काम करने वाले नेता से लेकर कार्यकर्ता सभी लापता हैं। सोशल मीडिया पर “का बा” जैसे सवाल पूछे जाते हैं जिनका जवाब सोशल मीडिया पर ही “ई बा” से दे दिया जाता है। यानी चुनावी रैलियों और नुक्कड़ सभा में नहीं ए सी स्टूडियो में मुद्दे तय होते हैं जिनके जवाब नेताजी नहीं प्रोफ़ेशनल लेखक गायक और नायक देते हैं। दरअसल सोशल इंजीनियरिंग जात पात का गणित और वोटबैंक की राजनीति ने लोकतंत्र के केंद्र आम आदमी को इन राजनैतिक दलों के हाथों की कठपुतली बनाकर रख दिया है। बिहार की ही अगर बात करें तो आज़ादी के 70 सालों बाद आज भी वो देश का चौथा सबसे पिछड़ा राज्य है जहाँ गरीबी रेखा दर 34% है। साक्षरता के दर में भी बिहार 65% से भी कम साक्षरता के साथ देश के राज्यों की सूची में अंतिम पायदान पर है। लेकिन आप इसे क्या कहेंगे कि इसके बावजूद देश का लगभग हर दसवां ब्यूरोक्रेट बिहार से आता है। आईआईटी की परीक्षा हो या अन्य कोई प्रायोगिक परीक्षा, बिहार के बच्चे सबसे अधिक बाज़ी मारते हैं। इसके बाद भी बिहार ही वो राज्य है जहाँ बेरोजगारी की दर देश में सबसे अधिक है। यह बात सही है कि “जंगल राज” के उन दिनों से जब बिहार में अपहरण का भी एक उद्योग था, उस राज्य ने आज काफी दूरी तय करी है लेकिन इसके बाद भी आज तक उसकी गिनती देश के पिछड़े राज्यों की सूची में चौथे स्थान पर होती है।

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि विगत 70 सालों से जिस आम आदमी के नाम पर चुनाव लड़े जाते हैं वो आजतक आर्थिक अथवा सामाजिक तौर पर वहीं का वहीं हैं लेकिन चुनाव लड़ने वाले दल और नेता दोनों की ही आर्थिक प्रगति लगातार जारी है। यह हम नहीं कह रहे बल्कि उनके हलफनामे कहते हैं। इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी कि आज भी चुनाव जीतने के लिए राजनैतिक दल हर घर तक बिजली और पीने के लिए स्वच्छ पानी पहुंचाने जैसी मानव जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के ही वादे करते पाए जाते हैं। 

बिहार चुनावों ने एक बार फिर इन सवालों को प्रासंगिक कर दिया है कि आखिर आम आदमी करे भी तो क्या करे? उसके पास विकल्प ही क्या है? बिहार को ही लें। कांग्रेस जो आज बिहार क्या देश में अपना अस्तित्व तलाश रही है उसमें बिहार का वोटर अपना भविष्य कैसे तलाश सकता है। लालू प्रसाद यादव अभी जेल में हैं और उनके परिवार की आपसी फूट जो 2019 के लोकसभा चुनावों में खुलकर सामने आ गई थी आरजेडी और बिहार के मतदाता के बीच की सबसे बड़ी दीवार है। अपने विपक्षी राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी से कोई भी राजनैतिक दल लड़कर जीत सकता है लेकिन जब दल के भीतर ही राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी से सामना हो तो संघर्ष जीत के लिए नहीं बल्कि अपने अस्तित्व के लिए सिमट कर रह जाता है। महागठबंधन की अगर बात करें तो इसमें शामिल दलों में सीटों के बटवारे को लेकर सहमति अवश्य हो गई है लेकिन उम्मीदवारों की घोषणा इन दलों द्वारा एक सांझे मंच की अपेक्षा अलग अलग करना इनमें आपसी तालमेल के अभाव को दर्शाता है। मोदी लहर पर सवार एनडीए की बात करें तो आम आदमी के पास विकल्प यहाँ भी नहीं है। क्योंकि

नीतीश कुमार जो कि वर्तमान में मुख्यमंत्री हैं और सुशासन बाबू के नाम से जाने जाते हैं उन्होंने जेडीयू की पूर्व मंत्री मंजू वर्मा जो कि मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड की आरोपी हैं और फिलहाल जमानत पर बाहर हैं उन्हें टिकट देकर अपने सुशाशन की पोल खोल दी है। जानना रोचक होगा कि मुजफ्फरपुर कांड सामने आने पर तब उन्हें जेडीयू से निलंबित कर दिया गया था। इसी प्रकार सुशाशन बाबू की जेडीयू ने मनोरमा देवी को भी चुनाव लड़ने के लिए गया से अपनी पार्टी का टिकट दिया है जिनके पति स्थानीय बाहुबली हैं। याद दिला दिया जाए कि 2016 में पूरे देश को हिलाकर रख देने वाले गया के रोड रेज केस के चलते इन्हें भी नीतीश कुमार ने पार्टी से निष्कासित कर दिया था। इस कांड में इनके बेटे को आजीवन कारावास और पति को पांच साल जेल की सजा सुनाई गई थी। लेकिन अगर आप सोचते हैं कि केवल जेडीयू ही अपराध में लिप्त लोगों को टिकट देती है तो आपको बता दें कि भाजपा हो या आरजेडी कांग्रेस हो या वाम दल राजनीति में अपराधीकरण को बढ़ावा देने के दोषी सभी दल हैं।

नवादा से बीजेपी की वर्तमान विधायक अरुणा देवी को एकबार फिर टिकट दिया गया है जिनके पति 2004 के नवादा नरसंहार के आरोपी हैं। 2009 में उनके पति अखिलेश सिंह ने जब निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन भरा था तो अपने ऊपर 27 आपराधिक मामले चलने की बात स्वीकार की थी। आरजेडी की ओर से वैशाली की प्रत्याशी वीना सिंह पूर्व सांसद रामकिशोर सिंह की पत्नी हैं जिनपर अपहरण से लेकर हत्या तक के आरोप हैं। इन परिस्थितियों में लोकतंत्र के नाम पर जब चुनाव कराए जाते हैं तो आम आदमी अपनी पहचान ही तलाशता रह जाता है। क्योंकि उसके पास तो यह विकल्प भी नहीं है कि वो चुनाव का बहिष्कार करे या नोटा दबाए। क्योंकि चुनावों से पहले एक दूसरे के खिलाफ मुखर होकर लड़ने वाले दल नतीजों के बाद बहुमत के अभाव में एक दूसरे के साथ हाथ मिलाकर सत्ता पर काबिज हो जाता है और आम आदमी ठगा सा देखता रह जाता है। वो जान चुका है कि पार्टी कोई भी जीते उसकी हार निश्चित है।

डॉ नीलम महेंद्र

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

डॉ नीलम महेंद्रhttp://drneelammahendra.blogspot.in/
Writer. Taking a small step to bring positiveness in moral and social values.

Latest News

प्राण व दैहिक स्वतंत्रता अनुच्छेद 21

हमारे सनातन धर्म की मूल भावना "जीयो और जीने दो" तथा "सभी जीवो को अपना जीवन अपनी ईच्छा से जीने का अधिकार है" में निहित है मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने भी अपने संपूर्ण जीवन काल मे प्रत्येक जीव के प्राण व दैहिक स्वतंत्रता को अमुल्य व सर्वोपरि मानकर प्रतिष्ठित किया

2020: An unprecedented, unpredictable, and uncertain year

Who could have imagined that the “unique 2020” would ironically turn into the most "unprecedented, unpredictable, and uncertain 2020" of historic proportions, perhaps not even worth remembering and writing about?

Mr. Ahmad Patel, they missed you!

Through the obituaries and condolences written by MSM journalists, one can easily see as to why these power brokers who used to enjoy the access to power corridors are so unnerved as they miss the absence of jugglers and conjurers in current regime.

गुपकार गैंग द्वारा रोशनी एक्ट की आड़ में किया गया 25000 करोड़ रुपए का घोटाला!

व्यवस्था का लाभ उठाकर 2001 से 2007 के बीच गुपकार गैंग वालों ने मिलकर जम्मू-कश्मीर को जहाँ से मौका मिला वहाँ से लूटा, खसोटा, बेचा व नीलाम किया और बेचारी जनता मायूसी के अंधकार में मूकदर्शक बनी देखती रही।

Death of the farmer vote bank

While in the case of a farmer the reform delivered double benefit but the political class faces double whammy, that of losing its captive vote bank that was dependent on its sops and secondly losing the massive income they earned as middlemen between the farmer and the consumer. Either the farmer is misinformed or wrongly instigated, otherwise it is impossible to conceive that any farmer should be actually unhappy or opposed for being given more choices, as to whom to sell their produce.

Teachers assign essays with a 280 character limit

This a satire news article, which 'reports' that the government has added 280 character essays to the educational curriculum in an attempt to train students to use Twitter in the future. Note: I have chosen an image of a school from your media library and added the twitter logo on top of it.

Recently Popular

गुप्त काल को स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है

एक सफल शासन की नींव समुद्रगप्त ने अपने शासनकाल में ही रख दी थी इसीलिए गुप्त सम्राटों का शासन अत्यधिक सफल रहा। साम्राज्य की दृढ़ता शांति और नागरिकों की उन्नति इसके प्रमाण थे।

सामाजिक भेदभाव: कारण और निवारण

भारत में व्याप्त सामाजिक असामानता केवल एक वर्ग विशेष के साथ जिसे कि दलित कहा जाता है के साथ ही व्यापक रूप से प्रभावी है परंतु आर्थिक असमानता को केवल दलितों में ही व्याप्त नहीं माना जा सकता।

वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के मध्य अंतर और हमारे इतिहास के साथ किया गया खिलवाड़

वास्तव में सनातन में जिस वर्ण व्यवस्था की परिकल्पना की गई उसी वर्ण व्यवस्था को छिन्न भिन्न करके समाज में जाति व्यवस्था को स्थापित कर दिया गया। समस्या यह है कि आज वर्ण और जाति को एक समान माना जाता है जिससे समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।

The story of Lord Jagannath and Krishna’s heart

But do we really know the significance of this temple and the story behind the incomplete idols of Lord Jagannath, Lord Balabhadra and Maa Shubhadra?

Pt Deen Dayal Upadhyaya and Integral Humanism

According to Upadhyaya, the primary concern in India must be to develop an indigenous economic model that puts the human being at centre stage.