Saturday, November 28, 2020
Home Hindi कश्मीर भाग 1: भारतवर्ष के सनातन का केंद्र बिंदु रहे कश्मीर के इस्लामीकरण की...

कश्मीर भाग 1: भारतवर्ष के सनातन का केंद्र बिंदु रहे कश्मीर के इस्लामीकरण की प्रक्रिया

Also Read

Om Dwivedihttp://raagbharat.com
Founder and writer at raagbharat.com Part time poet and photographer.

8 जून को जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के लोकभवन लरकीपोरा में सरपंच अजय पंडिता की गोली मारकर हत्या की गई। एक और कश्मीरी पंडित की हत्या। भारत के दूसरे हिस्सों में निवास करने वाले हिन्दुओं के लिए यह एक आतंकी गतिविधि हो सकती है। ये भी हो सकता है कि कपिल मिश्रा जैसे हिन्दुओं के अलावा किसी और को कोई विशेष अंतर न पड़े। लेकिन सत्य यह है कि यह कोई साधारण घटना नहीं है। अजय पंडिता के साथ वही हुआ है जो कश्मीर में हिन्दुओं के साथ लगभग 800 वर्षों से होता आया है। अखंड भारत का केंद्र बिंदु रहे कश्मीर का पिछली कुछ शताब्दियों का इतिहास हिन्दुओं के रक्त से रंजित है। इस इतिहास के हर पन्ने में आपको दिखाई देंगे असंख्य हिन्दू मंदिरों के अवशेष, जलाए गए हिन्दू धर्मग्रंथों की भस्म, रोते-बिलखते हिन्दू और कश्मीर की गलियों में पड़े उनके मृत शरीर।

कश्मीर पर आधारित यह लेख दो भागों में है। कश्मीर की समस्या कोई भूमि अथवा सीमा विवाद नहीं है। यह हिन्दुओं के नृजातीय नरसंहार की एक सतत प्रक्रिया है जो लगभग 800 से 1000 वर्षों से जारी रही। इसे कुछ हजार शब्दों में नहीं लिखा जा सकता है। इसके लिए एक पुस्तक की रचना करनी पड़ जाए किन्तु कश्मीर की समस्या को एक लेख में लिखने के लिए इसके इतिहास को दो भागों में बांटा गया है।

लेख के पहले भाग में जम्मू और कश्मीर के इतिहास से लेकर उसके वर्तमान तक की यात्रा का विस्तृत वर्णन किया जा रहा है। ये सब कुछ जानना आपके लिए आवश्यक है क्योंकि तभी आप इस्लामिक कट्टरपंथ और हिन्दुओं के प्रति उसकी घृणा को जान पाएंगे। आज भी कश्मीर की समस्या को मात्र आतंकवाद की समस्या समझने की भूल की जा रही है किन्तु कश्मीर हिन्दुओं के प्रति घृणा का एक सर्वोच्चतम बिंदु है। यह जिहाद के उस क्रूर पहलू का प्रत्यक्षदर्शी है जो मात्र हिंसा पर आधारित नहीं है अपितु एक सम्पूर्ण संस्थागत प्रक्रिया के तहत काफिरों के समूल नाश के उद्देश्य का फरमान है।

इस लेख को मात्र पढ़िए नहीं अपितु अपनी कल्पनाशीलता का उपयोग करते हुए जम्मू और कश्मीर के इस भयावह इतिहास की यात्रा के यात्री बनिए। कल्पना कीजिए कि जो भी हो रहा है वह आपकी आँखों के सामने घटित हो रहा है। ऐसा करके ही आप कश्मीर की दुर्गति के साक्षी बन पाएंगे।

कश्मीर का सनातन इतिहास:

महान भारतवर्ष के सनातन धर्म का केंद्र बिंदु थी कश्यप ऋषि द्वारा स्थापित भूमि, कश्यप सर(कश्मीर का सनातन नाम)। वैसे तो पूरा भारतवर्ष ज्ञान और विज्ञान का वैश्विक केंद्र था किन्तु भारतवर्ष में भी काशी और कश्यप सर ज्ञान के दो महान केंद्र थे। यहाँ से धर्म की धाराएं विभिन्न रूपों में दसों दिशाओं में प्रवाहित होती थीं। कल्प के आरम्भ से ही कश्मीर का वर्णन हिमाद्रि कुक्षि (कोख) में स्थित एक ऐसी दिव्य भूमि के रूप में किया जाता रहा है जो ब्रह्माण्ड में अद्वितीय है। इसके अतिरिक्त कश्मीर को भगवान शिव, माता सती (माता पार्वती) और उनके गणों की भूमि कहा जाता है। माता सती के प्रभाव के कारण ही कश्मीर की भूमि, कश्यप सर के अतिरिक्त सतीसर अथवा उमासर कही जाती है। कैलाश में विराजने वाले भगवान शंकर का प्रभाव इस भूमि पर सर्वाधिक है जिस कारण कश्मीर सनातन काल से ही शिवभक्ति और शैव परंपरा का मुख्य केंद्र रहा। पूरी कश्मीर भूमि शिव महालिंगों और महात्रिशूलों से आच्छादित थी। रामायण, महाभारत, शिव पुराण, वायु पुराण, वैष्णव पुराण, नंदी पुराण, कालिदास की रघुवंशम, मेघदूत, बाणभट्ट की हर्षचरित, वराहमिहिर की वृहद संहिता और पतंजलि के महाभाष्य जैसे महान ग्रंथों और पुस्तकों में कश्मीर क्षेत्र में शिव और शक्ति की दिव्य महिमा का विस्तृत वर्णन किया गया है। महाभारत के सभा पर्व, भीष्म पर्व एवं द्रोण पर्व में कश्मीर का वर्णन सुस्पष्ट रूप से किया गया है। नीलमत पुराण में कश्मीर के भौगोलिक, सांस्कृतिक और स्थानीय स्वरूप का सम्पूर्ण वर्णन है। शैव परंपरा के अतिरिक्त कश्मीर के हिन्दू भगवान सूर्य उपासक थे जिनमें कार्कोट वंश के शासक प्रमुख थे। इस वंश के शासकों के नाम में “आदित्य” प्रत्यय की उपस्थिति सूर्य के प्रति इनकी श्रृद्धा को सुदृढ़ करती है। इस वंश के महान शासक ललितादित्य ने ही मार्तण्ड सूर्य मंदिर का निर्माण कराया था जिसे बाद में इस्लामिक चरमपंथियों नष्ट कर दिया था। आज इस मंदिर के अवशेष मात्र बचे हुए हैं।  

कश्मीर के मंदिर एवं दिव्य धार्मिक स्थान:

जैसा कि इस लेख में बताया गया है कि भारतवर्ष में काशी और कश्मीर सनातन ज्ञान, विज्ञान तथा शिक्षा के केंद्र थे। इसी कारण इन दोनों स्थानों में हिन्दू धर्म स्थलों और शिक्षा केंद्रों की संख्या अत्यधिक थी। चूंकि कश्मीर की सम्पूर्ण जनसंख्या सनातन धर्म के अनुयायियों की थी अतः कश्मीर की एक एक गली में मंदिर बने हुए थे। ये मंदिर बाद में नष्ट कर दिए गए। कश्मीर के इतिहास में पंच मंदिरों का वर्णन मिलता है। ये पंच मंदिर कमलेश, भूतेश, विजयेश, वर्धमानेश और ज्येष्ठेश हैं। ये मंदिर पौराणिक कथाओं में अत्यंत पवित्र बताए गए हैं किन्तु आज इन मंदिरों का कोई अस्तित्व नहीं है। विश्व विख्यात मार्तण्ड सूर्य मंदिर जिसका निर्माण कश्मीर के शासक ललितादित्य ने कराया था, इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा नष्ट कर दिया गया। इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु को समर्पित मेरुवर्धन स्वामी और भगवान शंकर को समर्पित मामेष्वर मंदिर हिन्दुओं के लिए तीर्थ के समान थे। अवंतीपोरा, कश्मीर का ऐसा क्षेत्र था जहाँ हिन्दू मंदिर समूहों में निर्मित किए गए थे। इन मंदिर समूहों में अवंतीस्वामी और अवंतीश्वर दो प्रमुख मंदिर थे। जहाँ एक ओर अवंतीस्वामी भगवान विष्णु के बैकुंठ रूप को समर्पित था तो वहीं दूसरी ओर अवंतीश्वर भगवान शंकर को। ये मंदिर भी नष्ट  कर दिए गए। वितस्ता (वर्तमान झेलम) नदी के किनारे स्थित अवंतीपोरा में जितने मंदिर प्राचीन इतिहास के कालखंड में तोड़े गए, लगभग उतने ही मंदिर 1986 से 1996 के बीच 10 वर्षों में वर्तमान इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा तोड़ दिए गए। इनका वर्णन लेख में आगे किया जाएगा।

कश्मीर वैष्णो देवी, स्वयंभू शिव, संध्या देवी, शारदा माँ, नन्द शिला जैसे तीर्थों की भूमि रहा है। इसके अतिरिक्त इस महान सनातन भूमि में कई धर्म यात्राएं की जाती हैं। इनमें अमरेश्वर यात्रा (वर्तमान अमरनाथ यात्रा), वैष्णो देवी यात्रा, नंदी क्षेत्र यात्रा और तक्षक नाग क्षेत्र यात्रा प्रमुख है। कल्हण अपनी रचना “राजतरंगिणी” में नंदी क्षेत्र यात्रा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि शैव भक्ति का इससे दिव्य और महान स्वरूप किसी ने भी नहीं देखा होगा। इन सब के अतिरिक्त कश्मीर में कई दिव्य एवं साधना के लिए उपयुक्त क्षेत्र हैं जिनमें नंदी क्षेत्र, सुरेश्वरि क्षेत्र और विजय क्षेत्र प्रमुख हैं। कश्मीर के इतिहास में कई सरोवरों का भी वर्णन किया गया है। सनातन धर्म में जलाशयों का विशेष महत्व है अतः कश्मीर में इस्लामिक शासन स्थापित होने के पश्चात या तो ये जलाशय नष्ट कर दिए गए अथवा उनके नामों में परिवर्तन कर दिया गया। इनमें से प्रमुख सरोवर हैं सुश्रवा सरोवर, शेषनाग सरोवर, जमातृसर, उल्लोल सरोवर, उत्तर मानस एवं सुरेश्वरि सर (वर्तमान डल झील)।

इन मंदिरों और तीर्थ क्षेत्रों के अतिरिक्त पूरे कश्मीर में तपस्वियों एवं ऋषि-मनीषियों की गुफाएं, गुरुकुल, आरोग्यशाला एवं जनाश्रय आदि बहुतायत मात्रा में थे। कश्मीर प्राचीन भारत में भी एक महान एवं पुण्यदायी क्षेत्र था क्योंकि नीलमत पुराण और राजतरंगिणी के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि कश्मीर क्षेत्र में भारतवर्ष के अन्य भाग से लोग तीर्थ के लिए आते थे जिससे यहाँ अत्यधिक संख्या में जनाश्रय एवं आरोग्यशालाओं का निर्माण किया गया था।

शारदा पीठ और कश्मीर में आदि शंकराचार्य का आगमन :

अखंड भारतवर्ष के महा शक्ति पीठों में से एक है, शारदा पीठ। वर्तमान में माँ शारदा का यह पवित्रतम स्थान पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से अधिकार किए गए कश्मीर के भूभाग में स्थित है। कश्मीरी हिन्दुओं, विशेषकर कश्मीरी पंडितों के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीन मंदिरों में से एक है शारदा पीठ। दो अन्य तीर्थ स्थल हैं, अनंतनाग में स्थित मार्तण्ड सूर्य मंदिर एवं अमरनाथ बाबा। यहाँ माता सरस्वती की पूजा होती है।

जब भगवान शंकर कुपित होकर माता सती की मृत देह को लेकर भयानक तांडव करने लगे तब श्री विष्णु ने उन्हें शांत करने के लिए सुदर्शन चक्र का उपयोग करके माता सती की मृत देह के कई भाग कर दिए। ये भाग पृथ्वी पर जहाँ भी गिरे वहाँ शक्ति पीठों की स्थापना हुई। उनमें से भी कुछ स्थान अत्यधिक महत्त्व के हैं जिन्हे महा शक्ति पीठ कहा जाता है। शारदा पीठ उनमें से एक है। यहाँ माता सती का दाहिना हाथ गिरा था। इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान दृश्य मंदिर की स्थापना 5000 वर्षों पहले हुई है। शारदा पीठ विश्व का सबसे पुराना और महान मंदिर विश्वविद्यालय था। ज्ञान का यह केंद्र विश्व भर में अनूठा था और महान ऋषि-मनीषी भी अपने ज्ञान को सम्पूर्ण बनाने के लिए यहाँ आते थे। कश्मीर के अन्य मंदिरों की तरह शारदा पीठ भी तोड़ दिया गया। इस्लामिक चरमपंथियों के लिए कुछ भी महान नहीं था। उनके लिए मंदिर की प्राचीनता और महानता मायने नहीं रखती थी। उनके लिए इतना ही पर्याप्त था कि मंदिर हिन्दुओं के हैं। आज भी शारदा पीठ अपनी प्राचीनतम पहचान पुनः प्राप्त करने की प्रतीक्षा में है।

कश्मीर का सम्बन्ध एक और महान संत से है। एक ऐसा संत जिसने भारतभूमि से क्षीण हो रहे सनातन और वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना का कार्य किया। ये संत थे आदि शंकराचार्य। आदि शंकर भारत में सनातन धर्म के प्रचार प्रसार के अपने अभियान में कश्मीर भी गए थे। कश्मीर एक ऐसी भूमि थी जहाँ से प्रत्येक व्यक्ति कभी बिना किसी उपहार के वापस नहीं आया। विश्व का महानतम ज्ञानी भी यदि कश्मीर भूमि पहुँच जाता तो भी उसे कोई न कोई ज्ञान अवश्य प्राप्त हो जाता। आदि शंकर भी कश्मीर पहुंचे जहाँ उन्हें शिव के साथ शक्ति के दर्शन का ज्ञान हुआ। आदि शंकर ने जहाँ माता शक्ति के वर्णन में महान ग्रन्थ “सौंदर्य लहरी” की रचना की वह स्थान शंकराचार्य मंदिर और जिस पहाड़ी पर यह मंदिर स्थित है उसे शंकराचार्य पर्वत कहा गया। हालाँकि पहले यह मंदिर गोपाद्रि मंदिर कहा जाता था जहाँ एक शिवलिंग स्थापित है। इस मंदिर को भी कुतबुद्दीन के बेटे सिकंदर ने नष्ट कर दिया था।

बाद में स्वतंत्रता के पश्चात मंदिर में शिवलिंग के पीछे आदि शंकर की एक प्रतिमा स्थापित की गई। आदि शंकर, शारदा पीठ भी गए थे।

कश्मीर में इस्लाम का उदय एवं हिन्दुओं के दुर्भाग्य का आरम्भ :

हिन्दू और मुसलमान में एक बड़ा अंतर है जो मूलभूत है। मुसलमान में अपने मजहब के प्रति अटूट निष्ठा होती है और वह साम्राज्य के विस्तार के लिए कुछ भी कर सकता है। हिन्दू सहिष्णु होता है और सर्व धर्म सम भाव में विश्वास करता है। जब भारत के उत्तर पश्चिमी किनारे से इस्लामिक आक्रमण प्रारम्भ हो चुका था तब भी हिन्दुओं ने विदेशी मुस्लिमों को अपने प्रशासन में कार्यात्मक पद प्रदान किया। उसी समय से कश्मीर में हिन्दू साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो गया।

कहानी शुरू होती है कश्मीर में लोहार वंश के शासक सहदेव के शासनकाल से। सहदेव के शासनकाल में वर्ष 1320 में मंगोल आक्रमणकारी दुलाचा ने कश्मीर पर आक्रमण किया। सहदेव, दुलाचा की क्रूर सेना के आगे निर्बल साबित हुआ और पराजय को समीप देखकर कश्मीर से बाहर निकल गया। सहदेव के राज्य त्याग के पश्चात कश्मीर में शासन स्तर पर एक रिक्तता और अनिश्चितता की स्थिति बन गई। इसी अनिश्चितता के बीच तिब्बत के एक स्थानीय बौद्ध का बेटा रिनचिन ने कश्मीर की बागडोर अपने हाथ में ले ली। रिनचिन ने सहदेव के प्रधानमंत्री रामचंद्र की सहायता ली और उसकी बेटी से विवाह भी किया किन्तु बाद में रिनचिन ने सत्ता संघर्ष में रामचंद्र की हत्या कर दी। कश्मीर प्रशासन में एक व्यक्ति यह सब देख रहा था। उसका नाम था शाह मीर। शाह मीर इस्लामिक सत्ता की स्थापना का स्वप्न अपनी आँखों में लिए बैठा था। उसने रिनचिन पर अपना प्रभाव बढ़ाया और उसका धर्म परिवर्तन करके उसे मुस्लिम बना दिया। धर्म परिवर्तन के पश्चात रिनचिन बन गया सदरुद्दीन और कश्मीर पर इस्लाम का शासन स्थापित हो गया। रिनचिन ने शाह मीर को प्रधानमंत्री बना दिया। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब रिनचिन ने अपना धर्म परिवर्तन कराया तब कश्मीर के कुछ मुट्ठीभर विद्वानों और जन प्रतिनिधियों के अतिरिक्त एक बड़े वर्ग ने रिनचिन के धर्म परिवर्तन का कोई विरोध नहीं किया। सदरुद्दीन (रिनचिन) की मृत्यु के बाद एक बार फिर मंगोलों के कुछ समूहों के आक्रमण कश्मीर में हुए। इसके पश्चात परिस्थितियां ऐसी हुईं कि शाह मीर कश्मीर का शासक बन बैठा। रामचंद्र की बेटी और रिनचिन की पत्नी कोटा रानी ने संघर्ष करने का प्रयास किया किन्तु रिनचिन के धर्म परिवर्तन पर चुप बैठने वाले समाज के बुद्धिजीवी वर्ग ने शाह मीर का साथ दिया और कोटा रानी हार गई। कश्मीर ने अब एक गैर हिन्दू को ही अपना शासक मान लिया।   

इन्ही क्रूर शासकों में से एक शिहाबुद्दीन ने 1350-60 के दौरान कश्मीर के कई प्रमुख मंदिर नष्ट कर दिए। शिहाबुद्दीन के ही बेटे कुतबुद्दीन के शासन काल में धर्मान्तरण का कार्य पूरी क्षमता से किया गया। ईरान के सूफी मुसलमान, सैय्यद अली हमदानी के नेतृत्व में कश्मीर में घुसपैठ करने लगे। कुतबुद्दीन के ही शासनकाल में पहली बार हिन्दुओं के लिए भी इस्लामिक वेशभूषा पहनने का आदेश दिया गया। कुतबुद्दीन का बेटा सिकंदर अपने पूर्वजों से भी क्रूर था। सैय्यद अली के बेटे मीर मोहम्मद और सिकंदर का एक ही उद्देश्य बन गया था, कश्मीर का सम्पूर्ण इस्लामीकरण। मीर मोहम्मद कश्मीर अकेला नहीं आया था अपितु अपने साथ अफगान और ईरानी मुसलमानों की एक ऐसी फौज लाया जिसका काम था कश्मीर में शरिया शासन स्थापित करना। इसके बाद कहानी स्पष्ट हो जाती है कि अब मुस्लिम शासक कश्मीर के साथ क्या करना चाहते थे। गुरुकुल नष्ट किए गए, मंदिर तोड़े गए, हिन्दू धर्मग्रंथों की प्रतिलिपियाँ जलाई गईं, हिन्दू कला को नष्ट कर दिया गया। 

कश्मीर का दुर्भाग्य था कि वहाँ के योग्य एवं कुशल व्यक्तियों ने कश्मीर के इस्लामीकरण का प्रारम्भिक स्थिति में कोई प्रभावी विरोध नहीं किया। इसी निष्क्रियता का परिणाम था कि कश्मीर के बुद्धिजीवी और प्रभावी वर्ग को भी इस्लाम स्वीकार करना पड़ा।

कल्हण रचित राजतरंगिणी के भाष्यकार रघुनाथ सिंह जी लिखते हैं कि,

“श्रीनगर के राज्य संग्रहालय में विष्णु और शिव आदि देवों की खंडित मूर्तियां रखी हुई हैं। इन्हे पूजने वाले हिन्दू थे और तोड़ने वाले मुस्लिम किन्तु दुर्भाग्य यह था कि जो हिन्दू भय से मुसलमान बन गए थे उन्होंने भी खूब मूर्तियां तोड़ी”।

कश्मीर के इस्लामीकरण का नंगा नाच लगातार चलता रहा। कश्मीर के कई गाँव हिन्दू मुक्त हो गए। कश्मीर का जनसंख्या अनुपात बदल गया। हिन्दू बहुल कश्मीर मुस्लिम बहुल क्षेत्र में बदल गया। मुस्लिम शासनकाल में महिलाओं की स्थिति अत्यंत गंभीर थी। कश्मीर के इस्लामिक इतिहास में जितना कष्ट हिन्दू महिलाओं ने झेला है वह भयानक है।  

यह तब तक चला जब महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर के मुस्लिम शासकों के विरुद्ध युद्ध नहीं छेड़ दिया। सन 1589 में यहां मुगल का राज हुआ। यह अकबर का शासन काल था। मुगल साम्राज्य के विखंडन के बाद यहां पठानों का कब्जा हुआ। यह काल कश्मीर का काला युग कहलाता है। फिर 1819 में पंजाब के शासक महाराजा रणजीत सिंह द्वारा पठानों की पराजय हुई एवं सिख साम्राज्य आया। महाराजा रणजीत सिंह के कश्मीर विजय का परिणाम हुआ कि वहाँ से ईरानी और अफगान घुसपैठियों को भागना पड़ा। आगे आने वाले कुछ वर्षों में कश्मीर के अंदर हिन्दुओं की जो पहचान सुरक्षित रह पाई उसके पीछे मुख्य कारण महाराजा रणजीत सिंह का कश्मीर अभियान था।

लेख का दूसरा भाग जम्मू और कश्मीर पर अंग्रेजों के शासन, स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कश्मीर समस्या एवं स्वतंत्रता के पश्चात कश्मीर में उपजे आतंकवाद पर आधारित होगा। दूसरे लेख में इस्लामिक आतंकवाद के द्वारा संस्थागत रूप से कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार और भारतीय राजनीति की वीभत्स कश्मीरी नीति का सम्पूर्ण विश्लेषण किया जाएगा।

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

Om Dwivedihttp://raagbharat.com
Founder and writer at raagbharat.com Part time poet and photographer.

Latest News

26/11 : संघ और हिंदूओं को बदनाम करने के लिए कांग्रेस का सबसे घटिया प्रयास

Hinduism is a complex, inclusive, liberal, tolerant, open and multi-faceted socio-spiritual system of India called “Dharma”. Due to its innumerable divergences, Hinduism has no concept of ‘Apostasy’.

Hinduism: Why non-Hindus can’t comprehend

Hinduism is a complex, inclusive, liberal, tolerant, open and multi-faceted socio-spiritual system of India called “Dharma”. Due to its innumerable divergences, Hinduism has no concept of ‘Apostasy’.

आओ तेजस्विनी, प्रेम की बात करें

इसे लव जिहाद कहा जाये या कुछ और किन्तु सच यही है कि लड़कियों के धर्म परिवर्तन के लिए प्रेम का ढोंग किया जा रहा है और उसमें असफलता मिलने पर उनकी हत्या।

दाऊद लौटेगा भारत – कहा पैंसठ साल का और सीनियर सिटीजन होने के कारण पुलिस उसे नहीं पकड़ सकती

दाऊद को लगता है कि पैंसठ की उम्र और वरिष्ठ नागिरक बनने के बाद भारत के GO और लिबरल्स उसके लिए सरकार से लड़ेंगे और उसे जेल में एक दिन भी नहीं रहना पड़ेगा।

Migration and job creation

Here is reason- why migration is a way to job but one should attempt it only when there is no second option.

Which way do I move? Purpose of Rashtra

Civilization is such a grand machine in which input is a new born baby and output is the enlightened one.

Recently Popular

गुप्त काल को स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है

एक सफल शासन की नींव समुद्रगप्त ने अपने शासनकाल में ही रख दी थी इसीलिए गुप्त सम्राटों का शासन अत्यधिक सफल रहा। साम्राज्य की दृढ़ता शांति और नागरिकों की उन्नति इसके प्रमाण थे।

सामाजिक भेदभाव: कारण और निवारण

भारत में व्याप्त सामाजिक असामानता केवल एक वर्ग विशेष के साथ जिसे कि दलित कहा जाता है के साथ ही व्यापक रूप से प्रभावी है परंतु आर्थिक असमानता को केवल दलितों में ही व्याप्त नहीं माना जा सकता।

Pt Deen Dayal Upadhyaya and Integral Humanism

According to Upadhyaya, the primary concern in India must be to develop an indigenous economic model that puts the human being at centre stage.

The story of Lord Jagannath and Krishna’s heart

But do we really know the significance of this temple and the story behind the incomplete idols of Lord Jagannath, Lord Balabhadra and Maa Shubhadra?

Daredevil of Indian Army: Para SF Major Mohit Sharma’s who became Iftikaar Bhatt to kill terrorists

Such brave souls of Bharat Mata who knows every minute of their life may become the last minute.