Thursday, July 2, 2020
Home Hindi भगवान श्रीराम का वनवास जो 500 वर्षों के बाद समाप्त हुआ: श्रीराम मंदिर निर्माण...

भगवान श्रीराम का वनवास जो 500 वर्षों के बाद समाप्त हुआ: श्रीराम मंदिर निर्माण की अनंत कथा

Also Read

Om Dwivedihttp://raagbharat.com
Founder and writer at raagbharat.com Part time poet and photographer.
 

26 मई 2020 को अंततः राम मंदिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ हो गया। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत श्री नृत्यगोपाल दास जी महाराज द्वारा भूमि पूजन करके निर्माण कार्य प्रारम्भ किया गया। वर्तमान में रामलला एक अस्थायी मंदिर में विराजमान हैं और मुख्य मंदिर के निर्माण तक उसी अस्थायी भवन में अपने तीनों अनुजों सहित विराजित रहेंगे। उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री महंत श्री योगी आदित्यनाथ जी रामलला को अपनी गोद में उठाकर पंडाल से अस्थायी मंदिर तक ले आए थे। पिछले वर्ष अर्थात 9 नवम्बर 2019 को उच्चतम न्यायालय में गठित 5 न्यायधीशों की संविधान पीठ ने एकमत से जन्मभूमि क्षेत्र पर हिन्दुओं का दावा निर्विवादित रूप से स्वीकार किया और रामलला को उस भूमि का पूरा मालिकाना प्रदान किया।

यह निर्णय देखने में जितना सरल और सहज प्रतीत होता है, उतना है नहीं। श्रीराम जन्मभूमि का विवाद सदियों पुराना है। भगवान श्रीराम भारतवर्ष का स्वाभिमान हैं। उनके आदर्शों के वटवृक्ष तले भारत भूमि में राम राज्य की परिकल्पना की गई। सहस्त्राब्दियों से श्रीराम सनातन और राष्ट्रीय अखंडता के प्रतीक रहे। ऐसे में हिन्दुओं के लिए अयोध्या की इस पवित्र भूमि से अपना दावा छोड़ देना असंभव था। हिन्दू संघर्ष करते रहे। पहले इस्लामिक कट्टरपंथियों से, उनकी सेनाओं से। उसके पश्चात स्वतंत्र भारत में वामपंथी इतिहासकारों से जिन्होंने श्रीराम के अस्तित्व पर प्रश्न उठाने का कार्य किया। हिन्दुओं का संघर्ष उन राजनैतिक शक्तियों से भी चलता रहा जिन्होंने रामभक्तों को कुचलने का भरसक प्रयास किया। इन समस्त संघर्षों के दौरान हिन्दुओं को अपने प्राणों तक का बलिदान देना पड़ा। कई ऐसे नेतृत्वकर्त्ता भी जन्मे जिन्होंने अपना जीवन प्रभु श्रीराम को समर्पित कर दिया। अंततः श्रीराम विजयी हुए, भारतवर्ष विजयी हुआ, हिन्दू विजयी हुए और इस संघर्ष में दिए गए सहस्त्रों बलिदान सार्थक हुए।

आज इस लेख के माध्यम से सबसे पहले हम आपको श्रीराम जन्मभूमि की इस यात्रा के इतिहास में लेकर चलेंगे और वहां से आगे बढ़ते हुए, सभी घटनाओं को देखते हुए वर्तमान में वापस आएँगे।   

इतिहास गाथा :

1528 का एक दिन। भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े शत्रुओं, मुगलों की कट्टरपंथ की यात्रा अयोध्या तक पहुँच चुकी है। मुगल बाबर का कमांडर मीर बाकी अपनी सेना के साथ शक्ति के घमंड में चूर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दरवाजे तक पहुँच चुका है। सामने साधुओं और रामभक्तों की सेना है किन्तु मुगलों की सेना हथियारों से सुसज्जित है। मीर बाकी अपने सैनिकों के साथ मंदिर नष्ट करने के लिए आगे बढ़ता है। रामभक्त उससे भीषण युद्ध कर रहे हैं और अंततः मंदिर नष्ट कर दिया जाता है। इसके बाद 327 वर्षों से इस भूमि पर विवाद बना हुआ है। सैकड़ों बार हिन्दुओं का नरसंहार किया गया है।

वर्ष 1853 : निर्मोही अखाड़ा जन्मभूमि स्थान पर अपना अधिकार प्राप्त करते हैं। दो वर्ष पश्चात प्रशासन जन्मभूमि को दो भागों में बाँट देता है। एक हिन्दुओं के लिए और एक मुस्लिमों के लिए।

 

वर्ष 1883 : हिन्दुओं द्वारा जन्मभूमि पर मंदिर बनाने की मांग की जा रही है। मांग पूरी न होने पर दो वर्ष पश्चात 1885 में महंत रघुबीरदास जी ने जन्मभूमि स्थान पर मंडप निर्माण की अनुमति प्राप्त लिए फैजाबाद जिला न्यायालय में अपील कर रहे हैं। न्यायालय द्वारा अपील को निरस्त कर दिया गया है।

वर्ष 1949 : दिसंबर का महीना है। सब कुछ सामान्य चल रहा है किन्तु एक दिन अवैध मस्जिदनुमा गुम्बज के भीतर रामलला प्रकट होते हैं। इस असाधारण घटना की गवाही एक मुस्लिम पुलिस गार्ड भी दे रहा है।

अबुल बरकत जो एक मुस्लिम गार्ड था उसने अच्छी तरह से 1949, दिसंबर 22-23 की मध्यरात्रि की कहानी बताई। उसके अनुसार वह उस रात जन्मभूमि क्षेत्र के बाहर एक पुलिस आउटपोस्ट में ड्यूटी पर तैनात था। वह अपनी ड्यूटी कर ही रहा था कि अचानक अवैध बाबरी मस्जिद से एक दिव्य प्रकाशपुंज बाहर निकला। देखते ही देखते वह प्रकाशपुंज स्वर्णमयी हो चला और अंततः उसे एक दिव्य बालक स्वरुप के दर्शन हुए। ऐसा दिव्य बालक उसने अपने जीवन काल में नहीं देखा था।  

 

यह खबर पूरे भारत भर में फैल गई है। अलग अलग हिस्सों से श्रद्धालु रामलला के दर्शन के लिए आ रहे हैं, किन्तु सरकार द्वारा उस स्थान को विवादित घोषित कर दिया गया है और पूरे क्षेत्र की तालाबंदी कर दी गई है।

वर्ष 1950 : गोपाल विशारद जी द्वारा रामलला की पूजा करने की अनुमति प्राप्त करने हेतु फैजाबाद जिला न्यायालय में अपील दायर की गई है। परमहंस रामचंद्रदास ने भी पूजा करने की अनुमति मांगी है।

वर्ष 1959 : निर्मोही अखाड़ा ने जन्मभूमि स्थान का मालिकाना प्राप्त करने के लिए याचिका दायर की हुई है। दो वर्ष पश्चात उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड भी मालिकाना प्राप्त करने की याचिका दायर कर देता है। अब यह केस राजनैतिक रूप लेगा। वैसे भी सरकार इसे विवादित स्थान का नाम दे चुकी है और अब सुन्नी वक्फ बोर्ड के सम्मिलित होने से तुष्टिकरण का खतरा बढ़ गया है।

वर्ष 1980 : विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में श्रीराम जन्मभूमि स्थान पर मंदिर निर्माण की मांग तीव्र हो गई है।

वर्ष 1986 : फरवरी का महीना है और स्थानीय अदालत के आदेश पर जन्मस्थान को हिन्दुओं की पूजा के लिए खोलना पड़ा।

वर्ष 1990 : भाजपा नेता श्री लालकृष्ण अडवाणी द्वारा राम रथ यात्रा का शुभारम्भ। किन्तु रथ यात्रा को अयोध्या पहुंचने से पहले ही बिहार में लालू सरकार द्वारा रोक दिया गया है और आडवाणी जी गिरफ्तार कर लिए गए हैं।

30 अक्टूबर का दिन हिन्दुओं के लिए काला दिन साबित हुआ है। मुलायम सिंह यादव जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, उन्होंने साधुओं और कारसेवकों पर गोलीबारी के आदेश दे दिए हैं। रामभक्तों को सीधे सीधे निशाना बनाया जा रहा है। गलियों में इधर उधर भाग रहे कारसेवकों को ढूंढकर मारा जा रहा है।

वर्ष 1992 : 6 दिसंबर को अंततः सरकार और न्यायालयों से न्याय न प्राप्त करने की हताशा में विवादित और अवैध बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा दिया गया।   

वर्ष 1993 : केंद्र सरकार द्वारा जन्मस्थान को अधिग्रहित करने के लिए एक कानून पारित किया गया है। इसके विरोध में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। इस्माइल फारुकी की याचिका भी इनमे से एक है।

वर्ष 1994 : इस्माइल फारुकी केस में निर्णायक फैसला सुनाते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि मस्जिद, इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।

वर्ष 2002 : प्रयागराज उच्च न्यायालय में जन्मस्थान के मालिकाना अधिकार के प्रश्न पर सुनवाई प्रारम्भ हो चुकी है। अब आशा की किरण दिखाई दे रही है कि रामलला को न्याय मिलेगा।

वर्ष 2003 : भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा न्यायालय के आदेश पर श्रीराम जन्मभूमि पर सर्वेक्षण का कार्य प्रारम्भ किया गया है। सर्वेक्षण और शोध के पश्चात भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने न्यायालय को बताया है कि जन्मस्थान पर एक विशाल हिन्दू मंदिर होने के प्रमाण मिले हैं।

वर्ष 2010 : पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद भी न्यायालय ने श्रीराम जन्मभूमि तो तीन हिस्सों में बाँट दिया है। एक हिस्सा रामलला विराजमान को दिया गया है। एक हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड के खाते में गया है। यह निर्णय न्यायसंगत नहीं है। यह फैसला उच्चतम न्यायालय में जाएगा।

वर्ष 2011 : उच्चतम न्यायालय ने प्रयागराज उच्च न्यायालय के असंगत निर्णय पर रोक लगा दी है। 

इसके बाद प्रारम्भ हुआ श्रीराम जन्मभूमि विवाद का उच्चतम न्यायालय अध्याय।

उच्चतम न्यायालय में तमाम कानूनी दांवपेंच चले गए, मात्र इसलिए कि श्रीराम के मंदिर का मार्ग अवरुद्ध किया जा सके। न्यायालय के बाहर भी इस मुद्दे को सुलझाने का दिखावा किया गया किन्तु यह संभव न हो सका। उच्चतम न्यायालय में तीन न्यायाधीशों की पीठ का गठन किया गया। अंततः न्यायालय द्वारा सभी याचिकाओं पर सुनवाई के लिए 10 जनवरी 2019 की तिथि को निश्चित किया गया। पांच सदस्यों की एक संविधान पीठ का गठन किया गया जो इस विवाद पर सुनवाई करने वाली थी। पहले 8 मार्च को मध्यस्थता के लिए एक कमेटी का गठन किया गया। 1 अगस्त को मध्यस्थता कमेटी ने अपनी रिपोर्ट न्यायालय को सौंपी जिसमें किसी प्रकार का परिणाम न प्राप्त होने के पश्चात अंततः सुनवाई को ही अंतिम उपाय के रूप में स्वीकार किया गया। 6 अगस्त से प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई प्रारम्भ हुई। 16 अक्टूबर को उच्चतम न्यायालय ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

वर्ष 2019 : 9 नवम्बर, दिन शनिवार।

लगभग 500 वर्षों के वनवास और 134 वर्षों के कानूनों संघर्षों के बाद वो दिन आ चुका है जब श्रीराम जन्मभूमि पर निर्णय लिया जाएगा। सब कुछ सामान्य लग रहा है किन्तु है नहीं। लोग पिछली रात से जाग रहे हैं। भारत का एक एक रामभक्त उत्साहित है। सबको विश्वास है कि प्रभु श्री राम का वनवास समाप्त होने वाला है। सब अपने टेलीविजन, रेडियो और मोबाइल पर चिपके हुए हैं। घड़ी में ग्यारह बजते हैं। निर्णय सुनाया जाता है कि जन्मभूमि क्षेत्र का पूरा मालिकाना अधिकार रामलला को प्रदान किया जाता है। भारतवर्ष उत्साह से प्रफुल्लित हो उठता है। लोगों की आँखों में उत्साह के अश्रु छलक पड़े हैं। चारों ओर ढोल-नगाड़े बज रहे हैं, शंख घड़ियाल बजाए जा रहे हैं। खीर पूड़ी बननी शुरू हो गई है। आज रामलला प्रसाद में भक्तों की बनाई यही खीर पूड़ी ग्रहण करेंगे।

श्रीराम मंदिर निर्णय में अवरोध निर्माण :

श्रीराम जन्मभूमि विवाद कई वर्षों से चला आ रहा था किन्तु 2017 के बाद से उसके निपटारे की सम्भावना प्रबल होती जा रही थी। निश्चित है कि भारतीय राजनीति की कुंठा यह कभी भी स्वीकार नहीं करती कि राम मंदिर का निर्णय हिन्दुओं के पक्ष में आए और वो भी भाजपा के शासनकाल में। कांग्रेस एवं उसके सहयोगी दल, वामपंथी और मुस्लिम दल कभी भी नहीं चाहते थे कि 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले इस विवाद का निपटारा किया जाए। इसके लिए तमाम तरह के षड़यंत्र किए गए। चाहे वो जस्टिस लोया की स्वाभाविक मृत्यु को हत्या के रूप में बदल देने का षड़यंत्र हो अथवा तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के महभियोग का प्रस्ताव। जस्टिस दीपक मिश्रा के विरुद्ध लाया गया महाभियोग प्रस्ताव, उनके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों के द्वारा किये गए प्रेस कांफ्रेंस का परिणाम था। इसके बाद राफेल का मुद्दा भी सबके स्मरण में होगा जब कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने राफेल के मुद्दे पर सरकार को घेरने और न्यायालय का समय बर्बाद करने के लिए पूरी शक्ति लगा दी थी। इन सब तरीकों से विफल रहने के बाद भी राजनैतिक पार्टियां राम मंदिर के अंतिम निर्णय रोकने में सफल नहीं हो सकीं। 

वामपंथी इतिहासकारों का घिनौना षड़यंत्र :

राजनैतिक दलों के अतिरिक्त वामपंथी इतिहासकारों ने भी लगातार षड़यंत्र किए। इतिहासकारों की यह प्रजाति भयंकर झूठी है। यह हिन्दुओं के विरोध में किसी भी स्तर तक गिर सकती है। दशकों से यह नीच प्रजाति राम मंदिर के विरोध में अपना एजेंडा चलाती रही। पहले तो इन वामपंथियों ने कहा कि जन्मस्थान क्षेत्र में मुगलो या किसी अन्य इस्लामिक शासक द्वारा किसी भी प्रकार का विध्वंस नहीं हुआ अर्थात इनके कहने का तात्पर्य था कि यहाँ कोई मंदिर था ही नहीं। जब उत्खनन के दौरान पिलर या खम्भे मिले तो इन वामपंथी इतिहासकारों ने उन अवशेषों को मंदिर का अवशेष माना ही नहीं तथा ये कहते रहे कि सम्भावना है कि ये अवशेष किसी मस्जिद या स्तूप के हों। संभव है कि यदि ये वामपंथी और भी नीचे गिरते तो अयोध्या और विशेषतः जन्मभूमि को ईसाईयों के प्रभाव का क्षेत्र भी बता सकते थे। इन वामपंथी इतिहासकारों में एम अतहर अली, आर एस शर्मा, सूरज भान और डी एन झा प्रमुख हैं। ये ऐसे इतिहासकार हैं जो वर्षों तक भारत से राम मंदिर के सम्बन्ध में झूठ बोलते रहे। इन चारों ने एक झूठी रिपोर्ट बनाई जिसके आधार पर मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन अंतिम तारीख तक राम मंदिर के अस्तित्व को नकारते रहे। इन्ही वामपंथियों ने यहाँ तक कहा कि हिन्दू ग्रंथों में भी जन्मभूमि स्थान पर मंदिर होने का प्रमाण नहीं है और न ही यह क्षेत्र जन्म स्थान है। ये वामपंथी इतिहासकार इतने महान हैं कि इन्होने अपनी रिपोर्ट में यहां तक कहा कि स्कन्द पुराण का अयोध्या महात्म्य उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में जोड़ा गया है। स्कन्द पुराण वह महत्वपूर्ण साक्ष्य है जिसकी सहायता से जन्मभूमि क्षेत्र में रामलला का दावा सिद्ध हो सका।

स्पष्ट तौर पर यह देखा जा सकता है कि इन वामपंथियों ने राम मंदिर के विरोध में एक एक तर्क बनाए और उन्हें इस प्रकार  डिजाइन किया कि मंदिर से जुड़ी न्यायालयीन कार्यवाही को प्रभावित किया जा सके। वामपंथियों के इस षड़यंत्र का उपयोग मुस्लिम पक्षकारों ने भी भरपूर किया।

किन्तु सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता है। कई ऐसे नायक थे जिन्होंने वर्षों परिश्रम करके साक्ष्य जुटाए और अंततः रामलला को न्याय दिला सके। इन नायकों की महान गाथा जानने के लिए आगे लेख पढ़ते रहिए।

राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख नायक :

सबसे पहले तो हमें नमन करना चाहिए उन असंख्य महान पुरुषों का जो वर्ष 1528 के बाद से लेकर वर्तमान परिस्थितियों के दौरान श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति दे चुके हैं। ये वो साधु-सन्यासी हैं जो मीर बाकी से लड़े। ये ऐसे अपरिचित रामभक्त हैं जो सदियों तक रामलला को उनका अधिकार दिलाने के लिए लड़ते रहे किन्तु उनका वर्णन किसी पत्रिका, अखबार, ऑडियो-वीडियो अथवा दस्तावेजों में नहीं है। ये सब राम काज करके अमर हो गए। यह हमारा कर्तव्य है कि हम उल्लास के इन क्षणों में उन रामभक्तों का स्मरण करते रहें जिनके कारण आज हम राम मंदिर का स्वप्न साकार होते देख पा रहे हैं।

आधुनिक भारत में भी ऐसे रामभक्त हुए जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इन सभी का वर्णन आगे विस्तार से किया गया है।

पहला नाम आता है अभिराम दास का जिन्होंने रामलला के प्राकट्य के बाद अवैध मस्जिद के भीतर घुसकर रामलला की वही मूर्ति स्थापित की जो राम मंदिर को तोड़ने के दौरान सुरक्षित की गई थी।

महंत दिग्विजय नाथ राम मंदिर आंदोलन के उन प्रारंभिक पुरोधाओं में से एक हैं जिनके प्रयासों से राम मंदिर आंदोलन पूरे भारतवर्ष के स्वाभिमान का विषय बन गया।

गोपाल विशारद जी और परमहंस रामचन्द्रदास जी दो ऐसे पुजारी थे जिन्होंने रामलला की आराधना का अधिकार प्राप्त किया और अलग अलग परिस्थितियों में भी रामलला की पूजा करते रहे।

डॉ. बी. बी. लाल वो प्रमुख पुरातात्विक सर्वेक्षक हैं जिनके प्रयासों के कारण यह सिद्ध किया जा सका कि अवैध बाबरी मस्जिद के ढांचे के नीचे मिलने वाले अवशेष मंदिर के ही हैं। इस पुरातात्विक वानर दल में एक नाम और महत्वपूर्ण है, के.के. मोहम्मद।

इन्होने न केवल इसकी पुष्टि की कि मस्जिद का ढांचा मंदिर को गिराकर ही बनाया गया है अपितु यह भी सिद्ध किया कि मस्जिद को बनाने में मंदिर के ही अवशेषों का उपयोग किया गया है। मोहम्मद लगातार धमकियाँ मिलती रहीं लेकिन वो अपने कर्त्तव्य पथ पर डटे रहे।

नब्बे के दशक में एक व्यक्तित्व राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख कर्त्ता-धर्ता के रूप उभरा। यह व्यक्तित्व था अशोक सिंघल। श्री अशोक सिंघल को राम मंदिर आंदोलन का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने के लिए जाना जाता है। तत्कालीन विश्व हिन्दू परिषद अध्यक्ष अशोक सिंघल जी ने राम मंदिर आंदोलन की दिशा को मोड़ दिया। महंत अवैद्यनाथ जी की श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति और ताला खोलो आंदोलन में श्री अशोक सिंघल जी सक्रिय रूप से सहभागी रहे।

राम मंदिर को भारतवर्ष के स्वाभिमान से जोड़ने का श्रेय श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को जाता है। उन्होंने राम मंदिर निर्माण को लक्ष्य बनाकर सोमनाथ से अयोध्या के लिए राम रथ यात्रा आयोजन किया। हालाँकि यह रथ यात्रा अयोध्या नहीं पहुँच सकी और बिहार में लालू प्रसाद यादव के आदेश पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया किन्तु इस गिरफ्तारी से आंदोलन और भी तीव्र हो गया।

जब तक राम मंदिर आंदोलन की स्मृति रामभक्तों जीवित रहेगी तब तक कोठरी बंधु अमर रहेंगे। कलकत्ता के रहने वाले शरद कोठरी और रामकुमार कोठरी पैदल ही अयोध्या के लिए निकल पड़े थे। दोनों भाई कारसेवा के लिए अयोध्या आ रहे थे। यही दोनों वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अवैध मस्जिद के गुम्बद पर चढ़कर भगवा ध्वज लहराया था। उनका यह अप्रतिम साहस आज भी राम मंदिर आंदोलन के स्वाभिमान के प्रतीक चिन्ह के रूप में जाना जाता है।

1992 के दौरान उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और  मुख्यमंत्री थे कल्याण सिंह। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में हजारों संख्या में कारसेवक जमा हो गए थे लेकिन मुलायम सिंह यादव के विपरीत श्री कल्याण सिंह जी ने कारसेवकों के प्रति किसी भी प्रकार की पुलिस कार्यवाही का आदेश नहीं दिया। अवैध ढांचा गिरा दिया गया और उसके तुरंत बाद कल्याण सिंह जी ने मुख्यमंत्री पद से अपना त्यागपत्र दे दिया।

इसके बाद श्रीराम जन्मभूमि विवाद के अंतिम चरण में अधिवक्ता एस. के. परासरन इस राम काज में हनुमान बनकर उभरे। श्री परासरन हिन्दुओं की ओर से रामलला का पक्ष रख रहे थे। उन्होंने तर्कों एवं तथ्यों के माध्यम से रामलला के वैधानिक पक्ष को सुदृढ़ कर दिया।   

ये तो सिर्फ ऐसे नाम हैं जिन्हे हम जानते हैं किन्तु राम मंदिर आंदोलन की इस यात्रा में अनगिनत नाम हैं जिनके योगदान को एक लेख में वर्णित कर पाना असंभव है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि किसी का योगदान कम है या किसी का अधिक। सबका योगदान बराबर ही है, चाहे इस आंदोलन के बड़े नेता हों या हम आप जैसे सामान्य लोग। हम सब रामभक्त हैं। अंतर मात्र इतना है कि किसी का कार्य वानरों जैसा है और किसी का कार्य गिलहरी जैसा।

अस्पताल बनाने वाले रामद्रोही :

हालाँकि ऐसे लोगों का हमारे और आपके लिए कोई भी अस्तित्व नहीं होना चाहिए किन्तु फिर भी आप इन्हे जान लीजिए क्योंकि ये हमारे बीच ही रहते हैं। हमारे मित्र हैं, रिश्तेदार हैं अथवा सहयोगी हैं। ये सदियों से हैं। ये तब भी थे जब राम मंदिर तोड़ा जा रहा था। ये उस समय निष्क्रिय होकर सारा घटनाक्रम देख रहे थे। उसके बाद भी ये मुगलों के लिए कार्य करते रहे। ये वो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी, विकासवादी लोग हैं जिन्हे राम मंदिर से कोई लेना देना नहीं है। ये गंगा जमुनी तहजीब को बनाए रखने के लिए मंदिर के स्थान पर अस्पताल या स्कूल बनाना चाहते थे। यह तो हमारा सौभाग्य है कि ऐसे लोग भारत के शासन-प्रशासन में मुट्ठी भर ही हैं अन्यथा ये जन्मभूमि क्षेत्र में अस्पताल बनवाने में जुट जाते। फिर भी ऐसे लोग वास्तविकता में हैं तो और हमारे बीच इनका अस्तित्व भी बना हुआ है। आप बस इन लोगों को पहचान लीजिए। ये वो घातक लोग हैं संकट के समय शत्रु का साथ दे सकते हैं। जो राम का नहीं हो सकता वो आपका कैसे होगा? ऐसे लोगों का बहिष्कार कीजिए। इनसे कोई तर्क वितर्क मत कीजिए। इन्हे कुढ़ने दीजिए। ये लेखक हों, बॉलीवुडिये हों, सेक्युलर हों, पत्रकार हों या समाज के कोई भी प्रभावशाली व्यक्ति, इनके कार्यों को किसी भी प्रकार का कोई सहयोग न दीजिए। राम मंदिर हमारा स्वाभिमान है और इसकी सम्पूर्णता ही हमारा लक्ष्य है।

राष्ट्र गौरव की आधारशिला :

जैसा कि हम जानते हैं कि राम मंदिर के निर्माण का कार्य प्रारम्भ हो चुका है तो यह अब हमारा कर्तव्य है कि राम मंदिर को विश्व का सबसे अनूठा और भव्य धार्मिक स्थल बनाने में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दें। राम मंदिर एक मंदिर मात्र नहीं है। यह 500 वर्षों के संघर्षों का प्रतिफल है। यह असंख्यों बलिदान गाथाओं का परिचायक है। प्रभु श्री राम हमारे राष्ट्र पुरुष हैं। आने वाले कुछ दिनों में वह स्वप्न साकार होने वाला है जिसके लिए हमारे पूर्वज अपने प्राणों की आहूति दे गए। उसकी गरिमा को बनाए रखना हमारा कर्तव्य है। अयोध्या विश्व का सर्वश्रेष्ठ धाम बने इसकी जिम्मेदारी हम सबके कन्धों पर है। सरकार को चाहे जितना अनुदान देना पड़े, सरकार दे और हमें चाहे जितना दान देना पड़े, हम दें। सर्वश्रेष्ठ संसाधनों का उपयोग करना पड़े किन्तु राम मंदिर भव्यता की सीमाओं को लांघ जाए, यही महत्वाकांक्षा हम सब के भीतर होनी चाहिए।

राम मंदिर और श्री अयोध्या धाम हमारी धरोहर हैं। एक बार राम मंदिर का निर्माण पूर्ण हो जाए, भारतवर्ष का राष्ट्र गौरव कई गुना बढ़ जाएगा। इस पूँजी को सहेजना हमारा कर्त्तव्य है, जिससे आगे आने वाली पीढ़ी उस विशाल मंदिर को देखकर प्रफुल्लित हो, आनंदित हो और उससे भी बढ़कर गौरवान्वित हो।

हम सबने स्वप्न देखा था भगवा के उत्थान का, जिसका पहला क्षण होगा, जन्मभूमि क्षेत्र में राम मंदिर का निर्माण और इस स्वप्न को पूरा करने के लिए पूरा भारतवर्ष भाजपा, श्री नरेंद्र मोदी और महंत योगी आदित्यनाथ जी का आभारी रहेगा। 

जय श्री राम।।

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

Om Dwivedihttp://raagbharat.com
Founder and writer at raagbharat.com Part time poet and photographer.

Latest News

Why Sharad Pawar supported Modi, slammed Rahul Gandhi on China

He is trying to recreate The old Third Front in a new avatar and defeat Narendra Modi in 2024.

Taxes, the Bhagavad Gita, and the Bible

A response to those of the Left who point out apparent hypocrisy of religious people in demanding low taxes.

Sin, sinners and redemption

redemption as a tool of proscription of our acts is a welcome indication in this world where your status is mostly judged by your material possessions and the moral values are given a pass.

Impact of Hinduism and Buddhism in Southeast Asia

Although India does not share borders directly with any of the Southeast Asian States except Myanmar, the influence that India has had on these countries through religions remains intact for thousands of years.

A requiem for unsung victim: Bengali Hindus of Bangladesh

one of the most underreported cases of persistent ethnocide in the post-colonial period had certainly been with the Bengali Hindus of East Bengal. In terms of magnitude of brutality and spread on scale of time, it has hardly had any parallel in contemporary history.

The new evil empire: Why you should boycott China

China is an authoritarian, despicable, evil nation - and it must be treated as such.

Recently Popular

Hamesha Hamesha – Sushant Singh Rajput’s impact on me and the world

The invaluable lessons Sushant Singh Rajput has left the world with.

Why Sharad Pawar supported Modi, slammed Rahul Gandhi on China

He is trying to recreate The old Third Front in a new avatar and defeat Narendra Modi in 2024.

Who killed Sushant?

Initially his suicide was linked with bullying and nepotism. Rhea has been already interrogated in this case. The Mumbai police has already registered a case under professional rivalry and is investigating.

Sin, sinners and redemption

redemption as a tool of proscription of our acts is a welcome indication in this world where your status is mostly judged by your material possessions and the moral values are given a pass.

Striking similarities between the death of Parveen Babi and Sushant Singh Rajput: A mere co-incidence or well planned murders?

Together Rhea and Bhatt’s media statements subtly and cleverly project Sushant as some kind of a nut job like Parveen Babi, another Bhatt conjuring.