Monday, April 19, 2021
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वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के मध्य अंतर और हमारे इतिहास के साथ किया गया खिलवाड़

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ओम द्विवेदी
Writer. Part time poet and photographer.

भारतवर्ष सदैव ही अपनी संस्कृति और परंपरा से पोषित रहा। इसका परिणाम हुआ कि भारतवर्ष सब प्रकार से समृद्ध हुआ चाहे आर्थिक रूप से हो या सामाजिक रूप से। भारतवर्ष की बौद्धिक सम्पदा सहस्त्राब्दियों से सम्पूर्ण विश्व में सर्वोत्तम रही। इसका सबसे प्रमुख कारण था सनातन में उसकी एकनिष्ठ आस्था। सनातन एक मात्र ऐसा कारक है जिसे भारतवर्ष की महानता का उत्तरदायी बिना किसी प्रमाण के माना जा सकता है। भारतवर्ष का सनातन धर्म अपने आप में पूर्ण एवं स्थाई है। भारतवर्ष की सामाजिक एवं आर्थिक समृद्धि उसकी शत्रु भी बनी। यहाँ उपस्थित धन, धान्य और सम्पदा से प्रभावित होकर लुटेरे यदा कदा भारतवर्ष आते रहे। मजहबी कट्टर पंथ भी एक महत्वपूर्ण कारण था जिसके कारण बाहरी आक्रमणकारियों को भारतवर्ष की सभ्यता को नष्ट करके यहाँ के लोगो को अपना ग़ुलाम बना लेने की कुप्रेरणा मिली।

हालाँकि ये सब इतना आसान नहीं था। किन्तु किसी भी राष्ट्र के संगठन में दरार बना देने से यह काम आसान हो जाता है। पहले मुग़लों और फिर बाद में अंग्रेजों ने हिंदुओं में फूट डाल कर भारतवर्ष की अखंडता को मलीन करने का दुष्कर्म किया। भारतवर्ष के सामाजिक ताने बाने को इस सुव्यवस्थित तरीके से ध्वस्त किया गया जिसका परिणाम सदियों तक बना रहे और यह बना हुआ है। इन षडयंत्रों में सबसे प्रमुख और घातक था समाज को जातियों में विभाजित कर देना। आज भारतवर्ष जातियों में न केवल विभाजित है अपितु यह जातिगत भेदभाव राष्ट्र की सामाजिक संरचना को लगातार क्षति पहुंचा रहा है। वास्तव में सनातन में जिस वर्ण व्यवस्था की परिकल्पना की गई उसी वर्ण व्यवस्था को छिन्न भिन्न करके समाज में जाति व्यवस्था को स्थापित कर दिया गया। समस्या यह है कि आज वर्ण और जाति को एक समान माना जाता है जिससे समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। इस लेख में वर्ण और जाति के मध्य उपस्थित अंतर को समझने का प्रयास किया जाएगा।

सबसे पहले अपने मूल अर्थात वर्ण और वर्ण व्यवस्था की बात करते हैं। वर्ण, संस्कृत के शब्द “वृणोति” से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है धारण करना या चयन करना। सीधी भाषा में समझें तो किसी पद, कार्य या उत्तरदायित्व का वरण करना। इससे स्पष्ट होता है कि वर्ण व्यवस्था कार्यक्षेत्र के चुनाव पर आधारित थी न कि किसी कुल विशेष में जन्म लेने के आधार पर। सनातन में वर्णित वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्तियों को चार वर्णों में विभाजित किया गया है, जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। गीता में वर्ण व्यवस्था की व्याख्या करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।4.13।।


यहाँ स्पष्ट रूप से यह समझा जा सकता है कि भगवान ने स्वयं वर्ण व्यवस्था का आधार गुण एवं कर्म को माना है।

ब्राह्मण वो थे जिन्होंने समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार तथा धार्मिक कार्यों का उत्तरदायित्व ग्रहण किया। इनका प्रमुख कर्त्तव्य समाज में मूल्यों की स्थापना था। ब्राह्मण शिक्षा के माध्यम से यह कार्य करते थे। यह कार्य उनके द्वारा बिना किसी स्वार्थ के किया जाता। इसके बाद दूसरा वर्ण है क्षत्रिय, जो समाज की सुरक्षा से अस्तित्व में आया। क्षत्रिय धर्म की व्याख्या महाभारत में भली प्रकार से की गई है। एक क्षत्रिय धर्म के बारे में कहा गया है कि उसका कर्त्तव्य प्राणी मात्र की सुरक्षा है। इसके लिए भले ही उसे अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ जाएं। वैश्य और शूद्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने उद्योग, वाणिज्य, कला एवं सेवा के सर्वोत्तम विकास का दायित्व अपने हाथों में लिया। चारों ही वर्ण अपने कार्य में श्रेष्ठ हैं।

तो इस प्रकार वर्ण व्यवस्था का जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है।

अब बात करते हैं समाज में प्रचलित जाति व्यवस्था की। जाति शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की “जनि” धातु से हुई है।

“समानप्रसवात्मिकाजाति” अर्थात्‌ सामान जन्म वाले मिलकर एक जाति बनाते हैं।

“नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम्जातिवर्त्त्य” अर्थात जाति का सम्बन्ध अपनी तरह की समानता से है तथा जो निरंतर अर्थात नित्य है।

इनसे स्पष्ट है कि जाति न तो वर्ण का निर्धारण करती है और न ही समाज के वर्गीकरण का। यह तो मात्र एक समूह की पहचान तथा उनके भौतिक निर्धारण की व्यवस्था से सम्बंधित है।

जातियां चार प्रकार की हैं:
उद्भिज अर्थात जो धरती से उत्पन्न हुए हैं।
अंडज अर्थात जो प्राणी अंडे से उत्पन्न हुए हैं।
पिण्डज जिसका अर्थ है स्तनधारी प्राणी। 
ऊष्मज अर्थात तापमान तथा भौगोलिक स्थितियों से उत्पन्न अर्थात वायरस एवं बैक्टीरिया इत्यादि।

एक छोटे से उदाहरण से जाति को समझा जा सकता है। रामायण के सम्वाद कुछ ऐसे हैं, “यह सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण का प्रश्न है”, “दानव जाति के संहार के लिए प्रभु श्रीराम संकल्पबद्ध हैं”। यहाँ ध्यान दें तो पता चलता है कि मानव एक अलग जाति है और दानव अलग। इसी प्रकार किसी वायरस या बीमारी के विषय में कहा जाता है कि यह पूरी मानव जाति के लिए एक खतरा बन चुका है न कि यह कहा जाता है कि यह वायरस ब्राह्मण जाति के लिए खतरा बन गया है। इसी प्रकार विज्ञान में भी प्राणी जात और पादप जात जैसे शब्दों का वर्णन किया जाता है। 

अब यहाँ समझने की बात है कि हम जिस जाति व्यवस्था की बात करते हैं और जो समाज का वर्गीकरण करती है वह यूरोप के द्वारा दी गई Caste सिस्टम के समान है जो वास्तव में भेदभाव पर आधारित है।

इस प्रकार का जातिगत विभाजन शुरू होता है मुस्लिम आक्रांताओं के दौर में। हुआ ये कि जब इन आक्रांताओं के लिए भारतवर्ष पर विजय प्राप्त करना कठिन प्रतीत होने लगा तब इन्होने समाज में वर्ग आधारित विभाजन का बीज बोया। ये आक्रांता चतुर थे और इन्हें ज्ञात था की भारतवर्ष को तोड़ने का कार्य सरल नहीं है। इसलिए उन्होंने तमाम तरह के हथकंडे अपनाए। साहित्यिक उलटफेर करवाए। भारतवर्ष के लोगों में अपनी ही संस्कृति के प्रति घृणा उत्पन्न करने के लिए सामाजिक विचारकों को आगे लेकर आए। इन विचारकों ने कई प्रकार के साधनों को अपनाकर सामाजिक द्वेष की भावना को प्रबल करने का कार्य किया। यह कार्य सदियों तक चलता रहा और जो कार्य मुग़लों तक अधूरा रहा उसे यूरोपियों ने पूरा कर दिया। यूरोपियों को एक बना बनाया मंच प्राप्त हो चुका था। आवश्यकता थी संसाधनों का उपयोग करके वर्णगत विभाजन के इस बीज को समाज के सबसे आखिरी छोर तक लेकर जाने की। यूरोप में जो अलग अलग प्रकार का भेदभाव पनप रहा था उसी से प्रेरणा लेकर अंग्रेजों ने भारतवर्ष की सनातन से चली आ रही वर्ण व्यवस्था को जातिगत व्यवस्था में बदल दिया जिसका आधार ऊंच नीच और श्रेष्ठता था।

यह स्थिति आज भी बनी हुई है। भारतवर्ष का समाज जातियों में विभाजित है। हम जाति का अर्थ समझें बिना आपसी युद्ध में अपने सनातन और उसकी महान परम्पराओं की बलि देते जा रहे हैं। हिन्दू संगठन का प्रयास लगातार क्षीण होता जा रहा है और इसका एकमात्र कारण है, अपनी व्यवस्था के प्रति असंतोष। वर्ण शब्द राजनीति की भूल भुलैया में विलुप्त हो चुका है। उसका स्थान जाति ने ले लिया है। वर्तमान भारतवर्ष में जाति का उपयोग मात्र राजनैतिक हो चुका है। यदि वर्तमान विश्व की बात करें तो भला ऐसा कौन सा देश है जिसकी कल्पना बिना वाणिज्य, उद्योग और सेवा के की जा सकती है। ऐसे में यदि हम अपनी वर्ण व्यवस्था की बात करें तो वैश्य और शूद्र कहाँ से नीच वर्ण के हो गए। वास्तविकता तो यह है कि सनातन में वर्णित वर्ण व्यवस्था में किसी प्रकार का प्राथमिकता क्रम है ही नहीं तो फिर लड़ाई कैसी। यह लड़ाई इस हद तक चली गई कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान करना पड़ गया। इसमें भी जाति को आधार मान लिया गया।

आज आवश्यकता है वर्ण, वर्ण व्यवस्था, जाति एवं जाति व्यवस्था को सुपरिभाषित करने की। वैसे भी हिन्दू धर्म इतना महान है कि परिस्थितियों के साथ लगातार यात्रा करता रहता है किन्तु इस यात्रा का महत्वपूर्ण पहलू है कि मूल कहीं पीछे न छूट जाए। यदि मूल में ही विष घोल दिया जाएगा तो वृक्ष कैसे तैयार हो पाएगा। यह राष्ट्र निर्माण का विषय है। इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही न होने पाए इसका ध्यान रखना हमारे सनातन के बुद्धिजीवियों का कर्त्तव्य है।

वर्ण और जाति का अंतर समझिए और जो भी इस समाज और अंततः इस महान राष्ट्र के विरुद्ध ऐसे षडयंत्र करता है उन्हें जानिए क्योंकि आज निद्रा का त्याग नहीं किया तो कल काली रातें आएंगी और उन्हें जागकर ही बिताना होगा।   

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ओम द्विवेदी
Writer. Part time poet and photographer.

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