नाकारा पुलिस, निर्लज्ज सरकार और प्रगतिशील मीडिया का मुखर मौन

थानागाजी दुष्कर्म मामला

अलवर का थानागाजी दुष्कर्म मामला राजस्थान की कांग्रेस सरकार को बदनाम, नाकारा और लापरवाह और पुलिस तंत्र को निर्लज्ज साबित करने के लिए पर्याप्त है। ‘चुनाव जीतने के लिए….सरकार ने मामले को दबाकर रखा…।’ अगर राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ के इस बयान में थोड़ी भी गैर राजनैतिक सच्चाई है, तो किसी भी प्रदेश के राजनैतिक और सामाजिक तंत्र के लिए यह बहुत खतरनाक संकेत है। पुलिस, जैसा उसके बारे में कहा और सुना जाता है, अनेक सुधारों के बावजूद वह राजनीतिक आकाओं की पूंछभर है, जो मक्खियों और राजनैतिक मच्छरों को उड़ाने भर के लिए होती है। क्या अलवर जिले के थानागाजी क्षेत्र में दलित महिला के लिए साथ हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने राज्य के राजनैतिक तंत्र के माथे पर हल्की भी सिकन पैदा की। शायद नहीं। अगर होती तो, राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत चुनाव प्रचार पर जाने से पहले पीड़िता का दर्द बांटने और उसे न्याय दिलाने का आश्वासन देने अब तक थानागाजी पहुंच चुके होते। लेकिन सोलह मई आते आते बहुत देर हो गई। घटना के पूरे इक्कीस दिन और इस घटना के सार्वजनिक होने के चौदह दिन बाद मुख्यमंत्री अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ पहुंचे।

अब घटना का पुलिसिया हाल जानते हैं। 26 अप्रेल को दोपहर में अलवर के थानागाजी इलाके में मोटरसाइकल पर अपने घर लौटते दलित दंपती को गुर्जर समुदाय के कुछ आपराधिक मानसिकता के लड़के रोकते हैं। उनसे झगड़ा करते हैं। उन्हें एक सुनसान जगह ले जाकर दलित महिला के साथ उसके पति के सामने ही दुष्कर्म करते हैं। और हंसते हुए उसका वीडियो बनाते हैं। और उसे वायरल भी करते हैं। इस वीडियो में उनका अट्टाहास, कानून व्यवस्था का भद्दा मजाक है। जैसे, वे हंसते हुए पुलिसिया व्यवस्था को चिढ़ा रहे थे- तू मेरा क्या उखाड़ लेगा? अपराधियों में इतना आत्मविश्वास कहां से पैदा हो रहा है। गौरतलब है कि राज्य के मुख्यमंत्री राज्य के गृहमंत्री भी हैं।

इस घटना का मनोवैज्ञानिक पहलु अगर राजनैतिक दल समझ पाएंगे, तो शायद आत्महत्या कर लेंगे। मगर इतनी समझ वे खुद में पैदा ही नहीं होने देते। यह घटना मात्र आपराधिक घटना नहीं है। यह एक मनोवैज्ञानिक अपराध है, जो राजस्थान जैसे आमतौर पर आपराधिक नजर से शांत कहे जाने वाले प्रदेश के लिए गंभीर चेतावनी है। थोड़ी देर के लिए सचित्र कल्पना कीजिए, एक पत्नी का उसके पति के सामने दुष्कर्म। उस पीड़िता पर क्या गुजर रही होगी। और उस असहाय पति की क्या हालत हुई होगी, जब वह उन हवशी दरिंदों की जकड़न में अपनी पत्नी की विवशता को देख रहा होगा। और उसकी पत्नी अपनी पथराई आंखों से पति से मदद की गुहार लगा रही होगी। यह तय है कि वह दंपती जीवनभर अपनी आत्मा पर एक भारी बोझ लेकर जीते रहेंगे। और उनके घर पर राजनैतिक दलों की सियासी यात्राएं उनके इस बोझ को बढ़ाती रहेंगी।

अब बात करते हैं पुलिस की। सौ-डेढ़ सौ साल पुराने कानूनों को ढो रही पुलिस के रुख में बदलाव न के बराबर है। संवेदनशीलता को तो जैसे घर में लुंगी की तरह खूंटी पर टांग कर आना इनकी ड्यूटी की हिस्सा है। हर बार जब पुलिस कोई अच्छा काम कर अखबार में जगह बनाती है, तो लगता है अब खाकी के भी हालात बदलने लगे हैं। पुलिस आम लोगों के साथ फ्रेंडली होने लगी है। लेकिन कठोर धरातल पर यह उतना सच नहीं है, जितना अखबारी दुनिया में लगता है। इस अपमानजनक घटना के बाद जब दलित दंपती से वीडियो वायरल की धमकी देकर दुष्कर्मियों ने लगातार पैसों की मांग की तो उन्होंने अलवर के पुलिस अधीक्षक के पास गुहार लगाई। इस उम्मीद से कि जिला कप्तान हमारे साथ न्याय करेंगे। पूरे बहत्तर घंटे यानी तीन दिन बाद थानागाजी के दारोगा ने एफआईआर दर्ज की।

इसके बावजूद दुष्कर्मियों की ओर से पीड़ित दंपती को लगातार वीडियो वायरल करने की धमकियां दी जाती रही। इन धमकियों के बीच जब पीड़ित दंपती थानागाजी थाने के दारोगा के पास फिर पहुंचे और उन्हें धमकियों के बारे में बताया। इस पर थानेदार का जबाव सुनकर उसकी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा का पता चलता है। थाने से पीडित दंपती को जबाव मिला, अगर उन्होंने ऐसा किया तो एफआईआर में एक और धारा लगा देंगे। यानी, उन्हें वायरल करने दीजिए, हम देख लेंगे। कौन से दौर में जी रहा है हमारा तंत्र। गजब की संवेदनशीलता है! असली अपराधी कौन है, यह समझा जा सकता है। किसी दुष्कर्मी से तो अच्छे की उम्मीद नहीं की जा सकती, मगर जिन्हें कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी दे रखी, उसका यह व्यवहार। हम कौनसे पुलिसिया सुधार की बात करते हैं। पहले उन्हें इंसान तो ढंग का बनाएं।

अब और आगे की कहानी। छह मई को राजस्थान में दूसरे चरण की बारह सीटों पर चुनाव होने थे। चुनावी विश्लेषकों के हिसाब से ये सीटें कांग्रेस के मुफीद बताई जा रही थी। अगर यह मामला मीडिया में विस्फोट हो जाता, जो जितना राजनैतिक फायदा नजर आ रहा था, वह सब मटियामेट हो जाता। जाहिर है पुलिस तंत्र अपने राजनैतिक आकाओं के लिए किसी भी तरह का रिस्क नहीं ले सकते थे। लिहाजा एफआईआर पर किसी भी तरह की जांच पड़ताल चुनावी तैयारियों की आड़ में टाल दी गई। मगर उधर सोश्यल मीडिया पर फैलाई गई आग जब चारोँ ओर लपलपाने लगी, तो पुलिसिया तंत्र के हाथ पांव फूल गए।

अब अंदर की कहानी, जिसके सच होने की बहुत ज्यादा संभावना है, मगर उसके तथ्य जांच के विषय हैं। क्या यह संभव नहीं है कि तीस अप्रेल को जब एसपी ने थानागाजी थाने को इस मामले की एफआईआर दर्ज करने के लिए कहा होगा तो बाद में एसपी कार्यालय से इस मामले को किसी तरह दूसरे चरण के चुनाव पूरे होने तक टालने का भी इशारा किया होगा। एसपी कार्यालय को पता था कि मीडिया में मामले की हवा बनते ही सत्तारूढ़ पार्टी की हवा खिसक सकती है। पूर्वी राजस्थान में सियासी समीकरण पलट सकते हैं।

क्योंकि लोगों का आक्रोश ईवीएम मशीनों में अपना गुस्सा भर सकता है। मगर थाने में भी ‘ड्यूटी’ निभाई गई। पूरे तीन दिन तो एफआईआर दर्ज करने में लगाए गए। और इस संवेदनशील मामले को पूरी तरह दबा दिया गया। संवेदनशील इसलिए क्योंकि दुष्कर्मियों के पास उस वाहियात घटना के वीडियो मौजूद थे, जिन्हें वे कभी भी सोश्यल मीडिया के सैलाब में डाल सकते थे। पीड़ित दंपती डरे हुए थे। अपनी बेइज्जती से और दुष्कर्मियों द्वारा लगातार धमकाने और पैसा मांगने से। मगर पुलिस से जुबान लड़ाने का मतलब…सब समझते हैं। संभव है इस मामले में एसपी कार्यालय ने राजधानी स्थित बड़े दफ्तरों से राय मांगी हो, बड़े दफ्तरों ने राजनैतिक दफ्तरों से। मगर, यह तथ्य कभी भी मुख्यधारा में नहीं आएगा।

आम तौर पर ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़ितों की पहचान को छिपाकर रखा जाता है। मगर सहानुभूति दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। राजनैतिक संवेदनशीलता को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। इसके बावजूद राज्य के राजनैतिक मुखिया घटना के पूरे इक्कीस दिन अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ सहानुभूति का प्रदर्शन करने पीड़ित दंपती के घर पहुंचे। और उन्हें न्याय दिलाने का आश्वासन दिया। यह न्याय भी कहीं कांग्रेस का कथित ‘न्याय’ साबित न हो जाए। मगर इससे भी बड़ी बात यह है कि राजनैतिक दलों के पीड़िता के घर पहुंचने से पीड़िता का जीवन सार्वजनिक हो जाता है। मगर किसी भी राजनैतिक दल या नेता ने इस बात की चिंता नहीं की। उनमें पीड़िता के साथ संवेदनशीलता प्रदर्शित करने की होड़ थी। आईपीसी की धारा 228 क और सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश के अनुसार धारा 376 के मामले में पीड़ित पक्ष की पहचान किसी भी रूप में करना अपराध है। और इस मामले में दो साल की कैद का भी प्रावधान है। क्या इस तरह के संवेदनशील मामलों में सहानुभूति जताने का कोई और तरीका नहीं हो सकता? संवेदनशीलता के दिखाने के मामले में राज्य सरकार की मंत्री ममता भूपेश बहुत आगे निकल गईं। उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर पीड़िता का फोटो अपलोड कर दिया। कानून के अनुसार ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष की पहचान उजागर करने वालों को दो साल की कैद का प्रावधान है। क्या ममता भूपेश और सोश्यल मीडिया पर वायरल करने वालों को कानून सजा दिला पाएगा। क्योंकि ये लोग भी इस दुष्कर्त्य में उतने ही भागीदारी हैं।

अब असल जिम्मेदारी है न्याय तंत्र की। आम तौर पर हमारे यहां यहां न्याय तंत्र को उसके ढीलेपन के लिए कोसा जाता है। हालांकि कई बार ऐसे मामलों में न्याय तंत्र ने गजब की तत्परता दिखाते हुए पीड़ित पक्षों को न्याय दिलाया है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे मामलों में पुलिस और प्रशासन कितनी फुर्ती दिखा पाता है। पुलिस, प्रशासन और राजनैतिक उलझनों से निकलकर जब यह मामला न्याय तंत्र के हाथों में आएगा, तो उम्मीद करनी चाहिए कि पीड़ित पक्ष को मानसिक न्याय जरूर मिलेगा और दुष्कर्मियों को उनके पापों की ऐसी कड़ी सजा मिलेगी, कि किसी भी अपराधी की रूह कांप उठेगी।

दुर्भाग्य से स्थानीय मीडिया भी चुनावों में इतना व्यस्त रहा कि जिले में चुनाव के अलावा समाज में क्या हो रहा है, इस पर उसका ध्यान ही नहीं गया। अन्यथा क्या यह संभव है कि चार मई को सोश्यल मीडिया पर अपलोड किया वीडियो उनके मोबाइल तक नहीं पहुंचा हो। न जाने मीडिया कौनसे धर्म का पालन कर रहा था।

थोड़ी चर्चा देश के कथित प्रगतिशील मीडिया की। जो खुद को मुख्यधारा के मीडिया से अलग मानता है। द वायर, स्क्रॉल, द प्रिंट, द क्विंट, सत्यहिंदी। किसी की भी नजर में यह उतना बड़ा अपराध नहीं था कि इस पर कलम को घिसा जाए। उनकी लिखी रिपोर्टों के अनुसार यह एक सामान्य आपराधिक घटना थी, जिसमें ‘उछालने’ जैसा कुछ भी तत्व नहीं था। मगर, सच यह कि यह वही अलवर जिला है जहां मॉब लिंचिंग की कथित घटना को जमकर मसाले लगाकर दुनियाभर में परोसा गया। गुजरात के ऊना में दलितों को साथ कथित अत्याचार की घटना पर कई दिनों तक रिपोर्टें दिखाई गई। सरकार, कानून व्यवस्था, पुलिस तंत्र को खूब कोसा गया। तो क्या यह समझा जाए कि कब, क्या, कहां, और किस तरह ‘उछाला’ जाए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वहां सत्ता में कौन है?

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