क्या ‘कांग्रेस पार्टी’ को आज तक नहीं समझ पाई भारतीय जनता पार्टी?

नयी दिल्ली. भारतीय जनता पार्टी को लगभग 38 साल हो गए हैं और वो यह दावा भी करती है कि वो कांग्रेस पार्टी की घोर विरोधी है। किसी विरोधी राजनैतिक दल को समझने के लिए क्या इतना समय काफी नहीं है? क्या इन चार दशकों में बीजेपी पूरी तरह कांग्रेस को पहचान पाई है? लगातार धोखा खाने के बाद भी क्या भाजपा, कांग्रेस पार्टी के बयानों को गंभीरता से लेती है?

आगे हम कुछ घटनाओं का सन्दर्भ लेकर यह जानने की कोशिश करेंगे कि क्या बीजेपी वाकई में अपने विरोधी दल को पहचान पाई है या नहीं?

सबसे पहले बात करते हैं राफेल डील की, जिसके सहारे राहुल गाँधी ने अपनी चुनावी नैया पार लगा ली है। हालाँकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा को थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन इस मुद्दे से अगर किसी का फायदा हुआ है तो वो है कांग्रेस पार्टी।

चुनावी रैलियों के अलावा कांग्रेस पार्टी ने इसे न्यूज़ चैनलों पर भी खूब भुनाया है। तथ्य उनके साथ नहीं थे फिर भी Ecosystem की सहायता से उन्होंने अपना हित साध ही लिया। दूसरी ओर बीजेपी कांग्रेस को नैतिकता का पाठ पढ़ाती ही रह गई कि राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। अमित शाह जी राहुल गाँधी से उनकी सूचना का सोर्स ही पूछते रह गए। हद तो तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बीजेपी के नेता राहुल गाँधी से माफ़ी माँगने की मांग करने लगे।

तीन बड़े राज्यों में आप अभी-अभी चुनाव हार गए और आपको राहुल गाँधी के माफ़ी की चिंता सता रही है! और क्या सिर्फ माफ़ी मांगने से काम चल जाएगा? बिना तथ्यों के कोई आपको चूना लगा गया और आप कैमरे के ‘नैतिकता’ पर बहस करते ही रह गए।

दूसरा है क्रिश्चियन मिशेल का मुद्दा। जब कांग्रेस पार्टी से जुड़े तीन-चार वकील मिशेल की ओर से कोर्ट में उपस्थित हुए तो मीडिया ने बहुत शोर मचाया। भाजपा ने फिर से ‘नैतिकता’ के बाण कांग्रेस पार्टी की ओर छोड़ दिए जो रास्ते में ही फुस्स हो गए क्योंकि नैतिकता का कोई बाण उन्हें छू भी नहीं सकता। उस वकील को पार्टी से निकाल दिया गया और ऐसा प्रदर्शित किया गया जैसे देश पर बहुत बड़ा एहसान कर दिया गया हो!

जबकि ध्यान से देखने पर यह पता चलता है कि इस मामले में भी कांग्रेस पार्टी को फायदा ही हुआ है, क्योंकि मिशेल का साथ देने के लिए उन्होंने सही आदमी को सही जगह पहुँचा ही दिया है। वैसे भी मिशेल टीवी पर आकर यह नहीं कहने वाला कि उसने किन-किन लोगों को कब-कब ‘मैनेज’ किया है? अतः इस मुद्दे पर भी भाजपा, कांग्रेस से पीछे ही रही है।

तीसरा है महाभियोग यानि Impeachment। ये एक ऐसा मामला है जिससे कांग्रेस पार्टी को कई फायदे हुए हैं। पहला, अयोध्या का मसला अगले साल तक टल गया है। दूसरा, जजों को जो संदेश देना था, वो पार्टी ने दे दिया और तीसरा, न्यायधीशों को खुलेआम डराने के बावजूद उन्हें किसी को जवाब देना नहीं पड़ा।

किसी ने उनसे ये नहीं पूछा कि भाई ये क्या चल रहा है? किसी भी दूसरे देश में जहाँ लोकतंत्र है, वहाँ ऐसा करना और बचकर निकल भी जाना क्या संभव है? अमेरिका, ब्रिटेन या अन्य पश्चिमी देशों में क्या ऐसा हो सकता है? हमारे यहाँ यह कोई मुद्दा ही नहीं है, ना ही इसकी कोई चर्चा हुई। सबने ऐसा मान लिया कि ये सब तो चलता रहता है, कोई बड़ी बात नहीं है। अब किसी को याद भी नहीं है कि कांग्रेस पार्टी ने मुख्य न्यायधीश के खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिश भी की थी, उल्टे कुछ दिन बाद लेफ्ट नेताओं ने यह भी कहना शुरू कर दिया था कि केंद्र सरकार न्यायधीशों पर दबाव डाल रही है।

चौथा मुद्दा है कर्जमाफी का। इस मामले में भी कांग्रेस पार्टी के सुर कुछ अच्छे नहीं लग रहे हैं। चुनाव परिणाम के बाद जैसे ही यह झूठी खबर आई कि केंद्र सरकार किसानों का क़र्ज़ माफ़ करने वाली है, उसी वक़्त ‘कर्जमाफी’ का भाग्य लिखा जा चुका है।

इन सभी मामलों से स्पष्ट है कि देश की राजनीति में फिलहाल ‘नैतिकता’ का कोई स्थान नहीं है। बीजेपी यह जितनी जल्दी समझ जाए यह उनके लिए अच्छा होगा। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि देश की राजनीति को साफ़-सुथरा दिखाने का सारा बोझ बीजेपी ने अपने सर ले लिया हो, यह सोचकर कि देखो भाई! हमारे यहाँ हालात अभी इतने खराब नहीं हुए हैं।

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