Saturday, September 24, 2022
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होली विशेषांक 2018: वीर्य का गुब्बारा

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भारत के बुद्धिजीवी वर्ग को प्रत्येक वर्ष हिन्दुओं के एक बड़े त्यौहार होली की बहुत ही अधीरता से प्रतीक्षा रहती है. क्यूंकि यही वह समय होता है जब वे लोग अपने पिछले वर्षों के होली विरोधी और हिन्दू विरोधी लेखों को निकालते हैं झाड़ते पोंछते हैं और नये नाम, नये पात्र और नए कलेवर के साथ बड़े ही चाव से छापते हैं. दीपावली के अतिरिक्त यही वह समय होता है जब हिन्दुओं को उनकी औकात बताई जाती है और सारा बुद्धिजीवी सेक्युलर वर्ग एक सुर में यह घोषणा कर देता है कि भारत 80% हिन्दुओं का नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों का है (सिख जैन और पारसी अल्पसंख्यकों को छोड़ कर).

पिछले वर्षों में होली के आते ही पर्यावरण की रक्षा के नाम पर होलिका दहन का विरोध हुआ तो बेचारे हिन्दुओं ने सहिष्णुता दिखाते हुए चुपचाप लकड़ी की जगह कचरा बटोरकर जलाना प्रारम्भ कर दिया ताकि होली का त्यौहार भी मनाया जाये और साथ साथ पर्यावरण की रक्षा भी की जा सके. बुद्धिजीवी वर्ग इतने से संतुष्ट नहीं हुआ तो इसके बाद पानी की बर्बादी पर भाषण शुरू हुए तो बेचारे हिन्दुओं ने एक बार फिर सहिष्णुता दिखाते हुए सूखी गुलाल की होली खेलना प्रारम्भ कर दिया ताकि साहब लोगों की गाड़ियां धोने के लिए पानी कम न पड़ जाए. यहां यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि धर्मनिरपेक्षता की प्रथम शर्त यही है कि भले ही देश के संसाधनों पर पहला अधिकार एक विशेष अल्पसंख्यक समुदाय का है किन्तु पर्यावरण की रक्षा, साफ सफाई, न्याय व्यवस्था का पालन, संविधान का सम्मान इत्यादि का पहला उत्तरदायित्व हिन्दुओं का ही होगा.

इस वर्ष भी होली परंपरा का पालन करते हुए भारत के धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी वर्ग ने होली को विशेष बनाने के लिए कुछ नया प्रयोग किया और वह प्रयोग था वीर्य से भरा हुआ गुब्बारा.

जो लोग अब तक अन्धकार में जी रहे हैं और नहीं जानते कि वीर्य के गुब्बारे से होली कैसे खेली गई है उनको पहले संक्षेप में जानकारी देना आवश्यक है:
दिल्ली में किसी भीड़ भरे बाजार में किसी लड़की पर कहीं से एक पानी का गुब्बारा आकर लगता है. लड़की छू कर देखती है तो कुछ चिपचिपा सा पदार्थ प्रतीत होता है जो कुछ समय बाद सूख जाता है और सफेद निशान बचा रह जाता है. लड़की इसी अवस्था में अपने हॉस्टल पहुँचती है जिधर कुछ लड़कियां आपस में बात कर रही होती हैं कि आज बाजार में किसी लड़की पर वीर्य से भरा गुब्बारा फेंका गया है. पीड़ित लड़की तुरंत इंस्टाग्राम पर इस घटना की जानकारी देती है जिधर से उसके किसी रिश्तेदार को भी इस घटना का पता चलता है. वह रिश्तेदार तुरंत इस घटना को फेसबुक पर शेयर करता है और कुछ ही पलों में यह समाचार जंगल की आग कि तरह देश भर में फ़ैल जाता है. प्रत्येक समाचार इसी पंक्ति के साथ प्रारम्भ होता है कि इस होली पर पुरुषवादी क्षुद्र मानसिकता वाले जाहिल गंवार हिन्दू पुरुषों के द्वारा महिलाओं पर वीर्य के गुब्बारे फेंके जा रहे हैं.

हर बार की तरह हिन्दुओं ने मूर्खतापूर्ण आदर्शवाद का प्रदर्शन करते हुए बिना गलती किये ही सर झुका लिया है और ऐसे मुंह लटकाए बैठे हैं जैसे गुब्बारे में उन्हीं का वीर्य भरा था. किसी भी घटना पर प्रतिकार न करना और आरोप लगाए जाने के पहले ही आरोपों का उड़ता हुआ तीर पिछवाड़े में लेकर बैठ जाना हिन्दुओं की सदियों पुरानी आदत रही है जो कि अब परंपरा का रूप ले चुकी है. इन बेचारों ने तो तब भी मुंह नहीं खोला जब कांग्रेस सरकार के जांच दल ने बताया था कि गोधरा में ट्रेन के डब्बे को भीतर से बंद करके हिन्दुओं ने स्वेच्छा से सामूहिक आत्मदाह कर लिया था. ये बेचारे तो तब भी मुंह नहीं खोलते जब हर दूसरी फिल्म में पादरी या मौलवी कोई सम्मानित ज्ञानी व्यक्ति होता है लेकिन पूजा पाठ करने वाला हिन्दू भांड या मुर्ख विदूषक होता है.

अब इस घटना का थोड़ा विस्तार से विश्लेषण करते हैं.
सबसे पहले घटना के समय ध्यान दीजिए तो समझ आएगा कि होली का त्यौहार बस आने को ही है लेकिन वातावरण में एक विचित्र सी शांति है, होली सर पर है लेकिन बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्ष समुदाय ने अभी तक होलिका दहन को लेकर या पानी की बचत को लेकर न ही तो हिन्दुओं की छीछालेदर शुरू की है न ही कोर्ट में कोई याचिका लगाईं है. हिन्दू भी हैरान परेशान बैठा सोच रहा है कि क्या इस बार का त्यौहार बिना गाली खाए सूखा सूखा ही बीत जायेगा..! लेकिन भयावह सी लगने वाली यह शांति असल में तूफ़ान के पहले वाली शांति थी…. अचानक एक वीर्य से भरा गुब्बारा कहीं से आता है और इस शांति को भंग करते हुए होली के प्रारम्भ कि घोषणा कर देता है.

हिन्दुओं का प्रत्येक त्यौहार इसी तरह से प्रारम्भ होता है. दिवाली के दस दिन पहले अचानक पटाखों पर प्रतिबंध लग जाता है, जलीकटू के दस दिन पहले अचानक जानवरों के उपयोग पर प्रतिबंध लग जाता है, दहीहंडी के दस दिन पहले ही अचानक हांड़ी की ऊंचाई पर प्रतिबंध लग जाता है. यह सब करते समय याचिकाकर्ता और न्यायलय के द्वारा समय का विशेष ध्यान रखा जाता है और निर्णय ऐसे समय पर दिया जाता है कि बौखलाए हिन्दुओं को ना तो प्रतिक्रिया देने का अवसर मिले ना ही अपील करने का समय मिले. और यदि पुनर्विचार के लिए अपील कर भी दी तो आजतक न्यायालय ने हिन्दुओं के पक्ष में कभी भी आसानी से अपना निर्णय नहीं बदला है. हिन्दुओं का कोई भी त्यौहार बिना अपमानित हुए पूरा नहीं होता.

अब घटना के पात्रों पर गौर करते हैं… पीड़ित लड़की नार्थ ईस्ट की है क्यूंकि यदि लड़की उत्तर भारत कि होती या साड़ी पहने हुए होती तो सहानुभूति कुछ कम हो सकती थी. लड़की के समर्थन में नारे लगाते लोग जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी के वो लोग हैं जिनका जन्मजात कर्त्तव्य है हिन्दुओं के त्यौहारों परम्पराओं के साथ चीरफाड़ करने का, हिन्दुओं के प्रत्येक त्यौहार के पहले हिन्दूविरोधी माहौल खड़ा करना. लेख छापने वाला मीडिया बुद्धिजीवी सेक्युलर खेमे का है जो कभी कभी समय काटने के लिए भी हिन्दुओं को गाली दे लेता है. सबसे महत्वपूर्ण पात्र वीर्य का गुब्बारा है क्यूंकि पानी का गुब्बारा इस घटना को इतना महत्वपूर्ण नहीं बना पाता.

मीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार लड़की बहुत ही डरी हुई है इसलिए पुलिस के पास भी नहीं जा सकी और इतनी अधिक घबराई हुई है कि उसने अपनी सहेलियों से भी इस घटना कि चर्चा नहीं की फिर भी लड़की इंस्टाग्राम पर घटना की सारी जानकारी विस्तार से डाल देती है. लड़की का रिश्तेदार इस घटना को फेसबुक पर शेयर करता है (संभवतः इस डरी हुई लड़की की अनुमति के बिना ही) और आश्चर्यजनक रूप से मात्र एक घंटे में सारे मीडिया तक यह समाचार पहुँच जाता है. इस स्थिति में यह स्पष्ट हो जाता है कि लड़की अकेली नहीं थी बल्कि संभवतः मीडिया के बहुत से लोगों को पहले ही इस घटना के होने का पता था. यहाँ तक कि अलग अलग लोगों के द्वारा इस घटना पर लिखे गए लेखों की भाषा तक बहुत हद तक समान थी.

लड़की की पोस्ट को ध्यान से पढ़ें तो समझ आता है कि बहुत ही चतुराई से इन लोगों ने स्वयं को किसी भी संभावित न्यायिक कार्यवाही से बचा लिया है. लड़की पोस्ट में कहीं भी सीधे सीधे यह नहीं कह रही है कि उसके ऊपर वीर्य का ही गुब्बारा फेंका गया है बल्कि उसने कुछ लड़कियों कि आपस कि बातों को सुनकर अनुमान लगाया कि संभवतः उसके बारे में ही बात हो रही है. ऐसी स्थिति में यदि लड़की पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने का या हिन्दुओं के विरुद्ध द्वेषपूर्ण षड्यंत्र का आरोप लगा भी दिया जाये तो वह साफ बच निकलेगी. दूसरी और मीडिया भी यह कह कर बच निकलेगा कि पोस्ट से यह स्पष्ट नहीं है कि लड़की के ऊपर फेंके गए गुब्बारे में वीर्य नहीं था.

यदि तथ्यों की बात करें तो पहले तो गुब्बारे में वीर्य भरना आसान काम नहीं है. होली का गुब्बारा लगभग वयस्क हथेली के आकार का होता है और इसको ठीक से फोड़ने के लिए कम से कम ९०% पानी से भरा जाना आवश्यक है. ऐसे में वीर्य भरने के लिए कम से कम १२-१५ लोगों से वीर्य एकत्र करना पड़ेगा और ऐसा करने से गोपनीयता भंग होने का खतरा है. यदि १-२ लोगों के वीर्य को पानी में मिलाकर भरा गया है तो इस स्थिति में वीर्य पानी में घुल जाएगा और फेंके जाने पर चिपचिपा नहीं लगेगा. यह भी संभव है कि गुब्बारे में उस बैल का वीर्य था जिसकी गाय को भोजन की आजादी के नाम पर काट डाला गया. इसमें से किसी भी स्थिति में वीर्य सफेद निशान नहीं छोड़ता बल्कि पानी सूखने के बाद रंगहीन, गंधहीन सूखी पपड़ी के रूप में जम जाता है. इसलिए वीर्य के गुब्बारे वाली सारी की सारी थ्योरी ही झूठी लगती है.

लेकिन जो भी हो, मीडिया ने अपना काम कर लिया है, बुद्धिजीवियों और धर्मनिरपेक्षों ने भी पिछले ३-४ दिनों में जम कर कीचड़ की होली खेल डाली है और हिन्दुओं को उस कीचड़ में पटक पटक कर उनकी औकात बता दी गई है. सड़कों पर तो हंसी खुशी का वातावरण था किन्तु दलाल मीडिया यही चिल्लाता रहा कि लोग डरे हुए हैं और होली नहीं खेल रहे हैं. अब यदि पुलिस जांच में वीर्य का गुब्बारा झूठा निकलता है तो भी जेएनयू वाले कौन सा माफ़ी मांगने वाले हैं, और कौन सा मीडिया से कोई प्रश्न किया जायेगा.

अभी तक तो बाटला हॉउस एनकाउंटर को फर्जी बोलने के लिए और इंस्पेक्टर शर्मा की मृत्यु का मजाक उड़ाने के लिए भी बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्ष समुदाय ने (आतंकवादी अरीज़ खान के गिरफ्तार होने के बाद भी) क्षमा नहीं मांगी है. अभी तक तो जुनैद और इकलाख के लिए छाती कूटने वालों ने अंकित और चन्दन के लिए भी क्षमा नहीं मांगी है.

इतना सब होने के बाद पुलिस के द्वारा त्वरित जांच किया जाना और दोषियों की पहचान किया जाना अत्यंत आवश्यक है क्यूंकि यदि यह घटना सत्य है तो फिर अपराध अक्षम्य है और दोषी को दंड मिलना ही चाहिए और यदि यह घटना चर्च पर हमले की तरह फर्जी है तो इस स्थिति में दोषियों का पकड़ा जाना और भी आवश्यक हो जाता है क्यूंकि जब चर्च पर लगातार हमले हो रहे थे और हिन्दुओं को कठघरे में खड़ा किया जा रहा था तो सारे मामलों में जांच के बाद अपराधी कोई मुस्लमान या ईसाई ही निकला. जब दलितों को बड़ी मूंछ रखने के लिए पीटा जा रहा था तो जांच में भीमवादियों का हाथ निकला. इस कारण से आम जनमानस में यह धारणा बन चुकी है कि हिन्दुओं के विरुद्ध कोई भी षड्यंत्र होने पर उसमें मुस्लिम ईसाई या भीमवादियों का ही हाथ होगा और इसका परिणाम यह होता है कि हिन्दुओं का गुस्सा किसी ना किसी निर्दोष व्यक्ति पर ही निकल जाता है.

देश कि न्याय व्यवस्था में हिन्दुओं का टूटता हुआ विश्वास फिर से बनाने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि ना केवल दोषियों कि पहचान शीघ्र से शीघ्र की जाए बल्कि ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी, धर्मनिरपेक्ष तत्वों पर भी अंकुश लगाया जाए जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग करते हुए हिन्दुओं को भड़काने में लगे रहते हैं.

जब तक दोषियों को पहचान कर दण्डित नहीं किया जायेगा तब तक हिन्दुओं के मन में यह प्रश्न उठा रहेगा कि आखिर यह सब करके इन लोगों को क्या मिलता है? हर त्यौहार पर हिन्दुओं को गाली दे देना और उनके विरुद्ध विषवमन करना क्यों आवश्यक है? किसी भी छोटी बड़ी सांप्रदायिक घटना पर यदि मुसलमान मरे तो छाती कूटना, हिन्दू मरे तो मजाक उड़ाना क्यों आवश्यक है? चन्दन गुप्ता मरे तो भी हिन्दू को दोष देना, जुनैद मरे तो भी हिन्दू को दोष देना क्यों आवश्यक है? पुलिसवाला मरे तो मुंह ढांप कर सो जाना, आतंकवादी मरे तो भारत कि बर्बादी के नारे लगाना आखिर क्यों आवश्यक है? कब तक न्यायालय हिन्दुओं के त्यौहारों परम्पराओं पर हास्यास्पद आदेश थोपते रहेंगे? कब तक असामाजिक तत्व बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्ष मुखौटे लगाकर हिन्दुओं को प्रताड़ित करते रहेंगे और कब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे असामाजिक तत्वों को सरकारी संरक्षण मिलता रहेगा? कब तक इस देश की ८०% जनता को दलाल मीडिया, बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्षों की गुलामी में जीना होगा?

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