Saturday, November 26, 2022
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औरंगजेब की रूह का मणिशंकर अय्यर को पत्र

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आदरणीय मणिशंकर अय्यर जी,

मैंने हाल ही में सुना है कि आपने कांग्रेस अध्यक्ष/शहजादे राहुल गांधी की तुलना मेरे साथ की है।

तुम्हारी ऐसा करने की हिम्मत कैसे हुई?

हमारे जमाने में यह जरूरी नहीं था कि मुगल बादशाह का बेटा होने से मैं अपने आप अगला बादशाह बनता। पहले मुझे उत्त्तर अफगानिस्तान, फिर दक्कन और गुजरात का शासक बनकर अपनी काबिलियत साबित करनी पडी, हां वही गुजरात जहां आपका शहजादा अभी भी लडखडा रहा है।

आपके शहजादे की तरह मुझे कुछ भी बना बनाया नहीं मिला। मुझे कुतुबशाहि, आदिलशाहि और सफाविदों के साथ लडाईयां लडनी पडी। मुझे अपने भाइयों शुजा, मुराद और दारा शिकोह के खिलाफ लडना पडा, जीसकी मैने आखिरकार हत्या करवा दी। क्या राहुल गांधी को किसी की हत्या करनी पडी? लडाई की बात तो दूर, उन्होंने किसी को चुनाव में भी नहीं हराया।

और तुमने अपने शहजादे की तुलना मेरे अब्बू के साथ की? मेरे अब्बू के साथ? माना की मैंने आगरा के किले में उनहें कैद कर रखा था, फिर भी इस तुलना से मेरा खून खौल उठता है। मेरे अब्बू को भी दक्कन, बंगाल, बिहार, दिल्ली और गुजरात का शासन करना पडा था और मुगल बादशाह बनने से पहले अपनी मां नूरजहां का विरोध सहना पडा था, जबकि आपके शहजादे तो इन सभी प्रांतों को हार चुके  है। अमेठी, वह एकमात्र जागीर जहां आपके शहजादे का शासन चलता है, खंडहर बना पडा है।

बस एक बात के लिये आपके शहजादे को सलाम करता हूं। मेरे परीवार के इस मुल्क में बहुत सारे महल और मकबरे है। लेकीन जीतनी सडकें, संस्थानों और योजनाएं आपके शहजादे के परीवार के नाम पर है, हम उसकी बराबरी कभी भी नहीं कर सकते।

आपने यह तुलना करने की जो नीच हरकत कि है, इसके लिये मैं चाहूंगा की  आप न केवल मेरी बलकि पूरे मुगल परिवार की माफी मांगे। मैंने यह पत्र जानबूझकर हिंदी के बजाय हिन्दुस्तानी में लिखा है ताकि आप यह बहाना न दे सको की आप मेरे पत्र को समझ ही नहीं पाये क्योंकि हिंदी आपकी मूल भाषा नहीं है।

यदि मैं जिंदा होता, तो मैं आपको हाथियों के पैरों के नीचो कुचलवा देता या लाल किले में कैद कर देता या फिर फांसी के तख्ते पर suspend कर देता. नीच बयान देने में तो आपने अपनी एक niche बना ली है। मैंने St. Stephen’s College जैसे काफिर महाविद्यालय में पढाई नहीं की है लेकिन अंग्रेजी मुझे भी आती है।

आपकी,
औरंगजेब की रूह

This post is a slightly modified translation of the following article by Anand Walunjkar:
http://www.opindia.com/2017/12/open-letter-to-mani-shankar-aiyar-from-the-ghost-of-aurangzeb/

Additional inspiration from this Tweet by Ashwin Kumar:
https://twitter.com/ashwinskumar/status/938979113724919808

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